शनिवार, 23 जून 2012

मी.... दी... मॉम... फेसबुक ग़ज़ल एंड फ्रॉम ब्लॉग टू शिखा अनु... : महफूज़


आज मेरे कुछ फेवरिट पोस्ट्स ... की बात हो जाये। इन पोस्ट्स ने आज मेड माय डे.... दरअसल आज मेरे पास कुछ लिखने को नहीं था और मन बहुत कर रहा था कुछ लिखने को... तो सुनीता दी की पोस्ट ने आज रुला दिया। तो यही सोचा की क्यूँ न आज जो पोस्ट्स पढ़ीं उन्हें रिशेयर कर दिया जाए.. कुछ अपने अंदाज़ में।


बात अपनों की...

हाँ बात सिर्फ़ अपनों की। जो मेरे अपने हैं... अब आप कहेंगे ये अपने कहीं आपके रिश्तेदार तो नही? रिश्तेदार कहें तो रिश्ता मेरा उन सभी से है जिन्हें दिल मानता है अपना। किसी भी रिश्ते पर बात करने से पहले मै बात करूँगी मेरे पिता की।

मै अपने माता-पिता, भाई बहनों के साथ एक खूबसूरत शहर पिलानी में रहती थी। अब इसे शहर कहें या कस्बा पिलानी जो पहले दलेल गड़ के नाम से जानी जाती थी। सचमुच मेरी जन्म भूमि भी मेरी माँ की तरह बहुत खूबसूरत लगती है।
मेरे पिता श्री रमाकांत पांडॆ
  मेरे पिता एक बहुत ही सुलझे हुए संवेदनशील व्यक्तित्व के इंसान हैं। वो मुझे चालीस साल से जानते हैं लेकिन मै उन्हें तब से जानती हूँ जब मै चार साल की थी। इसके पूर्व का मुझे याद नही। मुझे याद है जब मेरे पिता देख सकते थे। मेरा हाथ पकड़ कनॉट प्लेस मोती हलवाई की दुकान पर जाते थे जहाँ मुझे रसमलाई खाने को मिलती थी। समोसे से मुह जल जाने का डर था वो बस माँ और बहन के लिये पैक करवा कर लाया जाता था। बस वही कुछ साल याद हैं जब पिता मेरा हाथ पकड़ मुझे ले जाते थे। और मै उछलती-कूदती उनके साथ तितली सी उड़ती चलती जाती थी।

एक दिन ऎसा भी आया जब एक हादसे में मेरे पिता की दोनो आँखें चली गई। साथ ही चली गई मेरी माँ की वो खूबसूरती जो हम हर पल पिता की आँखों में देखा करते थे। तितली सी अब मै उड़ना भी भूल गई थी। कितना मुश्किल था वो समय अब मुझे उबड़-खाबड़ रास्तों से सम्भाल कर पिता को मोती हलवाई के ले जाना पड़ता था। वो पिता का पुराना दोस्त था समोसा कुछ सस्ता हो गया था लेकिन अब मुझे रसमलाई पसंद नही थी। रमेशपान वाला भी बहुत अच्छा पान बनाता था। एक छोटा सा गुलकंद वाला पान मुझे भी मिलता था। अब भी मै चलती थी पिता के साथ कनॉट प्लेस मगर उड़ नही पाती थी। मुझे लगता था मै बहुत बड़ी हो गई हूँ। 
मेरे पिता चॉक बनाते हुए
ऎसे हालात में पिता ने हार नही माऊँट आबू से पढ़ाई कर  ब्लाईंड बच्चों को ब्रेल लिपि सिखाने का काम शुरू किया। जब उससे भी काम न चला तो घर में चॉक बनाने का कारखाना लगाया। माँ भी रात-दिन स्वेटर बुन घर का सारा भार उठाने लगी। मुझे  माँ स्वेटर की मशीन का एक पुर्ज़ा सी लगती थी। कैसे सब होगा कुछ मालूम नही था। लेकिन सब कुछ हुआ। मेरे माता-पिता की मेहनत और हम सबका विश्वास आखिर रंग लाया।
मेरे पिता की हिंदी और अंग्रेजी भाषा बहुत अच्छी थी। उन्होनें  अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ाई की थी। मेरी माँ संस्कृत और हिंदी बहुत अच्छी पढ़ाती थी।  मेरी दादी किसी स्कूल में प्राधानाचार्या रह चुकी थी। उनके मार्गदर्शन में हमने एक छोटा सा स्कूल खोला। जिसमें बच्चों को पढ़ाया जाने लगा।
बांसुरी पर भजन बहुत अच्छे सुनाते है मेरे पिता
बहुत मुश्किल होता है किसी हादसे के बाद यूँ उठकर चल देना। लेकिन आज भी याद है मुझको हर वो कसम जो मेरे परिवार ने खाई थी साथ निभाने की। वो खूबसूरत पल जब मेरे पिता बासी रोटी को चूर कर गुड़ से लपेट कर बनाते थे दो लड्डू जिसे मै और मेरा भाई बड़े चाव से खाया करते थे। मुझे याद है माँ की साड़ी से बनी फ़्राक जिसमे बहुत सी झालर थी। जिसे देख कर मेरी बहुत सी सहेलियां पूछती थी क्या अपनी माँ से हमारे लिये बनवा दोगी।

मेरी माँ  श्रीमति संतोष जिन्हें प्यार से दादी लॉर्ड मिंटो कहती थी
मुझे याद है मेरी टूटी-फ़ूटी कविताओं पर पिता का वाह कहना। और माँ का मुस्कुराना।
पहली बार माँ ने एक गीत सिखाया था मुझे...चलो चले माँ बादलों के पार चलें फूलों की छाँव में...मेरी माँ गाती बहुत थी कोयल की तरह लेकिन अब कभी-कभी शादी या विशेष प्रयोजन पर।  कोयल भी तो आम के मौसम में ही कुहुकती है।

मेरी कवितायें मेरी कहानियाँ सब मेरे पिता की बदौलत हैं। उनका विश्वास था मै लिखूंगी एक न एक दिन इससे भी बेहतर लिखूंगी। मै जब भी रेडियो सुनती उसकी नकल करती। जब बड़ी हुई अशोक चक्रधर और न जाने कितने कवियों को देख तमन्ना जागी मंच पर कविता सुनाने की। मेरे पिता को हॉस्य कवितायें बहुत पसंद हैं। । मेरी हर ख्वाहिश पर वो कहते थे...कोशिश करने वालों की हार नही होती... और मै पूरे जोश के साथ लग जाती थी कुछ नया करने। मुझे रंगों से खेलने का बहुत शौक था मगर पिता देख नही पाते थे। हाँ! मेरे कहने पर हाथ से छूकर कहते शाबाश।और मै चश्में के नीचे से चुपके से देखती थी पिता की आँखें।एक बात तो है कभी किसी ने उनकी आँखों में आँसू नही देखे। काले चश्मे के पीछे घूमती आँखे बस मै देख पाती थी।

यही सच है मेरी हर तमन्ना उन्हें मालूम थी मेरी आँखों से वे दुनिया देख पाते थे।आज मंच रेडियों टीवी अखबार पत्रिकायें सब हो चुका... मगर मेरे पिता की आँखें आज भी मेरे साथ चलती हैं। मै जानती हूँ वो आँखें न होकर भी मुझे देख पाये हैं। आज उन्हे आँखें खो देने का कोई मलाल भी नही है...

मेरे माता-पिता
रुला तो नही दिया कहीं आपको? आप भी कहेंगे शानू जी क्या-क्या लिख देती हैं। मगर क्या किया जाये सच भी तो करेले सा कड़वा होता है न।
इति

सुनीता शानू
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इंतज़ार क्यों ?
तोड़ा है विश्वास
हतप्रभ मैं 

तुम्हारी राहें
अलग थलग थीं
सो ,मैं भटकी 

दुश्मनी कहाँ ?
दोस्ती की नींव पर
गहरा घाव 


Posted by संगीता स्वरुप ( गीत ) 
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कई बार यूँ भी होता है...


रौशन  और  खुली,
निरापद राहों से इतर 
कई बार
अँधेरे मोड़ पर 
मुड़ जाने को दिल करता है.
जहाँ ना हो मंजिल की तलाश ,
ना हो राह खो जाने का भय
ना चौंधियाएं रौशनी से आँखें.
ना हो जरुरत उन्हें मूंदने की
टटोलने के लिए खुद को,
पाने को अपना आपा.
जहाँ छोड़ सकूँ खुद को
बहते पानी सा,
मद्धिम हवा सा
झरते झरने सा
निश्चिन्त,हल्का और शांत..
By : शिखा वार्ष्णेय 
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क्षितिजा

क्षितिजा

तुम कहते हो
निकलता हुआ चाँद
मुझे ही ताकता है
पर हर सांझ वो
मुझे बहुत रुलाता है
जब तुम से बिछड़ कर
जाने का वक़्त करीब
आता है ..
तुम से बिछड़ने से पहले
मैं खुद में विस्तार पाती हूँ
कनपटियों पर बजती हैं
खड़-खड़ उसाँस तुम्हारी
और
तुम्हारी ही हँसी के
चाँदी जैसे कण
बिखरने लगते है
मेरे चारो ओर
यह खंड-खंड टूटता हुआ सूरज
 और फटता हुआ मेरा मासूम ह्रदय
किसी तरह भी
रोक नहीं पाता
क्यों.. 
बंधी मुट्ठियों से फिसलती है
हर दिन की आखिरी किरण
दे जाने को एक नई
सांझ जीवन की
उठती हुई ...क्षितिजा को ||

अनु
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My One "GAZAL" Beautifully Designed by Sulaiman Faraz Hasanpuri ji
GAZAL

wahi furqat ke andhere wahi angnaai ho
teri yaadoN ka ho mela shab-e-tanhai ho

main usey jaanti hooN sirf usey janti hooN
kya zuroori hai zamane se shanasaai ho

Itni shiddat se koi yaad bhi aaya na kare
Hosh mein aauon to dunya hi tamashai ho

meri aankhoN mein kai zakhm hain mahroomi ke
Mere tootey huey khwaaboN ki maseehaai ho

vo kisi aur ka hai mujh se bichar kar seema
koi aisa bhi zamane mein na harjaai ho














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कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दूसरों में सिर्फ बुराईयाँ ही देखना चाहते हैं.. और ढूंढते भी हैं.. — in Lucknow City.
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