रविवार, 30 अगस्त 2009

दिन भी हो चला धुंधला, दिए की लौ भी बुझने को आई....


किसी कि आहट मुझे सोने नही देतीं,

दिल कि धडकनों में यह हलचल है किसकी?

जो मुझे पलकें भी मूँदने नहीं देतीं।

ज़ुल्मत में यादों कि परछाई किसकी है मुस्कुराई,

रौशनी सी बिखेरती मुझे अंधेरे में खोने नहीं देतीं।

यह मुश्कबू फैली है किसके छुअन की,

कि रात के डगमगाते साए भी सोने नहीं देते।

दिन भी हो चला धुंधला,

दिए की लौ भी बुझने को आई,

पर घटाएं बनी रातें सुबह होने नहीं देतीं।

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,

पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥

28 टिप्पणियाँ:

'अदा' ने कहा…

ज़ुल्मत में यादों कि परछाई किसकी है मुस्कुराई,
रौशनी सी बिखेरती मुझे अंधेरे में खोने नहीं देतीं।
यह मुश्कबू फैली है किसके छुअन की,
कि रात के डगमगाते साए भी सोने नहीं देते।
lagta hai aapne apne saare ahssason ki ek potli banayi aur is kavita ko pakda di hai.
har shabd nayab..
pathakon ko us tilasmi dunia ki sair karati hui..
aur saath mein jo tasveer lagayi hai usne baki ki kasar poori kar di..
jaise jaadu ki chhadi ghum gayi ho..

अर्चना तिवारी ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,
पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥

bahut khoob...

शरद कोकास ने कहा…

महफूज़ भाई खयाल तो बहुत अच्छा है लेकिन यह् गज़ल की शक्ल अख्तियार नहीं कर पाई है और बतौर नज़्म भी कुछ कमियाँ हैं बहर हाल मुश्कबू का जवाब नहीं , यह प्रयोग अच्छा लगा ।

Navnit Nirav ने कहा…

achchha prayog hai aapka.kahin kahin shabd shithil se ho gaye hain.Mujhe pasand aayi yah najm.

Babli ने कहा…

वाह वाह क्या बात है ! बहुत ख़ूबसूरत नज़्म पेश किया है आपने बेहतरीन तस्वीर के साथ! मुझे बेहद पसंद आया!

raj ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,

पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥..duniya bhar ki yadein humse milne aati hia..sham dale es sune ghar me mela lagta hai....

Udan Tashtari ने कहा…

जबरदस्त!! क्या बात है!

sadhana ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
sadhana ने कहा…

यह मुश्कबू फैली है किसके छुअन की,
कि रात के डगमगाते साए भी सोने नहीं देते।
^
^
^
ye bahut hi khubsurt pankti hai .

seema gupta ने कहा…

दिए की लौ भी बुझने को आई,


पर घटाएं बनी रातें सुबह होने नहीं देतीं।


ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,


पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥
भावनात्मक अभिव्यक्ति.......सुन्दर पंक्तियाँ..
regards

Harkirat Haqeer ने कहा…

किसी कि आहट मुझे सोने नही देतीं,
दिल कि धडकनों में यह हलचल है किसकी?

बहुत सुंदर .....!! (ये ki न लिख कर kii लिखें तो की होगा )

यह मुश्कबू फैली है किसके छुअन की,
कि रात के डगमगाते साए भी सोने नहीं देते।

लाजवाब .....!!

आई तो थी आपके प्रश्न का जवाब देने पर आपकी तस्वीर और नज़्म ने मंत्रमुग्ध कर लिया .....!!

हाँ मग्मूम means उदास या दुखित क्योंकि इस नामुराद का जन्मदिन भी आज ही है...!!

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

आपने बहुत ख़ूबसूरत गज़ल पेश किया है, बेहतरीन!!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

तस्वीर से निगाह हटी तब जा कर kavita पढ़ी है...तस्वीर और रचना का achcha ताल मेल रहता है आप की पोस्ट में.
बहुत ही अपने से भाव लगे..जैसे शब्दों में मन को बांधा है.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,
पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं

सच कहा ये यादें सोने नहीं देतीं .......... पर अगर ये यादे न हों तो जीना भी तो दुश्वार है .........लाजवाब लिखा है

ओम आर्य ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,
पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥
क्या बात है .......भाई महफूज जी

ओम आर्य ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,
पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥
क्या बात है .......भाई महफूज जी

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खुब महफूज जी, शब्दो का शानदार मिश्रण। लाजवाब रचना

Fauziya Reyaz ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,

पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥

bahut khoobsoorat, kaafi achha likha hai aapne

Fauziya Reyaz ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,

पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥

bahut khoobsoorat, kaafi achha likha hai aapne

M VERMA ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,
पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥
भावपूर्ण --
एहसास --
और फिर चित्रो मे तो पूरी की पूरी दास्तान.
वाह

रज़िया "राज़" ने कहा…

यह मुश्कबू फैली है किसके छुअन की,
कि रात के डगमगाते साए भी सोने नहीं देते।
वाह क्या अंदाज है आपका। जान डाल दी है आपने अपनी ईस रचना में ।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,
पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥
बहुत खूब सुन्दर अभिव्यक्ति शुक्रिया

kshama ने कहा…

Adaji se sahmat hun..dekh rahee hun,ki, aapkee rachnayen, din-b-din nikhar rahee hain!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतीकरण.....मुश्कबू का अर्थ क्या होता है?
ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,
पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥

rukhsar ने कहा…

bohat hi khubsurat poem hai.
mushkaboo ka mtlb kia hay?
purani yaadn rone nahi deti, to yaad hi kion karte hayn?

'अदा' ने कहा…

रश्मि जी,
मुश्कबू का अर्थ शायद 'कस्तूरी की खुशबू' है....

महफूज़ अली ने कहा…

jeee............

मुश्कबू ka matlab 'कस्तूरी की खुशबू' hi hota hai........

The smell of musk.......

shikha varshney ने कहा…

ज़िन्दगी का फलसफ़ा भी है अजीब,

पुरानी यादें रोने भी नहीं देतीं॥

aap esa bhi likhte hain? mashaallah..
or ye mushkbu......kya baat hai ..

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