रविवार, 9 सितंबर 2012

श्री. जैंगो जी की बरसी... जानवरों से गया बीता कोई ना रहा ... और डौगी स्टायल ऑफ़ हिंदी ब्लॉग्गिंग अवार्ड : महफूज़


कहा जाता है कि घर में हमेशा कोई जानवर पालना चाहिए... इससे घर की सारी बलाएँ दूर रहतीं हैं... हमारे बड़े बुजुर्गों ने कुछ चीज़ें तो अनुभव कर के ही कही होंगी.. 


यह हमारे सबसे प्यारे कुत्ते स्व. श्री जैंगो जी की हैं. आपकी यह तस्वीर तबकी है (ड्रिप चढ़ते हुए) जब आप बीमार हो कर हॉस्पिटल में एडमिट थे. आज आपकी तीसरी  डेथ ऐनीवर्सरी है.. ईश्वर आपकी आत्मा को स्वर्ग प्रदान करे. 

यह बहुत बड़े साहित्यकार और ब्लॉगर भी थे.. यह हिंदी ब्लॉग्गिंग भी करते थे.. और हिंदी ब्लौगरों की तरह ऐसे ऐसे अखबारों और मैगजीन्स (अजीब अजीब नामों वाले..जनसंदेश टाइम्स टाइप)  में छपते थे.. जिन्हें कोई जानता भी नहीं था.. और जिन्हें कोई कुत्ता भी नहीं पूछता था.. उन्हें जैंगो जी पूछते थे और फ़िर छप कर बहुत खुश भी होते थे. उन्हें बहुत जल्दी ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा "डौगी स्टायल" ऑफ़ हिंदी ब्लॉग्गिंग का अवार्ड दिया जाने वाला है. आपने हिंदी के लिए भी बहुत काम किया लेकिन कोई भी काम इसीलिए काम नहीं नहीं आया क्यूंकि आज भी लोग इतने वाहियात हैं कि अपने बच्चों को इंग्लिश ही बुलवाना और पढवाना चाहते हैं. श्री. जैंगो जी हिंदी दिवस मनाने के बहुत खिलाफ थे क्यूंकि आपका मानना था कि इतनी रिच भाषा का दिवस मानना अपमान है. आपने भी बहुत सारे स्ट्रग्लर्स की तरह हिंदी के लिए बहुत काम किया लेकिन हिंदी का विकास पिछले सत्तर सालों की तरह आज भी नहीं हो पाया. इससे आप बहुत आहत थे. स्व.श्री जैंगो जी कहते थे कि लोग हिंदी के लिए अपने हाथों में कंडोम पहन कर काम करते थे जिस वजह से कोई रिज़ल्ट नहीं निकलता था. आपका यही मानना था कि लोग फैमिली प्लैनिंग ख़ुद के लिए ना कर के हिंदी के लिए ज़्यादा करते हैं. फ़िर भी हम और हमारा एन.जी.ओ. श्री. जैंगो जी के बताये हुए निशान पर चल रहा है. उम्मीद है कि आगे चल कर कोई ना कोई रिज़ल्ट निकलेगा. इसी आशा के साथ आईये ज़रा अब मेरी कविता देखी जाए..

जानवरों से गया बीता कोई ना रहा 

ज़हरीले जानवरों की 
सभा हो रही थी.
आदमी को नष्ट करने का
बीज बो रही थी.... 
कि हमारा ज़हर 
आदमी में फ़ैल रहा है.
आदमी आदमी के जीवन से खेल रहा है.
इतने में 
सभा में एक आदमी आया
तो ज़हरीले जानवरों का हुज़ूम 
चिल्लाया....
जानवरों के सभापति ने 
उन्हें चुप करते हुए कहा
कि अब 
तुमसे गया बीता इस 
धरती पर
कोई नहीं रहा. 

(c) महफूज़ अली 

बुधवार, 25 जुलाई 2012

माँ का वजूद, मॉम..रश्मि प्रभा, क्यूँ लोग ख़ुद को किसी की भी ज़िन्दगी में अपना वजूद इम्पौरटेंट समझते हैं, ऐटीट्युड और जब शरीर से सम्बन्ध बाहर निकल जाते हैं : महफूज़


हर मर्द के ज़िन्दगी में माँ का होना बड़ा ज़रूरी होता है क्यूंकि एक माँ ही होती है जो बच्चे को समझती है. मेरी माँ कहतीं थीं  हमें जाहिलों के मुँह नहीं लगना चाहिए... यह सोचते और पढ़ते  कुछ और हैं और समझते कुछ और हैं... जाहिल आदमी बहस ज़्यादा करता है जबकि समझदार आदमी कन्फ्यूज़ रहता है.  माँ अगर बच्चे की पहली गलती है तो भी समझती है, दूसरी है तो भी समझती है , तीसरी है तो भी और यह सिलसिला पूरी ज़िन्दगी चलता रहता है. जब तक के बच्चा बूढा ना हो जाये. पता नहीं क्यूँ लोग ज़बरदस्ती गलतियां मनवाते है... और एक माँ होती है जो हर हर गलती को ढांकती है. पता नहीं क्यूँ लोग दोस्त होने का दम भरते हैं और एक माँ होती है जो हमेशा दोस्त ही रहती है. लोग भले ही पल में नकार दें लेकिन माँ किसी भी हालत में नहीं. माँ किसी भी हालात में पास ही रहती है.  अच्छा मेरे समझ में एक बात और नहीं आती कि क्यूँ लोग ख़ुद को किसी की भी ज़िन्दगी में अपना वजूद इम्पौरटेंट समझते हैं? मेरे ख्याल से माँ से बढ़कर शायद ही किसी और का वजूद ज़िन्दगी में मायने रखता है..  बाक़ी तो आते हैं और फ़िर जाते भी हैं.. फर्क तो माँ के ना रहने से पड़ता है... रश्मि प्रभा मॉम... मुझे बहुत ख़ुशी है कि आप मेरी ज़िन्दगी में माँ के रूप में आईं. 

आईये अब ज़रा कविता देखी जाए... बहुत साल पहले सिविल की तैयारी करते वक़्त .. एक काग़ज़ की दुकान से बड़े ऐ-2 साइज़ के पन्ने खरीदे थे.... सस्ते मिलते थे .... मैं और मेरा दोस्त इन्दर हम दोनों फ़िर उन ढेर सारे पन्नों को लेकर मोची के पास गए थे कि इन्हें चार पार्ट में काट कर सिल दो.. जिससे कि वो रफ कॉपी की शक्ल में आ जाएँ. मोची ने उनको सिलने से मना कर दिया था कि पाप चढ़ेगा. हमने उसे समझाया कि भाई किताब सिलने से पाप नहीं चढ़ेगा. किसी तरह माना वो और उसने सिल दिया.  उन दिनों पैसे नहीं होते थे और जो पैसे घरवालों से मांगते थे वो बाक़ी चीज़ों जैसे चाय, सिगरेट, गर्ल फ्रेंड, और प्रतियोगिता दर्पण.....सी.एस.आर...द हिन्दू... खरीदने में चले जाते थे. उन्ही काग़ज़ के बचे हुए पन्नों पर पिछले साल जब मैं हाईबरनेशन की ज़िंदगी किसी कारणवश गुज़ार रहा था तो काफी कवितायें लिखी थीं. उन्ही पन्नों से कविता निकाल कर उनके शब्दों को अपने ब्लॉग पर बिखेरता रहता हूँ.... 

अच्छा मेरे साथ एक बात और है कि मैं किसी को भी अपने पास तभी आने देता हूँ जब मैं चाहता हूँ. मैं अपनी मिस्ट्री जल्दी नहीं खोलता हूँ.. और लोग बिना मतलब में कन्फ्यूज़ रहते हैं. और मुझे किसी भी रिश्ते को जो मुझे दर्द दे रहा है.. फ़ौरन ख़त्म करने में देर नहीं लगाता. मेरे लिए कोई भी रिश्ता कभी भी मायने नहीं रखता सिवाय माँ का.. अगर मेरी माँ आज ज़िंदा होती.. तो मैं रोज़ उसके पैर धो कर .. फ़िर वही पानी पी कर अपने काम पर जाता... लोग पता नहीं क्यूँ गलत सोच लेते हैं? घमंड तो नहीं ...हाँ! ऐटीट्युड कह सकते हैं. मैं बहुत ही ऐटीट्युड वाला इन्सान हूँ.. इससे कोई क्या मेरे बारे में सोचता है मुझे फर्क कोई नहीं पड़ता.  मेरे लिए क्लास बहुत मायने रखता है. क्लास का मतलब पैसे से बिलकुल नहीं है. आजकल चार-पांच करोड़ रूपये तो हर किसी के घर में मिल जाते हैं. इसीलिए पैसे से बिलकुल नहीं है. क्लास बहुत ही डिफरेंट चीज़ होती है.. जो सिर्फ पर्सनैलिटी में झलक सकती है. सोशियो-सायको-अंडरस्टैंडिंग बिहेवियर भी कोई चीज़ होती है. लोग डिग्रियां तो ले लेते हैं लेकिन उन डिग्रीज़ को अपने अंदर ऐबजौर्ब नहीं कर पाते (एक मिनट ज़रा ऐबजौर्ब की हिंदी डिक्शनरी में देख कर आया..वी कॉन्वेंट बैक्ग्राउन्ड्स आर हैविंग ए लौट्स ऑफ़ प्रॉब्लम इन हिंदी ..यू नो..) हाँ! ऐबजौर्ब का मतलब आत्मसात करना होता है. तो डिग्रीज़ को अपने अंदर तक आत्मसात करना होता है. मैं भी कहाँ कविता की बात कर रहा था.. और कहाँ पहुँच गया.. आईये देखिये..कविता. मैं अपने हिंदी के गुरु अपने मित्र  के मामा जी और मेरे भी ... श्री. उपाध्याय जी का बहुत शुक्रगुज़ार हूँ. आप मुझे हिंदी की टुईशन (प्रोनन्सियेशन टुईशन है ... ट्यूशन नहीं होता) देते हैं. मेरी यह कविता हिंदी-इंग्लिश मिक्स्ड थी.. .....जिसे श्री. उपाध्याय जी ने हिंदी के शब्दों में ढाला है. 
(ऐटीट्युड तो आता ही है)

जब शरीर से सम्बन्ध बाहर निकल जाते हैं 

नामालूम वर्षों का वेग,
लहरों के भीतर के मरोड़,
सभी जिस्म से
काई की तरह निकल जाते हैं 
और सिर्फ निर्मल
और साफ़ जल रह जाता है. 
इसीलिए इस आदम खेल में 
आज भी आनंद बसा हुआ है.
शरीर से इगो निकल जाता है.
बस आदमी
और केवल औरत बच जाती है ,
सम्बन्ध 
वेग की शक्ल अख्तियार करता है,
और बह जाता है 
समूचे जिस्म में....
एक पल 
शरीर में ऐसा आकर ठहरता है
जब समूचे सम्बन्ध झरने के वेग में
जिस्म से बाहर निकल जाते हैं.
और वो एक पल 
पैर से लेकर सर तक 
फैल जाता है, 
आदमी, ताज़गी से भर जाता है 
जब शरीर से सम्बन्ध बाहर निकल जाते हैं 
तब 
असंबंधित मनुष्य 
बिलकुल खाली हो कर भी 
बहुत कुछ अपरिचित से भर जाता है.
यह भराव 
उसे ताज़ा बनाये रखता है 
और फ़िर धीरे धीरे 
वो फैला हुआ क्षण 
सिमटने लगता है 
और
सारा जिस्म
फ़िर पुराने संबंधों से भरने लगता है 
मगर वो भराव 
इन उलझे संबंधों को 
सुलझाने की नई ताकत देता है
और 
आदमी नये सिरे से 
जुझारू हो जाता है. 

(c) महफूज़ अली 
(मेरे घर में सब कहते हैं कि बुड्ढा लग रहा है बे ...वेट बहुत बढ़ गया था ..कोक पी पी कर। फिर भी बिना फोटो के मेरी पोस्ट्स अधूरी रहतीं हैं, यह जब गर्मी से निजात पाने गया था)


सोमवार, 16 जुलाई 2012

फिर से थोड़ी सी बकवास, कौन क्या क्या बना देता है और खुराक भर ज़िन्दगी: महफूज़


अभी लौटा हूँ गोरखपुर से तो रस्ते में कविता लिखी. अच्छा ट्रेन एक ऐसी जगह है जहाँ आपके साथ वेरायटीज़ ऑफ़ घटनाएँ घटती रहतीं हैं. आज हुआ क्या कि हमने देखा कि पैसे में बहुत बड़ी ताक़त होती है ...हम हमेशा जनरल का टिकट लेते हैं पर बैठते  ए.सी. में ही हैं... आज जिस आदमी की आर.ए.सी. कन्फर्म होनी थी टी टी ने वो बर्थ हमें दे दी. हम भी चौड़े होकर अपनी बर्थ लेकर दोनों पैर फैला कर बैठ गए. इसी बीच में शिवम् का फोन आया कि भैया बधाई हो. हम बड़े परेशां कि शिवम् को कैसे पता चला कि हमने आर.ए.सी. वाले की बर्थ झटक ली है? तो पता चला कि हमें दोबारा कहीं का प्रेसिडेंट बना दिया गया है. शिवम् ने हमसे बताया कि फलाने ब्लॉग पर है हम खुद शिवम् के ब्लॉग पर नहीं जाते हैं तो उस फलाने ब्लॉग कैसे जाते? लेदेकर हम सिर्फ प्रवीण पाण्डेय, डॉ, दराल और सिवाय शिखा के कहीं नहीं जाते तो भला उस ब्लॉग पर कैसे जाते? हमने कहा कि भई शिवम् हम चीज़ ही ऐसी हैं कि कौन हमें क्या क्या बना देता है हमें भी नहीं पता चलता ... कौन क्या करता है उससे मुझे क्या मतलब? इसी तरह कई बार हम चूतिया और बेवकूफ भी बन जाते हैं...वैसे यह दोनों हम सिर्फ प्यार में ही बनते हैं. हम यह जानते हैं कि जिस दिन हम अगर कुछ भी बनना चाहें न तो तो वो बन कर ही रहेंगे, कोई अगर नहीं भी बनाएगा तो भी हमारे में वो ताक़त है कि हम खुद को बनवा ही लेंगे. हम तो ऐसे आदमी हैं जो शांत रहते हैं जब तक के कोई छेड़े न ... अगर किसी ने छेड़ दिया तो हम बर्रा का छत्ता बन जाते हैं.   अरे बाप रे .. देखिये हम भी कितने बड़े वो हैं हम कहाँ कविता की बात कर रहे थे... और कहाँ हम फ़ालतू की बकवास ले कर बैठ गए. आईये भई... ज़रा हमारी कविता भी पढ़ी जाये.. 
(बिना हमारी फोटो के हमारी पोस्ट ही नहीं पूरी होती, यह हम अभी घूमने गए थे)

ख़ुराक  भर ज़िन्दगी 

मेरे अंदर का पहाड़
अब हिचकोले नहीं खाता,
उसे 
कोफ़्त नहीं होती 
इस कमरे से 
उस बरामदे के 
सफ़र के बीच 
और ख़ुराक भर ज़िन्दगी से..

बुधवार, 27 जून 2012

मन की सुन्दरता, लव, सेक्स और धोखा कुछ भी नहीं: महफूज़


आज मैंने फेसबुक पर सुश्री डॉ. शरद सिंह जी की एक पोस्ट से इंस्पायर्ड एक अपनी सोच के हिसाब से स्टेटस डाला कि "लोग कहते हैं कि मन की सुन्दरता देखो, लेकिन मन की सुन्दरता जैसी कोई चीज़ है ही नहीं. हम सबसे पहले बाहरी सुन्दरता ही देखते हैं. और जब हमारा कम्युनिकेशन इस्टैबलिश हो जाता है तब हम मन भी देखते हैं. हम प्यार भी करते हैं तो सुन्दरता देख कर ही.. उसके बाद मन .. मन अगर खराब होता है तो उसके बाद सारी सुन्दरता धरी रह जाती है. लेकिन मन की सुन्दरता नाम की कोई चीज़ विदाउट कम्युनिकेशन है ही नहीं और जब कम्युनिकेशन हो जाता है तो भी मन की सुन्दरता मायने नहीं रखती क्यूंकि लव एंड सेक्स एक दूसरे के कौनटेम्पोरैरी हैं.. बिना सेक्स का ख्याल लाये लव हो ही नहीं सकता". 

काफी लाईक्स और कमेंट्स मिले खासकर मेसेज इन्बोक्स में. कुछ ने मुझे डेयरिंग कहा तो कुछ ने बहुत सलीके से अपनी बात रखी. ज़्यादातर लोगों ने सपोर्ट किया. मेरी कुछ महिला मित्रों ने फ़ोन पर कमेन्ट किया तो कुछ महिलाओं ने इन्बोक्स में. कुछ ने कहा कि तुम्हारा कॉन्वेंट बैकग्राउंड तुम्हे ज़्यादा एक्स्ट्रोवेर्ट बनाता है. पुरूषों ने काफी सपोर्ट किया. लन्दन स्थित तेजेंद्र शर्मा जी ने इसी बात पर एक कहानी भी लिखी थी. इसी टॉपिक पर उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वो कहानी मुझे देंगे. 
(वैसे डिस्क्लेमर नीचे लगा है)
तो मैं कह रहा था कि मन सुन्दरता जैसी कोई चीज़ है ही नहीं. अब सवाल यह है कि मन की सुन्दरता हम कैसे जानेंगे? ज़ाहिर है हम किसी के मन को तभी जानेंगे जब हम उससे पर्सनली कॉन्टेक्ट में होंगे, जब हम पर्सनली कॉन्टेक्ट में ही नहीं होंगे तो मन की सुन्दरता को कैसे जानेंगे? तो सबसे पहले हम किसी से भी पर्सनल कॉन्टेक्ट में आयेंगें और जब पर्सनल कॉन्टेक्ट में आयेंगे तो सबसे पहले उसकी बाहरी सुन्दरता ही देखेंगे. कोई भी इन्सान बदसूरत और बेढंगे लोगों को नहीं पसंद करता है... इसीलिए सबसे पहले बाहरी आवरण से ही जुड़ता है. अगर आप सुंदर हैं और सुन्दरता के साथ आपका बिहेवियर भी अच्छा है तो वो दी बेस्ट है और अगर अगर आप सुंदर होने के साथ दिल से अच्छे नहीं हैं तो सारी सुन्दरता बेकार हो जाती है. तो बाहरी सुन्दरता सबसे अहम् चीज़ है, आपने ख़ुद को कैरी कैसे किया है यह बहुत मायने रखता है. लव में मन की सुन्दरता बहुत बाद में आती है सबसे पहले तो बाहरी आवरण से ही प्यार होता है जो कि एक कम्युनिकेशन का नतीजा होता है. बिना कम्युनिकेशन के प्यार हो ही नहीं सकता. अब चूंकि प्यार और सेक्स एक दूसरे के कौनटेम्पोरैरी हैं तो इसमें भी सबसे पहले शारीरिक सुन्दरता ही आती है. कोई भी चाहे फीमेल हो या मेल अपना सेक्सुअल पार्टनर ख़ूबसूरत ही चाहता है. क्यूंकि खूबसूरती प्यार को मज़बूत  करती है और यही प्यार फ़िर सेक्सुअली बौन्डिंग पैदा करता है. अगर सेक्सुअली खूबसूरती भी है तो प्यार और मज़बूत होता है. और सायकोलौजी सब्जेक्ट भी यही कहती है कि बियुटी कम्ज़ फर्स्ट देन ब्रेन. इसीलिए मन की सुन्दरता जैसी बातें सिर्फ फॉल्स आदर्शों को जताने के लिए ही ठीक रहती है. एक बात खासकर सिर्फ महिलाओं के लिए जब भी कोई पुरुष मन की सुन्दरता की बात करे तो समझ जाएँ कि वो बहुत बड़ा वाला "वो" है. 
(वैसे डिस्क्लेमर नीचे लगा है)
तो मन की सुन्दरता जैसी कोई चीज़ है ही नहीं अगर है तो इसको नापने का कोई पैमाना ही नहीं है. अब सिर्फ बातों में ही कह सकते हैं. लेकिन लव हम दर्शा सकते हैं. और प्यार अगर है तो उसे दर्शाना बहुत ज़रूरी है लेकिन मन की सुन्दरता को कैसे दर्शायेंगें वो भी बिना कम्युनिकेशन के? जैसे हम मन ही मन हंसने को नहीं दर्शा सकते हैं वैसे ही मन की सुन्दरता को भी नहीं दर्शा सकते.   इसीलिए सबसे पहले प्यार आता है .. रिश्तों में प्यार का होना ज़रूरी है और जब प्यार होगा तभी ना आप मन की सुन्दरता देखोगे और जब प्यार बिलकुल भी नहीं होगा तो मन की सुन्दरता भी नहीं होगी. 



DISCLAIMER:
  • वेयूज़ टोटली  मेरे हैं।
  • फ़ोटोज़ का ब्लॉग पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है, आत्ममुग्धता भी ज़रूरी होती है। जब तक के हम खुद से प्यार नहीं करेंगे तो कोई हमसे प्यार नहीं करेगा। 

मंगलवार, 26 जून 2012

लखनऊ नवाबों से पहले -भाग 2 (आईये जाने एक इतिहास..लखनऊ जनपद के प्राचीन नगर और बस्तियाँ.....): महफूज़


लखनऊ के इतिहास के पिछले और पहले श्रृंखला में आपने लखनऊ का शुरूआती इतिहास जाना. अब इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हैं. लखनऊ के इतिहास की श्रृंखला देरी से आने का कारण समय की कमी है. कोशिश रहेगी कि टाइम टू टाइम यह सीरीज़ जारी रहे. हमारा लखनऊ बनारस के बाद दुनिया का सबसे नोन और पुराना शहर है. पूरे दुनिया में यही दो ऐसे शहर हैं जो दुनिया में सबसे पुराने हैं. 

लखनऊ जनपद के प्राचीन नगर और बस्तियाँ..... 

आज मैं लखनऊ जनपद की प्राचीन बस्तियों और स्थलों का विवरण प्रस्तुत करूँगा. इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका वैज्ञानिक रीति से उत्खनन (excavation) किया गया है और कुछ ऐसे हैं जिनका परिचय सर्वेक्षण के दौरान मिली सामग्री से हुआ है. मैं पहले भी बता चुका हूँ कि यह वो इतिहास है जो किसी किताब और डिपार्टमेंट में नहीं मिलेगा और ना ही मेरा शोध है. यह जिनका शोध है मय सबूत उनका नाम मैंने पिछली पोस्ट में आभार के रूप में व्यक्त किया है. आईये आगे बढ़ें......

लखनऊ नगर में दो प्रमुख टीले हैं. एक नगर के उत्तर-पश्चिम दिशा में गोमती के तट पर स्थित लक्ष्मण टीला है और दूसरा टीला नगर के दक्षिण-पूर्व में स्थित बंगला बाज़ार के समीप क़िला मुहम्मदी नगर है जो कि  बिजली पासी के नाम से भी विख्यात है. दोनों पर प्राचीन बसती थी. प्रारम्भ में लक्ष्मण टीला विशाल क्षेत्र में फैला था. इसका ज़्यादातर भाग अब मेडिकल यूनिवर्सिटी के नीचे दबा हुआ है तथा इस टीले के एक भाग पर औरंगज़ेब के समय की बनी एक मस्जिद वर्तमान में है. इस टीले का पुरातात्विक उत्खनन नहीं हुआ है, इसलिए इसकी जानकारी के लिए हमें केवल इसके ऊपर या इसकी कटानों से मिलने वाली सामग्री पर निर्भर रहना पड़ता है. इस सामग्री से पता चलता है ली लक्ष्मण टीला भगवान् बुद्ध (ईसा से पूर्व छठी शताब्दी) के समय से भी प्राचीन है. अभी हाल ही में कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले  हैं जिनमें सबसे पुराने ईसा पूर्व एक हज़ार वर्ष के हैं. (और कोई न्यूज़ भी नहीं कहीं) इसमें राख के रंग का एक विशेष प्रकार का बर्तन भी है जिस पर सामान्यतः काले रंग से चित्र बने हैं जिसे पेंटेड ग्रे वेयेर कहा जाता है. टीले पर कई प्रकार के मनके, मिट्टी की मूर्तियाँ और खिलौने भी मिले हैं. अगर वैज्ञानिक ढंग से खुदाई की जाए तो वर्ष का सही पता चल सकता है. (बातचीत हमारी जारी है..आर्केओलौजी डिपार्टमेंट से)
(औरंगजेब की मस्जिद की पेंटिंग बाय हेनरी सौल्ट इन 1803)
(औरंगजेब की मस्जिद)

क़िला मुहम्मदी नगर (क़िला बिजली पासी) 240 मीo लम्बा और 170 मीo चौड़ा है जिसकी ऊंचाई 15 -20 मीटर रही होगी. इसे बिजली पासी का क़िला भी बताया जाता है. (आगे बिजली पासी के बारे में भी पता चलेगा). इस गढ़ी की चहारदीवारी में में लगभग २० बुर्ज बने थे. गढ़ी का निचला भाग मिट्टी का बना था जबकि इसके ऊपरी हिस्से में कंकड़ और ईंट का यूज़ हुआ है. आज भ ईसे देखने से ऐसा लगता है कि सुरक्षा के लिए चारों ओर खाई बनायीं गई थी जिसे पास के तालाब से भर लिया जाता था और वो तालाब आज भी है.  टीले से मिले मिट्टी के बर्तनों तथा मूर्तियों के आधार पर इस टीले का समय ईसा पूर्व 700 वर्ष तक रखा जा सकता है. ऐसा अनुमान है कि इस टीले पर बुद्ध के पहले से लेकर मुस्लिम काल तक यह बसती बनी रही. ऐसा लगता है कि लखनऊ नगर का प्राचीन इतिहास लक्ष्मण टीले तथा क़िला मुहम्मदी नगर का इतिहास है. और यह कैसा विचित्र संयोग है कि अगर एक टीला लक्ष्मण जी के नाम से  सम्बद्ध किया जाता है तो दूसरा टीला मुहम्मद साहब से. 
(प्राप्त सामग्री इन खुदाई)
यह तो रही लखनऊ के प्राचीन नगर की बात. अब हम यह देखेंगे और देखना चाहिए भी कि लखनऊ क्षेत्र में मनुष्य का निवास कब से आरम्भ हुआ और उस आरंभिक मनुष्य के बारे में हम क्या और कैसे जानते हैं? लखनऊ जनपद में ऐसे बहुत से स्थान हैं जहाँ तीन या चार हज़ार साल पहले मनुष्य निवास करने लगा था. पिछले दो वर्षों में लखनऊ जनपद के कई स्थानों का वैज्ञानिक उत्खनन किया गया है. सबसे पहले मैं अगले पोस्ट में उन स्थलों की चर्चा करूँगा जिनका उत्खनन किया गया है और फ़िर बाक़ी प्राचीन स्थानों कीक्रमशः (To be contd.....)

आभार: 
  • हिंदी वाड्मय निधि लखनऊ 
  • डॉ. एस. बी. सिंह 
  • स्वयं 
  • मैं अपनी स्टेनो कम टाइपिस्ट रीना का भी शुक्रगुज़ार हूँ.. जिसे मुझे कुछ भी समझाना नहीं पड़ा... शी इज़ वैरी इंटेलिजेंट.. इस बार रीना के बीमार होने की वजह से टाइपिंग में देरी हुई।
  • ऋचा द्विवेदी 
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