सोमवार, 20 जुलाई 2009

दम-साज़


रात में ख़ामोश चाँद हो तुम...

उस चाँद की पहली चांदनी हो तुम,

फूलों की कली, फ़रों से बनीं,

इत्र की खुशबू हो तुम,

खो गया मैं तेरे प्यार में,

उस दाश्तह की पहचान हो तुम..........

ग़र्क़-ऐ-बहर-ऐ-फ़ना "महफूज़",

मेरे हमसफ़र और दम-साज़ हो तुम... .... ..... ...... ..... .....




महफूज़ अली

5 टिप्पणियाँ:

raj ने कहा…

chandni ka badan khusboo ka saya ho tu...boht azeez marar praya hai tu..b`ful poem...

ओम आर्य ने कहा…

रात में ख़ामोश चाँद हो तुम.
bahut hi sundar ho tum par kya kare chand hamesha se chandanee ke saath hota hai.......par mere rag ko ragini na mil saki ..........bahut hi khubsoorat rachana.......

abhivyakti ने कहा…

चाँद था खामोश मेरी राह में थी रौशनी
हमसफ़र दमसाज के आगोश में थी जिन्दगी
आपकी कविता के भाव और शब्द चयन खूबसूरत है ..
प्रकाश 'पाखी'

Babli ने कहा…

बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई इस बेहतरीन रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

अल्पना वर्मा ने कहा…

badi mahakti si rachna hai :)

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