सोमवार, 11 जनवरी 2010

रोक सको तो रोक लो: - महफूज़



अभी थोड़े दिन पहले कि ही बात है. मैं जिम से एक्सरसाइज़ कर के अपने दोस्त पंकज के साथ घर लौट रहा था. कडाके कि ठण्ड में भी मुझे बहुत गर्मी लग रही थी. उस दिन कार्डियो और बेंच प्रेस बहुत ज्यादा कर लिया था. मुझे बॉडी बिल्डिंग का बहुत शौक़ है, मैं आज भी दो सौ पुश अप्स के साथ डेढ़ सौ पुल अप्स कर लेता हूँ. मेरे बयालीस इंच के बाइसेप्स और V-shaped  बॉडी पर टी-शर्ट खूब फब्ती है और इसीलिए मैं टी-शर्ट ज्यादा पहनता हूँ. इससे दो फायदे होते हैं एक तो सामने वाला पंगा लेने में थोडा घबराता है और खुद का सेल्फ-कॉन्फिडेंस भी अप रहता है. हमारे ज़ाकिर भाई कहते हैं कि वैसे भी आप बहुत हैंडसम हैं फिर काहे को इतनी बॉडी बिल्डिंग करते हैं?
अब क्या किया जाये... खुद को फिट रखना भी ज़रूरी है. अब ख़ुदा ने हमें जो अच्छी चीज़ दी है तो उसे संभालना भी हमारा ही काम है ना. ख़ैर! मैं बता रहा था कि उस दिन जब मैं लौट रहा था तो रस्ते में बहुत भीड़ थी, मेरा जिम मेरे घर से दस  किलोमीटर दूर हज़रतगंज में है, कई जगह बहुत जैम लगा हुआ था. बाइक ड्राइव करने में बहुत दिक्कत तो रही थी. मैं कैसे ना कैसे... किसी तरह सारे रुकावटों और भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ता चला जा रहा था. अपनी वैसे यह आदत है कि मैं ड्राइव करते वक़्त सामने वाले को कोई मौका नहीं देता, मेरा यही मोटिव रहता है कि बस बढ़ते रहो. रुकना  सामने वाले को है... मैंने कभी रुकना नहीं सीखा. अपने यही सिद्धांत पर कायम रहते हुए मैं बढ़ा  चला जा रहा था. तभी बाइक पर पीछे बैठा पंकज मुझसे कहता है कि," यार! महफूज़, तू बहुत ओफ्फेंसिव (offensive) ड्राइविंग करता है..."
मैं उसकी बात समझ नहीं पाया. मैंने कहा ," क्या मतलब?" मैं तो सारे रूल्ज़ फोल्लो करता हूँ...
उसने कहा कि " ओफ्फेंसिव से मेरा मतलब है कि तू सामने वाले को रुकने को मजबूर करता है और खुद रास्ता नहीं देता है. यह तेरा बहुत abstract behaviour है. उसकी बात सुनकर मैं जोर से हंस दिया. मैंने कहा कि यही तो अपना उसूल है. सामने वाले को मजबूर कर दो कि वो तुम्हे आगे बढ़ने के लिए रास्ता दे. मैं अपनी रियल ज़िन्दगी  में भी ऐसा ही करता हूँ... मैं कभी किसी को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता हूँ. मैं कभी किसी से डरता नहीं. ना ही खुद को किसी से कम समझता हूँ. आज जो दुनिया में इतनी कम उम्र में इतना नाम कमाया है ...उसके पीछे यही attitude है...  आज तक जिस काम में हाथ डाला है ... उसे पूरा कर के ही छोड़ा है. यही सब समझाते हुए कब उसका घर आ गया पता ही नहीं चला. उसे उसके घर ड्रॉप कर के मैं अपने घर आ गया.
उस वक़्त जो बात मैंने उसकी हंस कर टाल दी थी , वो बात मेरे दिल के अन्दर तक उतर चुकी थी. उसकी offensive driving वाली बात ने मुझे खुद के बारे बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया था. उसका मुझे offensive कहना ना जाने क्यूँ अच्छा लगा था.हालांकि यह offensive  शब्द बहुत नेगेटिव है पर यह मुझ पर पोसिटिवली सूट करता है. मुझे बहुत अच्छे से याद है आज भी ... मैं जब स्कूल में था और अगर किसी लड़के के मेरे से ज्यादा मार्क्स आ जाते थे ...तो मैं उसे मारने के बहाने खोजा करता था और जब तक के उसे मार नहीं लेता था ..मुझे चैन नहीं मिलता था. उस के दिल में इतनी दहशत पैदा कर देता था कि वो बेचारा जानबूझ कर अपना टेस्ट खराब कर देता था. और तो और मैं खुद को ही अपनी क्लास का टोपपर घोषित कर दिया करता था.  मेरा अपना गैंग था स्कूल में ...और मेरे गैंग में जितने भी लड़के थे सब एक नंबर के आवारा और studious थे... हम लोग all-rounder थे... अब मेरे गैंग के ज़्यादातर लड़के कारगिल युद्ध में शाहिद हो चुके हैं. बाकी जो बचे हैं उनमें से कुछ IAS  हैं , कुछ lecturer हैं, कुछ डॉक्टर हैं तो कुछ यहाँ वहां अच्छे पदों पर हैं. एक -दो चुनाव लड़ कर विधायक हैं. स्कूल के दौरान मेरे टीचर्स भी मुझसे बहुत डरते थे... क्यूंकि मुझे ऐसा लगता था कि मैं अपने टीचर से कहीं ज्यादा जानता हूँ... और कई मौकों पे इसे मैंने साबित भी किया... मेरे टीचर्स खुद मुझसे परेशां रहते थे... मेरे टीचर्स जो पढ़ाते थे... वो मैं पहले से ही  जानता था... और जब मैं क्लास में जवाब पहले ही दे देता था... तो बेचारा टीचर खुद ही शर्मा जाता था. मेरे टीचर्स मेरे पिताजी से मेरी शिकायत भी किया करते थे कि आपका बेटा रिस्पेक्ट नहीं करता है.  और मेरे पिताजी मुझे सबके सामने डांट मार कर टीचर और खुद कि संतुष्टि कर लेते थे.

यही हाल मेरा यूनिवर्सिटी में भी रहा. मैंने कभी भी यूनिवर्सिटी में ग्रैजूईशन की क्लास नहीं की...पोस्ट ग्रैजूईशन में भी कभी क्लास नहीं किया... मैं अपने टीचर्स को भी नहीं जानता था... न ही मेरे टीचर्स मुझे जानते थे... लेकिन मैंने पोस्ट ग्रैजूईशन में टॉप किया ... गोल्ड मेडल मिला... जब convocation में मुझे बुलाया गया ... और गोल्ड मेडल देने के बाद दो शब्द बोलने के लिए कहा... तो मैं बहुत परेशां हो गया.. क्यूंकि बाकी लोग श्रेय तो अपने टीचर्स को दे रहे थे.... और मैं अपने टीचर्स को ही नहीं जानता था... और न ही मेरे टीचर्स मुझे... बड़ी दुविधा कि सिचुईशन थी.. ख़ैर! मैंने दो शब्द में कहा कि मेरे इस सफलता का सारा श्रेय मैं खुद को देता हूँ... क्यूंकि मेरी मेहनत का  ही नतीजा यह सफलता थी.... और जब यह बताया कि मुझे UGC (NET) JRF भी  मिल  चुका है... तो सबने और दांतों तले उँगलियाँ दबा ली...  बेचारे ... मेरे यूनिवर्सिटी के टीचर.. खुद ही परेशां  थे...  सबने पूछा कि भाई कौन से बिल में छुपे थे... और किस्से तुमने पढाई कि... और बिना गुरु के कैसे टॉप कर गए?
मुझे ऐसा लगता है कि मैं सर्वज्ञाता हूँ. मुझे ऐसा भी लगता है कि कोई मेरे बराबर खड़ा नहीं हो सकता. कई बार तो मुझे ऐसा भी लगता है कि मैं अजर-अमर हूँ. मुझे ऐसा लगता है कि मैं कोई सुपर -ह्यूमन (Super Human) हूँ या फिर मेरे में डबल Y क्रोमोज़ोम हैं जो कि रेयरली ही मिलता है. मैं जब छोटा था तो साईकिल चलाने का शौक रखता था, मैं इंडिया का बेस्ट साइक्लिस्ट भी रह चुका हूँ और आज भी साईकिल पर वैसा ही स्टंट करता हूँ जो आपने सिर्फ फिल्मों में ही देखे होंगे. अपने स्कूल के दौरान मैंने कोई चौरासी साइकलें तोड़ी हैं. कभी कभी मैं जब सुबह सो कर उठता था तो यह सोच लेता था कि आज साईकिल का ब्रेक नहीं मारूंगा... चाहे कुछ भी हो जाए... और मैं वाकई में साईकिल का ब्रेक नहीं मारता था... एक बार तो जीप से टकरा गया था ...लेकिन मैं टकराते ही जम्प लगा गया था... लोगों कि भीड़ लग गई... मुझसे पूछा गया कि तुमने ब्रेक क्यूँ नहीं मारा... मैंने कहा कि मैंने सोचा हुआ था आज कि ब्रेक नहीं मारूंगा... सबने कहा कि पागल है मेजर साहब का लड़का. उस वक़्त पिताजी आर्मी में मेजर थे. मेरे पिताजी भी मुझे सनकी कहते थे.... हमारे स्कूल में जब भी कोई फंक्शन होता था तो मैं ज़बरदस्ती माइक ले लेता था ... क्यूंकि मुझे कुछ ना कुछ करना होता था.

एक बार हमारे स्कूल में स्कूल कैप्टन का चुनाव होने वाला था ...मैंने भी अपना नाम नोमिनेट किया पर हमारे प्रिंसिपल ने मेरा नाम काट दिया... प्रिंसी ने कहा कि तुम अगर कैप्टन बनोगे तो पूरा स्कूल तबाह हो जायेगा. और नोमिनेट ऐसे लड़के का नाम हुआ जिससे हमारे गैंग कि दुश्मनी थी. अब मुझे बहुत बेईज्ज़ती महसूस हुई ... मैंने भी प्रिंसी से कहा कि मैं इसे कैप्टन बनने ही नहीं दूंगा... प्रिंसी ने मुझे कहा कि मैं तेरे सीने के बाल खींच के मारूंगा... मेरे शर्ट में से मेरे सीने के बाल झलकते थे... उसे ही देख कर उसने कहा. मैंने भी कहा कि मैं उसे कैप्टन बनने ही नहीं दूंगा. फिर मैंने सब क्लास में जाकर सबको धमकी दी कि कोई अगर उसे वोट करेगा तो मार खायेगा. ख़ैर ! वो लड़का स्कूल कैप्टन बन गया. फिर वो हमारे ऊपर रौब गांठने लगा. पहले ही दिन हमने उसकी ऐसी धुनाई की कि वो सारी हेकड़ी भूल गया. और मैंने खुद को स्कूल कैप्टन घोषित कर दिया. अंत में प्रिंसी को भी मानना पड़ा ... बेचारे ने कहा कि पांच महीने की बात है यह लोग तो पास ओउट हो जायेंगे. इसी को बना देते हैं. मैं स्कूल कैप्टन बन गया.

ऐसे ही हमारे ट्वेल्थ के बोर्ड एक्जाम चल रहे थे.. हमारा सेंटर एक दूसरे स्कूल में पड़ा था... मैंने बोर्ड एक्जाम के तीन महीने पहले ही हिंदी छोड़ के इकोनोमिक्स सब्जेक्ट ले लिया था... अब जब बोर्ड में इकोनोमिक्स का पेपर आया तो मेरे तो हाथ पाँव फूल गए, मुझे पूरे पेपर में से सौ में से सिर्फ छब्बीस नंबर के सवाल आते थे... मैं कहा कि लो मेरी तो कम्पार्टमेंट अब पक्की हो गई... मैं बहुत परेशां हुआ . मेरे बगल में एक रीटा नाम की लड़की बैठी थी और उसके बगल में खिड़की के पास मेरा दोस्त दिनेश बैठा था... मैंने दिनेश से कहा कि भाई मैं तो गया इस बार ... आधे घंटे तक मैं इसी सोच में पागल हुआ जा रहा था.. थोड़ी देर के बाद मैंने एक डेसिशन लिया और अपना प्लान दिनेश को बताया ... दिनेश ने मेरा साथ देने के लिए कहा ... प्लान यह था कि क्लास के बाहर दिनेश का बैग रखा था उसमें इकोनोमिक्स की  बुक थी.. अब सवाल यह था कि बुक कैसे निकालूँगा ... ख़ैर! दिमाग में एक प्लान आ गया ... मैं दौड़ते हुए टोइलेट का बहाना बना कर बाहर भागा और दिनेश के बैग को जोर से लात मारी और बैग सीधा बाथरूम के अन्दर ... मैं किताब अपने जैकट में छुपा कर ले आया था... और पूरी चीटिंग की... बेल लगने के ठीक दस मिनट पहले टीचर ने मुझे चीटिंग करते हुए पकड़ लिया ... मैंने बुक उठा कर दिनेश को दी और दिनेश ने किताब उठा कर खिड़की से बाहर pond में फ़ेंक दी.. और मैं टीचर से उलझ गया कि मैंने चीटिंग नहीं की.. टीचर ने कहा कि इतने सारे लोगों ने तुम्हे देखा है चीटिंग करते हुए... मैंने कहा कि अगर कोई कह देगा तो मान जाऊंगा. अब मेरे डर से किसी ने कुछ कहा ही नहीं. और ऐसे मैं बच गया.. पर यह बात हमारे प्रिंसी को मालूम चल गई... जब CBSE board का रिज़ल्ट आया तो मैंने हर सब्जेक्ट में टॉप किया था ... इकोनोमिक्स में छियासी नंबर थे. इंग्लिश का रिकॉर्ड तो आज भी मेरे ही नाम है है मेरे नाइंटी एट नंबर थे.  हमारे प्रिंसिपल ने कहा कि जिस दिन महफूज़ और उसका गैंग स्कूल से निकलेगा उस दिन मैं पूरे स्कूल को गंगा जल से धोऊंगा.
मैं शुरू से offensive रहा हूँ. Aggressiveness मेरी नसों में दौड़ता है.  मेरे साथ यह है कि अगर मुझे किसी ने खराब बोला तो वो सिर्फ मेरा खराब वाला रूप ही देखेगा. अगर मेरी कहीं कोई गलती है तो मैं अपनी गलती मानते हुए चुपचाप माफ़ी लेता हूँ. मुझसे कभी कोई जीत नहीं सकता. मेरे से जीतने के लिए वो जूनून डेवलप करना पड़ेगा. मुझे सिर्फ प्यार से ही जीता जा सकता है... प्यार से तो मैं जान भी दे दूंगा. मेरे गुस्से या ताप से अगर कोई बचा सकता है तो वो कोई नहीं खुद मैं ही हूँ. मैं अपनी आज की ज़िन्दगी में भी बहुत aggressive रहता हूँ.. मैं सामने वाले को खुद के सामने काम्प्लेक्स कर देता हूँ. मुझे हमेशा लोगों से घिरा रहने में ज्यादा मज़ा आता है. मेरे aggressiveness  की हद यहाँ तक है कि ... मेरी जिस भी गर्ल फ्रेंड ने मुझे लो करने कि कोशिश की उसे मैंने अपने ज़िन्दगी  से निकाल फेंका. इसीलिए.. ऐसी पर्सनैलिटी होने के बावजूद भी मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है. और इस बात का कोई यकीन भी नहीं करेगा. लड़कियां मुझ से बहुत डरती हैं....आज भी मुझे लोगों को डरा कर रखना बहुत अच्छा लगता है.  उत्तर प्रदेश सरकार में कई मंत्री ऐसे हैं/रहे जो मुझसे गाली भी खाए और एक दो तो मार खाते खाते बचे. अब जब मैं खुद इस बार मेयर का चुनाव लड़ने जा रहा हूँ... गोरखपुर से... तो मेरा यही बिहैवियर मेरे बहुत काम आ रहा है.
मेरे साथ यह भी है कि मुझसे किसी भी सब्जेक्ट पर बात किया जा सकता है. मुझे ऐसा लगता है कि आप अगर किसी को दबा सकते हैं तो वो सिर्फ नॉलेज है. अगर मुझे किसी चीज़ कि नॉलेज नहीं है... तो मैं उस वक़्त शांत रह कर ...चुपचाप उस नॉलेज को गेन करने में लग जाता हूँ. मैं हमेशा लर्निंग मोड में रहता हूँ.  Offensive होना बुरा नहीं है... जब तक offensive  नहीं होंगे... तब तक के मंज़िल को नहीं पाया जा सकता.  और फिर offensive होने के लिए भी सबसे पहले नौलेजैबल होना पड़ता है , बिना नॉलेज के आप offensive हो ही नहीं सकते हैं. अगर हम ड्राविंग भी कर रहे हैं तो हमें offensive  होना पड़ेगा नहीं तो सामने वाला तो आगे बढ़ने के लिए तैयार है ही. आम ज़िन्दगी में भी वही इंसान सफल होता है जिसमें जूनून होता है. और यह जूनून बिना offensive हुए आप ला नहीं सकते. और यही चीज़ मैं खुद के साथ करता हूँ. मेरे सामने मैं कभी किसी को टिकने नहीं देता. और कोई अगर मेरी बुराई बिना मतलब में करता है तो उसे मेरे गुस्से को भी झेलना होगा. अगर यह offense है तो ऐसा offense मैं कई बार करने के लिए तैयार हूँ. ब्लॉग जगत में भी कई बार offensive हुआ हूँ.. .. पर वो तभी हुआ हूँ... जब किसी ने मेरे दोस्तों को बिना मतलब में बुरा-भला कहा.. तो अपने दोस्तों के साथ खडा होना मेरा फ़र्ज़ है... भले ही वो गलत हों... मैं तो अपने ताप से गलत को भी सही करने कि ताक़त रखता हूँ... मेरे अन्दर इतनी एनर्जी है... कि एक बार हमारे यहाँ बाथरूम का नल खराब हो गया था..प्लंबर आया लेकिन वो नल अपने रिंच  से नहीं खोल पाया... कहता है कि तेल डाल कर दो घंटे रखिये तब खोलूँगा... मैंने कहा ऐसे कैसे नहीं खुलेगा..और मैंने उस नल को  सिर्फ अपने हाथों से पाइप से अलग कर कर दिया. बेचारा , आँखें फाड़ कर देख रहा था. तो यहाँ वो नल खोलने में मेरी शारीरिक ताक़त कम और दिमागी ताक़त ज्यादा थी.. यहाँ भी वही offensive nature  काम आया. मतलब यही है कि offensive नेचर को पोज़िटिवली यूज़ कर सकते हैं. अब मुझे यहाँ घमंडी भी कह सकते हैं.... पर क्या offensive होना वाकई में घमंडी होना है?

आज अवधिया जी ने एक पोस्ट लिखी है उस पोस्ट में एक लाइन उन्होंने लिखी जो मुझे छू गई "पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। पाप और पुण्य का एक दूसरे के बिना काम ही नहीं चल सकता।याने कि पाप और पुण्य एक दूसरे के पूरक हैं।" इस लाइन में कितनी प्रेक्टिकलिटी है. अब बात तो सही  है कि पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। मैं ऐसे हज़ारों पाप करने के लिए तैयार हूँ. जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती नहीं है वो पुण्य है, और जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती है वो पाप है. कुल मिला कर सारांश यही है कि .... बहुत थोड़े शब्दों में कहूँगा खुद को डिफाइन करते हुए....
आप मुझे या तो प्यार कर सकते हैं या फिर नफरत, 
पर आप मुझे मुझे नज़रंदाज़ नही कर सकते....... 
क्यूंकि यही मेरा जादू है, 
लीक से हटकर काम करने का एक अलग ही जूनून  है.... 
और मैं हमेशा विवादों में ही रहता हूँ.....

बस फर्क यह है की मैं कोई राजनीतिज्ञ या फिर अभिनेता नही हूँ.... 

लेकिन उनसे कम भी नही हूँ....

इसे आप लोग मेरा मेरे प्रति पूर्वाग्रह मत समझ लीजियेगा.....

एक दिन आप मुझे रुल करते हुए पायेंगे...

अब आप ही लोग बताइयेगा कि क्या offensive होना बुरा है?

102 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा ने कहा…

काफ़ी लम्बा है महफ़ुज पुराण-अभी तो एक अध्याय हुआ है, बाकी का ईंतजार है, 12से पास आऊट होने के बाद प्रिंसपाल ने राहत की सांस ही ली होगी, आज पता चला की आप भी फ़ौजी परिवार से हैं, आभार्।

राजीव तनेजा ने कहा…

लीक से हटकर है आपका जुनून...
आपके व्यक्तित्व की कुछ बातें पसंद भी आई और कुछ से मैं इतेफ़ाक नहीं भी रखता हूँ...
ऊपरवाले ने सबको अलग-अलग नेचर का बनाया है

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

भई आज पता चला कि आप तो बडे खतरनाक आदमी हैं :)

"जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती नहीं है वो पुण्य है, और जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती है वो पाप है"
पाप ओर पुण्य की बिल्कुल सही व्याख्या की आपने...आपसे पूर्णत: सहमत!!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

संस्मरण लम्बा होते हुए भी रोचक है!
बधाई!

गिरिजेश राव ने कहा…

ये रास्ता भूले बच्चों वाला साइड बार कहाँ मिलेगा?

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

ज़िंदगी यहां तक आपने अपने उसूलों पर जी है
आगे का रास्ता अभी काफी लंबा है
[ आप अभी एक युवा हैं ]
आपकी सफलताओं के लिए ,
हमारी दुआएं भी शामिल कर लीजिये
हालांकि ,
आपकी आत्म निर्भरता
और काबिलियत आपको अवश्य
मंजिल तक ले जायेंगें
गुड लक !
- लावण्या

shikha varshney ने कहा…

अब आप ने इतना कुछ कह दिया अपने बारे में तो महाराज ! हमारी तो डर के मारे बोलती ही बंद हो गई है :) ..एक गुजारिश है जी आपसे...अब आप कभी मेयर- वेयर बन जाएँ मह्फुज़नंद जी महाराज! तो हम जैसे तुच्छ ब्लोगर्स को भी याद रखियेगा .:)

Udan Tashtari ने कहा…

आपको आपके मार्फत जानना अच्छा रहा. शुभकामनाएँ.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

महफूज भाई। आप की महफूजकथा पढ़ते पढ़ते अपुन भी जिन्दगी में पहली बार ओफेंसिव हो गए। रिकार्ड तोड़ डाला। 2634 शब्दों की पोस्ट एक साँस में पूरी पढ़ डाली।
यूँ एक जज कहती हैं आप को गुस्सा बहुत आता है। वैसे उन ने अपना गुस्सा कभी देखा ही नहीं है।

संगीता पुरी ने कहा…

मेरे दृष्टिकोण से किसी भी गुण और अवगुण को कहीं पर अच्‍छा तो कहीं पर बुरा माना जा सकता है .. ऑफेंसिव और डिफेंसिव दोनो के विपरीत स्‍वभाव होने के बावजूद हमारे जीवन में दोनो का महत्‍व होता है .. परिस्थितियों के अनुसार हमारा व्‍यवहार होना चाहिए .. और पूरे जीवन हमें एक जैसी परिस्थितियां नहीं मिलती .. एक सामान्‍य सा उदाहरण देकर इस बात को समझाया जा सकता है .. मोटरसाइकिल को तेज गति देकर आप सारे इनाम जीत सकते हैं .. पर कहीं मोटरसाइकिल की यही तेज गति मौत को गले लगाने का भी कारण बन सकती है .. इसलिए परिस्थितियों को समझकर उसके अनुरूप ही कार्य करने की आवश्‍यकता होती है !!

'अदा' ने कहा…

महफूज़ मियाँ,
बोलिए बोलिए ....डराइये , धमकाइये....!!
बस एक बार बीवी आ जाए बस ..आपको छट्ठी का दूध न याद दिला देवे तो फिर आप कहियेगा...हाँ नहीं तो...
और एक बात कहें आपसे ....पूरे ब्लॉग जगत में आप सबसे ज्यादा अपनी बीवी पर लट्टू होकर घूमेंगे.....लगी शर्त...!!
मंज़ूर हो तो बोलियेगा...
और इसमें कोई शक नहीं आपको इग्नोर करना असंभव है....लेकिन हम कौन से कम हैं ...:):)

Arvind Mishra ने कहा…

yyy

डॉ टी एस दराल ने कहा…

शांत , भीम भैया शांत।
सोच अच्छी है, एनर्जी अनलिमिटेड है।
लेकिन नियंत्रण की ज़रुरत है।
धूम धड़ाकेदार पोस्ट।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

सही है जीवन में ऐसे विचार हमेशा ही रखने चाहिए जो जैसा करे उसके सामने वही रूप प्रस्तुत करना चाहिए..बढ़िया संस्मरण दर्शाया आपने भाई बस ऐसे ही दिन प्रतिदिन आप सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे बस यही दुआ है भगवान से और इरादे सच्चे हो तो क्या कोई रोक सकता है..धन्यवाद महफूज़ भाई..

Vivek Rastogi ने कहा…

हम तो पढ़ने के बाद फ़ोटू में बाईशेप्स ही ढूँढ़ते रहे, और मिली तो खौफ़जदा हो गये हैं, कम नहीं हैं यह तो बता दिया है कि बिल्कुल मँजे हुए हैं अपनी जिंदगी में और सबको अच्छी तरह से जबाब देना जानते हैं।

अजय कुमार झा ने कहा…

अमां यार महफ़ूज़ भाई , कितनी बार कहा है कि हमेशा लाल लंगोट पहन के मत निकल जाया करो , जान बूझ के सांड को ललचाते/ललकारते हुए ...आगे कुछ और कहता इससे पहले आप खुद ही लाल सांड बन के लिए निकल लिए । बौडी बिल्डर, सायकल तोडू, जिद्दी, और क्या कहते हैं , offensive , कुल मिला के ...एक दम अलग एंगल के ब्लोग्गर निकले यार । मुझे पता है अभी तो कई एपिसोड बांकी हैं भाई मियां , दिल्ली पहुंचो फ़िर बतियाते हैं आपसे , और हां , अजी कौन रोके इस सांड को जो खुद ही लाल लंगोट बांधे घूम रहा है ,
अजय कुमार झा

sangeeta swarup ने कहा…

महफूज़ जी ,

आज तो आपकी बड़ी धमाकेदार रचना आई है....किसमें कितना है दम ...आपके बारे में जानकारी मिली.... बढ़िया है...
पढ़ते पढ़ते कहीं कहीं अतिश्योक्ति सी लगती है...पर भैया इतने डंके की चोट पर सब कह रहे हैं तो सही ही होगा....( ये मत समझिएगा की हम डर कर ये लिख रहे हैं ) :):) हर इंसान की अपनी सोच होती है....हाँ आपने उन लड़कियों को ज़रूर आगाह कर दिया है जो कभी आपके सपने देखने के बारे में सोचतीं.....अब फूंक फूंक कर कदम रखेंगी....

खुशदीप सहगल ने कहा…

ओ, xyy वाले सुपरमैन...
भईया मैंने सुना है कि पश्चिम के कुछ देशो में xyy क्रोमोसोम्स वाले इंसान को सुपर ह्यूमैन माना जाता है, वो कत्ल भी कर दे तो उसके लिए वो सज़ा नहीं होती जो कि xy क्रोमोसोम्स वाले आम इंसान के लिए होती है...अब तो
महफूज़ मियां तुमसे डर कर रहना पड़ेगा...मरना कोई है तुमसे टकरा कर...बाकी अदाजी की बात में मुझे दम नज़र आता है...शादी हो जाने दो न झाग की तरह नीचे बैठ गए तो मेरा नाम भी खुशदीप नहीं...

जय हिंद...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती नहीं है वो पुण्य है, और जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती है वो पाप है ..

AAOKE IS KHYAALAAT SE TO SAHMAT HAIN HAM BHI MAHFOOZ BHAI .... BAAKI JAHAA TAK OFFENSIVE HONE KA SAWAAL HAI .... APNI APNI SHAKSHIYAT HAI ..... APNA APNA RAASTA HAI .... EK HI RAASTA SAHI HAI YE ZAROORI TO NAHI ...

BAAKI AAPKI POST SACH MEIN DHAMAAKEDAAR HAI ..... DOLE-SHOLE SAMBHAAL KAR RAKHO BHAIYA .... KABHI HAM KO JAROORAT PADEGI TO UDHAAR LE LENGE AAPSE .....

MAJEDAAR HAI AAPKI POST BAHUT ACHEE LAGI ....

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

महफूज़ जी पढ़ते पढ़ते किसी का हार्ट अटैक न हो जाये ......मैं तो डर गई .....कोई गलती सलती हो तो प्ल्ज़ माफ़ी मांग लेती हूँ प्यार से .....आप कहीं चुनाव में जीत जायें तो देश सुधर जाये ....दुआ है हमारी ......राम प्यारी तू कहाँ है .....????

मनोज कुमार ने कहा…

यह रचना अपनी एक अलग विषिष्ट पहचान बनाने में सक्षम है।

बवाल ने कहा…

ऊँट ऊँचा घींच नैची पीठ ऊँची पूँछ नैची

बहुत ही उम्दा प्रोफ़ाइली लेख भाईजान।
और हाँ ऑफ़ेन्सिव एटिट्यूड का तो हम नहीं कह सकते मगर ऑफ़ेन्सिव ड्रायविंग का अपना अलग ही मज़ा है, जब तक धारा 279, 337 या 338 के चक्कर में ना जाएँ। इसके बाद ऑफ़ेन्सिव ड्रायविंग की बारी पुलिस और कोर्ट की रहती है आपकी नहीं, हा हा।
अदा जी ने एकदम सटीक बात कही है। चाहें तो काका हाथरसी की एक कविता के तेली से मिल लें वो आपको तफ़्सील से सब बता देगा। हा हा।

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा! पढ़कर आनंद आया! इस रोचक पोस्ट के लिए बधाई!

rashmi ravija ने कहा…

अरे वाह !!..क्या बात है...टुकड़ों टुकड़ों में तो कई बार अपनी पोस्ट में अपना परिचय आप दे चुके हैं...आज सारा आख्यान ही मिल गया...ये पढ़ तो अमिताभ बच्चन के सुपर हीरो वाले दिन याद आ गए...उनकी फिल्मों के स्क्रिप्ट आप से ही तो प्रेरणा लेकर नहीं लिखे गए थे.??...:)

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

संयोग देखिये ... आपसे सुना भी और पढ़ा भी ...
आपकी सक्रियता की मौखिक सराहना कर चुका हूँ , अब
लिखित भी कर रहा हूँ ... आभार ,,,

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप की कई बातो से असहमत हुं, कई बाते अच्छी लगी,शायद उम्र का फ़र्क हो सकता है

शबनम खान ने कहा…

Mehfooz ji...apki ye post padte hi JAB WE MET ka KAREENA ka vo dailogue yaad aa gaya "ME TO APNI FAVOURITE HU"...aisa lag raha ha ye lines bas aap hi k liye bani ho....
Apki post ka pehla peragraph padkar to me bohot khush ho gyi vo isliye kyunki zimmedari le rakhi ha apke liye ladki dhundhne ki...socha koi mile apke layak to apki body ka discription padhwa dungi....bohot khush hogi..bhayi par jab aage padha to ruk hi gyi....aise nhi chalega...ab apni hi tareefe karte jaoge toh koi ladki khak shadi karegi aapse....aji use tareef nhi chahiye hogi kya???
bhyi khudki tareefo me to aap mahir nikle u knw BADE DIL WALA....dusro k liye bhi yahi Imandari dikhayiye...
Mehfooz Puran k chapne ka intezar rahega...
shubhkamnaye..

M VERMA ने कहा…

मैं काफ़ी देर से सोच रहा हूँ कि अब आपके इस आलेख के बारे में क्या कहा जाये!!
एक सत्य यह भी है कि जो जरूरत से ज्यादा offensive नज़र आता है वास्तव में वह Defensive होता है. कहीं आप इस श्रेणी के तो नहीं हैं?

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

अदा जी की बात से १०१%सहमत . अभी ऊठ पहाड के नीचे आया कहां है . फ़िर देखेन्गे उस्के ताप से कौन बचायेगा ..........

वाणी गीत ने कहा…

अदा ने बिलकुल सही कहा है ....एक बार घर में बीबी आ जाने दे ...देखना कैसे कान पकड़कर नचाएगी तुझे ....सारी हेकड़ी भूल कर उसकी खुशामद में लगा रहेगा .... ...मगर सोच रही हूँ तेरी लिए लड़की कहाँ से आएगी ...कोई महिला Don ही ढूंढनी पड़ेगी ...!!

हास्यफुहार ने कहा…

good!

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

Nice Post...

जी.के. अवधिया ने कहा…

लगता है कि फिल्म जंजीर का विजय और फिल्म शोले का गब्बर दोनों ही आपके भीतर समा गये हैं।

एक बात कहूँगा महफ़ूज, आगे बढ़ो मगर किसी को जबरदस्ती पीछे ढकेल कर नहीं। और हाँ, यदि अपने क्वालिटीज़ का प्रयोग यदि समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अत्याचार आदि खराब बातों को खत्म करने के लिये करोगे तो यह एक बहुत ही सराहनीय कार्य होगा।

indu puri ने कहा…

जानते हो पढ़ कर कैसा लगा ,जैसे तुम अपने बारे में नही इंदु पुरी के बारे में लिख रहे हो
वही स्टुडेंट लाइफ ,पढने में भी,टीचर्स ' जी.के. बुक' के नाम से बुलाते थे .....जीवन में चेलेंज ,बोल्डनेस ,सामने वाले को अपने व्यक्तित्व से 'आतंकित' कर देना ....सब कुछ वही ,बस फर्क इतना सा ..मेरे पुरे स्कूल कोलेज के स्टुडेंट्स से अच्छे सम्बन्ध थे
ना कहू से दोस्ती ना कहू से बैर
अपने टीचर्स,लेक्चरर्स को बहुत रेस्पेक्ट देती थी ,सबकी लाडली थी
बदतमीज लेक्चरर्स की अक्ल ठिकाने लगाना भी खूब जानती थी.
आज भी प्यार से कोई जान मांग ले वरना ........
ये सच है, आप तभी हावी हो सकते हैं जब आपके पास नोलेज होता है
आपका ज्ञान ही है जिसके कारण सामने वाला आप से दब जाता है या नतमस्तक हो जाता है
बीते दिन याद दिला दिए .....मैं जानती हूँ जिसे लोग अहंकार समझ सकते हैं वो तुम्हारा आत्मविश्वास है,स्वयं को जानने के पश्चात की अभिव्यक्ति है .
हर व्यक्ति में ये आत्म विश्वास होना चाहिए हम दुनिया को बदल देने का जज्बा रखते हैं .
कुछ लोग बने बनाये रास्तों पर चलते हैं ,कुछ रास्ते बनाते हैं जिन पर बाद में लोग चलते हैं
ये आग हमेशा जलती रही ,ईश्वर हर किसी को ये गिफ्ट नही de

रश्मि प्रभा... ने कहा…

लीक से हटकर काम करने का एक अलग ही जूनून है....
सही है, लेकिन ऐज़ ए गार्डियन मैं कहूँगी कि खुद पर भरोसा रखो,पर वक़्त की नजाकत को नज़रअंदाज मत करो.....

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

वाह, बहुत खूब ! पूरी ऑटोबायोग्राफी ही रच डाली !

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

अमिताभ बच्चन का एक डायलोग याद आ गया, पेश-ए-खिदमत है;
" ये दुनिया है न दुनिया, इसमें दो तरह के इंसान होते है , एक वो जो जिन्दगी भर एक ही काम करते है, और एक वो जो एक ही जिन्दगी में सारे काम कर जाते है "

Dr. kavita 'kiran' (poetess) ने कहा…

khud ko khulkar share kiya hai aapne.aapke housle ki daad dete hain hum.ak baat bataiye,kahin aap aatm mugdh to nahi hain? i mean khud per fida?

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

आजकल ज्यादा कसरत को अच्छा नहीं माना जाता . पहलवानों को बुढ़ापे में बहुत तकलीफ़ होती है

sada ने कहा…

बहुत ही रोचकता से आपने अपने बारे में प्रस्‍तुत हर पहलू को उजागर किया, कम ही लोग अपने बारे में इतनी सुंदरता से बता पाते है...सटीक लेखन के लिये शुभकामनायें ।

संजय बेंगाणी ने कहा…

शादी हो जाए, बाप जाओ...फिर परिवर्तन हम देखेंगे. :)

बी एस पाबला ने कहा…

मैं सहमत हूँ कि
offensive होना बुरा नहीं है।

लेकिन एक बात सुन लीजिए कि ड्राईविंग मेरी भी कुछ 'ऐसी' ही है। ध्यान रखिएगा कभी मेरे खिलौने के सामने ना आ जायो,
ब्रेक तो लगाता नहीं मैं भी और ना एक्सीलेटर से पैर हटता है।
मैं बहुत खुश होता हूँ उस दिन, जब मेरे चाचा कभी कभी देते हैं वह खिलौना,
टाटा का दस चक्के वाला खाली ट्रक!
हा हा

बाकी मामलों में, वैसे पूछ सको तो पूछ लो
इंदु पुरी का भाई हूँ मैं :-)

रही बात बीबी की
तो मत मानना किसी की
आखिर जान है तो जहान है :-)

बनोगे 'गर मेयर
तो करना भई केयर
और रहना एकदम फेयर

शुभकामनाएँ
वैसे, offensive होना बुरा नहीं है।

बी एस पाबला

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

jai ho , jai ho , jai ho

aaj se ek naya naam --mahan mahfooz -MM

jai ho jai ho

Jyoti Verma ने कहा…

kya khub kahi apne!!!!!!!!!!
maza aa gaya....
hum bhi isi tarah ke nature ke hai....

Satindra ने कहा…

बहुत अच्छा लगा आपकी औटोबायोग्राफ़ी पढ़ना।

खास तौर पर:
"जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती नहीं है वो पुण्य है, और जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती है वो पाप है"

इशवर आपको सदा कामयाबी ही दे यही दुआ है।

जय हिंद

बेनामी ने कहा…

मैं पहले ये बता दूँ की,कोई ब्लॉगर नहीं हूँ...पर हिंदी पढने की चाहत यहाँ तक खींच लाती है. कहीं टिप्पणी भी नहीं करता
पर इस पोस्ट के बडबोलेपन ने लिखने वाले का परिचय पढने पर मजबूर कर दिया
वहाँ भी यही सब है,पर एक बात समझ नहीं आई ३०० लड़कियों से अफेयर?
महफूज़ अली,आपकी उम्र होगी, २८ से ३२ के बीच
चलिए ३० मान लेते हैं..
१५ साल की उम्र से अफेयर की शुरूआत की होगी.
यानि १५ साल में ३०० लड़कियां
१ साल में २०
२० लड़कियां एक साल में यानि ३६५ दिन में
१ लड़की से अफेयर रहा १८ दिन(लगभग)
या पूरी बीस लड़कियों को साल भर टू टाइमिंग या बीस टाइमिंग करते रहें.
यह टिप्पणी आपके लिए नहीं है.आप जैसे लोगों से उलझना मुझे पसंद नहीं. .
ये जयजयकार करने वालों की फ़ौज के लिए है या आपकी वकीलों के लिए है.

Anil Pusadkar ने कहा…

हम रूरल लोगों पर तो आप रूल कर ही रहे हैं।

अबयज़ ख़ान ने कहा…

हा..हा..हा.. महफूज़ भाई कई बार ओफेन्सिव होना ख़तरनाक भी हो जाता है... लेकिन आपका जुनून लाजवाब है... ज़िंदगी अपने उसूल के हिसाब से जीना बेहतर बात है.. लेकिन कई बार उसूलों से समझौता भी करना पड़ जाता है...

महफूज़ अली ने कहा…

@ Anonymous.....

भई, आप जो भी हैं ...आपका कमेन्ट मुझे अच्छा लगा.... अगर आपको यह पोस्ट बडबोलापन लगती है.... तो इसका मतलब साफ़ है कि आपको भी यही लगता है कि आप मुझे उलझ नहीं सकते...ना ही मेरी बराबरी कर सकते हैं. अगर खुद के बारे में बताना बडबोलापन है... तो यह बडबोलापण ...हम सब करना चाहते हैं. लेकिन जिन लोगों के पास बताने के लिए कुछ होगा ही नहीं.... वो बेचारे क्या बताएँगे? क्यूंकि बताने के लिए बहुत सी qualities चाहिए होती हैं. मैं तो खुद कहता हूँ आप मुझसे कम्पीटीशन में आईये... मगर आपको भी यह डर है कि आप मेरी बराबरी नहीं कर सकते.... इसीलिए यह बेनामी कमेन्ट किया है आपने.... रही बात मेरी उम्र कि आपने सही अंदाज़ा लगाया है.... पर तीस नहीं है.... तीस से थोड़ी ज्यादा है... जब आपने मेरे फ्लर्ट का अनालिसिस किया है तो यह भी सही किया है.... बस फर्क इतना है आपने बीस लड़कियों का एवरेज निकला है.... और मैं पचास कहता हूँ.... दरअसल फ्लर्ट भी वही कर सकता है जिसके पास कुछ qualities होतीं हैं ..... और मैंने जो भी लिखा है.... उसे पूरी सच्चाई से लिखा है... अगर अपने बारे में लिखना बडबोलापन है तो ऐसा बडबोलापन आपको बहुत बार दिखेगा... पर इतना तो श्योर है कि आप ऊँ लोगों में से हैं जो पूरी ज़िनदगी... रूल होते रहे हैं..... हम तो बचपन से लेकर आजतक रूल करते रहे हैं... शायद इसीलिए आपको बडबोलापन लगा है.... अगर आपके पास भी ऐसा कुछ है बताने के लिए तो ज़रूर बताइए.... नहीं है तो भई..... ऐसे ही काम्प्लेक्स में ही रहना पड़ेगा......
मुझे गाली दे कर आप खुद कि ही संतुष्टि कर सकते हैं.... लेकिन कम्पीट करने के लिए तो भाई साथ में खडा होना पड़ेगा.... अगर आप मुझसे जीत जायेंगे तो ज़िनदगी भर चरण धो कर पियूँगा.... वैसे अगर दम होता तो बेनामी टिप्पणी नहीं करते..... रही बात मेरे फ्लर्टिंग की .... तो मेरे फ्लर्टिंग पे एक पूरी फिल्म बन सकती है.... इसको तो मैं अपनी पोज़िटिवनेस मानता हूँ..... आप में दम नहीं है इसलिए नहीं कर पाए... मेरे में दम था इसीलिए बहुत किया.... मैं तो खुले आम कहता हूँ..... आप में दम है तो खुले आम कहिये.... रहगी बात मेरे वकीलों कि.... तो एक बात है कि प्यार दीजिये ....प्यार मिलेगा.... चिढेंगे तो लात खायेंगे.... तो बेहतर है कि प्यार दीजिये.... और प्यार पाइए... अगर आपके पास ऐसा कुछ है बताने के लिए ....तो लिखिए अपने संस्मरण में.... ज़िन्दगी भर अगर लात खाई है तो उसे भी लिखिए... अपना नाम बताइए...खुल कर सामने आईये.... ना रुला दिया तो मेरा नाम बदल दीजियेगा....हार गया तो अपना बदल कर आपका नाम रख लूँगा.... मेरे पास इतना कुछ है बताने के लिए.... कि यह ज़िन्दगी छोटी पड़ गई है.... आप जैसे लोग कमियां ढूंढते हैं.... क्यूंकि खुद में बहुत कमियां होतीं हैं.... और दूसरे की कोई ऐसा पॉइंट उठाना चाहते हैं कि जिससे कि सामने वाला दबे.... पर भई ...हम तो दबने वालों में से नहीं हैं.... हम तो शुरू से लड़ते आये हैं.... जो हमसे लड़ने कि कोशिश किया है.... सच बोलूँ... तो आज तक किसी से हारा नहीं हूँ.... जिस दिन हार जाऊंगा उस दिन खुद को ही ख़त्म कर लूँगा.... मुझे तो सिर्फ प्यार से ही हराया जा सकता है.... और ऐसी हार मैं हज़ारों बार हार चुका हूँ.....

SHIVLOK ने कहा…

बनोगे 'गर मेयर
तो करना भई केयर
और रहना एकदम फेयर

*KHUSHI* ने कहा…

thoda lamba post ho gaya kintu kuch had tak aapke vicharo se sahemat hoon... btw khoye hue baccho ka jo widget aapne lagaya hain woh mil sakega?

singhsdm ने कहा…

महफूज़ भाई.......

आपकी शख्सियत के बहुत से रंग आपकी पोस्ट से देखने को मिले.......वाकई....हैंडसम तो आप हैं ही...साथ में आपके मांसपेशियां क्या खूब गज़ब ढाती होंगी समझ सकता हूँ.......मजेदार पोस्ट.....खुलकर अपनी बात और खुद को रखने का जो ज़ज्बा आपमें है....वो कमाल है....!

महाशक्ति ने कहा…

बहुत दिनो से लखनऊ आने की सोच रहा था, पर अब ये सुनकर की 42 इंच के बायसेप वाले हंक से मिलने के लिये पहले खुद को 46 इंच को करना पड़ेगा, जो होने से रहा :)

रही V शेप बॉटी की बात तो हम तो I ही ठहरे।

भाई पोस्‍ट पढ़ते पढते लोट पोट हो गया, समझ मे नही आ रहा था कि खली की पोस्‍ट पढ़ रहा हूँ कि महफूज भाई की।

मेयर का चुनाव डेयर हो कर लड़े विजयश्री जरूर मिलेगी।

यूनीवसिटी की बात और भी मजेदार लगी और तो और गंगाजल से स्‍कूल धोया गया कि नही पता कर बताइयेगा।

आपका आपना
छोटा भाई

SANJAY KUMAR ने कहा…

OFFENCIVE OR AGGRESSIVE?

अजीत 'फिरदौस' ने कहा…

महफूज भाई आपका जीत के प्रति जूनून वाकई पढने वाले के दिलों में भी जूनून पैदा कर रहा है....पर बिन मांगी एक सलाह इस जीत के जूनून या फिर भूख को बरक़रार रखने के लिए हारना भी जरूरी....दुआ करता हूँ की कभी आपको हारना ना पढ़ें....और फिर आखिर में की समय बलवान होता है और कुछ नहीं....ढेर सारी शुभेच्छाओं के साथ कभी एक अधूरी सी कविता लिखी थी जो नज़र करता हूँ....

जिंदगी को कुछ यूँ सजाकर चलिए/
सरे-राह सर उठाकर चलिए/

किसने कहा कि देखभाल कर चलिए/
मौत से बाहें मिलाकर चलिए/

सच्चाई का दामन थामकर चलिए/
हरेक आँखों में आंखें डालकर चलिए/

सपनों की उड़ान बढ़ाकर चलिए/
पर हकीकत से नज़र मिलाकर चलिए/

जिंदगी इक संघर्ष मानकर चलिए/
हर फिक्र को धुंए में उड़ाकर चलिए/

परेशानियों को दोस्त बनाकर चलिए/
अच्छे दिनों की आस लगाकर चलिए/

आपका अजीत

Kusum Thakur ने कहा…

एक अच्छा संस्मरण , आभार !!

Kusum Thakur ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
नीरज गोस्वामी ने कहा…

आप की खुद्दारी पसंद आयी..खुदा आपको बुरी नज़र से महफूज़ रखे...
नीरज

रचना दीक्षित ने कहा…

महफूज़ भाई हमने तो पूत के पाँव पालने में ही पहचान लिए थे. मुझे ब्लॉग जगत में बहुत दिन नहीं हुए नहीं फिर भी आप के ब्लॉग पर जाती हूँ तो कुछ कुछ लिखने को दिल हो ही जाता है आपने वो एक अल्ट्रा मॉडर्न लड़की की अति सूक्ष्म kahani लिखी थी जाने क्या क्या लिखने को दिल आया पर मैंने कंट्रोल कर लिया.कोफ़ी हॉउस वाली ब्लॉग मीट की रिपोर्ट भी पढ़ी थी और आपके नुस्खे ज्यादा टिप्पणी पाने के,आपका घर भी जानती हूँ .मेरा हाजमा भी बड़ा दुरुस्त है मुझे काबिलियत की बदहज़मी भी नहीं होती. मैंने भी पहले अपने प्रोफाइल में लम्बी चौड़ी लिस्ट लगाई थी डिग्रियों की, अलग अलग भषाओं की, विज्ञानं की फिर सब निकाल दी, क्योंकि मैं अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती थी जिसका मेरी क्वालिफिकेशन से कोई वास्ता नहीं, मैं भी कुछ नाम गिना दूँ क्या? बेगम हामिदा हबीबुल्लाह, रानी लीला राम कुमार भार्गव,या फिर नए में प्रतिभा पाटिल के दामाद या उनके पिता जी (प्रतिभा पाटिल जी के समधी जी )डाक्टर राठोड. मैं क्या हूँ? क्या क्या हूँ? किसी को नहीं बताती. मैं तो बस तिकल्ले लपेटती हूँ. किसी का फायदा भी नहीं उठाती मैं धरती पर ही रहती हूँ, मेरे पिताजी क्या है, और मेरी माता जी क्या हस्ती हैं, उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता मुझ पर. मैं क्या हूँ और मैंने अपने दम पर क्या हासिल किया है उस पर गर्व करती हूँ औ र एक फल से लदे पेड़ की तरह जितनी प्रतिभा बढाती हूँ उतनी ही नम्र और विनम्र होती जाती हूँ
मुझे पता है की आप मेरी ये टिप्पणी या तो नहीं लगायेगें या फिर निकाल देंगें क्योंकि ये मेरी ये बातें आप के स्वाभाव को रास नहीं आएँगी.
आपके चुनाव के लिए अग्रिम बधाईयाँ

वन्दना ने कहा…

mahfoozzzzzzzzzzzzzzz

hey bhagwaan............yahan logon ko dara rahe ho dhamka rahe ho .........aur naam kaise mahfooz rah liya.........tumse to koi bhi mahfooz nhi rahega baba.............har koi bechara dar ke mare pahle hi behosh ho jayega...........vaise ada ji ne sahi kaha hai aur us din main yahi baat kah rahi thi tumhein........jis din biwi aayegi na uske baad puchenge .........kaun sa mahfooz aur kahan ka mahfooz..........sabko bhool kar sirf ek hi naam japa karoge............hahahahahaha..............hai koi hamari baat ka jawaabbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbbb....................nhi hai naaaaaaaaaa...........hoga bhi nhiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii.........hahahahahahahha

वन्दना ने कहा…

main to yahan aayi thi title dekhkar ki ko achchi si nazm padhne ko milegi magar yahan to sare aam gundagardi ho rahi hai aur koi rokne wala nhi...........uff ! kya naubat aa gayi hai ..............tumhare dar ke maare sab tumhara gungaan kar rahe hain aur ek main hun jo bekar mein panga le rahi hun...........hai na..........to neta ji .............ye janta bahut kharab hai bachkar rahna shuruaat yahin se ho rahi hai..............dekha ..........hahahaha

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

पागल कुत्ते ने काटा है क्या, जो इसकी हिमाकत करे?
--------
अपना ब्लॉग सबसे बढ़िया, बाकी चूल्हे-भाड़ में।
ब्लॉगिंग की ताकत को Science Reporter ने भी स्वीकारा।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

ये गोरखपुर का क्या कनेक्शन है मियाँ? आप वहाँ जरूर जाइए और चुनाव लड़िए। आपकी बहुत जरूरत है वहाँ। आप तो जानते ही होंगे कि वहाँ एक हिजड़ा मेयर रह चुका है। उसके बाद एक भद्र महिला आई हैं। अब आप जैसे जवाँ मर्द की जरूरत है जो हर हाल में जीतना चाहता है।

pragya pandey ने कहा…

आपसे तो डर लगता है .. हम तो आपकी हर ग़ज़ल पर बहुत अच्छी टिप्पणियां देंगे !बाप रे अब तक कैसे बचे रहे! .
वैसे सच्ची बात ये है कि आपके चरित्र कि ये जिंदादिली काबिले तारीफ़ है .

प्रबल प्रताप सिंह् ने कहा…

भाईजान अपने संस्मरण से हमें अवगत कराने के लिए धन्यवाद. आपके संस्मरण को पढ़कर मज़ा आ गया. आपसे साक्षात मिले बिना पता चल गया कि महफूज़ भाई नारियल के मानिंद हैं.

--
शुभेच्छु

प्रबल प्रताप सिंह

कानपुर - 208005
उत्तर प्रदेश, भारत
मो. नं. - + 91 9451020135

गौतम राजरिशी ने कहा…

अदा भायी महफ़ूज, किंतु इतनी आत्मश्लाघा...?

वैसे रचना दीक्षित जी बात काबिले-गौर है...

god bless you!

संजय भास्कर ने कहा…

kya khub kahi apne!!!!!!!!!!
maza aa gaya....
hum bhi isi tarah ke nature ke hai....

संजय भास्कर ने कहा…

महफूज़ जी ,

आज तो आपकी बड़ी धमाकेदार रचना आई है....किसमें कितना है दम ...आपके बारे में जानकारी मिली.... बढ़िया है...

गिरिजेश राव ने कहा…

मेरी पहली टिप्पणी ध्यान से पढ़ो भाई।
मन को 'रास्ता भूला बच्चा' बना कर 'साइड लेन' में मत डालो।
प्रतिक्रियावाद आवश्यक रूप से नकारात्मक होता है। 'मैं' का अतिरेक ऊर्जा को बर्बाद करेगा।
अपनी रचनात्मक ऊर्जा को पॉजिटिव सृजन में लगाओ भैया।
उपदेशात्मक लग रहा होऊँगा लेकिन फिर भी...
बुजुर्ग ;) अपनी आदत से बाज कब आते हैं।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

भाई महफ़ुज आपके इस लेखन पर बिना संकोच और पूर्वाग्रह के मैं कहना चाहता हूं कि इसमें स्वाभाविक कच्चापन है जो वैचारिक रूप से लोगों को कसैला महसूस हो सकता है किन्तु वक्त के साथ ही इसमें परिपक्वता आयेगी और गद्य लेखन का यह फल पककर निश्चित ही मीठा होगा.

एकेडमिक सफलता आपने मेहनत करके प्राप्त की है व्यावहारिक सफलता के लिए मानवोचित अटलता व लचीले व्यवहार दोनों की भी आवश्यकता होती है जिसे आपने अपने मित्रों के संबंध में चर्चा करते हुए इस पोस्ट में स्वीकार भी किया है. व्यवहार का खुलापन स्वमेव मित्रों की संख्या में वृद्धि करता है और संपूर्ण मानव समाज मित्रवत लगने लगता है. आपने अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीत लिया है.

उम्र में बडे होने एवं मंडन मिश्र व शंकर के शास्त्रार्थ की परंपरा समाप्त हो जाने के अवसर का लाभ उठाते हुए मैं कहना चाहूंगा कि यद्धपि जीवन संघर्ष, संग्राम जैसा कुछ है फिर भी उसमें प्यार का महत्व सदैव अहम है. मेरी शुभकामनांए.

आपका व्यवहार डिफेंसिव हो या अफेंसिव बस प्यार की गंगा बहाते चलो.

साहित्य की गलियारो मे कहा जाता है कि 'लेखक अपनी आत्मकथा मे कहानी और कहानी मे आत्मकथा लिखता है' पर आपने बहुत ही बोधगम्य तरीके से और पूरी साफगोई से अपनी बात रखी है इसके लिए धन्यवाद.

Mithilesh dubey ने कहा…

बढिया किया भईया पहले ही बता दिया। जिम वाली बात, नहीं तो हम तो बहुत कुछ सोच रहें थे आपके लिए कि कुछ करवाते है आपका, लेकिन आपने तो सारे लिए धरे पर पानी फेर दिया । जिन्हे कहा था आपको देखने के लिए वे बेचारे कह रहे है कि पिटना है क्या वहाँ जाऊं , फिर मैंने कहा कि अरे महफूज भाई , भाई है मेरे, तो वे लोग कहने लगे कि भाई होंगे आपके, मुझे तो दौडा-दौडा कर वहाँ तक मारेंगे जहाँ तक फट न जायें , अब ये मत पुछना क्या , ये तो महफूज भाई ने भी नहीं बताया था। महफूज भाई ये डराने वाली बात बहुत हो गई , अब जरा वो बात भी बताईये जब आप डर गये थे और आपको भागना पडा था, जरा उन्हे संतोष हो जाये कि कोई रास्ता है ।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

waah bhai waah......aap ke baare me kai baatein pata chali.....ab?
paap aur puny ke baare me ekdam sahi kaha hai.....

seema gupta ने कहा…

interesting to read..

regards

निर्मला कपिला ने कहा…

अरे बेटा इतना लम्बा भाषण वो भी आत्म कथा? वाह सही मे तुम रूल करोगे किसी दिन हमारी शुभकामनायें तुम्हारे साथ हैं अपने ये हौसले बनाये रखना मगर इन्सान बने रहना इसी तरह। तुम्हारे लिये कल खुशदीप जी के ब्लोग पर कविता के रूप मे एक कमेन्त छोदा था
बस सीमा मे बन्ध कर रहना भी जरूरी है इन्सानियत के बान्ध न टूटें बाकी तुम्हारी हर बात मन्जूर है
लोहडी की शुभकामनायें औरब तुम्हें बान्धने वाली आ जये यही आशीर्वाद है।

अल्पना वर्मा ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अल्पना वर्मा ने कहा…

आत्मा कथा या आत्म विश्लेषण...
उस पर टिप्पणियों में मिली सलाहें आप को सही मार्ग दिखला ही देंगी.

waise ओफेन्सिवे होना गलत नहीं है.
apni energy ko right direction mein lagayen!thts it!

खुला सांड ने कहा…

अच्छा दंड पैलक कर लेते हैं !!! हमें तो इसकी आवश्यकता नही पड़ती ना किसी से लड़ना ना कोई कन्या को भाव देना!!!

Harsh ने कहा…

bahut sundar.............

अर्कजेश ने कहा…

बुरा मत मानना लेकिन आप आत्‍ममुग्‍ध लग रहे हो ।

ये संस्‍मरण तो लोग 40-45 के बाद लिखना शुरू करते हैं मित्र । और अभी तो आपने शुरुआत भी नहीं की :)

वैसे काफी रोचक स्‍टोरी है नावेल लिखना शुरू कर दीजिए ।

शरद कोकास ने कहा…

बढिया है... तुम्हारी पोस्ट पढ़ते हुए एफ एम सुन रहा हूँ ..गुलज़ार का गीत बज रहा है..दिल तो बच्चा है जी .. ।

सुलभ 'सतरंगी' ने कहा…

अपना हुनर, अपना जज्बा, अपना विवेक ही काम आता है दुनिया में. वैसे भी सार्वजनिक जीवन में (दुनिया में) कोई किसी की परवाह नहीं करता..

हर सफल व्यक्ति अपने विवेक से ही काम लेता है... कोई किसी को गलत नहीं कह सकता.. कहना भी नहीं चाहिए... ! (अपराध अवश्य निंदनीय है और इसके लिए कानून भी है )

सबकी अपने सिद्धांत हैं और सिद्धांतों के मामले में कभी कोई कम्पीटीशन नहीं हो सकता.

Aage आप आने वाली नयी चुनौतियों को पार कर लेंगे ऐसा विश्वास आपने स्वयं ही दिलाया है.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

लम्बी और अच्छी पोस्ट.

शोभना चौरे ने कहा…

bahut achha likha hai .
jeenan me uh urja skaratmk ho.
shubhkamnaye

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

साहित्य की गलियारो मे कहा जाता है कि 'लेखक अपनी आत्मकथा मे कहानी और कहानी मे आत्मकथा लिखता है' ...

काफी रोचक स्‍टोरी है नावेल लिखना शुरू कर दीजिए ...

दिल तो बच्चा है जी ..

kuch connection sa hai in sab mein...

waise ye to hai ki maximum logon ko ye atmaprashansha hi lag rahi hogi.. actually ham sab log agar mud kar apna past dekhein, apne positives dekhein to achievements ki ek lambi list ban jayegi... jarurat hai positive attitude ki... mere liye har wo lamha kamaal ka hai jab meri choti se choti safalta (jaise bina coaching ke apne bal bute ek chote shahar mein rah kar bhi IIT JEE mein itni acchi rank lana) ya badi se badi safalta (18 ki age mein hi 4 international research papers, B Tech 2nd yr se hi placement offers and so on...) par meri family, mere parents muskurate hain... aur in sabke baare mein likhne baith jaayein to sachmuch duniya ki ab tak ki sabse badi novel ban jayegi...

PS: school aur college life ki baaki baatein to same hain, bas ladaai jhagda kabhi nahi kiya... :P

ज्योति सिंह ने कहा…

rochak hai ,aapke jeevan se judi har baat bemisaal hai aur kafi dilchasp bhi ,sundar ,kavyanjali par aaye aur vichar de .

sandhyagupta ने कहा…

Offensive ho ya defensive man mar kar kuch mat kijiye.wahi kijiye jo dil kahe.

आप मुझे या तो प्यार कर सकते हैं या फिर नफरत,
पर आप मुझे मुझे नज़रंदाज़ नही कर सकते.......

Ye to hai!

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

जैसे घर में होता है इक प्यारा सा बिगडा बच्चा
वैसा है महफूज़ हमारा अकल का कच्चा पर दिल का सच्चा ।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

महफ़ूज़ भाई आदाब
आपने पूछा है-
'अब आप ही लोग बताइयेगा कि क्या offensive होना बुरा है?'
??????????
सच बतायें जी,
ये सब पढ़कर हालत ऐसी हो गयी है कि
'मुंह से 'ना' ना निकले'
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

बेहतरीन ! अच्छा लगा ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

BAHUT DIN HO GAYE MAHFOOZ BHAI ... KIDHR HAIN ....

Sudha ने कहा…

mauf kejia shreman lekh mine Aamir khan ki film THREE IDIOTS jyada dikha.......!

PD ने कहा…

मुझे कम्प्युटर का शुरुवाती ज्ञान देने एक शिक्षक ने(जिन्हें मैं बहुत मानता भी हूँ) बहुत पहले एक बात कही थी, "इस भाग दौड कि जिंदगी में अगर कोई आपके साथ दौड रहा है तो उससे तेज दौड़ने कि कोशिश करो.. मगर किसी को धक्का देकर आगे मत बढ़ना नहीं तो बाद में तुम्हारी अंतरात्मा ही तुम्हे धिक्कारेगी.. अगर कोई गिर गया है तो भागते हुए ही उसे उठाने कि कोशिश भी करना, मगर उसके लिए रुकना नहीं.. नहीं तो तुम पीछे रह जाओगे.." अगर आप भी ऐसे ही हैं तो सारी दुनिया आपको और आपके ओफेंसिवनेस को सलाम भी करेगी..

वैसे गौतम जी और रचना दीक्षित जी कि बातों पर भी कभी आराम से विचार करके देखे..

Gourav Agrawal ने कहा…

लेख बहुत लम्बा है पर पढ़ कर (वो भी बिना रुके आपकी साइकिल की तरह)बहुत बहुत अच्छा लगा
आपने हम सभी को अपनी यादों में शामिल किया .......इसके लिए धन्यवाद

Shah Nawaz ने कहा…

भाई खतरनाक आदमी है आप तो......... :-)

वैसे हमेशा सादगी भी फायदा नहीं देती है. आपका प्रोफाइल फोटो देखकर तो लगता है बड़े सीधे-सादे इंसान हैं. पर आप तो माशाल्लाह कुछ ज्यादा ही सीधे-सादे निकले. ;-)

सलीम ख़ान ने कहा…

shah nawaz bhai main to mahfooz bhai ko janta bhi hoon aur mil bhi chuka hoon bas wo kaise hain mujhse behtar shayed koi bloger janta hoga...



@आपके व्यक्तित्व की कुछ बातें पसंद भी आई और कुछ से मैं इतेफ़ाक नहीं भी रखता हूँ...
ऊपरवाले ने सबको अलग-अलग नेचर का बनाया है

ajit gupta ने कहा…

महफूज, कल ब्‍लागवाणी क्‍या बंद हुई मुझे इतनी देर बाद महफूजवाणी पढ़ने को मिली। हम भी कभी कॉलेज में पढ़ाते थे और जितने भी अव्‍वल दर्जे के शैतान होते थे वे सब हमारे मुरीद होते थे। तुमने मुझे ममा लिखा और अब समझ आया कि हमें तो ऐसे शैतान बच्‍चे ही मिलते हैं। वास्‍तव में मेयर का चुनाव लड़ रहे हो क्‍या? वैसे मैं बताऊँ कि मैं अभी 6 महिने पहले ही इस पद के चुनाव को ठुकरा चुकी हूँ। हूँ ना तुम्‍हारी माँ। बस अब जल्‍दी ही तुम्‍हारे पर कतरने हैं, अदाजी से कहकर कोई बिहार की ढूंढ कर लाएंगे। फिर देखना कहाँ जाएगा ओफेन्सिवपना।

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

महफ़ू़ज़ भाई को कोई रोक पाया भला . भाई का हर
मामले में offensive हैं ये सब जानते है पर महसूस नहीं हो पाता .......?
खैर जनाब की बारात के लिये भी ऐसा ही ड्रायवर जुगाड़ना होगा...... पर आगे की लाईफ़ डिफ़ैन्सिव ही होनी चाहिये.

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

अदा जी
अभी पींगों में ही इतने दिनों से गुमशुदा थे तो आगे शरीक़े हयात के आने पर ज़नाब के क्या हाल होंगे समझ ही लीजिये. रहा मामला बकौल वक़ील सा’ब 2634 शब्दों वाली पोस्ट का अगर मियां महफ़ूज़ दूल्हा मियां महफ़ूज़ बन गये इस बरस तो 2+6+3+4=15/2=7.5 शब्द तक सीमित होगी तब फ़िर जज साहिबा कुछ न कहेंगी ये तय है...

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

अजय कुमार झा ने ”अमां यार महफ़ूज़ भाई , कितनी बार कहा है कि ....लाल लंगोट बांधे घूम रहा है ? , और जो नही कहा वो ये था :-
फ़िर हम को ही समझाना पड़ता है बाद में है न ?

गिरीश बिल्लोरे ने कहा…

गत्यात्मक ज्योतिष के एंगल से भी देखना होगा क्यों दीदी क्या क्याल है....?

मिहिरभोज ने कहा…

तुम्हें पढना हमेशा ही अच्छा लगता है....ये आगे बढते रहने का जूनून ही हमें जिंदा रखता हैं....बाकि तुम छोङते बहुत हो यार....खैर 10 -12 पुशप्स मैं भी मार लेता हूं....चालीस की उम्र मैं ठीक ही है

Rupesh ने कहा…

bahut khub, kisi ne thik kaha hai. dil ko dekho chehra na dekho, chehere ne lakho ko luta....

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