रविवार, 21 दिसंबर 2008

जब भी हम नई चीज़ों की नींव रखतें हैं, तो सबसे पहले पुरानीचीज़ों को हटाते हैं

नए मकान पुरानी नींव पर नहीं खड़े होते हैं.... अगर होते हैं भी तो ढह जाते हैं।




Mahfooz Ali




5 टिप्पणियाँ:

विनय ने कहा…

बहुत ख़ूब

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

.. आपका हार्दिक स्वागत है मेरे ब्लॉग पर भी तशरीफ़ लायें

सुलभ [Sulabh] ने कहा…

हिन्दी ब्लॉग के पन्नो पर आपके अल्फाज़ और जज्बातों का हम इस्तेकबाल करते हैं.

- यादों का इंद्रजाल

(If you can disable the "word verification option" It would be good for commentators.)

Deepak Sharma ने कहा…

महज़ अलफाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता
कोई पेशा ,कोई व्यवसाय नही है कविता ।
कविता शौक से भी लिखने का काम नहीं
इतनी सस्ती भी नहीं , इतनी बेदाम नहीं ।
कविता इंसान के ह्रदय का उच्छ्वास है,
मन की भीनी उमंग , मानवीय अहसास है ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नही हैं कविता
कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥

कभी भी कविता विषय की मोहताज़ नहीं
नयन नीर है कविता, राग -साज़ भी नहीं ।
कभी कविता किसी अल्हड yauvan का नाज़ है
कभी दुःख से भरी ह्रदय की आवाज है
कभी धड़कन तो कभी लहू की रवानी है
कभी रोटी की , कभी भूख की कहानी है ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता,
कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥

मुफलिस ज़िस्म का उघडा बदन है कभी
बेकफन लाश पर चदता हुआ कफ़न है कभी ।
बेबस इंसान का भीगा हुआ नयन है कभी,
सर्दीली रात में ठिठुरता हुआ तन है कभी ।
कविता बहती हुई आंखों में चिपका पीप है ,
कविता दूर नहीं कहीं, इंसान के समीप हैं ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता,
कोई पेशा, कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥

KAVI DEEPAK SHARMA
http://www.kavideepaksharma.co.in
http://Shayardeepaksharma.blogspot.com
Posted by Kavyadhara Team
All right reserved@Kavi Deepak Sharma

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