रविवार, 11 जनवरी 2009

टूटी औरत॥


टूटी कांच की चूडियाँ,

बूझी सिगरेट की राख,

दर्द से मदद को चिल्लाती,

और व्यर्थ में रोती॥


हजारों जूतों की आवाज़ ,

टूटा चेहरा,

खरोंच।


ऐसा पहली बार नही है........


पति के बदन से शराब की बदबू,

जो कोने में खड़ा माफ़ी मांगता,

और

आंसू बहाती,



टूटी औरत॥





महफूज़ अली




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