मंगलवार, 6 जनवरी 2009

इस दीवार को ढहाना ज़ुरूरी है,
मगर यह काम मुझसे अकेले नहीं होगा॥

आसमान की चाहत है मुझे,
मगर ज़मीं कम है॥

प्यास बहुत थी,
और मैं देखता रहा सामने उफनते दरिया को॥




महफूज़ अली

1 टिप्पणियाँ:

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) ने कहा…

तीनों लाईने पढ़कर यूँ लगा..जैसे कोई उफनता हुआ दरिया है.....हर दीवार तोड़कर बहने को व्याकुल....!!

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