शनिवार, 7 अप्रैल 2012

लेवल की बातें, शब्द अपनी सीमाएं नहीं तोड़ते और विरोध होना चाहिए, लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं: महफूज़ (Mahfooz)

अभी दो दिन पहले की बात है गोमती नगर के विराम खंड एरिया में एक मनसा मंदिर है वहां गया था क्यूंकि हमारे गोमती नगर में वही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं नहीं तो गोमती नगर में मारुती की कारें रखने वाला ग़रीब समझा जाता है. और यह मनसा मंदिर ही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं. मैं वहां अक्सर जाता रहता हूँ ... अकसर पुराने कपडे और अपनी माँ के नाम पर गरीबों को देता रहता हूँ पता नहीं क्यूँ पिता जी के नाम पर किसी को कुछ देने का मन ही नहीं करता... शायद पिताजी के जाने के बाद भी उनसे कॉन्फ्लिक्ट जारी है. माँ तो बहुत याद आती है हर पल पर पिता जी सिर्फ तभी याद आते हैं जब मैं मुक़दमे के सिलसिले में कोर्ट में जाता हूँ और जज का दरबान ज़ोर से चिल्ला कर मेरा नाम वल्द मेरे पिता जी हाज़िर हों या फ़िर जब टैक्स फ़ाइल करना होता है तब या फ़िर जब कहीं से कोई छुपी ही रकम मिलती है. एक बार कोर्ट में मैं जज से उलझ पड़ा था क्यूंकि मैंने कोर्ट में एंटर जेब में हाथ डाल कर किया था और जज के पेशकार ने मुझे जेब से हाथ निकालने को कहा था.. और हम वैसे भी सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रसित.. जज से यह कह कर उलझ पड़े कि यह सामंतवादी व्यवस्था है और कई  तर्कों से जज से उलझने के बाद वहीँ पेशकार को दो चार उलटी सीधी बातें सुनाने के बाद कोर्ट की अवमानना के जुर्म में ख़ुद को पांच सौ का जुर्माना लगवाया. लेकिन फ़िर उसके बाद किसी ने मुझसे उलझने की कोशिश नहीं की, बाद में जज मुझसे कहता है कि अगर तुम मेरे दोस्त नहीं होते तो सीधा जेल भिजवाता..... हमारे देश का क़ानून भी अजीब है जब तर्कों से हार जाता है तो जुर्माना लगा देता है या फ़िर संसद में बिल पास करने के नाम टाल जाता है. 

हाँ! तो हुआ क्या कि मनसा मंदिर गया था तभी देखा कि एक महिला अपने सत्रह-अठरह वर्षीय पुत्र के साथ मंदिर से बाहर निकल रही है. हम दोनों ने एक दूसरे को ध्यान से देखा और पहचान गए. वो मेरी किसी ज़माने में क्लास मेट थी. बात बात में पता चला कि वो समाज कल्याण अधिकारी है और अभी लखनऊ ट्रान्सफर हुआ है कोई  एक साल पहले, इंदिरा भवन में ही ऑफिस है. हम लोग बात करते करते गोमतीनगर में कैफे कॉफ़ी डे में बैठ गए, कैफे कॉफ़ी डे के बगल में ही वी.एल.सी.सी. है मेरी बहन वहीँ जिम जाती है मैंने सोचा कि उसे भी पिक कर लूँगा और इससे कुछ बातें भी हो जायेंगीं. और उसका बेटा वहीँ अपने एक दोस्त से मिलने चला गया. बात बात ही में उसने मुझसे पूछा कि  क्या तुम्हे मेरी याद आती थी? मुझे इस सवाल पर हंसी आई बहुत कस के. मैंने उससे कहा कि भई तुम्हे तो मैं कबका भूल चुका था... शक्ल तक याद नहीं थी... उसे यह लगा था कि मैं उसकी याद में पगला गया होऊंगा. फ़िर ख़ुद ही कहती है कि 'हाँ! तुम्हे क्या कमी? उससे थोड़ी देर यहाँ वहां की बातें होती रही... फ़िर मेरी सिस्टर भी आ गई हम सबने मिलकर खाया पिया काफी पी और अपने अपने घर आ गए. 

घर आ कर मैंने सोचा कि यह लड़कियां (महिलायें भी) पता नहीं क्या चाहती हैं और क्या समझतीं हैं? इन्हें यही लगता है कि लड़का इनकी याद में मर गया होगा, वैसे लड़कों की साइकोलॉजी (सब लड़के नहीं) बहुत डिफरेंट  होती है लड़का (अगर वाकई में लड़का है तो) हमेशा स्विच ओवर बहुत जल्दी कर लेता है. यह हमेशा लड़की के ऊपर डिपेंड करता है कि उसने कैसा रिश्ता (प्यार) रखा है कि लड़का उससे हमेशा बंध कर रहे.  

वैसे मैंने देखा है और महसूस भी किया है कि महिलायें बहुत सारी गलतफहमियों में बचपन से जीती हैं. वैसे महिलाओं (लड़कियों) के बिहेवियर को साइकोलौजिकली वॉच करने में बहुत मज़ा आता है. महिलाओं में सिर्फ एक चीज़ अच्छी होती है कि वो भविष्य जान लेतीं हैं और सिक्स्थ सेन्स उनमें वाकई में होता है. और पुरुषों में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर की बहुत कमी पाई जाती है और सिक्स्थ सेन्स होता ही नहीं. महिलायें फ़ौरन झूठ पकड़ लेतीं हैं और पकड़ कर शांत रहतीं हैं... वक़्त आने पर पोल खोलतीं हैं  और पुरुष सोचता है कि उसने महिला को बेवकूफ बना लिया. 

बहुत हो गया अब... अब ज़रा मेरी कविता भी बाट जोह रही हैं. कविता के साथ एक प्लस पॉइंट यह है कि यह कहीं भी लिखी जा सकती है... ट्रेन में, बाथरूम में, टहलते हुए और भी कई तरह से. मुझे कई बार बड़ा सरप्राइज़ होता है कि लोग रोज़ रोज़ कैसे कविता लिख लेते हैं? या तो कहीं से चुराते होंगे या फ़िर तुकबंदी होती होगी... क्यूंकि कविता लिखने के लिए भावनाओं में और भावनाओं का होना बड़ा ज़रूरी है. वैसे यह भी है कि बहुत बार ऐसा हुआ है कि कि कई लोगों की कविता पढने के बाद मुझे आत्महत्या से रोका गया है. एक बार एक कोई मनहूस सी शक्ल वाले की कविता अहा! ज़िन्दगी में पढ़ी थी उस कविता को पढ़ कर ऐसा लगा कि इस कविता को मैं कोई बीस पच्चीस साल या और भी पहले पढ़ चुका हूँ. ख़ैर! कविता एक ऐसी चीज़ है जिसकी चोरी बहुत आसानी से हो जाती है और पकड़ में भी नहीं आती है. अरे! आईये ज़रा अब मेरी कविता पढ़ते हैं:--

शब्दों की सीमायें नहीं होतीं 
______________________
उदासी 
गिरफ्त से बाहर 
ठहरी हुई है 
और मैं उसे शब्द मानने को
तैयार नहीं हूँ .... 
शब्द यदि अपनी सीमायें तोड़ दें 
तब वह शब्द नहीं रह जाता.
_________________________
(c) महफूज़ अली 


(फोटोग्रैफ्स तो ऐसे ही डाली गयीं हैं... आई एम इनफ हैंडी टू बी कौपीड फ्रॉम गूगल .. दैट्स वाय माय फोटोग्रैफ्स ईज़ हियर.)

जैसा कि मैंने कहा था... कि पोस्ट के आखिरी पंक्तियाँ हटा दी जायेंगीं... और शीर्षक में भी बदलाव करूँगा... तो वो मैंने कर दिया है. जिन्हें मेसेज देना था उन तक मेसेज पहुँच गया है... अब शायद वो साहब ऐसा नहीं  करेंगे... और उन्हें जो भी प्रॉब्लम होगी... तो वो किसी को पोस्ट लिख कर ... कुछ नहीं कहेंगे... ऐसा हम सोच सकते हैं. मेरे ऐसा लिखने से सबको कोफ़्त और परेशानी हुई होगी... मैं समझ सकता हूँ. लेकिन मैं मजबूर था. अब कोई किसी महिला को अपशब्दों से नवाज़ने की हिम्मत नहीं करेगा. और करना भी नहीं चाहिए. विरोध होना चाहिए.. ..लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं. 


आईये मेरा वन ऑफ़ दी फेवरिट गाना देखते हैं.. 



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