शनिवार, 22 अगस्त 2009

कुछ हिन्दी हाइकू कवितायें!!!


१। गर्मी से प्यासा सूरज,

बादलों से करता बातें,

मानसून अभी नही आया?

------------------------------------

२। जर्ज़र काया की मेरी कामवाली,

कहती नही छोडूंगी आपका घर,

क्यूंकि पेट नही तो भेंट नहीं॥

------------------------------------

३। सुनो! तुम रोना मत,

मुझे काफ़ी आगे जाना है, मैं लौटूंगा...

मैंने ऐसा तो नही कहा॥

-------------------------------------

४। लाल सूरज उगता ऊँचा, ऊँचा......

निष्फल पेड़ों से भी ऊँचा,

खड़ा निड़र, मुहँ चिढाता॥

-------------------------------------

५। नदिया बहती कल-कल ,

लादे पीठ पर कोहरा

और पेट में बर्फ॥

---------------------------------------


(हाइकू कविता लिखने की जापानी विधि है, जिसे हम 5-7-5 के Syllables में लिखते हैं, हिन्दी में लिखने के लिए कोई ज़रूरी नही है की हम Syllables को फोल्लो करें.... लेकिन तीन पंक्तियाँ का होना ज़रूरी है..... यह एक कोशिश है.... उम्मीद है की ठीक लगेंगी..... )

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

जब भी तुम्हें .......


कविता!!!!!!!!!!!


जब भी तुम्हे लिखता हूँ,

तुम किसी की कहानी बन जाती हो।

जब भी तुम्हें सुनता हूँ,

तुम किसी की ज़ुबानी बन जाती हो।

जब भी तुम्हें पढ़ता हूँ,

तुम किसी की यादें बन जाती हो।

जब भी तुम्हें याद करता हूँ,

तुम कविता बन जाती हो॥

मंगलवार, 18 अगस्त 2009


था दिन आज ही का,
चली गयीं थीं तुम मुझे छोड़ के ,
हमेशा के लिए ...........
फिर कभी न आने के लिए .............
क्या क़ुसूर था मेरा ?


सोच रहा हूँ कि
क्यूँ होता है ऐसा ?
क्या कभी तुमसे मिल पाउँगा?
क्यूँ जो होता है सबसे प्यारा
वो ही होता है दूर हमेशा........?????


हमेशा ही रहेंगीं यह आँखें नम
और
यादें ग़मज़दा ........
तुम आज भी बसी हो मेरी साँसों में
धडकनों में,
क्यूंकि हूँ तो अंश ही तुम्हारा.....


या! ख़ुदा , एक बार मुझपर थोड़ा सा रहम कर दो,
बस एक बार मुझे मेरी माँ से मिला दो !!!!!!!
क्यूंकि यह काम है बस तुम्हारा ही.....
क्या वो तुम्हे भी इतनी पसंद आई ?????


एक ख़्वाहिश है मेरी
बस एक बार जी भर के उन्हें देख लूं
इन तरसती आंखों को थोड़ा सुकून पा लूँ .....
बस मेरी इतनी इल्तिजा है तुमसे
उनका पूरा ख़याल रखना
कभी न आंसू आए उन आंखों में
मुस्कुराए वो हमेशा की तरह ...........
उनको जन्नत बख्शना
और उनकी बगिया में हमेशा ही फूलों को महकाना ......
और अपने लिए बस मांगूं मैं इतना ही.....
हर जनम में बनाना उन्हें ही

"मेरी माँ!!"

बुधवार, 12 अगस्त 2009

ये सूखे फूल आज भी ताज़ा हैं......


ढल जाती है जब शाम
तब तुम बहुत याद आती हो ,
देखता हूँ तुम्हारे दिए हुए फूलों को अब भी
जो सूखे से अब नज़र आते हैं ..........
तुम्हारे जाने से
कुछ खोता जा रहा हूँ ,
भरी भीड़ में भी अकेला
होता जा रहा हूँ.....................
चला जाता हूँ नींद के आगोशी में
करते हुए याद तुम्हें ,
तुम आती हो
ख़्वाबों में
और चली भी जाती हो ख़ामोशी से.......
आज फिर सुबह हुई है
तुम्हारे दिए हुए फूलों की

माला पिरोई है।
अब थोडी ही देर में
शाम हो जाएगी
इन सूखे हुए फूलों में थोड़ी और
महक आ जाएगी।
तुम आईं थीं मेरी ज़िन्दगी में
बारिश की तरह ,
खिल उठता था तब
मैं तुम्हें देख ,
उन्हीं फूलों की तरह ........
लौट आओ
मैं तुम्हें पाना चाहता हूँ
ये सूखे फूल आज भी ताज़ा हैं
दिखाना चाहता हूँ॥ ॥ ॥ ॥



पेश है एक और प्रेम कविता.......... see disclaimer below...............in the footer

शनिवार, 8 अगस्त 2009



मैं बैठा सोच रहा था,


ज़िन्दगी के बारे में,


जिसे सब पा लेना चाहते हैं


जिसके रंगों में रंग जाना चाहते हैं


आख़िर ये ज़िन्दगी है क्या?


ख़्वाब या धुंध?


या फिर किसी की याद?


तभी यह लगा कि


ज़िन्दगी कभी आसमाँ है,


तो कभी दरिया...........


वक्त को न तो किसी की याद है


न ही तलाश ......


वक्त तो चलते रहने का ही


दूसरा नाम है...........


और लगा आख़िर में कि


यही चलना ही ज़िन्दगी है॥




महफूज़ अली



२३.09


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...