मंगलवार, 12 जून 2012

डॉ. की दुविधा, टूटते सिलसिले बिन छाया के रह जायेंगे और चाय का कप: महफूज़


मैं थोडा आजकल परेशान चल रहा हूँ. मेरी परेशानी यह है कि मेरे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं अपने नाम के साथ डॉ. लगाऊं या नहीं? आख़िर पी.एच.डी. किये हुए आठ साल हो गए हैं. और ऑफिशियली डॉ. लगाना पड़ता है. अगर डॉ. लगाता हूँ तो मेरा बचपना ख़त्म हो जायेगा जो कि मैं चाहता नहीं हूँ. मुझे बहुत सीरियस रहना पड़ेगा जैसा की मुझे अपनी नोर्मल लाइफ में रहना पड़ता है.  अगर मैं डॉ. लगाता हूँ तो अपनी उम्र से और बड़ा दिखूंगा. फ़िर एक तो मैं वैसे भी बहुत ऐटीट्युड वाला इन्सान हूँ और पब्लिकली लोग मुझे घमंडी भी कहते हैं. डॉ. लगा लूँगा तो पब्लिकली  ऐटीट्युड नहीं दिखा पाउँगा. हालांकि! मार पिटाई.....गरियाना तो मेरे लिए अलग बात है.... यह सब तो आत्म सम्मान के लिए करना पड़ता है. लेकिन अब सोच रहा हूँ कि सोशल साइट्स पर भी डॉ. लगा ही लूं. पर एक चीज़ और है जिससे मैं घबराता हूँ कि डॉ. देख कर महिलाएं थोडा दूर हो जातीं हैं.  और मैं महिला मित्रों को खोना नहीं चाहता. मेरा सीरियस  ऐटीट्युड देख आकर सब वैसे ही भाग जायेंगीं.. 
(गोरखपुर स्थित मेरे घर का अगवाडा, इस भीषण गर्मी में भी पौधों को जिंदा रखना बड़ी बात है )
और फ़िर डॉ. लग जाने से संजीदगी का शो ऑफ करना पड़ेगा. और शो ऑफ मैं सिर्फ बौडी बिल्डिंग का ही करता हूँ. डॉ. लग जाने से यह सब बंद हो जायेगा. पी.एच.डी. के अपने फायदे भी हैं तो नुक्सान भी हैं. वैसे एक चीज़ बता दूं पी.एच.डी. सिर्फ और सिर्फ़ नालायक लोग करते हैं. जिनके पास सब्जेक्ट नॉलेज नहीं होती. हाँ! हम जैसे यू.जी.सी. वाले जो जे.आर.एफ. लेकर पी.एच.डी. करते हैं और दो चार बार सिविल से बाहर हो जाते हैं और फ़िर पूरी ज़िन्दगी  सुपिरियौरीटी कॉम्प्लेक्स में जीते हैं...  वो नालायकों की कैटेगरी में नहीं आते. (कहीं ना कहीं मेरा ऐटीट्युड दिख ही जाता है.... हा हा )
(गोरखपुर स्थित मेरे घर का पिछवाडा)
अब बता दूं अगली पोस्ट से मैं डॉ. लगाता हुआ ही दिखाई दूंगा... मेरा एक नुक्सान होगा कि मैं  फ़िर ताने नहीं मार पाऊंगा... लोगों की  धो नहीं  पाउँगा.. लेकिन अब लगाना तो पड़ेगा ही डॉ. .. आख़िर एक पहचान तो यह है ही.. 
(यह मैं सुबह के वक़्त)

आईये अब ज़रा मेरी एक कविता देखी जाए: 

सिलसिले टूट रहे हैं 

सुबह हो रही है 
मगर परछाइयों के सिलसिले 
टूट रहे हैं 
और हमारे बीच से
अब 
धूप का अंतराल ख़त्म हो गया है 
अब 
जवान होती दोपहर में भी 
हम बिन छाया के रह जायेंगे. 

(c) महफूज़ अली  

अब अगली बार से  मेरी खोजपरक और हिसटौरीकल सीरीज शुरू होंगीं. उन सीरीज में मेरा कोई ख़ास योगदान नहीं है. मेरा सिर्फ इतना कंट्रीब्युशन है कि मैं वो ईतिहास फैक्ट्स के साथ देश और समाज के सामने रखूँगा जो अब तक के गुमनाम है और आमजन को पता नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि पता नहीं है.. पता है ..लेकिन आम जन के सामने नहीं है और स्कूल कॉलेज के राजनितिक इतिहास से अलग है। वैसे भी बेकार लोगों के चक्कर में बकवास चीज़ें लिखते लिखते अब मेरा मन ऊब गया है।

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