गुरुवार, 3 सितंबर 2009

आईये आज मैं आप लोगों को बताता हूँ की बाबू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुयी?



आज कोई कविता नहीं थी लिखने के लिए...... लेकिन कुछ लिखने का बहुत मन कर रहा था, तो सोचा की क्यूँ आज कुछ अलग लिखा जाए, बहुत हो गई यह कविता - शविता...... लेकिन कोई भी चीज़ ध्यान में नहीं रहीं थीतभी सोचा की क्यूँ आज अपने पाठकों कुछ अलग ज्ञान दिया जाए..... तो बस एक लेख ध्यान में गया....


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हम लोगों ने अपने आस-पास बाबू नाम का शब्द ज़रूर सुना है...... हम प्यार से लोगों को बाबू कहते हैं, अपने बच्चों के नाम भी बाबू रखते हैं, सरकारी अधिकारीयों और क्लर्कों को भी बाबू कहते हैं ...... किसी से अगर काम भी निकलवाना है तो उससे भी बाबू-भइया कहकर बात करते हैं या कह लें की चापलूसी करते हैं....... और हम भारतीय तो बहुत खुश होते हैं....... अगर कोई हमें प्यार से बाबू कहे...... मतलब यह है की ...... बाबू को हम बहुत ही सम्मानजनक रूप में देखतें हैं............


लेकिन! क्या हमने कभी यह सोचा है की इस बाबू शब्द की उत्पत्ति कैसे हुयी है? शायद नही! हमनें कभी इतनी गहराई में जाने की नहीं सोची कभी...... भाई..... शब्द तो आख़िर शब्द है..... कहीं कहीं से तो आया ही होगा..... जो कि हमारे ज़िन्दगी में इतना घुस चुका है.... आईये जानते हैं कि यह शब्द आख़िर आया कहाँ से? जबकि यह शब्द हमें किसी भी शब्दकोष में नहीं मिलेगा......... यकीं आए तो खोज लीजिये किसी भी शब्द कोष में...... अगर मिल जाए तो मेहेरबानी करके मुझे भी बता दीजियेगा..... चलिए ज़्यादा लम्बी भूमिका नहीं बांधूंगा..... आईये जानते हैं इस शब्द के बारे में....


बात दरअसल यह है कि अंग्रेज़ों ने हम पे जैसा की हम सबको मालूम है की दो सौ साल तक राज किया.... और हम हिन्दुस्तानियों को बहुत ही हेय निगाह से देखा और रखा.... तो जो हिन्दुस्तानी लोग उस वक्त अंग्रेज़ों के घरों और सरकारी दफ्तरों में नौकर थे..... उन लोगों को अँगरेज़ बबून (baboon) पुकारते थे..... जैसा कि हमने देखा , पढ़ा और सुना होगा कि बबून (baboon) एक प्रकार का बन्दर प्रजाति का जानवर है.... जो कि अफ्रीका में पाया जाता है......जिसका मूँह कुत्ते जैसा और धड़ बन्दर जैसा होता है..... तो भाई! ये अँगरेज़ लोग हम हिंदुस्तानिओं को बबून (baboon) कह कर पुकारते थे..... जो कि अपभ्रंश होकर बाबू हो गया..... क्यूंकि हम हिन्दुस्तानियों को अंग्रेज़ों कि अंग्रेज़ी समझ में नही आती थी.... जब आज भी नहीं आती है तो उस वक्त क्या आती होगी..... अगर STAR MOVIES, HBO और AXN पे SUBTITLES चलें तो आज भी किसी के समझ में नही आती है.... तो जब अँगरेज़ हम हिन्दुस्तानियों को बबून (baboon) बुलाते थे..... तो हम हिन्दुस्तानियों कि यह लगता यह लगता था..... कि यह लोग हमें प्यार से बाबू बुलाते हैं...... और ऐसा अँगरेज़ उस वक्त ज़्यादा करते थे जब उनके घर में कोई विलायत से मेहमान आता था..... यहाँ तक कि उस वक्त के I.C.S. Officers को भी अँगरेज़ बबून ही बुलाते थे..... अब चूँकि अंग्रेज़ों कि अंग्रेज़ी हिन्दुस्तानियों को समझ में नही आती थी...... तो उनको लगता था कि ये लोग हमें बाबू बुलाते हैं...... और हम हिन्दुस्तानी भी ऐसे थे.... कि अपने घर जा कर उस वक्त लोगों को बड़ी खुशी-खुशी बताते थे कि अँगरेज़ हमें प्यार से बाबू बुलाते हैं..... बेचारों को क्या मालूम था कि अँगरेज़ हमें गालियाँ दे रहें हैं..... बबून कह के..... हम थे ही सीधे .....और आज भी हैं....... आज भी कितने हिन्दुस्तानी बबून (baboon) बन्दर के बारे में जानते हैं?



और धीरे - धीरे यह शब्द हमारी आम ज़िन्दगी में प्रचलन में गया...... आज यह शब्द हमारी नस नस में बस चुका है.... हम आज भी अपने यहाँ के क्लर्कों और IAS को बाबू ही बुलाते हैं.... किसी कि जब चापलूसी करते हैं तो बाबू ही कहते हैं...... चलिए अच्छा भी है इन bureaucrats और सरकारी क्लर्कों ने वैसे भी आम हिन्दुस्तानियों का जीना दुर्भर कर रखा है..... इसलिए इनको बाबू कहा जाता है.... बाबूगिरी करते हैं ये लोग...... यानी कि कुत्तागिरी..... कितना सही नाम दिया है अंग्रेज़ों ने...... हमें गर्व है कि हम बाबू हैं.......




37 टिप्पणियाँ:

Maansi ने कहा…

हमें गर्व है कि हम बाबू हैं......bahut sahi kaha apne...mahfooz ji aap sach me bahut achha likhte hai...main kahne ke liye nahi kah rahi...its true...mere pass tareef ke shabad nahi...

शरद कोकास ने कहा…

महफूज़ भाई चलो चेंज के लिये यह ठीक है । सबसे पहले यह बात कि बाबू शब्द ज्ञानमंडल

शरद कोकास ने कहा…

महफूज़ भाई चलो चेंज के लिये यह ठीक है । सबसे पहले यह बात कि बाबू शब्द ज्ञानमंडल

'अदा' ने कहा…

महफूज़ बाबू.......सॉरी महफूज़ जी,
इत्ता बड़ा ज्ञान दे दिया सबको अबतो बवाल हो जावेगा...कितने अनशन....कितने हड़ताल की संभावना हो गयी अब ...
इसको पढने के बाद कितने क्लार्क कितने आईएस के डेस्क के सामने यही लिखा मिलेगा......कुछ भी बुलाएं हमें लेकिन बाबु न बुलाए,,,,,और अब तो बाबू-भैया बोल के कहाँ कोई काम होगा जी.....सब गुड गोबर कर दिए न !!!!अरे इ भी तो बताना था की अब उनको का संबोधित किया जावेगा..
अजी जनाब ये तो बस क्रांति लाने वाली बात हो गयी न..
अब जो हंगामा होगा सम्हालियेगा आप ही....
लेख बहुते बढ़िया है ...बाकि हम चले जी....
टाटा ...

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खुब महफूज भाई बङी सही जानकारी दी है आपने। हम भारतीयो की यही तो कमजोरी है कि कोई हमे प्यार से बुलाये तो हम खूश हो जाते है चाहे बुलाने के लिए प्रयोग किया शब्द का मतलब गाली ही हो।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...

डा. अमर कुमार ने कहा…


सत्य वचन
सूअर के पिल्ले = पिगलेट = पगलेट
उल्लू का पट्ठा = आऊलेट = हऊलट
ऎसे पच्चीसों शब्द हैं, धन्य धन्य अँग्रेज़ बहादुर
ब्लडी इंडियन्स को कोई नाम तो दिया :)

Udan Tashtari ने कहा…

ये आज आपके मार्फत नई जानकारी मिली.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

गजब की जानकारी दी भाई ! उत्पत्ति का पता तो हमें भी नहीं था - हाँ हमें यह लगता था इस जाति की कारिस्तानियाँ देखकर कि बाबू का अर्थ हुआ - बा-बू । जैसे बाइज्जत माने इज्जत के साथ, जैसे बाअदब माने अदब के साथ वैसे बाबू माने बू (दुर्गंध) के साथ । ज्यादा क्या कहूँ ।

mehek ने कहा…

bahut hi rochak jankari.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

महफूज अली जी!
आपने बहुत ही उपयोगी जानकारी दी है।
आभार!

रज़िया "राज़" ने कहा…

एक अच्छी जानकारी हमारा तक पहोंचाने का शुक्रिया।
बाबू हमारा हिन्दी लोगों का प्रिय शब्द हो चला है।
बाबू शब्द की उत्त्पत्ति के बारे में आपसे जानकर बडी हैरत हुई। ख़ेर बाबू हमारा प्यारा शब्द है ये तो हम सभी ने स्वीकार किया है।

हर तरहाँ की "पोस्ट" में आपके विचार बडे ही मह्त्वपूर्ण जानकारी देते रहते हैं । बधाई।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

रोचक जानकारी दी है यह तो आपने ...बाबू से बबू बना होगा जिन्हें हम बच्चो को प्यार से बुलाते हैं :) अंग्रेज भी क्या क्या लफ्ज़ दे गए हैं और हम उनके दिए यह लफ्ज़ कितनी इज्जत से साथ बोल रहे हैं न :)

pallavi trivedi ने कहा…

बाबु की उत्पत्ति का ये रहस्य तो अब तक पता ही नहीं था....अब जैसे भी आया ये शब्द पर अब तो हमारे अन्दर ऐसा रच बस गया है की जाने वाला नहीं है!

vikram7 ने कहा…

महफूज़ जी, अदा जी ने सही कहा "अबतो बवाल हो जावेगा...कितने अनशन...."
चलिये आप के इस लेख से रोचक जानकारी मिली,बाबू शब्द बोलने से पहले अब सोचना पडेगा?

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

वाह क्या जानकारी दी है! बाबू सुन के इतराने वाले सरकारी बाबुओं तक ये जानकारी पहुंचाना बहुत ज़रूरी है.उम्मीद है आगे भी नयी जानकारियां देंगे.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

AAJ TO EK NAYEE JAANKAARI MIL GAYEE .... ISKI UTPATTI KA PATA NAHI THAA ... PAR KAHEEN KAHEEN YE SHABD PITA KI LIYE BHI PRACHLIT HAI ...... AGAR IS VISHAY PAR BHI KUCH PRAKAASH DAALENGE TO ACHHA LAGEGA ....

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ ने कहा…

अरे वाह बहुत अच्छी जानकारी, जनाब जब से मैंने ब्लोगिंग शुरू की तबसे जाने कितने लोगों को बाबू के खिताब से नवाज़ा जैसे सुरेश चिपलूनकर बाबू, राकेश सिंह बाबू, जी के अवधिया बाबू, अनिल पुसदकर बाबू, संजय बाबू, पंकज बाबू, निशांत बाबू... आदि आदि आदि...

वैसे मुझे कोई बाबू नहीं कहता; मुझे सब कहते हैं सलीम भाई या सलीम मियां....

अँगरेज़ चले गए चुद गए अपनी गन्दी आदतें.....

ओम आर्य ने कहा…

वैसे मैं महफूज़ भाई की बात से पूरी तरह सहमत हूँ, पर एक और पक्ष से वाकिफ करना चाहूँगा.

ब्रिटिश शासन के दौरान जब कोलकाता एकीकृत भारत की राजधानी थी, कोलकाता को लंदन के बाद ब्रिटिश साम्राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता था। इस शहर की पहचान महलों का शहर, पूरब का मोती इत्यादि के रूप में थी। इसी दौरान बंगाल और खासकर कोलकाता में बाबू संस्कृति का विकास हुआ जो ब्रिटिश उदारवाद और बंगाली समाज के आंतरिक उथल पुथल का नतीजा थी जिसमे बंगाली जमींदारी प्रथा हिंदू धर्म के सामाजिक, राजनैतिक, और नैतिक मूल्यों में उठापटक चल रही थी। यह इन्हीं द्वंदों का नतीजा था कि अंग्रेजों के आधुनिक शैक्षणिक संस्थानों में पढे कुछ लोगों ने बंगाल के समाज में सुधारवादी बहस को जन्म दिया। मूल रूप से "बाबू" उन लोगों को कहा जाता था जो पश्चिमी ढंग की शिक्षा पाकर भारतीय मूल्यों को हिकारत की दृष्टि से देखते थे और खुद को ज्यादा से ज्याद पश्चिमी रंग ढंग में ढालने की कोशिश करते थे। लेकिन लाख कोशिशों के बावज़ूद जब अंग्रेजों के बीच जब उनकी अस्वीकार्यता बनी रही तो बाद में इसके सकारत्म परिणाम भी आये, इसी वर्ग के कुछ लोगो ने नयी बहसों की शुरुआत की जो बंगाल के पुनर्जागरण के नाम से जाना जाता है। इसके तहत बंगाल में सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक सुधार के बहुत से अभिनव प्रयास हुये और बांग्ला साहित्य ने नयी ऊँचाइयों को छुआ जिसको बहुत तेजी से अन्य भारतीय समुदायों ने भी अपनाया।

इसलिए बंगाली लोगों को आज भी बंगाली बाबू कहा जाता है.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बहुत बढिया और नवीन जानकारी दी आपने!!!!!

महफूज़ अली ने कहा…

आप सब लोगों का बहुत बहुत धन्यवाद..... इस लेख को पसंद करने के लिए....

बाबू शब्द पिता के लिए भी प्रयोग होता है..... अब क्यूंकि हम भारतीय बाबू शब्द को सम्मान की नज़र से देखते हैं..... तो यह शब्द हम बड़ों बूढों को इज्ज़त देने के लिए भी इअसका प्रयोग करने लगे.....फर्क बस इतना है की हमने बाबू के साथ जी भी जोड़ दिया वो बाबूजी हो गया..... अगर देखा जाए तो हम एक तरह से बेईज्ज़ती ही कर रहे हैं......

हमें बाबूजी नहीं बोलना चाहिए..... मतलब हम बेईज्ज़ती भी सम्मान के साथ कर रहे हैं..... दरसल यह बाबूजी भी नहीं था...... यह हमारी संस्कृति में बाउजी था..... जो आपक हरयाणा की संस्कृति में देखने को मिल जायेगा..... बाउजी आगे चल कर धीरे धीरे बाबूजी हो गया.....


ओमजी से पूरी तरह सहमत हूँ..... यह वही बाबू हैं जिन्होंने अंग्रेजों से वेस्टर्न शिक्षा ग्रहण की.... और अँगरेज़ उनको भी बाबू ही बोलते थे..... जिसको बंगाल के संस्कृति ने अपना लिया.... अब जब इंसान पढ़ लिखा लेता है.... तो दिमाग खुल जाता है ..... और बंगाली उस वक़्त अंग्रेजी शिक्षा के ज्यादा करीब थे..... लेकिन बंगालिओं ने अंग्रेजों से सीख के हम भारतियों को ज्ञान ही दिया..... इसलिए बंगाली लोग खुद को बाबू कहलाना पसंद करते थे...... क्यूंकि उनको भी लगता की ..... अँगरेज़ उन्हें प्यार से बाबू कह रहे हैं.....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

india today,hindustan times ...par tasweer aur uplabdhi dekhkar bahut khushi hui.......itni achhi jankari,jo hamen nahi thi,wah dene ke liye badhaai.....

Suman ने कहा…

nice

भूतनाथ ने कहा…

वो तो सब ठीक है महफूज़.....तुम्हारी जानकारी भी शुक्रिया....मगर ये तो बताओ तुम्हारी सूरत ऐसी कैसी हो गयी.....क्या किसी बन्दर ने काटा.....!!!!????[बुरा मत मानना....और मान भी जाओ तो क्या......मैं तो इत्ती दूर बैठा हूँ......]हा..हा...हा..हा..हा..हा...देखा ना....कैसा धत्ता बताया तुम्हें.....???

अनिल कान्त : ने कहा…

बाबू शब्द की उत्पत्ति सुनकर हंसने को मन करता है...गुरु आप तो छ गए इस ज्ञान को देकर

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत ही भयंकर जानकारी दे दी आपने तो……!!!!!

sarwatindia ने कहा…

क्या जानकारी दी है, तबीयत खुश क्या खुश्क हो गयी. मेरे एक बुजुर्ग दोस्त का शेर है:
राजवंशों की जड़ें गहरी हुईं
और हम खुश हैं कि रजवाड़े गये.
बबून को बाबू समझकर हम आज भी अपना कलेजा निकलने को तैयार रहते हैं.

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

बहुत खूब.. भई हम तो प्यार से लोगों को बाबू कहकर ही बुलाते हैं :)

हैपी ब्लॉगिंग

sandhya ने कहा…

oh ,ab samjh me aai or hamlog to aise hi khush ho rahe the.......

raj ने कहा…

good work....

M VERMA ने कहा…

बहुत खूब --
बाबू शब्द का विश्लेषण और उसमे छिपे हुए अर्थ को जानकर अज़ीब सा लगा. हम अक्सर इसे तो सम्मान देने के लिये प्रयोग करते थे. बाबू हम छोटे बच्चे के लिये भी प्रयोग करते थे. अब पता चला कि इसमे कितनी हिकारत भरी है.
बाबू शब्द का प्रयोग आज से बन्द

सतीश पंचम ने कहा…

बहुत रोचक जानकारी दी है। यहां मुंबई में नेहरू प्लेनेटोरियम के बगल में एक गोल बिल्डिंग है जिसमें इतिहास की समग्र जानकारी को पर्मानेंट प्रदर्शनी के तौर पर रखा है।

इस प्रदर्शनी को देखते हुए काफी अलग अलग किस्म की जानकारीयां मिलती है।

इसी प्रदर्शनी में इलाहाबाद की पहली कार( जाहिर है नेहरू परिवार की), महात्मा गांधी और हडप्पा मोहन जोदडो तक की चीजें विस्तार से बताई गई हैं।

रेल लाईनों के बारे में बताया गया है कि हर रियासत मं रेल पटरियों की चौडाई अलग थी क्योंकि हर राजा अपने को अलग किस्म का मानता था और रियासत की सीमा आते ही रेल बदली करनी पडती थी क्योंकि आगे पटरीयों की चौडाई अलग है और दूसरे तरह के रेल डिब्बे ही वहा तक ले जा सकते हैं :)


उन्ही में से एक जगह एक दरवाजा बनाया गया है जो कि किसी अंग्रेज के घर का है। घर से टंगे पोस्ट बॉक्स के बगल में एक और तख्ती लगी है जिस पर लिखा है - Dogs and Indians are not allowed.
इसी बात से पता चलता है कि अंग्रेज हमारे लिये कैसा व्यवहार रखते थे।

sadhana ने कहा…

bahut hi..... rochak jankari di hai aapne ...

rukhsar ने कहा…

Omg! very good info. sorry for late comment.

अजित वडनेरकर ने कहा…

बबून शब्द से बाबू की व्युत्पत्ति से मैं सहमत नहीं हूं।
कृपया यहां ज़रूर नज़र डालें।
http://shabdavali.blogspot.com/2009/09/blog-post_24.html

डा. अमर कुमार ने कहा…


इस बिन्दु पर तो मुझे भी लगता है कि,
अजित भाई की बात पर ग़ौर किया जाना चाहिये ..
इसका सज़रा फ़ारसी के बावस्ता में क्यों न तलाशा जाये ?

राजेंद्र अवस्थी. ने कहा…

बहुत खूब दुर्लभ जानकारी देने का शुक्रिया।

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