शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

BOLD अत्याधुनिक नारी.....: एक लघुकथा.....





तृप्ति ने शादी से पहले अपने होने वाले पति से पूछा ............ 'क्या तुम वर्जिन हो'? 


शायद अटपटा लगा था संदीप को यह सुनकर, पर जल्द ही संभलकर बोला। 


"......और तुम.......?" अबकी सवाल उसने दागा...........


जवाब बोल्ड था...............






खुलेपन ने संवाद को तो विस्तार दे दिया, पर मन् और दिमाग के किसी कोने में विश्वास की खिड़की फिर भी न खुल सकी। 





(प्रस्तुत लघुकथा सत्य घटना पर आधारित है....)

87 टिप्पणियाँ:

निर्मला कपिला ने कहा…

bahut achhe racanaa hai sahee kahaa keval dikhave ke liye hi ham adhun nik kahalate hain magar dil se 50 varsh peechhe chalate hain badhai

shikha varshney ने कहा…

hmm.........sirf adhunik dikhne se koi adhunik nahi ho jata...satya hai.

अबयज़ ख़ान ने कहा…

Behtreen hai... Ham har baar Zamane ko Badalte hain.. Lekin Khud Kab Badlenge pata nahi..

डॉ टी एस दराल ने कहा…

सब मिथ्या है।
इसीलिए आजकल शान्ति लुप्त है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत बढ़िया!
ईंट का जवाब पत्थर से!
"शठे साट्ठयम् समाचरेत्"

चंदन कुमार झा ने कहा…

सत्य को उदघाटित करती रचना । बहुत सुन्दर भैया !!!!

Suman ने कहा…

nice

Shilpa ने कहा…

Please excuse my ignorance, but i am not being able to get this story right. So the boy wasn't a virgin or the girl wasn't virgin?


shilpa

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

नये नये ट्रेंड है लोगों के प्रश्न और उत्तर में भी नये जमाने के साहस परिलक्षित होते है..बड़े साहस की बात है संदीप को भले बहुत अच्छा लगा होगा तृप्ति के इस बोल्ड जवाब पर परंतु आगे इसे अपनाना शायद मुश्किल ही होगा..पर फिर भी हम कुछ नही कह सकते भाई लोगो के अपने अपने तरीके है देखने के सोचने के और समझने के...

बढ़िया सत्य कथा..अच्छी लगी बदलते दौर की एक बढ़िया कहानी सुनकर..धन्यवाद भाई..

Arvind Mishra ने कहा…

मगर बोल्ड क्या -क्लीन बोल्ड ?

Arvind Mishra ने कहा…

मगर बोल्ड क्या -क्लीन बोल्ड ?

Kusum Thakur ने कहा…

अच्छी रचना , बधाई !

M VERMA ने कहा…

बोल्ड्नेस जब बोल्ड्नेस के साथ स्वीकार किया जाये तो --

आधुनिक दिखने वाला आधुनिक हो जरूरी तो नहीं

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

बोल्डनेस ने तो धरती ही हीला रखी है

राज भाटिय़ा ने कहा…

अब हम क्या कहे? बस :) यानि सही जबाब

'अदा' ने कहा…

अरे महफूज बाबू,
हम बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलती है ...इसलिए हम कुछ नहीं बोलेंगे.. !!!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

विश्वास की खिड़की खुलेगी कैसे ! वो बन्द हुई तो ही तो ये बोल्डनेस आयी !

बेहतरीन लघुकथा । आभार

अर्कजेश ने कहा…

महफूज भाई इस सीन में प्रश्‍न ही पर्याप्‍त है गुड गोबर करने के लिए । उत्‍तर कुछ खास महत्‍व नहीं रखता ।
और रही बात आधुनिक होने की तो यदि वस्‍तु‍त: एडवांस होंगे लोग तो ऐसे प्रशन ही नहीं उठाये जायेंगे ।

हिमांशु जी ने बिल्‍कुल सटीक कहा है ।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

अच्छा है ऐसा सवाल जो बोल्ड कर रहा है ...
नहीं तो यहाँ सब सह्बाग की तरह सेंचुरी लगाते
हैं सब ...

PD ने कहा…

तभी कहा गया है - हर चेहरे में दस चेहरे हैं, जिसे देखो हजार बार देखो..

sangeeta ने कहा…

इस कहानी को पढ़ कर एक बात मन में उठी...

विश्वास शायद पहले से ही नहीं था....इसीलिए ये प्रश्न किया गया.
और जब उत्तर मनमाफिक नहीं मिला तो पुरुष का अहम् यानी कि संदीप (नायक ) को कहीं मर्माहत कर गया.

ज़माना बदल रहा है ,सोच भी बदल रही है...लेकिन अभी भी भारतीय सोच इतनी नहीं बदली है कि ऐसी आधुनिकता को
सहजता से स्वीकार किया जाये..

कहानी सोचने पर मजबूर करती है... अच्छी प्रस्तुति है.

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' ने कहा…

jis tareeke se aapane likhaa use hee
saahity kahaten hain pragatishelon men yahee kameen hai

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छी रचना। बधाई।

cmpershad ने कहा…

यही तो होता है जब अधिक बोल्ड बनने की छद्मकोशिश की जाती है। मैंने भी ऐसे हादसे होते देखे हैं जब हकीकत जानने के बाद नौबत तलाक तक चली गई॥

indu puri ने कहा…

ये विश्वास की खिड़की फिर भी नही खुली , जानते हो क्यों?
औरत और समाज दोनों पुरुष के शादी से पहले या बाद के
सम्बन्धो को रो कर या हँस कर स्वीकार लेता है.
क्या एक औरत के लिए itne बड़े दिल गुर्दे हैं उसी समाज और पुरुष के पास .
नही हैं, किसी स्थिति मे वो 'तृप्ति ' की स्वीकृति को माफ़ नही करता.(यदि ऐसा कुछ था तो....)जीवन भर अपने किये की सजा जरुर उसे भुगतनी पडती,वो गलती चाहे उसने की हो या उसके साथ की गई हो जिसे उस लडकी की आधुनिकता ,बोल्डनेस नाम दिया जा रहा है,
वो तब मानी जाती जब वो स्वीकार कर लेती .......
बोल्डनेस तो नायक की मानी जाती जब वो ये कहता 'जो हुआ, छोडो, अब हम एक दुसरे के प्रति इमानदार रहेंगे.'
हम इन्सान है ...भूल हो जाती है,तुमने की तो भी भूल थी मैंने की तो भी..,समाज के कुछ नियम बड़े सुंदर बने हुए हैं,हमे मानना था ...पर ..एक नई शुरुआत करें '' .

अमृत पाल सिंह ने कहा…

संदीप की जगह प्रश्न तृप्ति को पूछना चाहिये था। क्योंकि लडकियों के मुक़ाबले लडके कम वर्जिन होते हैं। ऐसे में आपने वर्जिन होने का जो counter question तृप्ति का तरफ दागा था उसमें पुरूषों को ही ऊँचा रख दिया।
कोई अच्छी रचना नहीं है। वर्जिनिटी के बारे में चिन्ता छोडिये। अपनी अपनी वर्जिनिटि की रक्षा सब कर लेंगे।

राजीव तनेजा ने कहा…

जैसे को तैसा मिला...

इतने कम शब्दों में इतनी बढिया लघु कथा...भय्यी वाह!...मज़ा आ गया

rashmi ravija ने कहा…

हम्म...उम्मीद है इस माईक्रो कथा ने बहुत सारे दिमाग की खिड़कियाँ ही नहीं खोली होंगी...अन्दर लगे जाले भी साफ़ कर दिए होंगे.

बी एस पाबला ने कहा…

तभी पूरी पोस्ट बोल्ड में लिखी हुई है

बी एस पाबला

शबनम खान ने कहा…

समझ नहीं आई...

खुशदीप सहगल ने कहा…

जहां सवाल होते हैं वहां विश्वास नहीं होता और जहां विश्वास होता है वहां सवाल
नहीं होते...

जय हिंद...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

सिर्फ चन्द वाक्यों की इस लघुकथा नें बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया.....

Udan Tashtari ने कहा…

आजाद ख्याली

अभी इतनी भी

आजाद नहीं....


बहुत कुछ सोचना होगा उस बोल्ड मार्का को अन्तःमन पर लगाने के पहले...

बेहतरीन लघुकथा!!

Dr.Aditya Kumar ने कहा…

बदलते परिवेश को दर्शाती सटीक लघुकथा. स्वयं राम जैसा चरित्र अपनाये बिना सीता जैसी चरित्र वाली पत्नी की कामना कैसे की जा सकती है ?

वाणी गीत ने कहा…

क्षद्म आधुनिकता पर करारा व्यंग्य करती यह लघु कथा ...महफूज़ भाई का ये रूप मेरे लिए नया है ...बना रहे ....शुभकामनायें ...!!

Devendra ने कहा…

प्रौढ़ के लिए भले ही ऐसे संवाद रोमांचित करने वाले हों लेकिन आज के युवाओं के लिए यह आम बात है। इससे नए बनने वाले घर में विश्वास की खिड़की मजबूत ही होती है। शुरूवात सच से हो यह तो अच्छी बात है।
-जंग लगे विचारों को धार देने के लिए बधाई।

जी.के. अवधिया ने कहा…

आज के जमाने में भी विश्वास नाम की चिड़िया होती है क्या?

Vivek Rastogi ने कहा…

पर ये बोल्ड का रंग लाल क्यों है ?

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

महफूज भाई, एक पक्ष इस गूढ़ बात का यह भी हम कह सकते है कि आज सभ्यता के शिखर पर चड़ी हमारी संस्कृति यहाँ तक पहुँच गई है !

गिरिजेश राव ने कहा…

अब देखो न भैया, बहुत लोगों को समझ में ही नहीं आई।
ऐसा क्यों लिखते हो भाई ;)

sada ने कहा…

बहुत ही कम शब्‍दों में व्‍यक्‍त यह सत्‍य कथा एक दूसरे का नजरिया, प्रस्‍तुति अनुपम ।

SHAKTI PRAJAPATI ने कहा…

its nic to see a poetic touch in a story n more immpressive when it is a short story,GAGAR MAIN SAGAR,u r fullfilling that,keep it up,i hope one day i have an honour to meet u.

Meenu Khare ने कहा…

बहुत ही अच्छी सशक्त लघु-कथा लिखी है महफ़ूज़ जी.कथ्य और कथन दोनो ही मन के साथ दिमाग को भी उद्वेलित करते हैं.

अनिल कान्त : ने कहा…

हम चाहे वो स्त्री हों या पुरुष दूसरे व्यक्ति से भले होने की आशा कैसे लगा सकते हैं जबकि हम स्वंय पापमुक्त ना हों.

यहाँ पाप मुक्त होने का मतलब सिर्फ़ 'वर्जिनिटी' से नहीं है.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

महफूज भाई कहीं ये आपकी अपनी घटना तो नहीं?

------------------
अदभुत है मानव शरीर।
गोमुख नहीं रहेगा, तो गंगा कहाँ बचेगी ?

वन्दना ने कहा…

man ki khidkiyan ab bhi band hi hain , soch ke darwazon par aaj bhi aadam ke zamane ka jung laga huaa hai to phir kahan ki boldness aur kahan ki adhunikta?

Dipti ने कहा…

आपकी रचना और उस आई प्रतिक्रियाएं पढ़कर लगाकि पढ़ने-लिखनेवाला तबका भी ऐसी बातों का हौव्वा बना सकता हैं। लगता है कि आपकी कहानी के पात्रों को सच बोलनेवाले जीवनसाथी नहीं बल्कि झूठ लबादा ओढ़े साथी चाहिए नहीं तो सच सुनकर विश्वास टूटता नहीं बल्कि बढ़ता कि कुछ भी हो इंसान कमसेकम सच्चा है। आखिर में सिर्फ़ इतना कि वर्ज़िनिटी खोना या शारीरिक संबंध रखना हमेशा ग़लत नहीं तरीक़े से हो या ग़लत ही हो ज़रूरी नहीं।

ज्योति सिंह ने कहा…

nirmala ji ke vichar bahut hi umda hai ,hum kitne hi aage nikal jaaye magar thode bahut ansh me kahi na kahi apni sanskriti je jude huye paaye jaate hai .humare ek sawal kai baar kai sawal khada kar dete hai .jahan bolti band ho jaati hai aese me bina soche kuchh kahna uchit nahi ,chahe wah varg koi bhi ho ,kyonki bhavnaye sabhi ki ek hi hai .

Jyoti Verma ने कहा…

kya kahe?
kahin na kahin hum bahut pichhade hai. khair....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

aadhuniktaa ki baaten aur apni zindagi me use sweekarna ......sahaj nahi

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत बढ़िया!
ईंट का जवाब पत्थर से!

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत बढ़िया!
ईंट का जवाब पत्थर से!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कुछ ही लाइनों में कही कहानी पर गहरे सत्य को खोलती ...... बहुत ही लाजवाब ........

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

शायद सवाल ही बेमानी सा है. फ़िर भी समझ अपनी अपनी!

रामराम.

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

महफूज़ भाई ने जब भी लघुकथा लिखी है..बस कहर ही गिरा दिया है....

"जवाब बोल्ड था.."
ओह...पर एक बात कहना चाहता हूँ..स्वीकृति दर स्वीकृति की ईमानदार आवृति के बाद एक maturity पर विश्वास आने भी लगना चाहिए..ये अब दिखने लगा है..खासकर जब दो कामकाजी सम्बन्ध रखते हैं..और यदि सफल रहते हैं..वैसे यह निश्चित ही rare है ...!!! बेहतरीन लिखा है..महफूज़ भाई..!

Pandit Kishore Ji ने कहा…

behatrin aapka jawaab nahi sach me behad bold

अजय कुमार झा ने कहा…

गुगली, बीमर , बाऊंसर, स्पिन, ..........यार था क्या ये.......एक साथ छ की छ की गिल्लियां साफ़ .....दोनों तरफ़ की.......इसे कहते हैं क्लीन बोल्ड ....नहीं नहीं यार क्लीन स्वीप ......

प्रबल प्रताप सिंह् ने कहा…

bahut bullet rachna hai bhaijaan.

स्वप्नदर्शी ने कहा…

"आपकी रचना और उस आई प्रतिक्रियाएं पढ़कर लगाकि पढ़ने-लिखनेवाला तबका भी ऐसी बातों का हौव्वा बना सकता हैं। लगता है कि आपकी कहानी के पात्रों को सच बोलनेवाले जीवनसाथी नहीं बल्कि झूठ लबादा ओढ़े साथी चाहिए नहीं तो सच सुनकर विश्वास टूटता नहीं बल्कि बढ़ता कि कुछ भी हो इंसान कमसेकम सच्चा है। आखिर में सिर्फ़ इतना कि वर्ज़िनिटी खोना या शारीरिक संबंध रखना हमेशा ग़लत नहीं तरीक़े से हो या ग़लत ही हो ज़रूरी नहीं।"

I agree with Diptee

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

इसी थीम पर कभी एक कहानी पढी थी। ये भी कम शब्दों में खूब रही।

हास्यफुहार ने कहा…

good.

अम्बरीश अम्बुज ने कहा…

pass... next par aate hain... bahut pending pada hua hai....

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

Jai ho......

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

हाथी के दांत ,
दीखाने के और चबाने के अलग अलग -
ये कहावत याद आयी

tulsibhai ने कहा…

" gaherai bahri baat ko kum alfaz me prastut kiya hai .aapko dher saari badhai "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

tulsibhai ने कहा…

" gaherai bahri baat ko kum alfaz me prastut kiya hai .aapko dher saari badhai "

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शरद कोकास ने कहा…

देखा असर !

RAJ SINH ने कहा…

बरखुरदार कहानी अच्छी तो लगी लेकिन अधूरी :) .
आगे और जोड़ देते ,
दोनों एक साथ :
चलो अब काम आसन हो गया :):):)

Murari Pareek ने कहा…

ab aage aage dekhiye hotaa hai kyaa !! aage kaa haal bhi batate rahiyega!!!

Dr. kavita 'kiran' (poetess) ने कहा…

आधुनिक होने और दिखने में बहुत फर्क होता हैं .

Babli ने कहा…

बहुत सुंदर लगा आपका ये पोस्ट जो बिल्कुल अलग सा लगा! सत्य को आपने बड़े ही सुन्दरता से शब्दों में पिरोया है!

डॉ.पदमजा शर्मा ने कहा…

महफूज जी
बदलते दौर को आईना दिखाती लघु कथा है . इतने कम शब्दों में इस से अच्छी रचना मिलना मुश्किल है .
आप मेरे सृजन में साथ हुए हैं .बहुत शुक्रिया .

पंकज ने कहा…

सब अपने अपने झूठ को बचा कर रखना चाहते हैं, जब कभी सच बोलने की शर्त आये तो खिड़कियां बंद.

sanjay vyas ने कहा…

अक्सर ये सवाल पहले आदमी पूछता है.यहाँ क्रम का बदलाव भी कुछ कहता है.

शहरोज़ ने कहा…

bilkul haqeeqat!

Pratik Maheshwari ने कहा…

लघु कथा.. पर सटीक और सत्य...

आभार..

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ ने कहा…

यह रचना वाकई "रचना" की भी बाप है.... बहुत ही सुन्दर!!!

रचना दीक्षित ने कहा…

वाह महफूज़ भाई गड़बड़ तो आपने पहले ही कर दी एक बर्र के छत्ते में हाथ डाल कर। अरे भाई अगर आप संस्कारों में पले बढे थे तो इस छूत की बीमारी से दूर ही रहना था
भाई राखी सावंत और मल्लिका सहरावत के देश में और क्या उम्मीद रखेंगे। पर ये बात अब पक्की समझें की पुरुषों को अब कमर कस लेनी चाहिए आगे इससे भी मुश्किल सवालों का जवाब देने के लिए। ये तो जनाब जोर का झटका बहुत जोरों से लगा । धन्यवाद सारा दिन सोचने के कुछ मिल गया । अरे हाँ इसके आगे क्या हुआ ....... ?

महाशक्ति ने कहा…

खुले विचारो के दौर मे अब तो सिर्फ नंगई का ही जमाना रह गया है।

राधे राधे

singhsdm ने कहा…

वसीम बरेलवी की एक ग़ज़ल का एक मिश्रा है की "बहु बेबाक आँखों में कोई रिश्ता नहीं रहता"
बात बिलकुल खरी है.........ब्लॉग पर इस तरह का लेकहं पहली बार देखा.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बदलते वक़्त की बात लिखी है आपने ..

Rakesh Singh - राकेश सिंह ने कहा…

मन की गांठें ऐसे bold भर बन जाने से नहीं खुला करती | सुन्दर लघु कथा |

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

महफूज़ जी ,
क्या कहूँ ....भावनाओं को जब चोट लगती है तो इस तरह के ख्याल आ जाते हैं ....जहां तक वर्जिन का सवाल है आज के आधुनिक युग में शायद ही कोई मिले .....बस विवाह या दोस्ती की गाड़ी सच्चाई और विश्वास पर ही चल सकती है अगर वो भी नहीं हैं तो अल्लाराखा .......!!

deri se aane ki kshmaa....!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

जहां विश्वास होता है वहां सवाल
नहीं होते.
अच्छी रचना.

चंदन कुमार झा ने कहा…

आपको सैल्युट भैया !!!!!

(अगली पोस्ट में टिप्पणी का आप्शन बंद अतः यहाँ लिखना पड़ा)

Dileepraaj Nagpal ने कहा…

Zayadatar Ladka Ye Prashan Pahle Poochta Hai...Khair Badlaaw To Samay Ki Maan Hai...

SHIVLOK ने कहा…

ये विश्वास की खिड़की फिर भी नही खुली , जानते हो क्यों?
औरत और समाज दोनों पुरुष के शादी से पहले या बाद के
सम्बन्धो को रो कर या हँस कर स्वीकार लेता है.
क्या एक औरत के लिए itne बड़े दिल गुर्दे हैं उसी समाज और पुरुष के पास .
नही हैं, किसी स्थिति मे वो 'तृप्ति ' की स्वीकृति को माफ़ नही करता.(यदि ऐसा कुछ था तो....)जीवन भर अपने किये की सजा जरुर उसे भुगतनी पडती,वो गलती चाहे उसने की हो या उसके साथ की गई हो जिसे उस लडकी की आधुनिकता ,बोल्डनेस नाम दिया जा रहा है,
वो तब मानी जाती जब वो स्वीकार कर लेती .......
बोल्डनेस तो नायक की मानी जाती जब वो ये कहता 'जो हुआ, छोडो, अब हम एक दुसरे के प्रति इमानदार रहेंगे.'
हम इन्सान है ...भूल हो जाती है,तुमने की तो भी भूल थी मैंने की तो भी..,समाज के कुछ नियम बड़े सुंदर बने हुए हैं,हमे मानना था ...पर ..एक नई शुरुआत करें '' .


"जवाब बोल्ड था.."
ओह...पर एक बात कहना चाहता हूँ..स्वीकृति दर स्वीकृति की ईमानदार आवृति के बाद एक maturity पर विश्वास आने भी लगना चाहिए..ये अब दिखने लगा है..खासकर जब दो कामकाजी सम्बन्ध रखते हैं..और यदि सफल रहते हैं..वैसे यह निश्चित ही rare है ...!!! बेहतरीन लिखा है..महफूज़ भाई..!

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