शनिवार, 11 जुलाई 2009

बागबाँ


मैं गुलाब था खुशबु भरा,

मुझे आँधियों ने हिला दिया,

जो मुझे बचाने को बने थे ,

मेरे उन काँटों ने मुझे ही रुला दिया।

तोडा मुझे,

फिर तोड़ के फेंका मुझे,

और पैरों तले मसल दिया।


वक्त साज़िश करता रहा,

पर मेरे साथ मेरा ख़ुदा रहा ,

जो संभाल ले मुझे प्यार से

ऐसे बागबाँ से मिला दिया .....



महफूज़ अली
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

My page Visitors