गुरुवार, 2 सितंबर 2010

दो बड़े अजीब इंसिडेंट के साथ...... अजनबी मेरे शब्दों से खेल गया....: महफूज़

दो  बड़े ही अजीब इंसिडेंट हुए मेरे साथ....अभी कुछ दिन पहले की ही बात है.....  पहले इंसिडेंट में हुआ यह कि मैं टी. वी. देख रहा था शाम की चाय के साथ... तो सोचा कि चैनल चेंज कर लूं... तो रिमोट उठा कर चैनल चेंज करने लगा... तो चैनल चेंज ही नहीं हुआ... बहुत कोशिश की ... रिमोट के बटन को खूब जोर से भी दबाया... लेकिन चैनल चेंज नहीं हुआ... बहुत जोर से गुस्सा आया... तो रिमोट उठा कर दीवार पर दे मारा... रिमोट टूट फूट कर बिखर गया... जब ज़मीन पर देखा तो वो मेरा रिमोट ना हो कर ....मेरा मोबाइल था... बेचारे के अस्थि-पिंजर अलग हो चुके थे... वो तो अच्छा  हुआ कि सस्ता मोबाइल था... . नहीं तो कहीं मेरा सैमसंग कॉरबी  प्रो होता तो हार्ट अटैक ही हो जाता... अच्छा मुझे गुस्सा भी कई बार बिना मतलब के आता है... जब आता है तो घर के कई सामान टूट फूट जाते हैं.... मेरे फादर मुझे बहुत एरोगेंट समझते थे... मेरे फादर मुझे कहते थे कि मैं अपने आप को अमिताभ बच्चन समझता हूँ... जबकि मैं सही बता रहा हूँ कि मुझे फिल्म स्टार्ज़ से कम्पैरीज़न बिल्कुल भी पसंद नहीं है... ऐसा नहीं लगता है कि बहुत लम्बा हो जायेगा ...यह सेल्फ-ऐप्रेसियेशन ...? (मैं बहुत आत्म-मुग्ध किस्म का इंसान हूँ) .... अब दूसरे  इंसिडेंट पर आता हूँ...

दूसरा इंसिडेंट हुआ यह कि पिछली पोस्ट लिखी थी एक्सिस बैंक के बारे में... तो एक्सिस बैंक में मोनिका नाम कि लड़की है... मुझे उसे अपनी कुछ डिटेल्ज़ मेल करनी थी... वो मैंने उसे कर दी... लेकिन हुआ क्या कि मैंने अपने जीमेल में सिग्नेचर में अपने ब्लॉग का लिंक दिया हुआ है... वो लिंक भी उसके पास चला गया...  मैं एक्सिस बैंक  मोनिका के चैंबर में पहुंचा दूसरे दिन ... तो मोनिका ने बहुत प्यार से मेरी धोयी ... वो भी बिना पानी के... उसने मेरा पहले बैंक का काम किया... फिर मुझसे मेरी हौबीज़ के बारे में बात करने लगी... मैंने बताया कि रीडिंग, राईटिंग और ट्रैवलिंग मेरी हौबी है... फिर उसने मुझसे लिट्रेचर पर भी बहुत सारी बातें की... डैन ब्राउन से लेकर ... प्रेमचंद, प्रेमचंद से लेकर मिल्टन जॉन, मिल्टन जॉन से गोर्की.. और भी बहुत सारी बातें... उसने सब्जेक्ट्स पर भी बातें की.. मैं बहुत इम्प्रेस्ड हुआ... और जब चलने को हुआ तो कहती है कि आपका ब्लॉग पढ़ा था... मेरा हाल ऐसा हुआ कि एयर-कंडीशंड कमरे में भी कान के पीछे से शर्म के मारे पसीना चू गया...   मैं वापस बैठ गया... और आधे घंटे तक उसे दुनिया भर के एक्स्प्लैनैशन देता रहा ... मेरे यह समझ में आ गया.. कि कभी भी किसी लड़की को अंडर-एसटीमेट नहीं करना चाहिए...  साला! यह सुपीरियरटी  कॉम्प्लेक्स  भी ना ... जो ना करा दे...  मोनिका समझ गयी कि मैं अब अनिज़ी फील कर रहा हूँ...  मैं वही सोचा कि बहुत बुरे तरह से मोनिका ने धो दी... लेकिन शाम में मोनिका का फ़ोन आया... हंस रही थी... .......उसने बहुत अच्छे से काम-डाउन किया... मैं जब बैंक से बाहर आया था... तो यह इंसिडेंट सबसे पहले अजित गुप्ता ममा को फ़ोन कर के बताया... ममा भी बहुत हंस रही थीं... 

अब फिर से थोडा खुद को सीरियस कर लूं... एक कविता लिखी है... मुझे पसंद आई है लिखने के बाद.... यह कविता भी स्व. सुभाष दशोत्तर जी को पढने के बाद ही लिखी है... सोच रहा हूँ... कि स्व.सुभाष दशोत्तर जी के जीवन और रचनाओं पर एक ब्लॉग बनाऊं ....ख़ैर! ख़ुद को वर्चुयल दुनिया में सीरियस  करना भी एक आर्ट है...  क्या वर्चुयल और क्या अन्वर्चुअल .... मेरे लिए तो सब बराबर है... तो पेश है कविता...

अजनबी ने मेरे शब्दों से खेल लिया...

एक अजनबी मेरे शब्द 
अपने साथ चुरा ले गया,
उसने उन्हें अपने
अनुसार ढाल कर
मेरे नाम से कसबे में बिखेर दिया....
और मैं
गालियों की बौछार झेलता हुआ
उस घटना से  अपरिचित हूँ 
क्यूंकि मैं 
दो असम्बद्ध वाक्यों में 
कॉमा का प्रयोग 
नहीं कर पाता हूँ. 

पोस्ट ख़त्म करने से पहले एक बात और याद आ  गयी... मेरी एक फ्रेंड थी..  वो मुझे समझाती थी... कि महफूज़ ...कभी भी किसी दोस्त को अपना नौकर मत बनाना और कभी अपने नौकर को अपना दोस्त मत बनाना... असफल लोगों से दूर रहना... अनपढ़, सेमी-लिटरेट (यह वो लोग होते हैं जिनके पास डिग्रियां तो होतीं हैं लेकिन नॉलेज नहीं) और नासमझ लोगों से बहस मत करना... और अपने विरोधियों को कभी कोई जवाब मत देना... और कमाल की बात यह है कि मैं .... यहीं  फेल हो गया... ही ही ही ही ... आज की पोस्ट श्री. राजेंद्र स्वर्णकार जी को समर्पित है.   

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

आज दो  बड़े ही अजीब इंसिडेंट हुए मेरे साथ.... पहले इंसिडेंट में हुआ यह कि आज मैं टी. वी. देख रहा था शाम की चाय के साथ... तो सोचा कि चैनल चेंज कर लूं... तो रिमोट उठा कर चैनल चेंज करने लगा... तो चैनल चेंज ही नहीं हुआ... बहुत कोशिश की ... रिमोट के बटन को खूब जोर से भी दबाया... लेकिन चैनल चेंज नहीं हुआ... बहुत जोर से गुस्सा आया... तो रिमोट उठा कर दीवार पर दे मारा... रिमोट टूट फूट कर बिखर गया... जब ज़मीन पर देखा तो वो मेरा रिमोट ना हो कर ....मेरा मोबाइल था... बेचारे के अस्थि-पिंजर अलग हो चुके थे... वो तो अच्छा  हुआ कि सस्ता मोबाइल था... पांच हज़ार रुपल्ली का.. नहीं तो कहीं मेरा सैमसंग कॉरबी  प्रो होता तो हार्ट अटैक ही हो जाता... अच्छा मुझे गुस्सा भी कई बार बिना मतलब के आता है... जब आता है तो घर के कई सामान टूट फूट जाते हैं.... ऐसे ही एक बार क्या हुआ कि मेरे पास एल.एम्.एल स्कूटर था ... अभी ज्यादा पुँरानी बात नहीं है... हुआ क्या कि ... गोमतीनगर थाने के पास चेकिंग चल रही थी... ट्रैफिक रुका हुआ था... शायद उस दिन कोई मर्डर हुआ था.. इसलिए चेकिंग चल रही थी... मैंने भी स्कूटर रोक दिया... पुलिस वाले मुझे चेक नहीं करते... सब पहचान वाले हैं... लेकिन मेरा स्कूटर बंद हो गया... बहुत किक मारी स्टार्ट नहीं हुआ... गुस्सा आया ....सामने पान की दूकान थी... वहां से माचिस लिया... और थाने के बगल में ही स्कूटर में आग लगा दी... आज भी वो गोमतीनगर थाने में दो साल से पड़ा हुआ है....  वो तो अच्छा हुआ कि मैं स्कूटर से था... अगर कार से होता तो क्या होता... यह मेरे फादर सोच रहे थे... उस वक़्त वो ज़िन्दा थे... मेरे फादर मुझे बहुत एरोगेंट समझते थे... मेरे फादर मुझे कहते थे कि मैं अपने आप को अमिताभ बच्चन समझता हूँ... जबकि मैं सही बता रहा हूँ कि मुझे फिल्म स्टार्ज़ से कम्पैरीज़न बिल्कुल भी पसंद नहीं है... बहुत लम्बा हो जायेगा ...सेल्फ-ऐप्रेसियेशन ... (मैं बहुत आत्म-मुग्ध किस्म का इंसान हूँ) .... अब दूसरे इंसिडेंट पर आता हूँ...


दूसरा इंसिडेंट हुआ यह कि पिछली पोस्ट लिखी थी एक्सिस बैंक के बारे में... तो एक्सिस बैंक में मोनिका नाम कि लड़की है... मुझे उसे अपनी कुछ डिटेल्ज़ मेल करनी थी... वो मैंने उसे कर दी... लेकिन हुआ क्या कि मैंने अपने जीमेल में सिग्नेचर में अपने ब्लॉग का लिंक दिया हुआ है... वो लिंक भी उसके पास चला गया...  मैं एक्सिस बैंक  मोनिका के चैंबर में पहुंचा दुसरे दिन ... तो मोनिका ने बहुत प्यार से मेरी धोयी ... वो भी बिना पानी के... उसने मेरा पहले बैंक का काम किया... फिर मुझसे मेरी हौबीज़ के बारे में बात करने लगी... मैंने बताया कि रीडिंग, राईटिंग और ट्रैवलिंग मेरी हौबी है... फिर उसने मुझसे लिट्रेचर पर भी बहुत सारी बातें की... डैन ब्राउन से लेकर ... प्रेमचंद, प्रेमचंद से लेकर मिल्टन जॉन, मिल्टन जॉन से गोर्की.. और भी बहुत सारी बातें... उसने सब्जेक्ट्स पर भी बातें की.. मैं बहुत इम्प्रेस्ड हुआ... और जब चलने को हुआ तो कहती है कि आपका ब्लॉग पढ़ा था... मेरा हाल ऐसा हुआ कि एयर-कंडीशंड कमरे में भी कान के पीछे से शर्म के मारे पसीना चू गया...   मैं वापस बैठ गया... और आधे घंटे तक उसे दुनिया भर के एक्स्प्लैनैशन देता रहा ... मेरे यह समझ में आ गया.. कि कभी भी किसी लड़की को अंडर-एसटीमेट नहीं करना चाहिए...  साला! यह सुपीरियरटी  कॉम्प्लेक्स  भी ना ... जो ना करा दे...  मोनिका समझ गयी कि मैं अब अनिज़ी फील कर रहा हूँ...  मैं वही सोचा कि बहुत बुरे तरह से मोनिका ने धो दी... लेकिन शाम मोनिका का फ़ोन आया... हंस रही थी... लेकिन उसने बहुत अच्छे से काम-डाउन किया... मैं जब बैंक से बाहर आया था... तो यह इंसिडेंट सबसे पहले अजित गुप्ता ममा को फ़ोन कर के बताया... ममा भी बहुत हंस रही थीं... 

अरे! हाँ बैंक में मुझे समीर लाल जी के एक डुप्लीकेट भी मिले... धीरे से उनकी फोटो भी ले ली... ऐट फर्स्ट ग्लांस में यह साहब मुझे समीर लाल जी  जैसे ही लगे... बस इन साहब के सर पर बाल कम हैं...  लेकिन काफी हद तक सिमिलैरीटीज़ हैं...  फोटो देखिये... और बताइयेगा कि  क्या वाकई में सिमिलैरीटीज़ हैं....?  


अब फिर से थोडा खुद को सीरियस कर लूं... एक कविता लिखी है... मुझे पसंद आई है लिखने के बाद.... यह कविता भी स्व. सुभाष दशोत्तर जी को पढने के बाद ही लिखी है... सोच रहा हूँ... कि स्व.सुभाष दशोत्तर जी के जीवन और रचनाओं पर एक ब्लॉग बनाऊं ....मेरी कविता को पढने के बाद बताइयेगा... कि क्या आप लोग भी श्री. सुभाष जी को पढना चाहेंगे...? तो पेश है कविता...

अजनबी मेरे शब्दों को चुरा ले गया.....

एक अजनबी मेरे शब्द 
अपने साथ चुरा ले गया,
उसने उन्हें अपने
अनुसार ढाल कर
मेरे नाम से कसबे में बिखेर दिया....
और मैं
गालियों की बौछार झेलता हुआ
उस घटना से  अपरिचित हूँ 
क्यूंकि मैं 
दो असम्बद्ध वाक्यों में 
कॉमा का प्रयोग 
नहीं कर पाता हूँ. 

पोस्ट ख़त्म करने से पहले एक बात और याद आ  गयी... मेरी एक फ्रेंड थी..  वोह मुझे समझाती थी... कि महफूज़ ...कभी भी किसी दोस्त को अपना नौकर मत बनाना और कभी अपने नौकर को अपना दोस्त मत बनाना... असफल लोगों से दूर रहना... अनपढ़ और नासमझ लोगों से बहस मत करना... और अपने विरोधियों को कभी कोई जवाब मत देना... और मैं .... साला! यहीं फेल हो गया... एक भी उसकी बात पर अमल नहीं कर पाया... पर अब करूँगा.. 

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

मैंने अपने खोने का विज्ञापन अखबार में दे दिया है...: महफूज़

आज बहुत दिनों के बाद वक़्त मिला है कुछ लिखने का... वक़्त क्या .... समझ लीजिये मूड... बना है. इस दौरान सिर्फ पढ़ा है... और खूब पढ़ा है... लिखा भी है... वक़्त की कमी तो है ही... पर  वो कहते हैं ना कि वक़्त निकालना पड़ता है , सो, आज वक़्त निकाल लिया... एक बड़े गुमनाम से कवि हैं...श्री. सुभाष दशोत्तर जिनका देहांत १९७७ में ही हो गया था... उन्हें मध्य प्रदेश सरकार ने १९७७ में सम्मानित भी किया था... उनकी लिखी बहुत सी रचनाएँ... पढ़ीं.... उनको पढ़ कर ऐसा लगा कि ... अगर इन्हें नहीं पढ़ा तो कभी साहित्य नहीं पढ़ा.. मगर अफ़सोस शायद ही उन्हें कोई जानता हो या फिर किसी ने उनका नाम सुना हो... सुना है कि १९७७ में मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें बहुत मजबूरी में सम्मान दिया था... क्यूंकि वो किसी लौबी में शामिल नहीं थे... नहीं तो यहाँ .... एक से एक नालायक बैठे हैं... जो लॉबिंग करके कई पुरुस्कार पा लेते हैं... और ख़ुद को लेखक/कवि बोलने लगते हैं... 


अच्छा! आजकल मैं बहुत घमंडी किस्म का हो गया हूँ... पता नहीं यह घमंड है या फिर सेल्फ-कॉन्फिडेंस ... या फिर सुपीरियरटी कॉम्प्लेक्स... मुझे तो घमंड लगता है... आजकल मैं बहुत चूज़ी भी हो गया हूँ .... पहले मैं लड़कियों की खूबसूरती नहीं देखता था... सिर्फ दिमाग़ देखता था... इंटेलिजेंट लड़कियां मुझे बहुत अपील करतीं हैं.... लेकिन, आजकल मुझे सिर्फ ख़ूबसूरत लड़कियां ही पसंद आ रही हैं... अब दिमाग़ को मैंने सेकंडरी कर दिया है... हमारे लखनऊ में इंदिरा नगर में एक्सिस बैंक है... उस ब्रांच में एक से एक सुंदर लडकियां हैं... अभी वहां अकाउंट खुलवाया है... वो भी बिना मतलब में... सिर्फ.... इसीलिए क्यूंकि वहां की एक एक्ज़ीक्यूटिव जो कि बहुत सुंदर है... उसने बहुत प्यार से कह दिया था... अब वहां रोज़ का आना जाना हो गया है... और सच कह रहा हूँ... कि वहां की जितनी भी सुंदर लड़कियां हैं...  वो सारी लड़कियां दिमाग़ से पैदल हैं... इसलिए यह भी सही कहा गया है कि सुंदर लड़कियों के पास दिमाग़ नहीं होता...हाँ! एक्सेप्शंस हर जगह होते हैं... एक्सिस बैंक फ़ाइनैन्शियल बैंक कम ब्यूटी बैंक ज़्यादा लगता है...  सुन्दरता भी क्या चीज़ है ... कितना अपील करती है... जो लोग यह कहते हैं कि सुन्दरता मायने नहीं रखती ... गलत कहते हैं... मैं ख़ुद गलत था... हम जब बाज़ार में सब्ज़ी भी खरीदने जाते हैं... तो जो सब्ज़ी सबसे सुंदर और ताज़ी नज़र आती है... उसे ही खरीदते हैं... इसी तरह हम सुंदर लोगों को भी पसंद करते हैं.... अब यह बात अलग है... कि... Beauty lies in the eyes of the beholder... 

अच्छा ! चलिए अब थोडा सा सीरियस हो जाया जाये.... बहुत तफ़रीह कर लिया .... इसी बात पे तो वाणी दीदी मुझे "नौटंकी" कहतीं हैं.... कितने प्यार से कहतीं हैं.... उनका अंदाज़ ही अलग है....आज कविता लिखी है जिसकी इंस्पीरेशन मुझे श्री.सुभाष दशोत्तर जी को पढने के  बाद मिली है... पता नहीं क्यूँ कुछ लोग मरने के बाद भी ग़ुमनाम हो जाते हैं.... तो पेश है कविता ... बताइयेगा कैसी लगी...  

मेरे खोने का विज्ञापन...

मैंने अपने खोने का विज्ञापन
अखबार में दे दिया है,
जो कोई मुझे 
तलाश कर के लाएगा,
आने-जाने के खर्च के साथ
इनाम भी पायेगा.
मेरा जोश 
अब ठंडा पड़ गया है...
अब मेरे भीतर कई विचार 
एक साथ नहीं चल पाते 
शायद ....
मेरे विचारों पर धारा 
एक सौ चव्वालिस
लागू होती जा रही है....


N.B. मेरा एक इंग्लिश पोएट्री का ब्लॉग भी है... जिसे अभी लिखना शुरू किया है... उम्मीद है पसंद आएगा... वैसे मैं इंग्लिश पोएट्री इस वेबसाईट पर लिखता हूँ... जहाँ मेरी तकरीबन सात सौ इंग्लिश कवितायेँ हैं... 

सोमवार, 31 मई 2010

शेक्सपियर ग़लत था.... नाम में बहुत कुछ रखा है.... : महफूज़

दुनिया में इन्सान जब जन्म लेता है, तब वह अपने साथ कोई नाम नहीं लाता. हाँ! फ़ौरी तौर पर उसका नामकरण कर दिया जाता है. जैसे:- पप्पू, बिल्लू, पिंकी, चिंटू, बाबू.. आदि और भी बहुत से नाम. नाम तो पैदा होने के कुछ दिनों पर रखा जाता है, जिसे  हम बाकायदा नामकरण संस्कार कहते हैं, ताकि परिवार, समाज, गाँव, राष्ट्र और दुनिया में लोग उसे उस नाम से पहचानें और पुकारें, और यह परंपरा हर जगह, हर समाज में प्रचलित है. सामाजिक सरोकार में भी उस नाम से ही व्यवहार किया जाता है. सृष्टि के प्रारम्भ से ही हमारी धार्मिक क़िताबों से वस्तुओं के और पदार्थों के नाम पाए गए हैं और माता-पिता, भाई-बहन आदि सम्बन्धवाचक संज्ञाएँ भी हमारी धार्मिक क़िताबों से ही पायी गयीं हैं. इन्ही धार्मिक क़िताबों से इंसानों ने अपनी संतानों के लिए नाम रखना शुरू किया.  इस तरह देखा जाए तो नामकरण एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है. 


अगर सोचा जाए कि कोई नाम ही नहीं होता तो क्या होता? पेड़....पेड़ नहीं होता तो क्या होता? आम...आम नहीं होता तो क्या होता? मैं...महफूज़ नहीं होता तो क्या होता? समीरलाल जी...समीरलाल नहीं होते तो क्या होते? शिखा ....शिखा नहीं होती तो क्या होतीं? तो कहने का मतलब यह है कि अगर नाम नहीं होता, तो संसार का व्यवहार पल भर भी नहीं चल पाता, इसलिए नाम का बड़ा महत्त्व है और नाम से ही सहजता प्राप्त होतीं हैं. 

नाम कई प्रकार से हो सकते हैं. कुछ गुण के अनुसार, कुछ कर्म के अनुसार, स्वभाव के अनुसार, सम्बन्ध के अनुसार और व्यवहार के अनुसार भी देखने में आते हैं. एक इंसान के कई नाम हो सकते हैं, लेकिन मुख्य नाम एक ही होता है. जैसे मेरा प्यार से पुकारा जाने वाला नाम "पप्पू" है (ही ही ही ...), मेरे घर में, नाते-रिश्तेदार सब पप्पू बुलाते है, लेकिन मुख्य नाम महफूज़ है. वैसे, नाम कैसा रखना चाहिए इसका भी मार्गदर्शन, धर्मानुसार, संस्कृति व् संस्कार में पाया जाता है. और यह भी कहा जाता है कि नाम का असर हमारे पूरे व्यक्तित्व पर भी पड़ता है. अब कोई इंसान बुधवार को पैदा हुआ तो घर वालों ने उसका नाम प्यार से बुद्धू रख दिया, तो वो इंसान अपने नाम के ऐकौर्डिंग ही बिहेव करेगा... वो वाकई में बुद्धू होगा. ऐसे ही अगर देखें तो मोनिका, अंजलि, रश्मि, टीना, रीटा, फ़िज़ां, और पारुल नाम की लडकियां हमेशा सुंदर ही मिलेंगीं क्यूंकि इन नामों का मतलब ही सुंदर होता है. इसलिए नाम ऐसा होना चाहिए जो पूरे व्यक्तित्व को सार्थक बनाए और हमेशा उस नाम से ज़िंदगी   में प्रेरणा  मिलती रहे. बहुत पहले की बात है... मैं उस वक़्त नाइंथ क्लास में पढता था... मेरे साथ एक लड़का पढता था... उसका नाम छेदी लाल था... अब जैसा उसका नाम, वैसे ही उसका रूप और व्यवहार. उसे कोई भी स्टूडेंट अपने साथ नहीं रखना चाहता था, सिर्फ उसके नाम की वजह से.... वो पढने में भी छेदी टाईप का था... और उसको भी शर्म आती थी....उसे कोई अपने साथ बैठाना भी नहीं चाहता था.... उसे मैं अपने साथ बैठाने लगा... सिर्फ यह दिखाने के लिए... कि ... मेरे जैसे स्मार्ट को यह सब चीज़ें परेशान नहीं करतीं.... अब जब भी कोई नया टीचर आता.. वो खड़ा कर के सबका इंट्रो लेता तो उसके बाद मेरा ही नंबर आता .... अब उसका नाम छेदी लाल... अब इससे पहले कि मैं अपना नाम टीचर को बताता ...सारी क्लास पहले ही बोल  देती एक स्वर में..... कि सर...इसका नाम सुराख अली है.... अब छेदी लाल और सुराख अली का कॉम्बिनेशन भी देखिये.... एकदम ट्विन सिटी की तरह.... हैदराबाद और सिकंदराबाद ...की तरह...   अब धीरे धीरे मुझे भी वो प्रॉब्लम देने लगा.... तो मैं भी धीरे से अलग हो गया.... तो नाम का बहुत असर होता है. अगर नाम का असर नहीं होता... तो थ्री इडियट्स में करीना कपूर ...बेचारे आमिर खान का दोनों बार नाम सुनकर "यक" नहीं कहती और यह भी नहीं कहती कि मैं शादी के बाद अपना सरनेम नहीं चेंज करुँगी. .... 

इंसानों और इश्वर के नामों में बहुत अंतर देखने में आता है. इंसानी नाम सार्थक, यथार्थ और वास्तविक नहीं होते, लेकिन अगर देखें तो ईश्वर (ख़ुदा) के सारे नाम सार्थक हैं. जैसे किसी एक मनुष्य का नाम अमरसिंह है. लेकिन, नाम अमर होने से क्या वह मरेगा नहीं? मरना तो उसे है ही, इसका मतलब है कि उसका नाम सार्थक ना रहा. अगर किसी का नाम अन्नपूर्णा है और वो भीख मांगती है, तब क्या उसका नाम सार्थक हुआ? 

इसलिए नाम का बहुत महत्त्व है, नाम हमारे व्यक्तित्व को सार्थक बनाते हैं. अगर हम ग़ुलाब को ग़ुलाब ना कहें तो क्या उसकी ख़ुशबू कम हो जाएगी? नहीं..... लेकिन नाम तो ग़ुलाब ही रहेगा न, जुलाब तो नहीं होगा ना? इसलिए शेक्सपियर ग़लत था. यह कह देने भर से कि नाम में क्या रखा है? काम नहीं चलेगा. नाम में तो बहुत कुछ रखा है. नाम हमें सार्थकता व् सम्पूर्णता प्रदान करते है, नाम तो अव्यय, अविनाशी और ईश्वर जैसा है.
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साहित्य जगत व ब्लॉग जगत के तमाम मित्रों को यह बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी हिंदी कविता "बचपन" अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "पुरवाई' जो कि लन्दन से प्रकाशित होती है, में प्रकाशित हुई है. कविता की  स्कैन कॉपी अवलोकन के लिए प्रस्तुत है.



शनिवार, 10 अप्रैल 2010

खुशियाँ बांटने से बढती है..नफरत का क्या काम? : महफूज़


सबसे पहले समस्त ब्लॉग जगत को इतना अपनापन और स्नेह देने के लिए धन्यवाद. (खुशदीप भैया के लिए सिर्फ एक बात कहना चाहूँगा कि मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ. मुझे गर्व है आप पर.) मैं बिन माँ-बाप का होकर भी अकेला नहीं हूँ, यह मुझे समस्त ब्लॉग जगत ने बता दिया. इसके लिए मैं पूरे हिंदी व इंग्लिश ब्लॉग जगत का शुक्रगुज़ार हूँ. मुझे तो पता ही नहीं था कि सब मुझे इतना प्यार करते हैं? पिछले दो महीने से वक़्त ही नहीं था कि नेट पर बैठ सकूँ? कुछ प्रोब्लेम्स ही ऐसी थीं. लेकिन आज जब पूरा ब्लॉग जगत खंगाला तो आँखों से आंसू छलक पड़े. ब्लॉग जगत के लोकप्रियता के ऐसे शिखर पर आप सब लोग बैठाएंगे, इसका अंदाज़ा भी मुझे नहीं था. लोग कहते हैं कि ब्लॉग कि दुनिया ऐसी है कि लोग जल्दी ही भुला देते हैं, लेकिन आप सबके प्यार ने इस मिथ को झुठला दिया. आज सबसे पहली टिप्पणी डॉ. अजित गुप्ता जी के ब्लॉग पर की, अपने आप हाथ से माँ का संबोधन निकल पडा, जिसका ध्यान मुझे बिलकुल भी नहीं था, ममा का मेल आया तो बहुत देर तक रोता रहा. इस ब्लॉग जगत ने मुझे हर रिश्ता दिया है. माँ नहीं है मेरी, लेकिन आज मेरे पास ब्लॉग जगत के द्वारा जो रिश्ता बना है मेरा उससे माँ कि कमी अब नहीं महसूस होती है. अब तो मैं यहाँ धन्यवाद के लिए नाम भी नहीं लिख सकता हूँ क्यूंकि इतने सिर्फ नाम लिखने के लिए मुझे चार पोस्ट लिखनी पड़ेगी. मैं तो सबके प्यार से अभीभूत हूँ.

मैं आज फिर पूरे ब्लॉग जगत को अपनी खुशियों में शामिल करना चाहता हूँ. अब जैसा कि मैंने आज से ९ महीने पहले एक धन्यवाद पोस्ट लिखी थी और उसमें बताया था कि अमेरिका के Wisconsin University जो कि Madison State में है. उस यूनिवर्सिटी के Emeritus Professor. Nancy L.John Diekelmannn ने  मुझे संपर्क कर के  मेरी कविता "Fire is still Alive" को टी-शर्ट पर प्रकाशित करने की अनुमति मांगी थी, जो कि मैंने उनको दे दी थी, उस सिलसिले में मुझे उस वक़्त अमरीका भी जाना था लेकिन उन्होंने बाद में मना कर दिया था. इस पूरे दस महीने के दौरान अलग अलग चरण में मेरी उनसे फ़ोन और इ.मेल के ज़रिये बात-चीत चल रही थी. बाद में उन्होंने बताया कि वो टी-शर्ट एक अप्रैल को छप कर आ जाएगी.  और जब वो टी-शर्ट छप कर आ गई तो उन्होंने मुझे फोन और इ.मेल से सूचित किया और इसकी ख़बर मैंने सबसे पहले अपनी मम्मी रश्मि प्रभा जी को फोन के द्वारा सत्ताईस मार्च को सूचित किया. Diekelmann जी ने मुझे मेल के द्वारा सूचित किया कि Priority Mail जो कि अमरीका कि सबसे तेज़ डाक सेवा है जो पूरी दुनिया में कहीं भी डाक दो दिन में पहुंचाने का दावा करती है से चार टी-शर्ट भेज दी है. उन्होंने मुझसे माफ़ी भी मांगी कि टी-शर्ट पर मेरा नाम गलत प्रिंट हो गया है. हालांकि उन्होंने मुझसे citation मेल कर के पूछा था, लेकिन नेट से दूर होने की वजह से मैं उन्हें समय पर जवाब नहीं दे पाया, और टी-शर्ट छप कर आ गई. जब वो टी-शर्ट छप कर आ गई तो उसको स्कैन कर के मेरी बहन ने मेरी मेल पर भेज दिया और इसकी खुशखबरी सबसे पहले मैंने आदरणीय समीर लाल जी, खुशदीप भैया और अदा जी को मेल फॉरवर्ड कर के बताया. जिसका ज़िक्र खुशदीप भैया ने फर्स्ट अप्रैल को अपने ब्लॉग पर किया, जिसको काफी लोगों ने मूर्ख दिवस का मज़ाक समझ लिया...हा हा हा हा हा .... फिर बाद में अदा जी ने अपने ब्लॉग पर पूरी स्कैन मेल पोस्ट की. जब उन्होंने पोस्ट कर दिया फिर उसके बाद मैंने अपने लोगों को फोन से सूचित किया. अब मैं तो अपने घर से बहुत दूर हूँ... बहुत मन है वो टी-शर्ट पहनने  का.... और यह ख़्वाहिश लखनऊ और गोरखपुर पहुँच कर ही पूरी हो सकती है. अभी तो देहरादून का प्लान है फिर उसके बाद ३ दिन के लिए मलेशिया जाना है.  

Diekelmann जी ने बताया कि मेरी वो कविता Wisconsin University के सिलेबस में भी जोड़ी जा रही है और दिसम्बर में Wisconsin University में  होने वाले दीक्षांत समारोह में मुझे भी आमंत्रित किया जायेगा जहाँ मुख्य अतिथि अमरीका के राष्ट्रपति श्री. बराक ओबामा जी भी मुझे सम्मानित करेंगे. अमरीकन राष्ट्रपति जी के ओफ्फीस से भी मेल बधाई कि मेल चुकी है.  उन्होंने (Diekelmann) यह भी बताया कि पहले यह टी-शर्ट परियोजना Non-Profit based थी लेकिन कंपनी ने जब उसे मार्केट में उतारने का प्रस्ताव भी रखा तो उन्होंने इजाज़त दे दी और कहा कि जब मार्केट में यह आएगी तो आपको Royalty भी मिलेगी. मुझे यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई. इस सन्दर्भ में बहुत जल्द ही पेपर्ज़ साइन होने वाले हैं. उन्होंने यह भी बताया कि रोयल्टी सारी लीगल कार्यवाही और FEMA Act. की formalities पूरी हो जाने के बाद ही मिलेगी जिसमें तीन से चार महिने का समय लगेगा. Diekelmann जी ने यह बताया कि यह टी-शर्ट अमरीका, कनाडा सहित एशिया के कुछ देशों (जिसमें भारत भी) में भी बिक्री की जायेंगीं.. इससे पहले भी मुझे USA से सन २००५ में International Poet of the year का अवार्ड मेरी अंग्रेजी कविता "Lullaby for a missing child' के लिए   मिल चुका है. (कृपया मेरे ब्लॉग पर और ऑरकुट के एल्बम में अखबारों की स्कैन कॉपी देखें..) जिसके लिए मुझे तत्कालीन मुलायम  राज्य सरकार ने भी U P D C जिसकी अध्यक्ष उस वक़्त जया बच्चन जी थीं के हाथों और तरफ से सम्मानित किया गया था. (कृपया ब्लॉग के दायीं ओर लगी फोटो देखें और अखबारों की कतरन देखें)... इस बार भी मेरी बहन ने मुझे फोन कर के बताया कि ऐसा कोई फोन आया था और मेरे बाहर होने की वजह से बोल दिया गया कि मैं बाहर हूँ और मुझे जल्द से जल्द संपर्क करने के लिए कहा गया है... अब किस विभाग से आया यह तो मुझे गोरखपुर पहुँच कर ही पता चलेगा.... गोरखपुर/लखनऊ पहुँच कर जैसे ही सूचना/तिथि का निर्धारण होगा मैं आप सबको ज़रूर सूचित करूँगा... आप लोग सब तैयार रहिएगा.... काश! पिता जी ज़िंदा होते तो मेरी ना-मौजूदगी में सब संभाल लेते...सच कहा गया है...माँ-बाप के बिना जीवन अधूरा है. इसकी भी सूचना मैंने अपने लोगों को दी है कि सब लोग तैयार रहें.... इस बार मेरा परिवार बहुत बड़ा है. तो मैंने अपने ब्लॉग परिवार को भी सूचित किया. अब सारी डिटेल तो गोरखपुर पहुँच कर ही पता चलेगी. इस उपलब्धि को लखनऊ/गोरखपुर पहुँच कर ही प्रेस मीट और प्रेस रिलीज़ कर के समस्त दुनिया के सामने भी रखना है. मीडिया से फोन तो आ रहे है, लेकिन रोज़ी रोटी पहले है...काम ख़त्म होते ही इस उपलब्धि पर काम करना है.    श्री.बिल्लोरे जी ने कहा था कि हम यहीं पर प्रेस रिलीज़ कर दे रहे हैं,  जिसकी सूचना उन्होंने यहाँ के मीडिया को भी दे दी थी, लेकिन मैंने मना कर दिया कि मैं अपनी सरज़मीन और जन्मभूमि पर ही सब कुछ करूंगा. इसका मैं श्री. गिरीश बिल्लोरे जी का एहसानमंद हूँ.  अब जब लखनऊ /गोरखपुर पहुंचूंगा और इस सफलता को सेलेब्रेट करूँगा तो मैं अभी से समस्त ब्लॉग जगत को मैं आमंत्रण दे रहा हूँ कि अपनी उपस्थिति से मेरी खुशियों को दोगुना करें.

 मैं बहुत खुश भी हूँ और दुखी भी. दुखी इसलिए कि कई बार हम कई रिश्तों को समझ नहीं पाते हैं, हम गाहे-बगाहे ऐसे लोगों को अपना समझ लेते हैं, जो किसी मौके की तलाश में रहते हैं कि आपको दुःख हो. जिन्हें हम अपना समझते हैं वही धोखा दे जाते हैं. और जिन्हें हम कुछ भी नहीं समझते वो हमारे साथ रहते हैं और फिर एक नए रिश्ते को जन्म देते हैं. और फिर यही रिश्ता शायद ज़िन्दगी भर के लिए कायम हो जाता है. कई बार हम सोचते हैं कि जिन्हें हम प्यार कर रहे हैं वो हमारे साथ हर सुख दुःख में रहेगा फिर वही कब धोखा दे जाए ...कुछ कहा नहीं जा सकता. इस ब्लॉग जगत में मुझे बहुत कुछ मिला है. बहुत कुछ मिला है तो बहुत कुछ सीखा भी है. इंसान और रिश्तों को पहचानना मैंने ब्लॉग जगत से ही सीखा है. मुझे कई लोग और काफी लोग भी बहुत घमंडी किस्म का या फिर मगरूर किस्म का भी समझते हैं पर मेरा यकीन करिए मैं ऐसा बिलकुल भी नहीं हूँ. मैं हमेशा प्यार बांटता हूँ और बदले में सिर्फ प्यार ही चाहता हूँ. जब कभी मेल खोलता हूँ तो कोई गाली लिख के भेजता है, तो कोई कहता है कि तुझे अपनी सुन्दरता पे बहुत घमंड है, तो कोई कहता है कि मुकदमा कर दूंगा. मैं कहता हूँ कि अगर राष्ट्रवादी विचारधारा का होना क्या गुनाह है? क्या इसके लिए मुझे गाली देनी चाहिए? अब हैंडसम हूँ तो मेरा इसमें क्या दोष? क्या सुंदर होना घमंडी होने का मापदंड है? और मुकदमा भई कोई क्यूँ करेगा ...मैंने तो किसी की भैंस भी नहीं खोली है.... और वैसे इतना दम भी रखता हूँ कि भैंस खोल लूं ...और मैं ऐसे लोगों को क्या बोलूँ? इन्हें यह नहीं पता कि हम तो खानदानी मुकदमेबाज़ हैं. मेरे पिताजी मेरे ऊपर छः-छः मुक़दमे छोड़ कर गए हैं. ज़मीन से लेकर, 307 और 504  के मुक़दमे झेल रहा हूँ बिना मतलब के .... ऐसे लोगों को क्या बोलूँ ? मैंने एक बार जज से कहा भी था कि बिना मतलब इतना सब झेल रहा हूँ... तो जज ने कहा अच्छा तो है.... पता कैसे चलेगा कि बड़े आदमी हो... तो ऐसे लोगों को मैं यही कहना चाहूँगा कि फर्जी मुक़दमे में कैसे फंसाया जाता है यह मुझसे ज्यादा अच्छे से कोई नहीं जानेगा. इसलिए अब इस प्रकार की मेल भेजना बंद करें या फिर कोई मुकदमा लाद ही दें मुझ पर ... फिर देखें क्या होता है? मैं तो खुलेआम कहता हूँ कि जिसे भी मुझसे झगडा करना है तो एक बार सोच ले क्यूंकि मैं डसूंगा तो बहुत दर्द होगा. और आप ही लोग बताइए कि मैंने कभी किसी को ब्लॉग पर उल्टा सीधा कहा है? किसी की भी इन्सल्ट की है? हाँ! एक बार मैंने महिलाओं के खिलाफ कुछ गलत किसी पोस्ट पर कमेन्ट के रूप में लिख दिया था.... उसके लिए मैं माफ़ी भी मांग चुका हूँ और आज इस खुले मंच से अपने उस गंदे और वाहियात कमेन्ट के लिए फिर से समस्त ब्लॉग जगत कि महिलाओं से माफ़ी मांगता हूँ.  मेरा यकीन करिए ... मुझे बहकाया गया था... शायद किसी रौ में मैंने वो लिख भी दिया. और तबसे उसका पश्चाताप कर रहा हूँ. उस कमेन्ट की वजह से मैंने कई अच्छे दोस्त इस ब्लॉग जगत पर खो दिए. और तो और कुछ लोग ब्लॉग समाचार या फिर किसी और नाम से ब्लॉग बना कर मेरे नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं. मैं इन लोगों को condemn करता हूँ और साथ ही साथ वार्न भी . मैं तो इतना ही कहूँगा कि प्यार बांटिये .... प्यार मिलेगा...  नहीं तो वही कहावत वाला हाल होगा कि "बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होए..."  

अंत में मैं आदरणीय समीर लाल जी, खुशदीप भैया (आप मेरे सगे से बढ़ कर हैं...), श्री. ऍम.वर्मा जी, आदरणीय शास्त्री जी, श्री. अविनाश वाचस्पति जी, श्री. शरद कोकास भैया, श्री. पाबला जी, श्री. ललित शर्मा जी, श्री. अवधिया जी, shri. ajay kumar jha ji, श्री. डॉ. अरविन्द मिश्र जी, श्री. गिरिजेश राव जी, श्री. महेंद्र मिश्र जी, श्री.रविन्द्र प्रभात जी, श्री. सुमन जी (नाईस वाले), श्री. संजय अनेजा जी... श्री. बवाल जी ..आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद... आप लोग हमेशा मेरे साथ रहे ...मेरा हौसला बढाया.... मैं आप सबका आभारी हूँ. 

मैं श्री. गिरीश बिल्लोरे जी का बहुत एहसानमंद हूँ. आपने व आपके परिवार ने मुझे इस अनजान शहर में बिलकुल भी अकेला नहीं महसूस होने दिया. आपने मेरा बहुत ख्याल रखा. मुझे बिलकुल भी एहसास ही नहीं हुआ कि मैं एक अलग शहर में हूँ.     आपने बड़े भाई और पिता की तरह मेरा ख्याल रखा. जो इज्ज़त आपने मुझे दी वो मैं पूरी ज़िन्दगी नहीं भूल सकता. 

मैं मम्मी रश्मि प्रभा जी (आपका आशीर्वाद हमेशा से मेरे साथ रहा है..), डॉ.अजित गुप्ता जी.... (ममा... कल आपका मेल आने के बाद मैं बहुत रोया हूँ... ममा..आपको मैंने Diekelmann जी का फोन नंबर और इ.मेल ..मेल कर दिया है.... आप अमेरिका पहुँच कर उनको फोन कर लीजियेगा ... वो आपको टी-शर्ट available करवा देंगे..) ...रश्मि रविजा जी...(आपका मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ... हर पल आपने मेरा हौसला बढाया... discourage होने से बचाया..I am very thankful to you....), शिखा जी..(आपको मैं बहुत मिस कर रहा हूँ) ... वाणी दीदी (क्या दीदी... कान छोडिये ना....अब लम्बी-लम्बी नहीं फेकूंगा.... दी...प्लीज़ कान छोड़ दीजिये... सॉरी बाबा..आ..दी..दर्द कर रहा है..)....अदा जी.... (आप में तो मेरी जान बसती है... मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ... ) मैं आप सब लोगों का शुक्रगुज़ार हूँ ... और मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ.... 

Last but not the least.... मैं पूरे ब्लॉग जगत का आभार व्यक्त करता हूँ.... जो इज्ज़त और प्यार आप सबने मुझे दिया है .... उसका मैं शुक्रगुज़ार हूँ. मेरे लिए यह संभव ही नहीं है कि मैं आप सबका शुभ नाम लिखूं... क्यूंकि आप लोग भी जानते हैं कि अगर मैंने नाम के साथ आभार व्यक्त किया तो चार पोस्ट और लिखनी पड़ेगी. मैं आप सबसे बहुत प्यार करता हूँ. 

कई बार हम इतनी जिम्मेदारियों में फंसे होते हैं कि कई बाहरी कामों के लिए वक़्त ही नहीं निकाल पाते हैं. मैं तो वैसे भी इतना बीजी हूँ कि बीज़ी वर्ड भी मेरे बीज़िनेस के आगे बहुत  बहुत खाली है... इसी बीज़िनेस को देखते हुए भई आज मैं लखनऊ ब्लोग्गर अस्सोसियेशन के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे रहा हूँ. हालांकि, मुझे पता नहीं था कि मैं इस अस्सोसियेशन का अध्यक्ष भी हूँ... जब पता चला तो अपनी गैर ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ....  मैंने सोचा कि इतने नालायक अध्यक्ष का क्या फायदा? जो अपने संस्था के बारे में ही ज्यादा नहीं जान रहा हो... ख़ैर! मैं तो समस्त ब्लॉग जगत का तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. मेरा ब्लॉग जगत के विद्वान जनों से अनुरोध है कि कृपया मेरी कविता "Fire is still alive" का हिंदी में अनुवाद कर के मुझे दीजिये. मैं आभारी रहूँगा.

(अपने शुभचिंतकों व मित्रों के कहने पर मेल व कोरियर के स्नैपशॉट हटा रहा हूँ.... ११/०४/२०१०....समय : १२.५५)   

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

इस क़दर टूटा हूँ कि रोना चाहता हूँ....: महफूज़

कभी-कभी मन बहुत उदास होता है. कारण ख़ुद को भी नहीं पता होता. हम रोना तो चाहते हैं, लेकिन आंसू नहीं निकलते, मंज़िल सामने तो होती है लेकिन रास्तों का पता नहीं होता. विचारों का द्वंद्व  दिल-ओ-दिमाग़ में चलता रहता है लेकिन विचारों में ठहराव नहीं होता. यूँ ही अपलक लेटे-लेटे छत पर टंगे पंखे को देखते हैं लेकिन अशांत मन द्वंद्व में रहता है. इसी द्वंद्व को दर्शाती ....प्रस्तुत है एक कविता.....  




इस क़दर टूटा हूँ कि
रोना चाहता हूँ.
आत्मा की पुक़ार खींच रही है
ख़ुद से बातें करना चाहता हूँ.
घना  अँधेरा,
जिसकी दुनिया नहीं
खिड़की किनारे बैठ कर,
सूनी आँखों से,
सुनता रेलगाड़ी की आवाज़
अनमना सा,
मंज़िल को पाना चाहता हूँ.
गाता उदासी के गीत
सोच! काश! माँ ज़िंदा होती?
तो जीवन होता सुंदर और भी सुंदर
ख़ुद को गढ़ता पढ़कर
शिव खेडा "आप जीत सकते हैं"
फ़िर सोचता,
जाने कैसे गढ़ता कुम्हार
मिटटी के लोंदे को
जहाँ सांस भी थिरकती है
चाक पर..
दोहराता ख़ुद को
स्वार्थ खोजते कुछ
करता अपने को सार्थक 
अपलक, मृत्यु से पहले
करके पापों का अपहरण
भिड़ता कहीं,
अतीत और आगत से
अपने काम को अंजाम देते हुए
और
निकल पड़ता हूँ किसी अनंत 
यात्रा पर....

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

इसीलिए सिर्फ प्रेम करना चाहिए..: महफूज़


अन्नपूर्णा कूड़ा फेंकने घर के बाहर आई तो देखा कि तीन बूढ़े व्यक्ति घर के बाहर वाले चबूतरे पर बैठे हैं. अन्नपूर्णा ने उन्हें नहीं पहचानते हुए कहा " वैसे तो मैं आप लोगों को नहीं जानतीं, फिर भी घर के अन्दर आईये और कुछ भोजन ग्रहण कीजिये."

"क्या घर का मालिक घर में है?" बूढों ने पूछा...
"नहीं" अन्नपूर्णा ने कहा. "वे बाहर गए हैं."

"तब हम अन्दर नहीं आ सकते".. बूढों ने कहा.

शाम को अन्नपूर्णा के पति जब घर पर आये तो अन्नपूर्णा ने दिन की घटना के बारे में बताया.

"जाओ उनको बताओ कि मैं घर पर आ गया हूँ और आदर के साथ अन्दर ले आओ.." अन्नपूर्णा के पति ने कहा...

अन्नपूर्णा बाहर आई और उन लोगों को घर के अन्दर चलने के लिए आमंत्रित किया. 

" हम एक साथ घर के अन्दर नहीं जा सकते," बूढों ने कहा...
"क्यूँ?" वो कारण जानना चाहती थी..

उनमें से एक बूढा बोला," मेरा नाम धन है तथा यह मेरे साथी सफलता और प्रेम हैं. अब तुम जाओ और अपने पति से विमर्श करके बताओ कि वो हम तीनों में से किसे घर के अन्दर आमंत्रित करना चाहते हैं."

अन्नपूर्णा अन्दर आई और सारा वाक़या अपने पति से बताया. 

"ठीक है, धन को अन्दर आने दो जिससे हमारा घर भी धन से भर जाए." अन्नपूर्णा के पति ने कहा.....

"नहीं, क्यूँ ना हम सफलता को सफलता को आमंत्रित करें?" अन्नपूर्णा ने कहा...

दोनों की बेटी जो सारी बातें सुन रही थी ने कहा, "क्यूँ ना हम प्रेम को आमंत्रित करें जिससे कि हमारा घर भी प्रेम से भर जायेगा?"

अन्नपूर्णा के पति ने बेटी की बात को रखते हुए कहा, "ठीक है, जाओ प्रेम को ले आओ..."

अन्नपूर्णा बाहर गई और तीनों बूढों से पूछा, "आपमें से प्रेम कौन है? कृपया अन्दर आईये और हमारे मेहमान बनिए...."

प्रेम उठा और घर की ओर चल दिया. उसके पीछे - पीछे बाकी दोनों बूढ़े भी चलने लगे.....

आश्चर्यचकित होते हुए अन्नपूर्णा ने धन और सफलता से पूछा," मैंने तो सिर्फ प्रेम को आमंत्रित किया था .... आप लोग क्यूँ अन्दर आ रहे हैं?"

दोनों बूढों ने एक साथ जवाब दिया: "प्रेम जहाँ भी जाता है, हम उसके साथ जाते हैं..." 

बुधवार, 27 जनवरी 2010

जज़्बा ग़र दिल में हो तो हर मुश्किल आसाँ हो जाती है... मिलिए हिंदुस्तान के एक उभरते हुए ग़ज़लकार से: महफूज़

कहते हैं.....कविता या शायरी ख़ुदा  की ज़ुबां होती है...और उस ज़ुबां  को हम तक पहुँचाने वाले लोग बहुत ख़ास होते हैं...ऐसे ही एक बहुत ख़ास शख्स से आज मैं आपका विसाल करवाने जा रहा हूँ..नाम है जनाब पवन कुमार सिंह. यूँ  तो इनका तार्रुफ़ मेरी आवाज़ या मेरी कलम की मोहताज है ही नहीं ...इन्होने अपना बहुत ऊंचा मक़ाम बनाया हुआ है. जनाब पवन कुमार सिंह आई.ए.एस हैं....किसी ने मुझसे कहा था आई.ए.एस कोई बनता नहीं है,  आई.ए.एस पैदा होता  हैं....और यह बिलकुल सही बात है....शायद आपको आई.ए.एस कई मिल जाएँ ...लेकिन शायर आई.ए.एस , यह एक बहुत ही रेयर कॉम्बिनेशन है...और इनकी यही बात मुझे कायल कर गई.


जनाब पवन कुमार सिंह जी से मेरी मुलाक़ात अपने मेरे अपने शहर गोरखपुर प्रवास के दौरान हुई. जनाब पवन कुमार सिंह जी मेरे हमउम्र ही हैं और इस वक़्त गोरखपुर में जोइंट मैजिस्ट्रेट की बसात से ओज हैं...जनाब पवन कुमार सिंह जी लखनऊ के भी Sub divisional magistrate रह चुके  हैं. लखनऊ में प्रशासनिक शौर्य गाथा आपकी बहुत मशहूर है. लखनऊ में मुहर्रम के दौरान इनके वक़्त में पूरे अमन-ओ-चैन के साथ ताजिये का जुलूस निकलता था. पवन जी बहुत ही सदाक़त-म' आब शख्सियत हैं. 
 
पवन कुमार जी शुरू से ही एक मेधावी छात्र  रहे....पढाई लिखाई में हमेशा अव्वल....इनकी मेधा ऐसी तीखी की आईएस बनना बायें हाथ का खेल रहा....इस उपलब्धि में इनके पिता श्री जो कि पुलिस सेवा में रहे का भरपूर हाथ रहा.... आपके पिताश्री ने पुलिस सेवा में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित किया है.....इनके पिता भी बहुत तीक्ष्ण दिमाग  के व्यक्ति रहे....उनका व्यक्तित्व भी बहुत प्रभावपूर्ण है....जो भी उनसे मिलता है...उनकी मृदुभाषा से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता....

जैसा की मैंने आपसे बताया ..जनाब पवन कुमार जी एक आई.ए.एस होने के साथ-साथ एक पहुँचे हुए शायर भी हैं......इस ग़ज़लगो ने ग़ज़लों की दुनिया में भी धूम मचा रखी है....मैं ग़ज़लों की तमीज तो नहीं रखता लेकिन इनकी ग़ज़लों ने हमेशा मुझे झिंझोड़ा है..... आपको उर्दू की बहुत ज़हीन इल्मियत हासिल है. आप सही मायनों में ग़ज़ल को ग़ज़ल लिखते हैं. कहते हैं कि बिना उर्दू और फ़ारसी के ग़ज़ल बन ही नहीं सकती और आप ऐसा लगता है कि  आपकी क़लम से उर्दू कि स्याही निजात होती है. हालांकि...आजकल ग़ज़ल हर भाषा में लिखी जा रही है. आपकी कई ग़ज़लें हिंदुस्तान के मशहूर क़िताबों में निशाँ-ऐ-शुहूद हो चुकी हैं. कई मशहूर ग़ज़लकारों ने आपकी ग़ज़ल को इल्मियत तौर पर तस्दीक किया है. इसीलिए आज की मेरी पोस्ट जनाब पवन कुमार जी के नाम आबिद (समर्पित) करता हूँ...उम्मीद ही नहीं ...यकीं  है आप सब भी मुझसे ज़रूर इत्तेफ़ाक़ होंगे...... 

मैंने अपने गुरु मशहूर गीतकार और ग़ज़लकार जनाब जावेद अख्तर जिनसे मैं आजकल ग़ज़ल की बारीकियां सीख रहा हूँ...से आपके बारे में ज़िक्र किया और उन्होंने ने भी आपकी उर्दू ग़ज़लों को लायक-ऐ-तहसीन किया है. और आपको हिंदुस्तान का उभरता हुआ ग़ज़ल गो का तमगा दिया है. जनाब जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि ग़ज़ल वो होती है जिसे गाई जा सके और आपकी ग़ज़लों को जावेद साहब ने उसी रूप में तस्दीक किया है. मैंने भी सोचा की मैंने हर विधा में लिखा है तो क्यूँ ना ग़ज़ल में भी हाथ आज़माया जाये? पर ग़ज़ल की बारीकियों को सीखने की ज़रूरत थी और उसके लिए एक अच्छे गुरु की ज़रूरत थी और जनाब जावेद साहब से अच्छा गुरु कौन हो सकता था. उम्मीद है की आने वाले दिनों में आप सबका तार्रुफ़ मेरी ग़ज़लों से भी होगा. ग़ज़ल सीखने में जनाब पवन कुमार सिंह जी भी मेरी काफी मदद कर रहे हैं. आपकी एक भूरे कवर की डाइरी है... जिसमें कई उम्दा ग़ज़लें आपकी क़लम से शिरकत कर चुकी हैं. मेरी आपसे गुज़ारिश है कि आप अपनी डाइरी के पन्नों को अपने ब्लॉग पर पूरी तरह से उकेर दें. आपकी एक ग़ज़ल जो मुझे बहुत दिल अज़ीज़  है...जिसमें आपने मोहब्बत में टूटने के एहसास को ... और टूट के फिर से खड़े होने के जज़्बात को बहुत ही खूबसूरती से उकेरा है....तो पेशे-ऐ-ख़िदमत है आपकी वही उम्दा ग़ज़ल ... तो हज़रात!!!!  ज़रा आप सब भी मोलाहिजा फरमाइयेगा...


ज़रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं !
सलामत आईने रहते हैं, चेहरे टूट जाते हैं !!

पनपते हैं यहाँ रिश्ते हिजाबों एहतियातों में,
बहुत बेबाक होते हैं वो रिश्ते टूट जाते हैं !!

नसीहत अब बुजुर्गों को यही देना मुनासिब है,
जियादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं !!

दिखाते ही नहीं जो मुद्दतों तिशनालबी अपनी, ,
सुबू के सामने आके वो प्यासे टूट जाते हैं !!

समंदर से मोहब्बत का यही एहसास सीखा है,
लहर आवाज़ देती है किनारे टूट जाते हैं !!

यही एक आखिरी सच है जो हर रिश्ते पे चस्पा है,
ज़रुरत के समय अक्सर भरोसे टूट जाते हैं !!


आपका यह कहना है कि  जिंदगी में जिन चीज़ों की ज़रूरत सबसे ज्यादा होती है उनमे दोस्तों को भी शामिल किया जाना बेहद ज़रूरी है। दोस्तों की ज़रूरत आपको उस समय सबसे ज्यादा होती है की जब आप उदास होते हैं या फ़िर कि जब आप काफी खुश होते हैं. वक्त पर दोस्तों का काम आना आपके लिए तसल्ली देने वाला लम्हा होता है। दोस्ती के बारे में एक बात और ,दोस्ती हमेशा तभी होती है जब आप निस्वार्थ तरीके से किसी से जुड़ते हैं. मुझे बहुत ख़ुशी है कि आप मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं.  चलते चलते पेश है आपकी एक और ग़ज़ल... 
ज़रा आप लोग भी नोश फरमाइयेगा... 

तेरी खातिर खुद को मिटा के देख लिया !
दिल को यूँ नादान बना के देख लिया !!

जब जब पलकें बंद करुँ कुछ चुभता है,
आँखों में एक ख्वाब सजा के देख लिया !!

बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है,
बच्चों को चुपचाप बिठा के देख लिया !!

कोई शख्स लतीफा क्यों बन जाता है,
सबको अपना हाल सुना के देख लिया !!

खुद्दारी और गैरत कैसे जाती है,
बुत के आगे सर को झुका के देख लिया !!

वस्ल के इक लम्हे में अक्सर हमने भी,
सदियों का एहसास जगा के देख लिया !!

इत्तेफाक यह देखिये आज... कि... मैंने दिन में यह पोस्ट लिखी और शाम में जनाब पवन जी का फोन आ गया... कि आप लखनऊ में ही हैं... और अभी उन्ही से मिल कर आ रहा हूँ...  वो दिन दूर नहीं जब हम हिंदुस्तान के बड़े नुमाईन्दा शायरों और ग़ज़ल कारों में आपका नाम  शुमार होते हुए ... फ़ख्र से  देखेंगे.  जनाब पवन जी के लिए बहुत सारी दुआएं......  आमीन....

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

जब मैं चोरी करते पकड़ा गया..:- महफूज़



आज आपको अपने स्कूल का एक बहुत मजेदार संस्मरण बताने जा रहा हूँ. यह संस्मरण पढ़ कर आपको पता चलेगा कि मैं स्कूल में कितना बदमाश किस्म का लड़का था. चंचलता व बदमाशी तो आज भी इस उम्र में भी (?) करता हूँ. बात उन दिनों की है जब मैं बारहवीं क्लास में पढ़ता था. मेरा एक अपना गैंग हुआ करता था.. मेरे गैंग में हम कोई आठ लड़के थे.  हम आठों अपने क्लास के सबसे स्टूडिय्स और बदमाश लड़के थे.
 
एक लड़का जिसका नाम सेंथिल राजन था. उसका एक ही काम था कि वो लड़किओं का टिफिन रोज़ असेम्बली से पहले चुरा कर खा जाता था, आजकल इडियन एयर फ़ोर्स में स्क्वाड्रन लीडर है और फाइटर पाइलट है.
 
मनोज यह आर्मी में कैप्टन था और कारगिल युद्ध में शहीद हो चुका है और इसकी मूर्ती यहीं  लखनऊ में इसी के नाम से मशहूर है.
 
गुरजिंदर सिंह सूरी यह महाशय भी कैप्टन थे और कारगिल में शहीद हो चुके हैं इनकी भी मूर्ती पंजाब के गुरदासपुर में लगी है. गुरजिंदर को बकरियां  चुराने का बहुत शौक था. यह बकरियां चुरा कर काट कर खा जाता था और खाल बेच देता था १०० रुपये में.  

सुखजिंदर सिंह ...इसको हम लोग सुक्खी बुलाते थे... इसकी ख़ास बात यह थी कि यह जब अपना जूडा खोल देता था तो बिलकुल लड़की लगता था. एक बार संडे के दिन इसके घर हम लोग गए  कॉल बेल बजाई तो यह बाहर निकला ...हम लोगों ने पूछा दीदी सुक्खी है? इसने हम लोगों को एक झापड़ लगाया और अपने बाल पीछे कर के बोला कि यह रहा सुक्खी... यह IIT से इंजिनियर हो कर आजकल कनाडा में है.
 
वजीह  अहमद खान यह आजकल लन्दन में है और वर्ल्ड का बहुत जाना माना कॉस्मेटिक सर्जन है. इसको घूमने का बहुत शौक है यह उस ज़माने में कालोनी के घरों का टी.वी. बना कर पैसे बचाता था और फिर घूमने निकल जाता था.  और आज पूरी दुनिया घूम रहा है. हमारे फिल्म जगत के काफी लोगों ने इससे सर्जरी करवाई है.  
 
अमलेंदु यह आजकल एक डिग्री कॉलेज में सीनियर लेक्चरार है.  अमलेंदु बिहारी था और  को  बोलता था. यह बहुत जिनिअस था. यह इतिहास का बहुत बड़ा ज्ञाता है. और सिविल में सेलेक्शन ना होने कि वजह से फ्रस्ट्रेट रहता है. 
 
मनीष ....मनीष आजकल IAS है ... और इस वक़्त डिस्ट्रिक्ट मैजिसट्रेट है. यह दसवीं क्लास से दारु पीता था. IIT कानपूर से पास हुआ ... यह फ्रूटी (Frooti) के पैकेट में दारु भर कर पीता था. 


बात हमारी बारहवीं क्लास की है.  अब जैसा की मै बता चुका हूँ कि हम लोग स्कूल के सबसे बदमाश लड़कों में आते थे. हम लोग क्या करते थे कि स्कूल में छुट्टी के बाद घर नहीं जाते थे...  और हम सब मिल कर दूसरे क्लासेस में जा कर फैन और ट्यूबलाईट के चोक खोल लिया करते थे. और फिर वही फैन्स और चोक्स को हम लोग  मार्केट में ले जा कर बेच दिया करते थे. फिर जो भी पैसे मिलते थे. उससे हम शाम में होटल प्रेसिडेंट में जाकर ऐश किया करते थे. हमारा स्कूल  बहुत बड़ा था ... प्राइमरी क्लास मिला कर कुल पांच सौ साठ कमरे थे... और हर क्लास में दस -दस फैन और छह ट्यूबलाईट लगे  होते थे. होटल प्रेसिडेंट आज भी है गोरखपुर में. हम लोग रोज़ एक फैन और चोक चुरा लिया करते थे और फिर बेच देते थे. धीरे धीरे पूरे स्कूल में खबर फ़ैल गई कि पंखे और चोक चोरी हो रहे हैं. प्रिंसिपल हमारा बहुत परेशां लेकिन उसको चोर मिल ही नहीं रहे थे. और हम लोग अपना काम बहुत सफाई से कर लिया करते थे. एक बार क्या हुआ कि हम दूकान पर फैन और चोक बेच रहे थे... तो जिस दूकान पर हम लोग सब बेच रहे थे उसी दूकान  पर एक प्राइमरी क्लास का टीचर भी कुछ सामान खरीद रहा था और उस टीचर को हम लोग जानते ही नहीं थे, लेकिन वो हम लोगों को जानता था ...उसने फैन बेचते हुए देख लिया और स्कूल के हर फैन पर पेंट से स्कूल का नाम शोर्ट फॉर्म में लिखा होता था. दूकानदार ने भी हमें पैसे दिए और हम लोग चलते बने. 

दूसरे दिन स्कूल में असेम्बली में हम आठों का नाम पुकारा गया. हम  आठों बड़े मज़े से डाइस की ओर दौड़ते हुए गए... क्यूंकि आये दिन हम आठों को कोई ना कोई प्राइज़ या फिर ट्राफी मिलती ही रहती थी और काफी ट्रोफीज़/प्राइज़ हम लोगों को मिलनी बाकी थीं... हम लोगों ने वही सोचा कि कुछ ना कुछ प्राइज़ मिलेगा इसीलिए नाम पुकारा गया है.  हम बड़ी शान से डाइस पर जाकर खड़े हो गए... सीना चौड़ा कर के. फिर असेम्बली वगैरह शुरू हुई. सारी औपचारिकताएं पूरी हुईं असेम्बली की. उसके बाद हमारा प्रिंसिपल माइक पर आ गया. हमारा प्रिंसिपल हम लोगों की तारीफ़ करने लगा ...फिर कहता है कि आज इन शेरों की महान करतूत  मैं बताने जा रहा हूँ. तब तक के सामने टेबल सज गई. हम लोगों ने सोचा कि ट्राफी इसी पर रखी जाएँगी और एक एक कर के हम लोगों को दी जाएँगी. थोड़ी देर के बाद हम लोग क्या देखते हैं कि टेबल पर वही फैन्स और चोक सजाये जा रहे हैं जो हम लोगों ने मिल कर चुराए थे. अब हम लोगों को काटो तो खून नहीं.. शर्म के मारे हालत खराब हो रही थी. हम लोग समझ गए कि चोरी पकड़ी गई. अब हमारे प्रिंसिपल ने हम लोगों की तारीफ़ करनी शुरू की.. पांच हज़ार बच्चों के सामने बताया कि हम ही लोग थे वो चोर. उसने उस दुकानदार को भी बुला लिया था. वो भी असेम्बली  में खड़ा था. वो टीचर भी आ गया गवाही देने.  अब हम लोगों की ख़ैर नहीं थी यह हम लोगों की समझ में आ गया. 


हमारे प्रिंसिपल ने एक पतला सा डंडा रखा हुआ था ... उस डंडे का नाम उसने गंगाराम रखा था. गंगाराम जिस पर भी पड़ता वो सीधा हॉस्पिटल जाता था. और जहाँ पड़ जाता था ...वहां से चमड़ी भी साथ लेकर निकलता था. अब प्रिसिपल ने चपरासी से कहा कि जाओ गंगाराम को लेकर आओ. गंगाराम आ गए. चपरासी रोज़ कपडे को तेल में डुबो कर गंगाराम की मालिश किया करता था. बस फिर क्या था.. सुबह -सुबह  जो मार पड़ी कि आज तक याद है. मुझे तो प्रिंसिपल ने नीचे गिरा कर लातों से भी मारा था. उसको मेरे सीने के बालों से बहुत चिढ थी... हमेशा कहता था कि सीने  के बाल नोच-नोच कर मारूंगा. प्रिंसिपल मुझे लीडर समझता था. कहता था कि यह शक्ल से धोखा देता है. एक और मजेदार बात बता रहा हूँ . हमारे स्कूल में हिंदी का नया टीचर आया था ...वो क्लास में सबका इंट्रो ले रहा था... मेरी बारी आई ...मैंने भी अपना इंट्रो दिया. उसके बाद वो टीचर बोलता है कि बड़ा भोला बच्चा है. इतना सुनते ही पूरी क्लास हंसने लग गई. बेचारे! के समझ में आया ही  नहीं कि सब लोग क्यूँ हंस रहे हैं. बहुत दिनों के बाद उसके समझ में आया कि उस दिन सब लोग क्यूँ हंस रहे थे. 

ख़ैर! हम लोग पांच हज़ार बच्चों के सामने मार खा कर क्लास में गए टूटे-फूटे. लेकिन शर्म नाम की चीज़ हम लोगों के चेहरे पर बिलकुल भी नहीं थी. क्लास में पहुँचते ही हम लोगों को देख कर पूरी क्लास खूंब हंसी... हम लोग भी खूब हँसे. हँसते हँसते बीच में यहाँ वहां दर्द भी हो उठता था. थोड़ी देर के बाद हम लोगों का सस्पेंशन आर्डर लेकर चपरासी आ गया. हम लोगों के लिए सस्पेंड होना आम बात थी. With immediate effect हम लोगों को स्कूल छोड़ने और अपने-अपने गार्जियंस को लाने का आदेश था.  हम लोगों ने अपना अपना बैग उठाया... पूरी क्लास हम लोगों को विदा करने गेट तक आई और अश्रुपूरित आँखों से सबने हमें विदाई दी. सब लोगों ने कहा कि जल्दी आना नहीं तो पूरा स्कूल सूना-सूना लगेगा. यह विदाई साल में पांच-छः बार ज़रूर होती थी. हमने भी जल्द ही दोबारा आने का वादा कर के सबसे गले मिल कर विदा लिया. उसके बाद घर पर क्या हुआ वो मैं बता नहीं सकता. 

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ...: महफूज़



कहाँ खो गयीं थीं तुम?
जवाब दो....
मत पूछो हाल मेरा,
पर मेरे हर आंसू  का हिसाब दो.

बुना था जो ख़्वाब तुम्हारे साथ,
उसे धड़कन बना कर पास रखा था,
तस्वीर जो बनाई थी तुम्हारी,
उसे आँखों में बसा कर रखा था.

सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ तुमसे,
क्या दूर रह कर तुम भी उदास रहतीं थीं? 

सोमवार, 11 जनवरी 2010

रोक सको तो रोक लो: - महफूज़



अभी थोड़े दिन पहले कि ही बात है. मैं जिम से एक्सरसाइज़ कर के अपने दोस्त पंकज के साथ घर लौट रहा था. कडाके कि ठण्ड में भी मुझे बहुत गर्मी लग रही थी. उस दिन कार्डियो और बेंच प्रेस बहुत ज्यादा कर लिया था. मुझे बॉडी बिल्डिंग का बहुत शौक़ है, मैं आज भी दो सौ पुश अप्स के साथ डेढ़ सौ पुल अप्स कर लेता हूँ. मेरे बयालीस इंच के बाइसेप्स और V-shaped  बॉडी पर टी-शर्ट खूब फब्ती है और इसीलिए मैं टी-शर्ट ज्यादा पहनता हूँ. इससे दो फायदे होते हैं एक तो सामने वाला पंगा लेने में थोडा घबराता है और खुद का सेल्फ-कॉन्फिडेंस भी अप रहता है. हमारे ज़ाकिर भाई कहते हैं कि वैसे भी आप बहुत हैंडसम हैं फिर काहे को इतनी बॉडी बिल्डिंग करते हैं?
अब क्या किया जाये... खुद को फिट रखना भी ज़रूरी है. अब ख़ुदा ने हमें जो अच्छी चीज़ दी है तो उसे संभालना भी हमारा ही काम है ना. ख़ैर! मैं बता रहा था कि उस दिन जब मैं लौट रहा था तो रस्ते में बहुत भीड़ थी, मेरा जिम मेरे घर से दस  किलोमीटर दूर हज़रतगंज में है, कई जगह बहुत जैम लगा हुआ था. बाइक ड्राइव करने में बहुत दिक्कत तो रही थी. मैं कैसे ना कैसे... किसी तरह सारे रुकावटों और भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ता चला जा रहा था. अपनी वैसे यह आदत है कि मैं ड्राइव करते वक़्त सामने वाले को कोई मौका नहीं देता, मेरा यही मोटिव रहता है कि बस बढ़ते रहो. रुकना  सामने वाले को है... मैंने कभी रुकना नहीं सीखा. अपने यही सिद्धांत पर कायम रहते हुए मैं बढ़ा  चला जा रहा था. तभी बाइक पर पीछे बैठा पंकज मुझसे कहता है कि," यार! महफूज़, तू बहुत ओफ्फेंसिव (offensive) ड्राइविंग करता है..."
मैं उसकी बात समझ नहीं पाया. मैंने कहा ," क्या मतलब?" मैं तो सारे रूल्ज़ फोल्लो करता हूँ...
उसने कहा कि " ओफ्फेंसिव से मेरा मतलब है कि तू सामने वाले को रुकने को मजबूर करता है और खुद रास्ता नहीं देता है. यह तेरा बहुत abstract behaviour है. उसकी बात सुनकर मैं जोर से हंस दिया. मैंने कहा कि यही तो अपना उसूल है. सामने वाले को मजबूर कर दो कि वो तुम्हे आगे बढ़ने के लिए रास्ता दे. मैं अपनी रियल ज़िन्दगी  में भी ऐसा ही करता हूँ... मैं कभी किसी को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता हूँ. मैं कभी किसी से डरता नहीं. ना ही खुद को किसी से कम समझता हूँ. आज जो दुनिया में इतनी कम उम्र में इतना नाम कमाया है ...उसके पीछे यही attitude है...  आज तक जिस काम में हाथ डाला है ... उसे पूरा कर के ही छोड़ा है. यही सब समझाते हुए कब उसका घर आ गया पता ही नहीं चला. उसे उसके घर ड्रॉप कर के मैं अपने घर आ गया.
उस वक़्त जो बात मैंने उसकी हंस कर टाल दी थी , वो बात मेरे दिल के अन्दर तक उतर चुकी थी. उसकी offensive driving वाली बात ने मुझे खुद के बारे बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया था. उसका मुझे offensive कहना ना जाने क्यूँ अच्छा लगा था.हालांकि यह offensive  शब्द बहुत नेगेटिव है पर यह मुझ पर पोसिटिवली सूट करता है. मुझे बहुत अच्छे से याद है आज भी ... मैं जब स्कूल में था और अगर किसी लड़के के मेरे से ज्यादा मार्क्स आ जाते थे ...तो मैं उसे मारने के बहाने खोजा करता था और जब तक के उसे मार नहीं लेता था ..मुझे चैन नहीं मिलता था. उस के दिल में इतनी दहशत पैदा कर देता था कि वो बेचारा जानबूझ कर अपना टेस्ट खराब कर देता था. और तो और मैं खुद को ही अपनी क्लास का टोपपर घोषित कर दिया करता था.  मेरा अपना गैंग था स्कूल में ...और मेरे गैंग में जितने भी लड़के थे सब एक नंबर के आवारा और studious थे... हम लोग all-rounder थे... अब मेरे गैंग के ज़्यादातर लड़के कारगिल युद्ध में शाहिद हो चुके हैं. बाकी जो बचे हैं उनमें से कुछ IAS  हैं , कुछ lecturer हैं, कुछ डॉक्टर हैं तो कुछ यहाँ वहां अच्छे पदों पर हैं. एक -दो चुनाव लड़ कर विधायक हैं. स्कूल के दौरान मेरे टीचर्स भी मुझसे बहुत डरते थे... क्यूंकि मुझे ऐसा लगता था कि मैं अपने टीचर से कहीं ज्यादा जानता हूँ... और कई मौकों पे इसे मैंने साबित भी किया... मेरे टीचर्स खुद मुझसे परेशां रहते थे... मेरे टीचर्स जो पढ़ाते थे... वो मैं पहले से ही  जानता था... और जब मैं क्लास में जवाब पहले ही दे देता था... तो बेचारा टीचर खुद ही शर्मा जाता था. मेरे टीचर्स मेरे पिताजी से मेरी शिकायत भी किया करते थे कि आपका बेटा रिस्पेक्ट नहीं करता है.  और मेरे पिताजी मुझे सबके सामने डांट मार कर टीचर और खुद कि संतुष्टि कर लेते थे.

यही हाल मेरा यूनिवर्सिटी में भी रहा. मैंने कभी भी यूनिवर्सिटी में ग्रैजूईशन की क्लास नहीं की...पोस्ट ग्रैजूईशन में भी कभी क्लास नहीं किया... मैं अपने टीचर्स को भी नहीं जानता था... न ही मेरे टीचर्स मुझे जानते थे... लेकिन मैंने पोस्ट ग्रैजूईशन में टॉप किया ... गोल्ड मेडल मिला... जब convocation में मुझे बुलाया गया ... और गोल्ड मेडल देने के बाद दो शब्द बोलने के लिए कहा... तो मैं बहुत परेशां हो गया.. क्यूंकि बाकी लोग श्रेय तो अपने टीचर्स को दे रहे थे.... और मैं अपने टीचर्स को ही नहीं जानता था... और न ही मेरे टीचर्स मुझे... बड़ी दुविधा कि सिचुईशन थी.. ख़ैर! मैंने दो शब्द में कहा कि मेरे इस सफलता का सारा श्रेय मैं खुद को देता हूँ... क्यूंकि मेरी मेहनत का  ही नतीजा यह सफलता थी.... और जब यह बताया कि मुझे UGC (NET) JRF भी  मिल  चुका है... तो सबने और दांतों तले उँगलियाँ दबा ली...  बेचारे ... मेरे यूनिवर्सिटी के टीचर.. खुद ही परेशां  थे...  सबने पूछा कि भाई कौन से बिल में छुपे थे... और किस्से तुमने पढाई कि... और बिना गुरु के कैसे टॉप कर गए?
मुझे ऐसा लगता है कि मैं सर्वज्ञाता हूँ. मुझे ऐसा भी लगता है कि कोई मेरे बराबर खड़ा नहीं हो सकता. कई बार तो मुझे ऐसा भी लगता है कि मैं अजर-अमर हूँ. मुझे ऐसा लगता है कि मैं कोई सुपर -ह्यूमन (Super Human) हूँ या फिर मेरे में डबल Y क्रोमोज़ोम हैं जो कि रेयरली ही मिलता है. मैं जब छोटा था तो साईकिल चलाने का शौक रखता था, मैं इंडिया का बेस्ट साइक्लिस्ट भी रह चुका हूँ और आज भी साईकिल पर वैसा ही स्टंट करता हूँ जो आपने सिर्फ फिल्मों में ही देखे होंगे. अपने स्कूल के दौरान मैंने कोई चौरासी साइकलें तोड़ी हैं. कभी कभी मैं जब सुबह सो कर उठता था तो यह सोच लेता था कि आज साईकिल का ब्रेक नहीं मारूंगा... चाहे कुछ भी हो जाए... और मैं वाकई में साईकिल का ब्रेक नहीं मारता था... एक बार तो जीप से टकरा गया था ...लेकिन मैं टकराते ही जम्प लगा गया था... लोगों कि भीड़ लग गई... मुझसे पूछा गया कि तुमने ब्रेक क्यूँ नहीं मारा... मैंने कहा कि मैंने सोचा हुआ था आज कि ब्रेक नहीं मारूंगा... सबने कहा कि पागल है मेजर साहब का लड़का. उस वक़्त पिताजी आर्मी में मेजर थे. मेरे पिताजी भी मुझे सनकी कहते थे.... हमारे स्कूल में जब भी कोई फंक्शन होता था तो मैं ज़बरदस्ती माइक ले लेता था ... क्यूंकि मुझे कुछ ना कुछ करना होता था.

एक बार हमारे स्कूल में स्कूल कैप्टन का चुनाव होने वाला था ...मैंने भी अपना नाम नोमिनेट किया पर हमारे प्रिंसिपल ने मेरा नाम काट दिया... प्रिंसी ने कहा कि तुम अगर कैप्टन बनोगे तो पूरा स्कूल तबाह हो जायेगा. और नोमिनेट ऐसे लड़के का नाम हुआ जिससे हमारे गैंग कि दुश्मनी थी. अब मुझे बहुत बेईज्ज़ती महसूस हुई ... मैंने भी प्रिंसी से कहा कि मैं इसे कैप्टन बनने ही नहीं दूंगा... प्रिंसी ने मुझे कहा कि मैं तेरे सीने के बाल खींच के मारूंगा... मेरे शर्ट में से मेरे सीने के बाल झलकते थे... उसे ही देख कर उसने कहा. मैंने भी कहा कि मैं उसे कैप्टन बनने ही नहीं दूंगा. फिर मैंने सब क्लास में जाकर सबको धमकी दी कि कोई अगर उसे वोट करेगा तो मार खायेगा. ख़ैर ! वो लड़का स्कूल कैप्टन बन गया. फिर वो हमारे ऊपर रौब गांठने लगा. पहले ही दिन हमने उसकी ऐसी धुनाई की कि वो सारी हेकड़ी भूल गया. और मैंने खुद को स्कूल कैप्टन घोषित कर दिया. अंत में प्रिंसी को भी मानना पड़ा ... बेचारे ने कहा कि पांच महीने की बात है यह लोग तो पास ओउट हो जायेंगे. इसी को बना देते हैं. मैं स्कूल कैप्टन बन गया.

ऐसे ही हमारे ट्वेल्थ के बोर्ड एक्जाम चल रहे थे.. हमारा सेंटर एक दूसरे स्कूल में पड़ा था... मैंने बोर्ड एक्जाम के तीन महीने पहले ही हिंदी छोड़ के इकोनोमिक्स सब्जेक्ट ले लिया था... अब जब बोर्ड में इकोनोमिक्स का पेपर आया तो मेरे तो हाथ पाँव फूल गए, मुझे पूरे पेपर में से सौ में से सिर्फ छब्बीस नंबर के सवाल आते थे... मैं कहा कि लो मेरी तो कम्पार्टमेंट अब पक्की हो गई... मैं बहुत परेशां हुआ . मेरे बगल में एक रीटा नाम की लड़की बैठी थी और उसके बगल में खिड़की के पास मेरा दोस्त दिनेश बैठा था... मैंने दिनेश से कहा कि भाई मैं तो गया इस बार ... आधे घंटे तक मैं इसी सोच में पागल हुआ जा रहा था.. थोड़ी देर के बाद मैंने एक डेसिशन लिया और अपना प्लान दिनेश को बताया ... दिनेश ने मेरा साथ देने के लिए कहा ... प्लान यह था कि क्लास के बाहर दिनेश का बैग रखा था उसमें इकोनोमिक्स की  बुक थी.. अब सवाल यह था कि बुक कैसे निकालूँगा ... ख़ैर! दिमाग में एक प्लान आ गया ... मैं दौड़ते हुए टोइलेट का बहाना बना कर बाहर भागा और दिनेश के बैग को जोर से लात मारी और बैग सीधा बाथरूम के अन्दर ... मैं किताब अपने जैकट में छुपा कर ले आया था... और पूरी चीटिंग की... बेल लगने के ठीक दस मिनट पहले टीचर ने मुझे चीटिंग करते हुए पकड़ लिया ... मैंने बुक उठा कर दिनेश को दी और दिनेश ने किताब उठा कर खिड़की से बाहर pond में फ़ेंक दी.. और मैं टीचर से उलझ गया कि मैंने चीटिंग नहीं की.. टीचर ने कहा कि इतने सारे लोगों ने तुम्हे देखा है चीटिंग करते हुए... मैंने कहा कि अगर कोई कह देगा तो मान जाऊंगा. अब मेरे डर से किसी ने कुछ कहा ही नहीं. और ऐसे मैं बच गया.. पर यह बात हमारे प्रिंसी को मालूम चल गई... जब CBSE board का रिज़ल्ट आया तो मैंने हर सब्जेक्ट में टॉप किया था ... इकोनोमिक्स में छियासी नंबर थे. इंग्लिश का रिकॉर्ड तो आज भी मेरे ही नाम है है मेरे नाइंटी एट नंबर थे.  हमारे प्रिंसिपल ने कहा कि जिस दिन महफूज़ और उसका गैंग स्कूल से निकलेगा उस दिन मैं पूरे स्कूल को गंगा जल से धोऊंगा.
मैं शुरू से offensive रहा हूँ. Aggressiveness मेरी नसों में दौड़ता है.  मेरे साथ यह है कि अगर मुझे किसी ने खराब बोला तो वो सिर्फ मेरा खराब वाला रूप ही देखेगा. अगर मेरी कहीं कोई गलती है तो मैं अपनी गलती मानते हुए चुपचाप माफ़ी लेता हूँ. मुझसे कभी कोई जीत नहीं सकता. मेरे से जीतने के लिए वो जूनून डेवलप करना पड़ेगा. मुझे सिर्फ प्यार से ही जीता जा सकता है... प्यार से तो मैं जान भी दे दूंगा. मेरे गुस्से या ताप से अगर कोई बचा सकता है तो वो कोई नहीं खुद मैं ही हूँ. मैं अपनी आज की ज़िन्दगी में भी बहुत aggressive रहता हूँ.. मैं सामने वाले को खुद के सामने काम्प्लेक्स कर देता हूँ. मुझे हमेशा लोगों से घिरा रहने में ज्यादा मज़ा आता है. मेरे aggressiveness  की हद यहाँ तक है कि ... मेरी जिस भी गर्ल फ्रेंड ने मुझे लो करने कि कोशिश की उसे मैंने अपने ज़िन्दगी  से निकाल फेंका. इसीलिए.. ऐसी पर्सनैलिटी होने के बावजूद भी मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है. और इस बात का कोई यकीन भी नहीं करेगा. लड़कियां मुझ से बहुत डरती हैं....आज भी मुझे लोगों को डरा कर रखना बहुत अच्छा लगता है.  उत्तर प्रदेश सरकार में कई मंत्री ऐसे हैं/रहे जो मुझसे गाली भी खाए और एक दो तो मार खाते खाते बचे. अब जब मैं खुद इस बार मेयर का चुनाव लड़ने जा रहा हूँ... गोरखपुर से... तो मेरा यही बिहैवियर मेरे बहुत काम आ रहा है.
मेरे साथ यह भी है कि मुझसे किसी भी सब्जेक्ट पर बात किया जा सकता है. मुझे ऐसा लगता है कि आप अगर किसी को दबा सकते हैं तो वो सिर्फ नॉलेज है. अगर मुझे किसी चीज़ कि नॉलेज नहीं है... तो मैं उस वक़्त शांत रह कर ...चुपचाप उस नॉलेज को गेन करने में लग जाता हूँ. मैं हमेशा लर्निंग मोड में रहता हूँ.  Offensive होना बुरा नहीं है... जब तक offensive  नहीं होंगे... तब तक के मंज़िल को नहीं पाया जा सकता.  और फिर offensive होने के लिए भी सबसे पहले नौलेजैबल होना पड़ता है , बिना नॉलेज के आप offensive हो ही नहीं सकते हैं. अगर हम ड्राविंग भी कर रहे हैं तो हमें offensive  होना पड़ेगा नहीं तो सामने वाला तो आगे बढ़ने के लिए तैयार है ही. आम ज़िन्दगी में भी वही इंसान सफल होता है जिसमें जूनून होता है. और यह जूनून बिना offensive हुए आप ला नहीं सकते. और यही चीज़ मैं खुद के साथ करता हूँ. मेरे सामने मैं कभी किसी को टिकने नहीं देता. और कोई अगर मेरी बुराई बिना मतलब में करता है तो उसे मेरे गुस्से को भी झेलना होगा. अगर यह offense है तो ऐसा offense मैं कई बार करने के लिए तैयार हूँ. ब्लॉग जगत में भी कई बार offensive हुआ हूँ.. .. पर वो तभी हुआ हूँ... जब किसी ने मेरे दोस्तों को बिना मतलब में बुरा-भला कहा.. तो अपने दोस्तों के साथ खडा होना मेरा फ़र्ज़ है... भले ही वो गलत हों... मैं तो अपने ताप से गलत को भी सही करने कि ताक़त रखता हूँ... मेरे अन्दर इतनी एनर्जी है... कि एक बार हमारे यहाँ बाथरूम का नल खराब हो गया था..प्लंबर आया लेकिन वो नल अपने रिंच  से नहीं खोल पाया... कहता है कि तेल डाल कर दो घंटे रखिये तब खोलूँगा... मैंने कहा ऐसे कैसे नहीं खुलेगा..और मैंने उस नल को  सिर्फ अपने हाथों से पाइप से अलग कर कर दिया. बेचारा , आँखें फाड़ कर देख रहा था. तो यहाँ वो नल खोलने में मेरी शारीरिक ताक़त कम और दिमागी ताक़त ज्यादा थी.. यहाँ भी वही offensive nature  काम आया. मतलब यही है कि offensive नेचर को पोज़िटिवली यूज़ कर सकते हैं. अब मुझे यहाँ घमंडी भी कह सकते हैं.... पर क्या offensive होना वाकई में घमंडी होना है?

आज अवधिया जी ने एक पोस्ट लिखी है उस पोस्ट में एक लाइन उन्होंने लिखी जो मुझे छू गई "पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। पाप और पुण्य का एक दूसरे के बिना काम ही नहीं चल सकता।याने कि पाप और पुण्य एक दूसरे के पूरक हैं।" इस लाइन में कितनी प्रेक्टिकलिटी है. अब बात तो सही  है कि पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। मैं ऐसे हज़ारों पाप करने के लिए तैयार हूँ. जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती नहीं है वो पुण्य है, और जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती है वो पाप है. कुल मिला कर सारांश यही है कि .... बहुत थोड़े शब्दों में कहूँगा खुद को डिफाइन करते हुए....
आप मुझे या तो प्यार कर सकते हैं या फिर नफरत, 
पर आप मुझे मुझे नज़रंदाज़ नही कर सकते....... 
क्यूंकि यही मेरा जादू है, 
लीक से हटकर काम करने का एक अलग ही जूनून  है.... 
और मैं हमेशा विवादों में ही रहता हूँ.....

बस फर्क यह है की मैं कोई राजनीतिज्ञ या फिर अभिनेता नही हूँ.... 

लेकिन उनसे कम भी नही हूँ....

इसे आप लोग मेरा मेरे प्रति पूर्वाग्रह मत समझ लीजियेगा.....

एक दिन आप मुझे रुल करते हुए पायेंगे...

अब आप ही लोग बताइयेगा कि क्या offensive होना बुरा है?

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