शुक्रवार, 31 जुलाई 2009


तन गीला,

मन गीला,

गीला - गीला है पानी,

छलके जो आंखों के पोर से........

आंसू भी है गीला।

वो यादों की लहरें,

वे झुरमुट और वे टीले,

टूट कर बिखरे तारे सारे,

पर....... रंग सभी चमकीले॥



महफूज़ अली

3 टिप्पणियाँ:

raj ने कहा…

yadin hmesha geeli rahti hai.....khoobsurat khayal..

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

वो यादों की लहरें,

वे झुरमुट और वे टीले,

टूट कर बिखरे तारे सारे,

पर....... रंग सभी चमकीले॥

behtreen...aur ek-ek lafz dil ko chhoo lene wala hai...

संजय भास्कर ने कहा…

आंसू भी है गीला।



बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन

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