गुरुवार, 2 सितंबर 2010

दो बड़े अजीब इंसिडेंट के साथ...... अजनबी मेरे शब्दों से खेल गया....: महफूज़

दो  बड़े ही अजीब इंसिडेंट हुए मेरे साथ....अभी कुछ दिन पहले की ही बात है.....  पहले इंसिडेंट में हुआ यह कि मैं टी. वी. देख रहा था शाम की चाय के साथ... तो सोचा कि चैनल चेंज कर लूं... तो रिमोट उठा कर चैनल चेंज करने लगा... तो चैनल चेंज ही नहीं हुआ... बहुत कोशिश की ... रिमोट के बटन को खूब जोर से भी दबाया... लेकिन चैनल चेंज नहीं हुआ... बहुत जोर से गुस्सा आया... तो रिमोट उठा कर दीवार पर दे मारा... रिमोट टूट फूट कर बिखर गया... जब ज़मीन पर देखा तो वो मेरा रिमोट ना हो कर ....मेरा मोबाइल था... बेचारे के अस्थि-पिंजर अलग हो चुके थे... वो तो अच्छा  हुआ कि सस्ता मोबाइल था... . नहीं तो कहीं मेरा सैमसंग कॉरबी  प्रो होता तो हार्ट अटैक ही हो जाता... अच्छा मुझे गुस्सा भी कई बार बिना मतलब के आता है... जब आता है तो घर के कई सामान टूट फूट जाते हैं.... मेरे फादर मुझे बहुत एरोगेंट समझते थे... मेरे फादर मुझे कहते थे कि मैं अपने आप को अमिताभ बच्चन समझता हूँ... जबकि मैं सही बता रहा हूँ कि मुझे फिल्म स्टार्ज़ से कम्पैरीज़न बिल्कुल भी पसंद नहीं है... ऐसा नहीं लगता है कि बहुत लम्बा हो जायेगा ...यह सेल्फ-ऐप्रेसियेशन ...? (मैं बहुत आत्म-मुग्ध किस्म का इंसान हूँ) .... अब दूसरे  इंसिडेंट पर आता हूँ...

दूसरा इंसिडेंट हुआ यह कि पिछली पोस्ट लिखी थी एक्सिस बैंक के बारे में... तो एक्सिस बैंक में मोनिका नाम कि लड़की है... मुझे उसे अपनी कुछ डिटेल्ज़ मेल करनी थी... वो मैंने उसे कर दी... लेकिन हुआ क्या कि मैंने अपने जीमेल में सिग्नेचर में अपने ब्लॉग का लिंक दिया हुआ है... वो लिंक भी उसके पास चला गया...  मैं एक्सिस बैंक  मोनिका के चैंबर में पहुंचा दूसरे दिन ... तो मोनिका ने बहुत प्यार से मेरी धोयी ... वो भी बिना पानी के... उसने मेरा पहले बैंक का काम किया... फिर मुझसे मेरी हौबीज़ के बारे में बात करने लगी... मैंने बताया कि रीडिंग, राईटिंग और ट्रैवलिंग मेरी हौबी है... फिर उसने मुझसे लिट्रेचर पर भी बहुत सारी बातें की... डैन ब्राउन से लेकर ... प्रेमचंद, प्रेमचंद से लेकर मिल्टन जॉन, मिल्टन जॉन से गोर्की.. और भी बहुत सारी बातें... उसने सब्जेक्ट्स पर भी बातें की.. मैं बहुत इम्प्रेस्ड हुआ... और जब चलने को हुआ तो कहती है कि आपका ब्लॉग पढ़ा था... मेरा हाल ऐसा हुआ कि एयर-कंडीशंड कमरे में भी कान के पीछे से शर्म के मारे पसीना चू गया...   मैं वापस बैठ गया... और आधे घंटे तक उसे दुनिया भर के एक्स्प्लैनैशन देता रहा ... मेरे यह समझ में आ गया.. कि कभी भी किसी लड़की को अंडर-एसटीमेट नहीं करना चाहिए...  साला! यह सुपीरियरटी  कॉम्प्लेक्स  भी ना ... जो ना करा दे...  मोनिका समझ गयी कि मैं अब अनिज़ी फील कर रहा हूँ...  मैं वही सोचा कि बहुत बुरे तरह से मोनिका ने धो दी... लेकिन शाम में मोनिका का फ़ोन आया... हंस रही थी... .......उसने बहुत अच्छे से काम-डाउन किया... मैं जब बैंक से बाहर आया था... तो यह इंसिडेंट सबसे पहले अजित गुप्ता ममा को फ़ोन कर के बताया... ममा भी बहुत हंस रही थीं... 

अब फिर से थोडा खुद को सीरियस कर लूं... एक कविता लिखी है... मुझे पसंद आई है लिखने के बाद.... यह कविता भी स्व. सुभाष दशोत्तर जी को पढने के बाद ही लिखी है... सोच रहा हूँ... कि स्व.सुभाष दशोत्तर जी के जीवन और रचनाओं पर एक ब्लॉग बनाऊं ....ख़ैर! ख़ुद को वर्चुयल दुनिया में सीरियस  करना भी एक आर्ट है...  क्या वर्चुयल और क्या अन्वर्चुअल .... मेरे लिए तो सब बराबर है... तो पेश है कविता...

अजनबी ने मेरे शब्दों से खेल लिया...

एक अजनबी मेरे शब्द 
अपने साथ चुरा ले गया,
उसने उन्हें अपने
अनुसार ढाल कर
मेरे नाम से कसबे में बिखेर दिया....
और मैं
गालियों की बौछार झेलता हुआ
उस घटना से  अपरिचित हूँ 
क्यूंकि मैं 
दो असम्बद्ध वाक्यों में 
कॉमा का प्रयोग 
नहीं कर पाता हूँ. 

पोस्ट ख़त्म करने से पहले एक बात और याद आ  गयी... मेरी एक फ्रेंड थी..  वो मुझे समझाती थी... कि महफूज़ ...कभी भी किसी दोस्त को अपना नौकर मत बनाना और कभी अपने नौकर को अपना दोस्त मत बनाना... असफल लोगों से दूर रहना... अनपढ़, सेमी-लिटरेट (यह वो लोग होते हैं जिनके पास डिग्रियां तो होतीं हैं लेकिन नॉलेज नहीं) और नासमझ लोगों से बहस मत करना... और अपने विरोधियों को कभी कोई जवाब मत देना... और कमाल की बात यह है कि मैं .... यहीं  फेल हो गया... ही ही ही ही ... आज की पोस्ट श्री. राजेंद्र स्वर्णकार जी को समर्पित है.   

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

आज दो  बड़े ही अजीब इंसिडेंट हुए मेरे साथ.... पहले इंसिडेंट में हुआ यह कि आज मैं टी. वी. देख रहा था शाम की चाय के साथ... तो सोचा कि चैनल चेंज कर लूं... तो रिमोट उठा कर चैनल चेंज करने लगा... तो चैनल चेंज ही नहीं हुआ... बहुत कोशिश की ... रिमोट के बटन को खूब जोर से भी दबाया... लेकिन चैनल चेंज नहीं हुआ... बहुत जोर से गुस्सा आया... तो रिमोट उठा कर दीवार पर दे मारा... रिमोट टूट फूट कर बिखर गया... जब ज़मीन पर देखा तो वो मेरा रिमोट ना हो कर ....मेरा मोबाइल था... बेचारे के अस्थि-पिंजर अलग हो चुके थे... वो तो अच्छा  हुआ कि सस्ता मोबाइल था... पांच हज़ार रुपल्ली का.. नहीं तो कहीं मेरा सैमसंग कॉरबी  प्रो होता तो हार्ट अटैक ही हो जाता... अच्छा मुझे गुस्सा भी कई बार बिना मतलब के आता है... जब आता है तो घर के कई सामान टूट फूट जाते हैं.... ऐसे ही एक बार क्या हुआ कि मेरे पास एल.एम्.एल स्कूटर था ... अभी ज्यादा पुँरानी बात नहीं है... हुआ क्या कि ... गोमतीनगर थाने के पास चेकिंग चल रही थी... ट्रैफिक रुका हुआ था... शायद उस दिन कोई मर्डर हुआ था.. इसलिए चेकिंग चल रही थी... मैंने भी स्कूटर रोक दिया... पुलिस वाले मुझे चेक नहीं करते... सब पहचान वाले हैं... लेकिन मेरा स्कूटर बंद हो गया... बहुत किक मारी स्टार्ट नहीं हुआ... गुस्सा आया ....सामने पान की दूकान थी... वहां से माचिस लिया... और थाने के बगल में ही स्कूटर में आग लगा दी... आज भी वो गोमतीनगर थाने में दो साल से पड़ा हुआ है....  वो तो अच्छा हुआ कि मैं स्कूटर से था... अगर कार से होता तो क्या होता... यह मेरे फादर सोच रहे थे... उस वक़्त वो ज़िन्दा थे... मेरे फादर मुझे बहुत एरोगेंट समझते थे... मेरे फादर मुझे कहते थे कि मैं अपने आप को अमिताभ बच्चन समझता हूँ... जबकि मैं सही बता रहा हूँ कि मुझे फिल्म स्टार्ज़ से कम्पैरीज़न बिल्कुल भी पसंद नहीं है... बहुत लम्बा हो जायेगा ...सेल्फ-ऐप्रेसियेशन ... (मैं बहुत आत्म-मुग्ध किस्म का इंसान हूँ) .... अब दूसरे इंसिडेंट पर आता हूँ...


दूसरा इंसिडेंट हुआ यह कि पिछली पोस्ट लिखी थी एक्सिस बैंक के बारे में... तो एक्सिस बैंक में मोनिका नाम कि लड़की है... मुझे उसे अपनी कुछ डिटेल्ज़ मेल करनी थी... वो मैंने उसे कर दी... लेकिन हुआ क्या कि मैंने अपने जीमेल में सिग्नेचर में अपने ब्लॉग का लिंक दिया हुआ है... वो लिंक भी उसके पास चला गया...  मैं एक्सिस बैंक  मोनिका के चैंबर में पहुंचा दुसरे दिन ... तो मोनिका ने बहुत प्यार से मेरी धोयी ... वो भी बिना पानी के... उसने मेरा पहले बैंक का काम किया... फिर मुझसे मेरी हौबीज़ के बारे में बात करने लगी... मैंने बताया कि रीडिंग, राईटिंग और ट्रैवलिंग मेरी हौबी है... फिर उसने मुझसे लिट्रेचर पर भी बहुत सारी बातें की... डैन ब्राउन से लेकर ... प्रेमचंद, प्रेमचंद से लेकर मिल्टन जॉन, मिल्टन जॉन से गोर्की.. और भी बहुत सारी बातें... उसने सब्जेक्ट्स पर भी बातें की.. मैं बहुत इम्प्रेस्ड हुआ... और जब चलने को हुआ तो कहती है कि आपका ब्लॉग पढ़ा था... मेरा हाल ऐसा हुआ कि एयर-कंडीशंड कमरे में भी कान के पीछे से शर्म के मारे पसीना चू गया...   मैं वापस बैठ गया... और आधे घंटे तक उसे दुनिया भर के एक्स्प्लैनैशन देता रहा ... मेरे यह समझ में आ गया.. कि कभी भी किसी लड़की को अंडर-एसटीमेट नहीं करना चाहिए...  साला! यह सुपीरियरटी  कॉम्प्लेक्स  भी ना ... जो ना करा दे...  मोनिका समझ गयी कि मैं अब अनिज़ी फील कर रहा हूँ...  मैं वही सोचा कि बहुत बुरे तरह से मोनिका ने धो दी... लेकिन शाम मोनिका का फ़ोन आया... हंस रही थी... लेकिन उसने बहुत अच्छे से काम-डाउन किया... मैं जब बैंक से बाहर आया था... तो यह इंसिडेंट सबसे पहले अजित गुप्ता ममा को फ़ोन कर के बताया... ममा भी बहुत हंस रही थीं... 

अरे! हाँ बैंक में मुझे समीर लाल जी के एक डुप्लीकेट भी मिले... धीरे से उनकी फोटो भी ले ली... ऐट फर्स्ट ग्लांस में यह साहब मुझे समीर लाल जी  जैसे ही लगे... बस इन साहब के सर पर बाल कम हैं...  लेकिन काफी हद तक सिमिलैरीटीज़ हैं...  फोटो देखिये... और बताइयेगा कि  क्या वाकई में सिमिलैरीटीज़ हैं....?  


अब फिर से थोडा खुद को सीरियस कर लूं... एक कविता लिखी है... मुझे पसंद आई है लिखने के बाद.... यह कविता भी स्व. सुभाष दशोत्तर जी को पढने के बाद ही लिखी है... सोच रहा हूँ... कि स्व.सुभाष दशोत्तर जी के जीवन और रचनाओं पर एक ब्लॉग बनाऊं ....मेरी कविता को पढने के बाद बताइयेगा... कि क्या आप लोग भी श्री. सुभाष जी को पढना चाहेंगे...? तो पेश है कविता...

अजनबी मेरे शब्दों को चुरा ले गया.....

एक अजनबी मेरे शब्द 
अपने साथ चुरा ले गया,
उसने उन्हें अपने
अनुसार ढाल कर
मेरे नाम से कसबे में बिखेर दिया....
और मैं
गालियों की बौछार झेलता हुआ
उस घटना से  अपरिचित हूँ 
क्यूंकि मैं 
दो असम्बद्ध वाक्यों में 
कॉमा का प्रयोग 
नहीं कर पाता हूँ. 

पोस्ट ख़त्म करने से पहले एक बात और याद आ  गयी... मेरी एक फ्रेंड थी..  वोह मुझे समझाती थी... कि महफूज़ ...कभी भी किसी दोस्त को अपना नौकर मत बनाना और कभी अपने नौकर को अपना दोस्त मत बनाना... असफल लोगों से दूर रहना... अनपढ़ और नासमझ लोगों से बहस मत करना... और अपने विरोधियों को कभी कोई जवाब मत देना... और मैं .... साला! यहीं फेल हो गया... एक भी उसकी बात पर अमल नहीं कर पाया... पर अब करूँगा.. 

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

मैंने अपने खोने का विज्ञापन अखबार में दे दिया है...: महफूज़

आज बहुत दिनों के बाद वक़्त मिला है कुछ लिखने का... वक़्त क्या .... समझ लीजिये मूड... बना है. इस दौरान सिर्फ पढ़ा है... और खूब पढ़ा है... लिखा भी है... वक़्त की कमी तो है ही... पर  वो कहते हैं ना कि वक़्त निकालना पड़ता है , सो, आज वक़्त निकाल लिया... एक बड़े गुमनाम से कवि हैं...श्री. सुभाष दशोत्तर जिनका देहांत १९७७ में ही हो गया था... उन्हें मध्य प्रदेश सरकार ने १९७७ में सम्मानित भी किया था... उनकी लिखी बहुत सी रचनाएँ... पढ़ीं.... उनको पढ़ कर ऐसा लगा कि ... अगर इन्हें नहीं पढ़ा तो कभी साहित्य नहीं पढ़ा.. मगर अफ़सोस शायद ही उन्हें कोई जानता हो या फिर किसी ने उनका नाम सुना हो... सुना है कि १९७७ में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें बहुत मजबूरी में सम्मान दिया था... क्यूंकि वो किसी लौबी में शामिल नहीं थे... नहीं तो यहाँ .... एक से एक नालायक बैठे हैं... जो लॉबिंग करके कई पुरुस्कार पा लेते हैं... और ख़ुद को लेखक/कवि बोलने लगते हैं... 


अच्छा! आजकल मैं बहुत घमंडी किस्म का हो गया हूँ... पता नहीं यह घमंड है या फिर सेल्फ-कॉन्फिडेंस ... या फिर सुपीरियरटी कॉम्प्लेक्स... मुझे तो घमंड लगता है... आजकल मैं बहुत चूज़ी भी हो गया हूँ .... पहले मैं लड़कियों की खूबसूरती नहीं देखता था... सिर्फ दिमाग़ देखता था... इंटेलिजेंट लड़कियां मुझे बहुत अपील करतीं हैं.... लेकिन, आजकल मुझे सिर्फ ख़ूबसूरत लड़कियां ही पसंद आ रही हैं... अब दिमाग़ को मैंने सेकंडरी कर दिया है... हमारे लखनऊ में इंदिरा नगर में एक्सिस बैंक है... उस ब्रांच में एक से एक सुंदर लडकियां हैं... अभी वहां अकाउंट खुलवाया है... वो भी बिना मतलब में... सिर्फ.... इसीलिए क्यूंकि वहां की एक एक्ज़ीक्यूटिव जो कि बहुत सुंदर है... उसने बहुत प्यार से कह दिया था... अब वहां रोज़ का आना जाना हो गया है... और सच कह रहा हूँ... कि वहां की जितनी भी सुंदर लड़कियां हैं...  वो सारी लड़कियां दिमाग़ से पैदल हैं... इसलिए यह भी सही कहा गया है कि सुंदर लड़कियों के पास दिमाग़ नहीं होता...हाँ! एक्सेप्शंस हर जगह होते हैं... एक्सिस बैंक फ़ाइनैन्शियल बैंक कम ब्यूटी बैंक ज़्यादा लगता है...  सुन्दरता भी क्या चीज़ है ... कितना अपील करती है... जो लोग यह कहते हैं कि सुन्दरता मायने नहीं रखती ... गलत कहते हैं... मैं ख़ुद गलत था... हम जब बाज़ार में सब्ज़ी भी खरीदने जाते हैं... तो जो सब्ज़ी सबसे सुंदर और ताज़ी नज़र आती है... उसे ही खरीदते हैं... इसी तरह हम सुंदर लोगों को भी पसंद करते हैं.... अब यह बात अलग है... कि... Beauty lies in the eyes of the beholder... 

अच्छा ! चलिए अब थोडा सा सीरियस हो जाया जाये.... बहुत तफ़रीह कर लिया .... इसी बात पे तो वाणी दीदी मुझे "नौटंकी" कहतीं हैं.... कितने प्यार से कहतीं हैं.... उनका अंदाज़ ही अलग है....आज कविता लिखी है जिसकी इंस्पीरेशन मुझे श्री.सुभाष दशोत्तर जी को पढने के  बाद मिली है... पता नहीं क्यूँ कुछ लोग मरने के बाद भी ग़ुमनाम हो जाते हैं.... तो पेश है कविता ... बताइयेगा कैसी लगी...  

मेरे खोने का विज्ञापन...

मैंने अपने खोने का विज्ञापन
अखबार में दे दिया है,
जो कोई मुझे 
तलाश कर के लाएगा,
आने-जाने के खर्च के साथ
इनाम भी पायेगा.
मेरा जोश 
अब ठंडा पड़ गया है...
अब मेरे भीतर कई विचार 
एक साथ नहीं चल पाते 
शायद ....
मेरे विचारों पर धारा 
एक सौ चव्वालिस
लागू होती जा रही है....


N.B. मेरा एक इंग्लिश पोएट्री का ब्लॉग भी है... जिसे अभी लिखना शुरू किया है... उम्मीद है पसंद आएगा... वैसे मैं इंग्लिश पोएट्री इस वेबसाईट पर लिखता हूँ... जहाँ मेरी तकरीबन सात सौ इंग्लिश कवितायेँ हैं... 

सोमवार, 31 मई 2010

शेक्सपियर ग़लत था.... नाम में बहुत कुछ रखा है.... : महफूज़

दुनिया में इन्सान जब जन्म लेता है, तब वह अपने साथ कोई नाम नहीं लाता. हाँ! फ़ौरी तौर पर उसका नामकरण कर दिया जाता है. जैसे:- पप्पू, बिल्लू, पिंकी, चिंटू, बाबू.. आदि और भी बहुत से नाम. नाम तो पैदा होने के कुछ दिनों पर रखा जाता है, जिसे  हम बाकायदा नामकरण संस्कार कहते हैं, ताकि परिवार, समाज, गाँव, राष्ट्र और दुनिया में लोग उसे उस नाम से पहचानें और पुकारें, और यह परंपरा हर जगह, हर समाज में प्रचलित है. सामाजिक सरोकार में भी उस नाम से ही व्यवहार किया जाता है. सृष्टि के प्रारम्भ से ही हमारी धार्मिक क़िताबों से वस्तुओं के और पदार्थों के नाम पाए गए हैं और माता-पिता, भाई-बहन आदि सम्बन्धवाचक संज्ञाएँ भी हमारी धार्मिक क़िताबों से ही पायी गयीं हैं. इन्ही धार्मिक क़िताबों से इंसानों ने अपनी संतानों के लिए नाम रखना शुरू किया.  इस तरह देखा जाए तो नामकरण एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है. 


अगर सोचा जाए कि कोई नाम ही नहीं होता तो क्या होता? पेड़....पेड़ नहीं होता तो क्या होता? आम...आम नहीं होता तो क्या होता? मैं...महफूज़ नहीं होता तो क्या होता? समीरलाल जी...समीरलाल नहीं होते तो क्या होते? शिखा ....शिखा नहीं होती तो क्या होतीं? तो कहने का मतलब यह है कि अगर नाम नहीं होता, तो संसार का व्यवहार पल भर भी नहीं चल पाता, इसलिए नाम का बड़ा महत्त्व है और नाम से ही सहजता प्राप्त होतीं हैं. 

नाम कई प्रकार से हो सकते हैं. कुछ गुण के अनुसार, कुछ कर्म के अनुसार, स्वभाव के अनुसार, सम्बन्ध के अनुसार और व्यवहार के अनुसार भी देखने में आते हैं. एक इंसान के कई नाम हो सकते हैं, लेकिन मुख्य नाम एक ही होता है. जैसे मेरा प्यार से पुकारा जाने वाला नाम "पप्पू" है (ही ही ही ...), मेरे घर में, नाते-रिश्तेदार सब पप्पू बुलाते है, लेकिन मुख्य नाम महफूज़ है. वैसे, नाम कैसा रखना चाहिए इसका भी मार्गदर्शन, धर्मानुसार, संस्कृति व् संस्कार में पाया जाता है. और यह भी कहा जाता है कि नाम का असर हमारे पूरे व्यक्तित्व पर भी पड़ता है. अब कोई इंसान बुधवार को पैदा हुआ तो घर वालों ने उसका नाम प्यार से बुद्धू रख दिया, तो वो इंसान अपने नाम के ऐकौर्डिंग ही बिहेव करेगा... वो वाकई में बुद्धू होगा. ऐसे ही अगर देखें तो मोनिका, अंजलि, रश्मि, टीना, रीटा, फ़िज़ां, और पारुल नाम की लडकियां हमेशा सुंदर ही मिलेंगीं क्यूंकि इन नामों का मतलब ही सुंदर होता है. इसलिए नाम ऐसा होना चाहिए जो पूरे व्यक्तित्व को सार्थक बनाए और हमेशा उस नाम से ज़िंदगी   में प्रेरणा  मिलती रहे. बहुत पहले की बात है... मैं उस वक़्त नाइंथ क्लास में पढता था... मेरे साथ एक लड़का पढता था... उसका नाम छेदी लाल था... अब जैसा उसका नाम, वैसे ही उसका रूप और व्यवहार. उसे कोई भी स्टूडेंट अपने साथ नहीं रखना चाहता था, सिर्फ उसके नाम की वजह से.... वो पढने में भी छेदी टाईप का था... और उसको भी शर्म आती थी....उसे कोई अपने साथ बैठाना भी नहीं चाहता था.... उसे मैं अपने साथ बैठाने लगा... सिर्फ यह दिखाने के लिए... कि ... मेरे जैसे स्मार्ट को यह सब चीज़ें परेशान नहीं करतीं.... अब जब भी कोई नया टीचर आता.. वो खड़ा कर के सबका इंट्रो लेता तो उसके बाद मेरा ही नंबर आता .... अब उसका नाम छेदी लाल... अब इससे पहले कि मैं अपना नाम टीचर को बताता ...सारी क्लास पहले ही बोल  देती एक स्वर में..... कि सर...इसका नाम सुराख अली है.... अब छेदी लाल और सुराख अली का कॉम्बिनेशन भी देखिये.... एकदम ट्विन सिटी की तरह.... हैदराबाद और सिकंदराबाद ...की तरह...   अब धीरे धीरे मुझे भी वो प्रॉब्लम देने लगा.... तो मैं भी धीरे से अलग हो गया.... तो नाम का बहुत असर होता है. अगर नाम का असर नहीं होता... तो थ्री इडियट्स में करीना कपूर ...बेचारे आमिर खान का दोनों बार नाम सुनकर "यक" नहीं कहती और यह भी नहीं कहती कि मैं शादी के बाद अपना सरनेम नहीं चेंज करुँगी. .... 

इंसानों और इश्वर के नामों में बहुत अंतर देखने में आता है. इंसानी नाम सार्थक, यथार्थ और वास्तविक नहीं होते, लेकिन अगर देखें तो ईश्वर (ख़ुदा) के सारे नाम सार्थक हैं. जैसे किसी एक मनुष्य का नाम अमरसिंह है. लेकिन, नाम अमर होने से क्या वह मरेगा नहीं? मरना तो उसे है ही, इसका मतलब है कि उसका नाम सार्थक ना रहा. अगर किसी का नाम अन्नपूर्णा है और वो भीख मांगती है, तब क्या उसका नाम सार्थक हुआ? 

इसलिए नाम का बहुत महत्त्व है, नाम हमारे व्यक्तित्व को सार्थक बनाते हैं. अगर हम ग़ुलाब को ग़ुलाब ना कहें तो क्या उसकी ख़ुशबू कम हो जाएगी? नहीं..... लेकिन नाम तो ग़ुलाब ही रहेगा न, जुलाब तो नहीं होगा ना? इसलिए शेक्सपियर ग़लत था. यह कह देने भर से कि नाम में क्या रखा है? काम नहीं चलेगा. नाम में तो बहुत कुछ रखा है. नाम हमें सार्थकता व् सम्पूर्णता प्रदान करते है, नाम तो अव्यय, अविनाशी और ईश्वर जैसा है.
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साहित्य जगत व ब्लॉग जगत के तमाम मित्रों को यह बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी हिंदी कविता "बचपन" अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "पुरवाई' जो कि लन्दन से प्रकाशित होती है, में प्रकाशित हुई है. कविता की  स्कैन कॉपी अवलोकन के लिए प्रस्तुत है.



शनिवार, 10 अप्रैल 2010

खुशियाँ बांटने से बढती है..नफरत का क्या काम? : महफूज़


सबसे पहले समस्त ब्लॉग जगत को इतना अपनापन और स्नेह देने के लिए धन्यवाद. (खुशदीप भैया के लिए सिर्फ एक बात कहना चाहूँगा कि मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ. मुझे गर्व है आप पर.) मैं बिन माँ-बाप का होकर भी अकेला नहीं हूँ, यह मुझे समस्त ब्लॉग जगत ने बता दिया. इसके लिए मैं पूरे हिंदी व इंग्लिश ब्लॉग जगत का शुक्रगुज़ार हूँ. मुझे तो पता ही नहीं था कि सब मुझे इतना प्यार करते हैं? पिछले दो महीने से वक़्त ही नहीं था कि नेट पर बैठ सकूँ? कुछ प्रोब्लेम्स ही ऐसी थीं. लेकिन आज जब पूरा ब्लॉग जगत खंगाला तो आँखों से आंसू छलक पड़े. ब्लॉग जगत के लोकप्रियता के ऐसे शिखर पर आप सब लोग बैठाएंगे, इसका अंदाज़ा भी मुझे नहीं था. लोग कहते हैं कि ब्लॉग कि दुनिया ऐसी है कि लोग जल्दी ही भुला देते हैं, लेकिन आप सबके प्यार ने इस मिथ को झुठला दिया. आज सबसे पहली टिप्पणी डॉ. अजित गुप्ता जी के ब्लॉग पर की, अपने आप हाथ से माँ का संबोधन निकल पडा, जिसका ध्यान मुझे बिलकुल भी नहीं था, ममा का मेल आया तो बहुत देर तक रोता रहा. इस ब्लॉग जगत ने मुझे हर रिश्ता दिया है. माँ नहीं है मेरी, लेकिन आज मेरे पास ब्लॉग जगत के द्वारा जो रिश्ता बना है मेरा उससे माँ कि कमी अब नहीं महसूस होती है. अब तो मैं यहाँ धन्यवाद के लिए नाम भी नहीं लिख सकता हूँ क्यूंकि इतने सिर्फ नाम लिखने के लिए मुझे चार पोस्ट लिखनी पड़ेगी. मैं तो सबके प्यार से अभीभूत हूँ.

मैं आज फिर पूरे ब्लॉग जगत को अपनी खुशियों में शामिल करना चाहता हूँ. अब जैसा कि मैंने आज से ९ महीने पहले एक धन्यवाद पोस्ट लिखी थी और उसमें बताया था कि अमेरिका के Wisconsin University जो कि Madison State में है. उस यूनिवर्सिटी के Emeritus Professor. Nancy L.John Diekelmannn ने  मुझे संपर्क कर के  मेरी कविता "Fire is still Alive" को टी-शर्ट पर प्रकाशित करने की अनुमति मांगी थी, जो कि मैंने उनको दे दी थी, उस सिलसिले में मुझे उस वक़्त अमरीका भी जाना था लेकिन उन्होंने बाद में मना कर दिया था. इस पूरे दस महीने के दौरान अलग अलग चरण में मेरी उनसे फ़ोन और इ.मेल के ज़रिये बात-चीत चल रही थी. बाद में उन्होंने बताया कि वो टी-शर्ट एक अप्रैल को छप कर आ जाएगी.  और जब वो टी-शर्ट छप कर आ गई तो उन्होंने मुझे फोन और इ.मेल से सूचित किया और इसकी ख़बर मैंने सबसे पहले अपनी मम्मी रश्मि प्रभा जी को फोन के द्वारा सत्ताईस मार्च को सूचित किया. Diekelmann जी ने मुझे मेल के द्वारा सूचित किया कि Priority Mail जो कि अमरीका कि सबसे तेज़ डाक सेवा है जो पूरी दुनिया में कहीं भी डाक दो दिन में पहुंचाने का दावा करती है से चार टी-शर्ट भेज दी है. उन्होंने मुझसे माफ़ी भी मांगी कि टी-शर्ट पर मेरा नाम गलत प्रिंट हो गया है. हालांकि उन्होंने मुझसे citation मेल कर के पूछा था, लेकिन नेट से दूर होने की वजह से मैं उन्हें समय पर जवाब नहीं दे पाया, और टी-शर्ट छप कर आ गई. जब वो टी-शर्ट छप कर आ गई तो उसको स्कैन कर के मेरी बहन ने मेरी मेल पर भेज दिया और इसकी खुशखबरी सबसे पहले मैंने आदरणीय समीर लाल जी, खुशदीप भैया और अदा जी को मेल फॉरवर्ड कर के बताया. जिसका ज़िक्र खुशदीप भैया ने फर्स्ट अप्रैल को अपने ब्लॉग पर किया, जिसको काफी लोगों ने मूर्ख दिवस का मज़ाक समझ लिया...हा हा हा हा हा .... फिर बाद में अदा जी ने अपने ब्लॉग पर पूरी स्कैन मेल पोस्ट की. जब उन्होंने पोस्ट कर दिया फिर उसके बाद मैंने अपने लोगों को फोन से सूचित किया. अब मैं तो अपने घर से बहुत दूर हूँ... बहुत मन है वो टी-शर्ट पहनने  का.... और यह ख़्वाहिश लखनऊ और गोरखपुर पहुँच कर ही पूरी हो सकती है. अभी तो देहरादून का प्लान है फिर उसके बाद ३ दिन के लिए मलेशिया जाना है.  

Diekelmann जी ने बताया कि मेरी वो कविता Wisconsin University के सिलेबस में भी जोड़ी जा रही है और दिसम्बर में Wisconsin University में  होने वाले दीक्षांत समारोह में मुझे भी आमंत्रित किया जायेगा जहाँ मुख्य अतिथि अमरीका के राष्ट्रपति श्री. बराक ओबामा जी भी मुझे सम्मानित करेंगे. अमरीकन राष्ट्रपति जी के ओफ्फीस से भी मेल बधाई कि मेल चुकी है.  उन्होंने (Diekelmann) यह भी बताया कि पहले यह टी-शर्ट परियोजना Non-Profit based थी लेकिन कंपनी ने जब उसे मार्केट में उतारने का प्रस्ताव भी रखा तो उन्होंने इजाज़त दे दी और कहा कि जब मार्केट में यह आएगी तो आपको Royalty भी मिलेगी. मुझे यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई. इस सन्दर्भ में बहुत जल्द ही पेपर्ज़ साइन होने वाले हैं. उन्होंने यह भी बताया कि रोयल्टी सारी लीगल कार्यवाही और FEMA Act. की formalities पूरी हो जाने के बाद ही मिलेगी जिसमें तीन से चार महिने का समय लगेगा. Diekelmann जी ने यह बताया कि यह टी-शर्ट अमरीका, कनाडा सहित एशिया के कुछ देशों (जिसमें भारत भी) में भी बिक्री की जायेंगीं.. इससे पहले भी मुझे USA से सन २००५ में International Poet of the year का अवार्ड मेरी अंग्रेजी कविता "Lullaby for a missing child' के लिए   मिल चुका है. (कृपया मेरे ब्लॉग पर और ऑरकुट के एल्बम में अखबारों की स्कैन कॉपी देखें..) जिसके लिए मुझे तत्कालीन मुलायम  राज्य सरकार ने भी U P D C जिसकी अध्यक्ष उस वक़्त जया बच्चन जी थीं के हाथों और तरफ से सम्मानित किया गया था. (कृपया ब्लॉग के दायीं ओर लगी फोटो देखें और अखबारों की कतरन देखें)... इस बार भी मेरी बहन ने मुझे फोन कर के बताया कि ऐसा कोई फोन आया था और मेरे बाहर होने की वजह से बोल दिया गया कि मैं बाहर हूँ और मुझे जल्द से जल्द संपर्क करने के लिए कहा गया है... अब किस विभाग से आया यह तो मुझे गोरखपुर पहुँच कर ही पता चलेगा.... गोरखपुर/लखनऊ पहुँच कर जैसे ही सूचना/तिथि का निर्धारण होगा मैं आप सबको ज़रूर सूचित करूँगा... आप लोग सब तैयार रहिएगा.... काश! पिता जी ज़िंदा होते तो मेरी ना-मौजूदगी में सब संभाल लेते...सच कहा गया है...माँ-बाप के बिना जीवन अधूरा है. इसकी भी सूचना मैंने अपने लोगों को दी है कि सब लोग तैयार रहें.... इस बार मेरा परिवार बहुत बड़ा है. तो मैंने अपने ब्लॉग परिवार को भी सूचित किया. अब सारी डिटेल तो गोरखपुर पहुँच कर ही पता चलेगी. इस उपलब्धि को लखनऊ/गोरखपुर पहुँच कर ही प्रेस मीट और प्रेस रिलीज़ कर के समस्त दुनिया के सामने भी रखना है. मीडिया से फोन तो आ रहे है, लेकिन रोज़ी रोटी पहले है...काम ख़त्म होते ही इस उपलब्धि पर काम करना है.    श्री.बिल्लोरे जी ने कहा था कि हम यहीं पर प्रेस रिलीज़ कर दे रहे हैं,  जिसकी सूचना उन्होंने यहाँ के मीडिया को भी दे दी थी, लेकिन मैंने मना कर दिया कि मैं अपनी सरज़मीन और जन्मभूमि पर ही सब कुछ करूंगा. इसका मैं श्री. गिरीश बिल्लोरे जी का एहसानमंद हूँ.  अब जब लखनऊ /गोरखपुर पहुंचूंगा और इस सफलता को सेलेब्रेट करूँगा तो मैं अभी से समस्त ब्लॉग जगत को मैं आमंत्रण दे रहा हूँ कि अपनी उपस्थिति से मेरी खुशियों को दोगुना करें.

 मैं बहुत खुश भी हूँ और दुखी भी. दुखी इसलिए कि कई बार हम कई रिश्तों को समझ नहीं पाते हैं, हम गाहे-बगाहे ऐसे लोगों को अपना समझ लेते हैं, जो किसी मौके की तलाश में रहते हैं कि आपको दुःख हो. जिन्हें हम अपना समझते हैं वही धोखा दे जाते हैं. और जिन्हें हम कुछ भी नहीं समझते वो हमारे साथ रहते हैं और फिर एक नए रिश्ते को जन्म देते हैं. और फिर यही रिश्ता शायद ज़िन्दगी भर के लिए कायम हो जाता है. कई बार हम सोचते हैं कि जिन्हें हम प्यार कर रहे हैं वो हमारे साथ हर सुख दुःख में रहेगा फिर वही कब धोखा दे जाए ...कुछ कहा नहीं जा सकता. इस ब्लॉग जगत में मुझे बहुत कुछ मिला है. बहुत कुछ मिला है तो बहुत कुछ सीखा भी है. इंसान और रिश्तों को पहचानना मैंने ब्लॉग जगत से ही सीखा है. मुझे कई लोग और काफी लोग भी बहुत घमंडी किस्म का या फिर मगरूर किस्म का भी समझते हैं पर मेरा यकीन करिए मैं ऐसा बिलकुल भी नहीं हूँ. मैं हमेशा प्यार बांटता हूँ और बदले में सिर्फ प्यार ही चाहता हूँ. जब कभी मेल खोलता हूँ तो कोई गाली लिख के भेजता है, तो कोई कहता है कि तुझे अपनी सुन्दरता पे बहुत घमंड है, तो कोई कहता है कि मुकदमा कर दूंगा. मैं कहता हूँ कि अगर राष्ट्रवादी विचारधारा का होना क्या गुनाह है? क्या इसके लिए मुझे गाली देनी चाहिए? अब हैंडसम हूँ तो मेरा इसमें क्या दोष? क्या सुंदर होना घमंडी होने का मापदंड है? और मुकदमा भई कोई क्यूँ करेगा ...मैंने तो किसी की भैंस भी नहीं खोली है.... और वैसे इतना दम भी रखता हूँ कि भैंस खोल लूं ...और मैं ऐसे लोगों को क्या बोलूँ? इन्हें यह नहीं पता कि हम तो खानदानी मुकदमेबाज़ हैं. मेरे पिताजी मेरे ऊपर छः-छः मुक़दमे छोड़ कर गए हैं. ज़मीन से लेकर, 307 और 504  के मुक़दमे झेल रहा हूँ बिना मतलब के .... ऐसे लोगों को क्या बोलूँ ? मैंने एक बार जज से कहा भी था कि बिना मतलब इतना सब झेल रहा हूँ... तो जज ने कहा अच्छा तो है.... पता कैसे चलेगा कि बड़े आदमी हो... तो ऐसे लोगों को मैं यही कहना चाहूँगा कि फर्जी मुक़दमे में कैसे फंसाया जाता है यह मुझसे ज्यादा अच्छे से कोई नहीं जानेगा. इसलिए अब इस प्रकार की मेल भेजना बंद करें या फिर कोई मुकदमा लाद ही दें मुझ पर ... फिर देखें क्या होता है? मैं तो खुलेआम कहता हूँ कि जिसे भी मुझसे झगडा करना है तो एक बार सोच ले क्यूंकि मैं डसूंगा तो बहुत दर्द होगा. और आप ही लोग बताइए कि मैंने कभी किसी को ब्लॉग पर उल्टा सीधा कहा है? किसी की भी इन्सल्ट की है? हाँ! एक बार मैंने महिलाओं के खिलाफ कुछ गलत किसी पोस्ट पर कमेन्ट के रूप में लिख दिया था.... उसके लिए मैं माफ़ी भी मांग चुका हूँ और आज इस खुले मंच से अपने उस गंदे और वाहियात कमेन्ट के लिए फिर से समस्त ब्लॉग जगत कि महिलाओं से माफ़ी मांगता हूँ.  मेरा यकीन करिए ... मुझे बहकाया गया था... शायद किसी रौ में मैंने वो लिख भी दिया. और तबसे उसका पश्चाताप कर रहा हूँ. उस कमेन्ट की वजह से मैंने कई अच्छे दोस्त इस ब्लॉग जगत पर खो दिए. और तो और कुछ लोग ब्लॉग समाचार या फिर किसी और नाम से ब्लॉग बना कर मेरे नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं. मैं इन लोगों को condemn करता हूँ और साथ ही साथ वार्न भी . मैं तो इतना ही कहूँगा कि प्यार बांटिये .... प्यार मिलेगा...  नहीं तो वही कहावत वाला हाल होगा कि "बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होए..."  

अंत में मैं आदरणीय समीर लाल जी, खुशदीप भैया (आप मेरे सगे से बढ़ कर हैं...), श्री. ऍम.वर्मा जी, आदरणीय शास्त्री जी, श्री. अविनाश वाचस्पति जी, श्री. शरद कोकास भैया, श्री. पाबला जी, श्री. ललित शर्मा जी, श्री. अवधिया जी, shri. ajay kumar jha ji, श्री. डॉ. अरविन्द मिश्र जी, श्री. गिरिजेश राव जी, श्री. महेंद्र मिश्र जी, श्री.रविन्द्र प्रभात जी, श्री. सुमन जी (नाईस वाले), श्री. संजय अनेजा जी... श्री. बवाल जी ..आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद... आप लोग हमेशा मेरे साथ रहे ...मेरा हौसला बढाया.... मैं आप सबका आभारी हूँ. 

मैं श्री. गिरीश बिल्लोरे जी का बहुत एहसानमंद हूँ. आपने व आपके परिवार ने मुझे इस अनजान शहर में बिलकुल भी अकेला नहीं महसूस होने दिया. आपने मेरा बहुत ख्याल रखा. मुझे बिलकुल भी एहसास ही नहीं हुआ कि मैं एक अलग शहर में हूँ.     आपने बड़े भाई और पिता की तरह मेरा ख्याल रखा. जो इज्ज़त आपने मुझे दी वो मैं पूरी ज़िन्दगी नहीं भूल सकता. 

मैं मम्मी रश्मि प्रभा जी (आपका आशीर्वाद हमेशा से मेरे साथ रहा है..), डॉ.अजित गुप्ता जी.... (ममा... कल आपका मेल आने के बाद मैं बहुत रोया हूँ... ममा..आपको मैंने Diekelmann जी का फोन नंबर और इ.मेल ..मेल कर दिया है.... आप अमेरिका पहुँच कर उनको फोन कर लीजियेगा ... वो आपको टी-शर्ट available करवा देंगे..) ...रश्मि रविजा जी...(आपका मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ... हर पल आपने मेरा हौसला बढाया... discourage होने से बचाया..I am very thankful to you....), शिखा जी..(आपको मैं बहुत मिस कर रहा हूँ) ... वाणी दीदी (क्या दीदी... कान छोडिये ना....अब लम्बी-लम्बी नहीं फेकूंगा.... दी...प्लीज़ कान छोड़ दीजिये... सॉरी बाबा..आ..दी..दर्द कर रहा है..)....अदा जी.... (आप में तो मेरी जान बसती है... मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ... ) मैं आप सब लोगों का शुक्रगुज़ार हूँ ... और मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ.... 

Last but not the least.... मैं पूरे ब्लॉग जगत का आभार व्यक्त करता हूँ.... जो इज्ज़त और प्यार आप सबने मुझे दिया है .... उसका मैं शुक्रगुज़ार हूँ. मेरे लिए यह संभव ही नहीं है कि मैं आप सबका शुभ नाम लिखूं... क्यूंकि आप लोग भी जानते हैं कि अगर मैंने नाम के साथ आभार व्यक्त किया तो चार पोस्ट और लिखनी पड़ेगी. मैं आप सबसे बहुत प्यार करता हूँ. 

कई बार हम इतनी जिम्मेदारियों में फंसे होते हैं कि कई बाहरी कामों के लिए वक़्त ही नहीं निकाल पाते हैं. मैं तो वैसे भी इतना बीजी हूँ कि बीज़ी वर्ड भी मेरे बीज़िनेस के आगे बहुत  बहुत खाली है... इसी बीज़िनेस को देखते हुए भई आज मैं लखनऊ ब्लोग्गर अस्सोसियेशन के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे रहा हूँ. हालांकि, मुझे पता नहीं था कि मैं इस अस्सोसियेशन का अध्यक्ष भी हूँ... जब पता चला तो अपनी गैर ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ....  मैंने सोचा कि इतने नालायक अध्यक्ष का क्या फायदा? जो अपने संस्था के बारे में ही ज्यादा नहीं जान रहा हो... ख़ैर! मैं तो समस्त ब्लॉग जगत का तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. मेरा ब्लॉग जगत के विद्वान जनों से अनुरोध है कि कृपया मेरी कविता "Fire is still alive" का हिंदी में अनुवाद कर के मुझे दीजिये. मैं आभारी रहूँगा.

(अपने शुभचिंतकों व मित्रों के कहने पर मेल व कोरियर के स्नैपशॉट हटा रहा हूँ.... ११/०४/२०१०....समय : १२.५५)   
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