रविवार, 3 मई 2009

सूरज कहाँ चला जाता है?

मैं सोच रहा था की रात में सूरज कहाँ चला जाता है?
क्या बादलों के बीच खो जाता है?
या फिर चाँद के थकने का इंतज़ार करता है
या फिर थक कर सो जाता है?
क्या सूरज कहीं जा सकता है?
क्या कहीं खो सकता है?
क्या सूरज को नींद आ सकती है?
क्या वह इतना डरपोक हो सकता है कि
अंधेरे से डरकर छिप जाए?





(मेरी यह प्रस्तुत कविता कादम्बिनी पत्रिका जून २००६ में पृष्ठ संख्या १७२ में छाप चुकी है । )



महफूज़ अली

2 टिप्पणियाँ:

अखिलेश शुक्ल ने कहा…

प्रिय मित्र
आपकी रचनाओं ने प्रभावित किया। इन्हें प्रकाशित कराने के लिए पत्रिकाओं के पते चाहते हों तो मेरे ब्लाग पर अवश्य पधारें।
अखिलेश शुक्ल्
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anju ने कहा…

yeh such hai kee suraj darpok hai
who kabhi chaand aur taare aane ke pehle he chup jaata hai
kyon aise
who tho unhee se pucho
uska uttar who hee de saktha hai
bahut khub lika hai Ali jee aapne
mera ishwar se yehi prathana hai
kee aap ko bahut aashirwaad mile
anjali

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