रविवार, 8 नवंबर 2009

काग़ज़ पर स्वीमिंग पूल .......



तरण-ताल  (Swimming-pool)

                                                                                                               लघु-कथा

नए खेल अधिकारी ने आज विभाग ज्वाइन करते ही पूरे खेल प्रांगण और विभाग का निरीक्षण किया, फिर चपरासी को सारी पुरानी फाइलें लाने का आदेश दिया.

चपरासी ने सारी फाइलें टेबल पर लाकर रख दिया. फाइलों को देखते हुए अधिकारी की नज़र ऐसी फाइल पर पडी जिसमें एक तरण-ताल का उल्लेख था, उक्त फाइल में उनके पूर्ववर्ती अधिकारी ने तरण-ताल बनवाने के लिए शासन से पचास लाख रुपये स्वीकृत कराये थे. 



उस फाइल में खेल प्रांगण में तरण-ताल के होने का उल्लेख था जिसका उदघाटन प्रदेश के खेल-मंत्री ने भी किया था.  नए अधिकारी ने पूरे खेल-प्रांगण का दोबारा निरीक्षण किया, परन्तु कहीं तरण-ताल नही दिखा, वापस ऑफिस पहुंचकर नए खेल अधिकारी ने तुंरत शासन को पत्र लिखा की जो तरण-ताल बनवाया गया था, उसमें पिछले दो महीने में दस लोग डूब कर मर गए हैं तथा जनता की बेहद मांग पर उक्त तरण-ताल को बन्द करना पड़ रहा है.  कृपया तरण-ताल को भरने के  लिए पचास लाख रुपये जल्द-से-जल्द स्वीकृत करें....


92 टिप्पणियाँ:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आश्चर्यजनक भी रोचक भी....
कल इसे चर्चा में लगा रहा हूँ।

M VERMA ने कहा…

जब स्विमिंग पूल मे कागज हो सकता है तो कागज मे स्विमिंग पूल क्यो नही. और फिर कमोबेश आपने तो वस्तुस्थिती ही बयान कर दिया.
त्रासदी ये है कि अब कोई भी त्रासदी, त्रासदी नही रही

Mithilesh dubey ने कहा…

भाई वाह क्या बात है। काफी रोचक लगा पढ़कर, और हैरानी भी हुई , मुझे लगा की पत्र इसलिए लिखा जा रहा कि यहाँ तरुण ताल के सारे पैसे हजम हो गये है। इनको हजम करने वालो के उपर कार्यवाई की जाये लेकिन जैसे ही कहानी के अन्तिम में पहुचा तो देखा, वह तरुण ताल जो कभी बना ही उसकी मरम्मत करवाने के लिए सरकार से और पचास लाख रुपये लिए जा रहे है, क्या बात है भाई, क्या जमाना आ गया है।

'अदा' ने कहा…

डॉ. महफूज़,
ये कहानी नहीं है ....
ऐसी हकीकत से हम दो-चार हो चुके हैं....तब जब मेरी माँ स्कूल इन्स्पेक्ट्रेस थीं....उन्होंने ३ कागजी स्कूल पकडे थे.....जो सिर्फ कागज़ पर ही थे.....
स्कूल की बिल्डिंग -----कागज़ पर
स्कूल में बच्चे ------कागज़ पर
बस हर महीने तनखा असली आती थी......
ऐसी दुरूह जगह पर स्कूल थे जहाँ जाना हर किसी के वश की बात भी नहीं थी.....
और कभी किसी ने सोचा भी नहीं था की कोई इंस्पेक्टर आ भी जाएगा निरिक्षण के लिए.....
इसलिए ऐसे कागजी पूल ज़रूर होंगे......कोई शक नहीं है मुझे....
अजी हजूर ! फिर एक बार.....बहुत रोचक....सार्थक......और सत्य को आईना दिखाती हुई रचना....
बधाई....

rashmi ravija ने कहा…

सारे हालात जानते हुए भी,हर बार ही ऐसा कुछ पढ़कर मन हैरत से भर जाता है..कहानी ही सही,पर हकीकत से उपजी हुयी ..पता नहीं कहाँ कहाँ और कितनी बार ऐसे किस्से हुए होंगे... अदा जी की टिपण्णी ने तो और भी कई राज़ बयाँ कर दिए....ऐसे कामो में हमारा दिमाग कितनी तेजी से दौड़ता है??ओलंपिक में ऐसी दिमाग की कोई दौड़ होती तो स्वर्ण पदक कहीं गया नहीं था

M VERMA ने कहा…

वैसे अगर ऊपर का चित्र कागज पर बने स्वीमिंग पूल का ही है तो बहुत खूबसूरत है

राजीव तनेजा ने कहा…

अरे वाह...आप तो व्यंग्य भी लिखते हैँ...
कोरी कल्पना नहीं...सच्चाई है ये
रिश्वत दे-दे नौकरियाँ पाई...उसी की भरपाई है ये

राजीव तनेजा ने कहा…

रेल पटरियों सी लम्बी अजगर मानिंद लपलपाती रिश्वतखोरी जेबें...

डस-डस बस यही कहती हैँ....और देवें...और देवें

सैयद | Syed ने कहा…

१०० में से ८० बेईमान, फिर भी मेरा देश महान !!

डॉ टी एस दराल ने कहा…

भई वाह,ये तो वही बात हो गयी की --
गड्ढा खोदो, गड्ढा भरो
रोज़गार दिलाने का ये भी एक तरीका है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

ऎसा काम सिर्फ़ ओर सिर्फ़ मेरे भारत महान मै ही हो सकता है..... ओर वो भी इस काग्रेस के राज मै, बहुत सुंदर मजेदार.

ρяєєтι ने कहा…

kya khub...
yahi hota raha, hota hai, hota hi rahenga agar -
"JAgo INDIA JAgo" nahi hua to.. warna hum kahte rah jaayenge MEra BHarat MAhaan...

संगीता पुरी ने कहा…

आपने व्‍यंग्‍य नहीं लिखा .. सरकार के न जाने कितने कार्यक्रम कागजों पर ही चल रहे हैं .. ये तो हकीकत है !!

अमृत पाल सिंह ने कहा…

रोचक है महफूज भाई। अच्छा है।

Arvind Mishra ने कहा…

सरकारी तंत्र की कार्य प्रणाली पर गहरा कटाक्ष !

Apoorv ने कहा…

सही बात है महफ़ूज़ भाई..और यह व्यंग्य नही है बल्कि हकीकत है..भारतीय ब्यूरोक्रे्सी और पॉलिटिक्स का सच..सूखे तरणताल मे भी न जाने कितने डूब जाते हैं यहाँ..बहुत खूब...

Anil Pusadkar ने कहा…

अच्छी और सच्ची पोस्ट।

Shefali Pande ने कहा…

ye kagaz me kashtee
ye kagaz me panee.....
naa jane kab tak chalegee
ye ajab see kahanee....

खुशदीप सहगल ने कहा…

ओह रे ताल मिले नदी के जल में
नदी मिले सागर में...
सागर मिले कौन से जल में...
कोई जाने न...
(मैं भ्रष्टाचार के जल की बात कर रहा हूं...)

जय हिंद...

शोभना चौरे ने कहा…

ye to sarkari kam hai
ab to kuch N.G.Oaur niji sansthano me
smaj seva ke nam par kagjo me hi kam hota hai jihe unhe srkar ko dikhakar aur sarkari madd leni hoti hai .
aapki ktha achhi lgi

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

नये नये और बढ़िया जानकारी भी आप समय समय पर प्रस्तुत करते रहते है..अब इसी बात को देखिए जानकारी भरा और काफ़ी मजेदार तथ्य पेश किए आपने..सरकारी लोगों की सरकारी कारनामे..बढ़िया प्रस्तुति महफूज़ जी बहुत बहुत आभार..

MANOJ KUMAR ने कहा…

यह आलेख नौकरशाही के यथार्थवादी क्रूर पाखण्ड का चेहरा सामने आता है।

shikha varshney ने कहा…

बात एकदम सही कही है आपने ..पर सरकारी महकमों का ये हाल आज से नहीं हमेशा से है हमारे देश में. जैसा की अदा जी ने कहा ..हमारा अनुभव भी कुछ ऐसा ही है ...कितने ही गाँव में पानी के नल लगवाने के लिए लाखों रूपया लिया जाता है और वहां नल तो क्या पाइप line तक नहीं होती पर हाँ कागजों पर पर वे गाँव विकसित हो जाते हैं....एक जागरूक करने वाला व्यंग लिखा है आपने बहुत बधाई.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

अच्छी तस्कीर उकेरी है

आपने-भ्रस्टाचार के फैलाव की |

शुक्रिया ...

अर्कजेश ने कहा…

Allow me a place to stand and I will lift the earth.

- Archirmedes

Vinay Prajapati 'Nazar' ने कहा…

क्या कहें, अभी यही नियति होगी, और आप कैसे हो?
---
चाँद, बादल और शाम

रश्मि प्रभा... ने कहा…

hahaha....ye sachchi ghatna hai, yaad dilakar hansa diya

'अदा' ने कहा…

बैठे-बैठे एक और वाक्या याद आया है.....भ्रष्टाचार का ...
सबने चारा-घोटाला सुना ही होगा....उन दिनों....गायों और भैसों का वितरण किया जा रहा था ...निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए...लालू प्रसाद यादव की यह एक महत्वकांक्षी योजना थी यह......हजारों गायों और भैसों का वितरण कागज़ पर हुआ और उससे भी बड़ी बात......
वो गायें और भैसें स्कूटर के पीछे बैठ कर गयीं थी .....क्यूंकि जिस वाहन में उन्हें पहुँचाया गया था .....वो नंबर स्कूटर का था .....हा हा हा हा

'अदा' ने कहा…

बैठे-बैठे एक और वाक्या याद आया है.....भ्रष्टाचार का ...
सबने चारा-घोटाला सुना ही होगा....उन दिनों....गायों और भैसों का वितरण किया जा रहा था ...निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए...लालू प्रसाद यादव की यह एक महत्वकांक्षी योजना थी यह......हजारों गायों और भैसों का वितरण कागज़ पर हुआ और उससे भी बड़ी बात......
वो गायें और भैसें स्कूटर के पीछे बैठ कर गयीं थी .....क्यूंकि जिस वाहन में उन्हें पहुँचाया गया था .....वो नंबर स्कूटर का था .....हा हा हा हा

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

यहाँ भारत में अधिकतर सरकारी काम ऎसे ही होते हैं......सिर्फ कागजों में !!
हकीकत को बहुत अच्छे से व्यंगात्मक लहजे में पेश किया आपने......

Dipak 'Mashal' ने कहा…

Achambhit karne wali laghukatha likh daali bhai ji aaj to... beshaq ek stareeya rachna jo kam shabdon me hi bhrashtachaariyon ke kapde chura ke aa gayee..
Jai Hind...

वाणी गीत ने कहा…

कागज के स्विमिंग पूल का पानी भी तो कागजी नोटों से कागज पर ही भरेगा ...
इस बार आपकी ईमेल नहीं मिली मुझे ..शिकायत दर्ज की जाए ...!!

RAJ SINH ने कहा…

bhayee bahatee ganga ko bhathva dene vala desh hai yah . taran tal kya cheez hai?

aaj pahlee bar aapke yahaan aaya aur aanandit hoon .

Suman ने कहा…

nice

Babli ने कहा…

अरे वाह ! ये तो बहुत ही रोचक और आश्चर्यजनक बात है! सुंदर आलेख है !

M.A.Sharma "सेहर" ने कहा…

Soooooooooo true...interestin !!! afssos par sach bhee to yahee hai..!!

well penned up !!

जी.के. अवधिया ने कहा…

उस खेल अधिकारी को दस आदमी डुबाने के पहले तरणताल की साफ-सफाई के लिये भी सैंक्शन लेना चाहिये था। बेचारे से थोड़ी चूक हो गई!

POTPOURRI ने कहा…

ye jo aapne racha hai ye koi khaas nahi hai ye to ab aam baat ban gayi hai aur jaldi hi hamara desh bhastachar ki suchi mein sab desho ko peeche chodkar #1 hoga!!!:(

POTPOURRI ने कहा…

There is one correction in my comment plz read bhastachar as Brshthachar=corruption.ThanQ

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

ऐसा नजारा लगभग हर विभाग मैं देखने को मिलता है |

विडम्बना ये है की ... अब इसे आम बात मान ली गई है |

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) ने कहा…

Nice

Happy Blogging

sada ने कहा…

बहुत ही रोचकता से आपने कम सत्‍यता को उजागर किया । आभार ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अपने देश में ऐसा होना कोई हैरानी वाली बात नहीं है ......... हां स्विमिंग पूल नया सुना है ......... अब तक सड़कें ....... नहरें वगेरह तो सुनते थे .......... बन गयीं ......... टूट गयीं......... रिपेयेर के लिए पैसा भी उठा लिया कितनी कितनी बार ...... अब स्विमिंग पूल बना है तो उअको बंद तो होना ही है ......

sangeeta ने कहा…

बहुत खूबसूरती से भ्रष्टाचार का उल्लेख किया है
अब ऐसी घटनाएँ चौंकाती नहीं हैं.. बस
सोचने पर मजबूर करती हैं कि सरकारी विभाग
में कार्यरत कितना और सोच सकते हैं...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

इटस हैपेन ओनली इन इंडिया।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

sanjay vyas ने कहा…

सच्चाई को अपने अंदाज़ में सामने लाती अच्छी रचना.

Murari Pareek ने कहा…

वाह !!! एक ने नहीं बनवा के बनाया और दुसरा नहीं भर के भर रहा है!! बहुत सूझ बुझ वाली कथा है महफूज भाई !! उम्दा !!!

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

हा-हा-हा,.... मेरा भारत महान !! धन्य है लोकतंत्र, और ये जो आपने लिखा है यह महज कोई कोरी बात नहीं , ऐसी बहुत सी सच्चाइया मौजूद है !

Rajey Sha ने कहा…

हकीकत है जी।

संजय बेंगाणी ने कहा…

बहुत पहले एक व्यंग्य पुस्तक पढ़ी थी. सोवियत संघ की थी. उसमें तरण ताल पर ऐसा ही व्यंग्य था. पूल तो था ही नहीं हाँ डूबने से बचाने वाला अधिकारी जरूर था, जो लोगो को बचा कर ईनाम पाता था. :)

Ravi Srivastava ने कहा…

महफूज भाई, इस छोटी सी कहानी में तो आप ने राजनीति और प्रशाशन में व्याप्त भ्रष्टाचार की तरफ बड़ी ही मजबूती से इशारा किया है. आभार

प्रबल प्रताप सिंह् ने कहा…

बहुत कम शब्दों में भाईजान आपने राजनीति और प्रशासन में व्याप्त भ्रस्टाचार के सच को कलमबद्ध किया है.
साधुवाद...!!
शुभेच्छु

प्रबल प्रताप सिंह

कानपुर - 208005
उत्तर प्रदेश, भारत

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Harkirat Haqeer ने कहा…

वाह.... कविताओं के साथ-साथ एक शानदार लघु कथा ......बहुत खूब ....!!

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

aksharshah satya hai...

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर मजेदार.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुंदर मजेदार.

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सूझ बुझ वाली कथा है

Amit K Sagar ने कहा…

व्यंग ढीला सा रहा.
जारी रहें.
--

महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सुंदर और करारा व्यंग.:)

रामराम.

ओम आर्य ने कहा…

बेहद रोचक लगा आपका यह पोस्ट .....अतिसुन्दर.......हर एक क्षेत्र के योद्धा हो बन्धुवर!

अल्पना वर्मा ने कहा…

Afsos janak hai magar
koi aschry nahin hai..aisa hona ab to common ho gaya hai..

sirf ek kahani nahin yah sachchaayee hai.

सुनीता शानू ने कहा…

भाई महफ़ूज अली,जो लिखा वह सच है इसमे कोई संशय नही। मुबारक हो आप बहुत अच्छा लिखते हैं सदा सभी के दिलो को अपनी लेखनी से जीतते रहें यही दुआ करते हैं।

Meenu Khare ने कहा…

बेहतरीन लघु कथा. पहली बार ही इतना अच्छा प्रयास है, बधाई.

शबनम खान ने कहा…

ye to bhrashtachar ki ek bangi bhar ha...iski jitni gehrayi me jaoge aise n jane kitne kadve sach ubhar kar ayenge...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

महफ़ूज़ भाई, असलियत यही है. आज पता नहीं कितनी योजनायें केवल कागज़ों पर ही चल रही हैं. बहुत शानदार लघुकथा. बधाई.

satish kundan ने कहा…

aapne afsarsahi ki bas ek bangi bhar pes ki hai..aur n jane kya kya hota hai..

Devendra ने कहा…

करारा व्यंग्य!
...बधाई

सुलभ सतरंगी ने कहा…

बाबूजी ने पैसे दिए थे, जा बेटा सेब खा लेना. बेटे ने पैसे बचाई और इमली खाई.
जब पेट दर्द हुआ तो बाबूजी ने ही अस्पताल में इलाज कराई.

सरकार ही माई-बाप है. जितना लूट सको लूट लो.

वन्दना ने कहा…

ek behad katu sachchayi ko thode shabdon mein hi aapne ujagar kar diya...............aaj yahi halat hain har jagah. ........jo hota hai sirf kagzon par hi aur paisa doobta hai aam janta ka.behtreen likha hai.isse bada tamacha aur kya hoga prashasan ke moonh par..........waah re gandhi ke desh..........MERA DESH MAHAAN isiliye to hai.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

देश महान यूँ ही बनाते हैं कागज़ पर किस्से :)

Udan Tashtari ने कहा…

भ्रष्टता का चरम...कथा के माध्यम से उजागर किया. उम्दा प्रयास.

Nirmla Kapila ने कहा…

बिलकुल सटीक रचना है और आज का सच। शायद इतने दिनो मे मैने बहुत सी रचनाओंो पढ नहीं सकी फिर कभी आती हूँ बधाई इस रचना के लिये

sadhana ने कहा…

bilkul sahi kaha aapne ...aaj ki tarikh me kai aise sarkari daftar hai, jaha pe sirf kagz pe hi kam ho raha hai .....or usake paise bhi utha rahe hai ...bahut hi achha likha hai .....sach ka samna

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

वाह भई वाह......सुन्दर और समकालीन यथार्थ को प्रस्तुत करती रचना....

Dr. kavita 'kiran' (poetess) ने कहा…

बहुत सच्चा लिखा है महफूज़ साहिब!इस देश में ऐसी बातें अब आम हैं.ये सब सुनकर अचम्भा नहीं होता अब.सच को रेखांकित करने के लिए आपकी कलम को बधाई.

pragya pandey ने कहा…

महफूज़ जी ..

तरन ताल फिर पेपर पर ही बनेगा फिर लोग डूबेंगे और एक दिन पूरा देश ही उसमें डूबेगा

गौतम राजरिशी ने कहा…

एक सशक्त लघु-कथा !

अमृत पाल सिंह ने कहा…

mhfooj ji kabhi hamare blog ki taraf bhi nazre utha liya karo

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

वास्तविकता तो यही है ।

sandhyagupta ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
sandhyagupta ने कहा…

Kagaj ke swimming pool me adhikariyon ko tairte dekha ! Is anuthe kartab ke liye we 'badhai' ke patr hain !!!

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

behatreen aur umda bhee....

*KHUSHI* ने कहा…

bahetareen....!!! kuch alag hi likha hain aapne..

गिरिजेश राव ने कहा…

कमाल है किसी को सिंचाई विभाग याद नहीं आया!
जनता वाकई कृषि से विमुख हो रही है ;)

रंजना ने कहा…

Waaaaaaaaaahhhhhh !!! KARARA !!! Lajawaab !!! Ye to haal hai hamare desh ka aur sarkari kaam kaaj ka.....

Satya.... a vagrant ने कहा…

YEH KAHANI SATYA GHATNAO PER ADHARIT HAI. KRIPYA ISKE ADI HO JAYEN .
SATYA VACHAN

tejaswini ने कहा…

bahut achha likha hai / sarkari kaam aise hi hote hain /

tejaswini ने कहा…

aap kavita kab likheinge ?

Simply Poet ने कहा…

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शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत बढ़िया ..........सच में कागजो में अपना देश बहुत आगे है बाकी रही बात सच्चाई कि तो कहे मुँह खुलवा रहे हो भाई !!!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाह... अच्छा व्यंग्य किया आपने बधाई.....

शरद कोकास ने कहा…

चपरासी ने सारी फाइलें टेबल पर लाकर रख दिया.
रख दिया नहीं "रख दीं " होना चाहिये । लघुकथा के लिये नये विषय ढूंढो । यह विषय पुराना है । गाँवो मे ऐसे कई तालाब कागज़ पर ही खुदते हैं । अखबारो मे आये दिन छपता रहता है ।

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