सोमवार, 28 जनवरी 2013

पथराई आँखें, प्रतीक्षा तुम्हारी और कुछ घर के फूल : महफूज़

आहट पे तुम्हारी,
पलकें बिछीं हैं हमारी,
पथराई आँखें,
प्रतीक्षा तुम्हारी. 

              पलकों की कालीन बिछी है
              कमरे की हर चीज़ सजी है
              गुलदस्ते की आँखें कहतीं 
              रेतीली आशाएं सारी.
              पथराई आँखें,
               प्रतीक्षा तुम्हारी. 

नाखूनों से ज़मीं कुरचते
अंतर पलकों का भीगा,
राह रोकते, बाट जोहते,
नयनों की भाषा हारी 
पथराई आँखें,
प्रतीक्षा तुम्हारी. 

               युग आँखों में बीत गया है 
               सपना दिन में रीत गया है 
               चादर के कोने से कब तक 
                खेलेंगी उँगलियों हमारी 
              पथराई आँखें,
              प्रतीक्षा तुम्हारी.   

दिन हाशिया खींचने सा लगा है
प्यार की पहर नयनों में फ़िर उगा है 
आईना लिए मैं बैठी हूँ कबसे
न वो जीत में है न मैं बाज़ी हारी 
पथराई आँखें,
प्रतीक्षा तुम्हारी. ...

(c) महफूज़ अली 

(यह सारे फूल घर के ही हैं )

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