शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009


सब कुछ भूल उड़ने की चाहत ज़िन्दा रह गई

दबी प्यास के ऊपर बहने लगी एक नदी

हर तरफ़ दिखने लगी घिरती हुई धुंध

घुप अंधेरे में दीवार से टकराते सर भी

कुछ न कर सके

शहर के बीचोबीच गुम हो गया वह चेहरा भी

जो निकला था अपनी पहचान बनाने के लिए॥

महफूज़ अली

2 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली ने कहा…

क्या बात है!!बहुत बढिया!

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

नमस्कार,
इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की।
आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम प्रसन्नता होगी तथा जो कदम अकेले उठाया है उसे आप सब लोगों का सहयोग मिलने से बल मिलेगा साथ ही हमें भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा। रचनायें आप shabdkar@gmail.com पर भेजिएगा।
सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार।
कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
शब्दकार
रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

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