बुधवार, 7 जनवरी 2009


बाहर से हँसी की आवाज़ ,

और

बर्तनों के खटपट की आवाज़ भी आती रहती है,

बहन की बचकानी हँसी,

कलकल बहते झरने की तरह,

और

माँ की आवाज़ भी बीच-बीच में सुनायी देती है॥

महफूज़ अली।

1 टिप्पणियाँ:

Shamikh Faraz ने कहा…

bahut achhi rachana hai.

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