शनिवार, 27 जून 2009

कुछ पहलू........कुछ फलसफे...और कुछ कवितायें !!

१.

मैंने एक खिले हुए
फूल को तोडा था,
तो मैं तड़प गया था॥

मैंने नोचे थे पंख
एक परिंदे के
तो मैं बिलख उठा था॥

मैंने छेडा था एक
मोती की माला को
तो मैं बिखर उठा था॥
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२.

आज अगर मैं सोचता हूँ
तो बीच में कल आ जाता है
कल कल था
और कल कल होगा
यह याद आ जाता है॥
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३.

मैं तुमसे मिलूंगा
किसी किताब के पन्नों में
नाम अपना दर्ज
होने से पहले,
यह मेरा वायदा है
पर ठीक ऐसा ही हो
जैसा मैं कह रहा हूँ
यह कहना आज शायद
थोड़ा मुश्किल है,
पर कल ?????
नामुमकिन ज़रूर होगा॥
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४.

ख़्वाबों में झांकता हूँ
और गाता हूँ अपना ही राग
लंबे लंबे डगों से
लांघता हूँ दीवारों को
और
खोजता हूँ
उन खोये हुए
पलों को॥
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महफूज़ अली

सोमवार, 22 जून 2009

छू लिया आसमान!!


उसने पूछा की

'आसमान छूने जा रहे हो?'

मैंने कहाँ 'हाँ!!! '

उसने कहा .....

'छू लेना हाथ बढ़ा के

आसमान को '

और मुझे बताना

कैसा था?

फूल सा नाज़ुक

या

रुई सा नरम?


ले आना अपने साथ

थोड़ा सा अहसास

और

कराना महसूस

मुझे......


और मेरा ...............

आसमान....

अब मेरे पास है॥




महफूज़ अली

शनिवार, 20 जून 2009

अजनबी सी लगीं नहीं!!


कभी किसी महफिल

में तुम दिखीं नहीं,

कभी परियों के किस्सों

में भी तुम मिली नहीं।

न जानें क्यूँ फिर भी

मुझे तुम कभी

अजनबी सी

लगीं नहीं॥





महफूज़ अली

सोमवार, 15 जून 2009

खुशी

आज मैंने सुबह
अपने कमरे की खिड़की
खोली थी,
खिड़की के एक कोने में
बादल का एक छोटा सा
टुकडा था।

मैंने फिर पूरी खिड़की खोल दी
बाहर आँगन में
तारों भरे आसमान
के कई टुकड़े पड़े थे॥









महफूज़ अली

शुक्रवार, 12 जून 2009

मोमबत्ती की मौत!!!!!!!!!!!


वो गुलाबी मोमबत्ती,

सौन्दर्य बोध से भरपूर

पीली लपटों में कोलाहल करतीं

अपनी ही रौशनी से खेल रही थी।


उजली रात में भी

अँधेरा जशन मना रहा था

धरती काग़ज़ पर ख़्वाबों की

खेती कर रही थी,

मोमबत्ती फिर भी जल रही थी।


अँधेरा दुस्वप्न की तरह भाग रहा था

जलती पिघलती, मृत्यु-वेदना से शनैः-शनैः

धुंधली होती लपटों में,

मोमबत्ती चिल्ला रही थी

आख़िर कौन अमर होता है?
महफूज़ अली
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