गुरुवार, 1 मार्च 2012

ब्लॉग्गिंग, भारतीय साहित्य और सिनेमा: महफूज़ (Mahfooz)


इसी इतवार को क़िताबों की रहस्यमयी दुनिया में ले जाने वाला दिल्ली में बीसवें विश्व पुस्तक मेले में जाना हुआ. हालांकि, जाने का कोई ऐसा प्रोग्रैम नहीं था मेरा, लेकिन अंजू चौधरी जी के पुस्तक "क्षितिजा" का विमोचन था और उसमें मेरा जाना ज़रूरी था और किया हुआ वादा भी निभाना था. इस बार पुस्तक मेले का विषय है "भारतीय साहित्य और सिनेमा". विषय देख कर मुझे हंसी भी आई क्यूंकि साहित्य और हिंदी सिनेमा का दूर दूर तक आपस में कोई लेना देना नहीं है. हिंदी साहित्य जो भी है सब नब्बे के दशक के पहले के हैं अब तो हिंदी साहित्य रचा ही नहीं जाता और हिंदी साहित्य का मतलब लोग सिर्फ प्रेमचंद से ही समझते हैं और थोडा बहुत निराला से. अब तो यह हाल है कि गाँव भी ख़त्म हो गए और खेत खलिहान भी और गाँव में रहने वाले  लोग भी. जो गाँव में रहते थे वो आठवीं /दसवीं पास/फेल कर के शहरों में मौल्ज़ में काम करने लगे. अब ना हीरा मोती हैं और ना ही बिरजू. फ़िर कुछ साहित्यिक मैगजीन्स आज भी इनसे ऊपर आने को तैयार नहीं है आज भी वो गाँव और खेतों और बैलों को ही साहित्य मान रही है. अब जो जेनेरेशन अस्सी के मध्य और नब्बे के दौरान पैदा हुईं हैं वो क्या जाने यह सब? इसीलिए यह जेनेरेशन साहित्य से दूर हैं क्यूंकि जो कुछ साहित्य में लिखा जा रहा है वो उन्होंने देखा ही नहीं. अगर हम दैनिक जागरण के टैबलौयिड आई-नेक्स्ट को देखें तो उसने वही भाषा को अपनाया है जो आज की जेनेरेशन बोलती है तो भाई साहित्य में भी वही भाषा क्यूँ नहीं? सेक्स जैसा विषय आज भी टैबू है साहित्य में जबकि वहीँ आई-नेक्स्ट आई-कैंडी के नाम से एक कॉलम निकालता है जो इनडाइरेक्टली  सेक्स ही बेचता है. हमारा साहित्य भी पिछले बीस सालों से कोई ख़ास डेवलपमेंट नहीं कर पाया है. आज साहित्यकार का मतलब लोग जावेद अख्तर, प्रसून जोशी और गुलज़ार जैसे लोगों को ही जानते हैं. इनसे भी ऊपर लोग  हैं और अच्छा लिखते हैं. आजकल अच्छे साहित्यकार इसीलिए सामने नहीं आ पा रहे हैं क्यूंकि एक तो बेचारे लौबिस्ट नहीं हैं और दूसरा उनके पास चेतन भगत जैसा मार्केटिंग स्किल और फायनेंस नहीं हैं. 

आप सबने देखा होगा कि जब भी वॉशबेसिन या नाली में "हिट" का स्प्रे करो तो अचानक ढेर सारे कौक्रोचेस और अजीब कीड़े निकल कर बाहर आ जाते हैं उसी तरह इंटरनेट के आने से और ब्लॉग रूप में एक फैसिलिटी मिल जाने से तमाम साहित्यकार पैदा हो गए हैं. कई लोग मुझे फ़ोन करके बताते हैं कि फलाने ने कविता छापने के लिए इतने पैसे मांगे और कोई एक आध संकलन निकाल कर बेचारे दूसरे को एहसास दे दिया कि भाई हमने तेरे जैसे को भी साहित्यकार बना दिया है. यह एक धंधा चल निकला है आजकल, तू मेरी खुजा मैं तेरी  खुजाऊंगा वाली तर्ज पर. अब तो ऐसा लगता है कि नेट आ जाने से हर घर में कवि/कवयित्री और साहित्यकार पैदा हो गया है. ऐसा लगता है कि पांच की फैमिली हैं तो एक मेंबर साहित्यकार है. 

और रहा सवाल हिंदी सिनेमा का तो आदि काल से जबसे हिंदी सिनेमा का जन्म हुआ है तबसे बेचारी पूरी फिल्म इंडस्ट्री हौलीवूड पर डिपेंड है ... हर फिल्म किसी ना किसी इंग्लिश, स्पैनिश, जैपनीज, ईरानियन और अरेबियन फिल्म का रीमेक है. पूरी कहानी, सब्जेक्ट, म्युज़िक, सिनेमेटोग्रैफी, स्क्रिप्ट, सीन और यहाँ तक कि डाय्लौग्स भी चुराए हुए होते हैं. हिंदी सिनेमा में सिवाय हिंदी (जो कि मूल रूप से उर्दू होती है) और हिंगलिश के सिवाय और कुछ ओरिजिनल नहीं होता. तो हिंदी के नाम पर सिनेमा को कैश करना यह हिंदी की गत दिखाता है कि पाठकों और दर्शकों (दर्शक इसलिए क्यूंकि ज़्यादातर लोग हिंदी की किताबें खरीद कर नहीं पढ़ते) को पुस्तक  मेले तक लाने के लिए सिनेमा का भी सहारा लेना पड़ा. हिंदी ग्लोबल भाषा भी नहीं है जो लोग हिंदी सिनेमा को ओवरसीज़ भी बताते हैं वो सिर्फ उन लोगों के लिए ओवरसीज़ सिनेमा बनाते हैं जो भारतीय डौलर और पौंड में पैसा खर्च करते हैं. और उससे हिंदी सिनेमा की लागत निकल जाती है और बाक़ी प्रौफिट वो देसी मार्केट से कमा लेते हैं.भीड़ खींचने के लिए ऐसा विषय रखा है और भीड़ है कि नदारद है पहले दिन ही कोई ख़ास भीड़ नहीं थी जो थी वो डेटिंग करने वालों की ज़्यादा थी.. उनको एक बहाना और जगह मिल गई थी डेटिंग करने के लिए. भीड़ है नहीं और ना ही होगी क्यूंकि एक्ज़ाम्ज़ चल रहे हैं और आजकल के मोडर्न पेरेंट्स अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाएंगे नहीं और ना ही खरीदने को इनकरेज करेंगे. अभी भी सारी भीड़ जो है थोड़ी बहुत वो इंग्लिश काउंटरज़ पर ज़्यादा हैं और खरीद भी रही हैं और हिंदी किताबें की ओर देख कर उलट पलट कर वापस रैक पर रख दी जा रही हैं. 

अब कुछ पलों को देखिये जो मैंने अपनों के साथ बिताये:----

(शिखा वार्ष्णेय की किताब डायमंड बुक स्टाल पर)

(बुक फेयर के पहले दिन सुनीता दी के स्टाल पर, मैं कुर्ते पजामे में)

(यहाँ भी)

(यहाँ संजू तनेजा जी के साथ दूसरे दिन)

(यह पदम् है यह मंचिंग कर रहा है)

(आप घोंसला वाले राजीव जी हैं)

(हरकीरत जी मंच से अपनी किताब का विमोचन कर के वापस आते हुए)

(सुनीता दी और अंजू जी)

(यह बैसवारी वाले संतोष जी हैं और पीछे पदम् मुझे मुक्का दिखाते हुए)

(अ वैरी स्पेशल मोमेंट)

(मी विद अंजू )

(हियर अल्सो ... हैविंग सम गुफ्तगू)

(यहाँ भी )

(दी... फ़ोटोज़ दिखाते हुए)

(यहाँ भी दीदी फोटो दिखाते हुए)
(अ न दर  कैची मोमेंट)

(यहाँ मैं.. यह फोटो शिवम् ने कब खींची पता नहीं)



अब मेरी कविता पढ़िए बिलकुल ओरिजिनल है हिंदी फिल्मों जैसी नहीं. 

संस्कृति की पगडण्डी 
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कुछ लोग हैं 
जिन्होंने 
ईश्वर
दर्शन
धर्म
और 
संस्कृति की 
पग डंडियों से सबकी 
आँखें खरीद ली हैं......
इसीलिए ज़्यादातर 
लोगों को सड़कें तो
दिखतीं हैं,  मगर
रास्ते नहीं दिखते. 

(c) महफूज़ अली 

अब इसी के साथ पोस्ट ख़त्म करता हूँ. आप लोग मेरा फेवरिट गाना देखिये.. 




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