गुरुवार, 7 मई 2009

रात बहुत लम्बी है..


रात बहुत लम्बी है,

रात बहुत ठंडी है,

मैं जाग रहा हूँ,

मैं जाग रहा हूँ।

सामने नदी है,

पेड़ की छाया है,

पर छाया पकड़ी नहीं जा सकती।

रात बहुत लम्बी है,

रात बहुत ठंडी है,

और

मैं जाग रहा हूँ॥

महफूज़ अली

3 टिप्पणियाँ:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

पहली बार आया हूं आपके ब्लॉग पर, पर कविता पढकर लग रहा है कि अब तक कहां था। बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

raj ने कहा…

raat hmesha dukh ki lambi hoti hai.....

anju ने कहा…

hey the nights
are long and cold
but the thoughts
are warm and gold
thats enough to give
you good sleep
then why cryyyyyyyy??
good write
anjali

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