शनिवार, 11 जुलाई 2009

बागबाँ


मैं गुलाब था खुशबु भरा,

मुझे आँधियों ने हिला दिया,

जो मुझे बचाने को बने थे ,

मेरे उन काँटों ने मुझे ही रुला दिया।

तोडा मुझे,

फिर तोड़ के फेंका मुझे,

और पैरों तले मसल दिया।


वक्त साज़िश करता रहा,

पर मेरे साथ मेरा ख़ुदा रहा ,

जो संभाल ले मुझे प्यार से

ऐसे बागबाँ से मिला दिया .....



महफूज़ अली

7 टिप्पणियाँ:

raj ने कहा…

hath uske bhi yakeenan hue honge jakhmi,,,jisne kante teri raho me bichhaye honge....khoobsurat kavita.....

ओम आर्य ने कहा…

बहुत खुब महफूज भाई ...............जबाव नही है इस बेहतरीन अभिव्यकति का..........अतिसुन्दर

M VERMA ने कहा…

आशावादी सुन्दर रचना. बहुत खूब

Udan Tashtari ने कहा…

ये बेहतरीन रहा!!

Sheena ने कहा…

वक्त साज़िश करता रहा,
पर मेरे साथ मेरा ख़ुदा रहा

aage bhi waqt kitni bhi saajishe karta rahe, par mere sath sada hi mera khuda rahe

*KHUSHI* ने कहा…

मैं गुलाब था खुशबु भरा,
मुझे आँधियों ने हिला दिया,
जो मुझे बचाने को बने थे ,
मेरे उन काँटों ने मुझे ही रुला दिया।

wah... bahetareen..

abhivyakti ने कहा…

कांटे और गुलाब के बिम्बों से मानव मन कि सुन्दर अभिव्यक्ति पेश कि है..
बधाई..
प्रकाश

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