मंगलवार, 15 जनवरी 2013

आईये जानें कुछ भारतीय दर्शन और आध्यात्मवाद: महफूज़


आज इस साल की पहली ब्लॉग पोस्ट पोस्ट करने का टाइम काफी दिनों के बाद मिला है। पिछले कई महीनों से मैं हिंदी साहित्य और हिंदुस्तानी फ़िलौसोफ़ि (दर्शन) का अध्ययन कर रहा हूँ। मेरे यह नहीं समझ आता कि हमारा हिंदी साहित्य इतना समृद्ध है फिर भी इसकी मांग क्यूँ नहीं है? हम सिर्फ बातों में ही हिंदी डेवलपमेंट कर सकते हैं और अगर आजकल के हिंदी के लेखकों के नाम पूछो तो लोग वही प्रेमचंद/महादेवी वर्मा ही  बताएँगे। आजकल के बच्चों को हिंदी के लेखकों के नाम ही नहीं पता, लेखक होंगे तो पता होंगे न? रही बात हिंदुस्तानी दर्शन की तो लोग सिर्फ टर्मीनौलौजीज़ से ही परिचित हैं अगर हम किसी से हिंदुस्तानी दर्शन पर सवाल पूछें तो लोग बगलें झाँकने लगते हैं या फिर बातों को बातों में ही खींचते हैं। मुझे बहुत अफ़सोस होता है कि लोग सिर्फ हिंदी के विकास के बारे में लिखते हैं "कि हिंदी का विकास करिए" मगर खुद सोचते और करते बिलकुल भी नहीं हैं। हिंदी के जैसा ही हाल भारतीय दर्शन का भी हो चुका है सिर्फ शब्दों से ही परिचित हैं।

आज मैं इसी भारतीय दर्शन के अंतर्गत "आध्यात्म" और "आध्यात्मवादिता" के बारे में सरल और आम भाषा में बता रहा हूँ। पहले तो यह बता दूं कि आध्यात्म का किसी भी धर्म से कोई भी लेना देना नहीं है,आध्यात्म एक प्राकृतिक (ईश्वरीय) प्रक्रिया है और धर्म मनुष्य निर्मित प्रक्रिया है। एक सामान्य भारतीय के जीवन का दार्शनिक आधार है "आध्यात्मवादिता"।  हमारे अंदरूनी भावों की ही आधार-शिला पर आधारित विचार मन में उठते हैं और उन्ही के सन्दर्भ में ही तमाम क्रियाएँ व्यक्ति तथा समाज के प्रति संपादित होती हैं। इन्हीं क्रियाओं के पीछे हमारा उद्देश्य भौतिक सुख तथा आनंद का ना होकर इससे परे आध्यात्मिक सुख का होता है। हमारी आँखों के सामने जो कुछ भी दिखता है वह हमारे इसी आध्यात्म के चश्मे के रंग में रंगा हुआ दिखता है।
(घर के फूल हैं, इनका भी एक अपना अलग दर्शन है)
जीवन तथा प्रकृति का कोई भी क्षेत्र हमारे सामने भले ही अपनी नम्रता लिए खड़ा हो पर हम उसमें ईश्वरीय मौजूदगी का ही दर्शन करते हैं। यही कारण है कि हमने जीव और जड में तो ईश्वर की साकार मूर्ति की कल्पना की है पर जो अदृश्य है उसमें भी हम ईश्वर को देखने लगते हैं (मूर्ति कल्पना और लिंग पूजन आज भी और विदेशी सभ्यताओं में भी पायी जाती है ... चीन, जापान और इंडोनेशिया में आज भी यह प्रचलित है). इसी ईश्वरीय अवधारणा से हमारी सारी क्रियाएं ईश्वर नियंत्रित और समर्पित होती है। यही आध्यात्म ही भारतीय जीवन दर्शन का "आध्यात्मवादिता" है। 
(घर के फूल हैं, इनका भी एक अपना अलग दर्शन है)
मगर हमारा आध्यात्मवाद कोरा भावनात्मक नहीं है, क्रियात्मक है। इसीलिए इस आध्यात्म को पाने के लिए हमेशा "कर्म" को ही प्राथमिकता दी गयी है। यही दूसरे शब्दों में "कर्मवाद" का सिद्धांत है। कर्मवाद की भावना हमारे जीवन में इसीलिए इतनी व्याप्त है कि किसी भी वस्तु के प्रति हमारे प्रत्येक के अन्दर अनासक्ति का भाव घर कर बैठा है, तथा यह इसलिए भी और बलवती है कि  हमारा सम्बन्ध भौतिक जगत से ना हो कर आध्यात्मिक जगत से ज्यादा है। वहीँ भारतीय दर्शन में यह भी कहा गया है कि धर्म वही है जो आपने धारण किया हुआ है जिससे स्वतः सुख हो मगर दूसरे को उससे कभी भी कष्ट ना हो।   

आध्यात्म का दो स्वरुप है: भौतिक और आध्यात्मिक। दूसरे शब्दों में यह सामूहिक और व्यक्तिगत है क्यूंकि जो भौतिक है वह सामूहिक है तथा जो आध्यात्मिक है वह व्यक्तिगत है। अब यहाँ व्यवहारिक एवं वैचारिक सम्बन्ध मानव निर्मित्त धर्म के ही आधार पर व्यक्ति का व्यक्ति से तथा व्यक्ति का समूह से बनाये रखने का प्रयास किया जाता है। इसीलिए भारतीय दर्शन में किसी भी मानव क्रिया में अर्थ और कर्म अगर उत्तेजक है तो यही मानव निर्मित्त धर्म के दर्शन द्वारा उसका नियंत्रण है। 


डिस्क्लेमर: प्रस्तुत आलेख में कुछ अंश भारत के सन्दर्भ में रशियन लेखन रोवोत्सकी (Dvorotski) की किताब से लिए गए हैं। बाकी लेख पूर्णतया मेरा है। फ़ोटोज़ का पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है।

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