गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

जानना नहीं चाहेंगे आप संस्कार शब्द का गूढ़ रहस्य? एक ऐसा शब्द जो सिर्फ भारत में ही पाया जाता है... :- महफूज़


अभी  थोड़े  दिन पहले की बात है, किसी ने मुझ से पूछा था कि ' संस्कार कि इंग्लिश बताईये?' मुझे मालूम नहीं था, मैंने कहा कि देखकर बताता हूँ. सही कहूँ तो संस्कार कि इंग्लिश कहीं नहीं मिली. थोडा शोध किया तो पता चला कि विश्व के किसी भी भाषा में संस्कार शब्द है ही नहीं. थोडा शोध और किया तो पता चला कि संस्कार सिर्फ और सिर्फ भारतीय संस्कृति में ही हैं और सिर्फ भारतीय ही संस्कारी हैं, और सबसे बड़ी बात यह कि संस्कार का  भारत में व्याप्त किसी भी  धर्म से कोई लेना देना नहीं है. यानी कि हर भारतीय संस्कारी है और संस्कार में ही जीता है और मरता है. तो आखिर यह संस्कार है क्या

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भारतीय समाज की परम्पराएं दूसरे देशों से बिलकुल अलग हैं. जहाँ पश्चिमी सभ्यता भौतिकतावाद पर ज़ोर देता है, वहीँ भारत का हर कर्म और विचार आध्यात्मिक है. संस्कार एक संस्था है. इस संस्था का मूल उद्देश्य है कि मानव जीवन  को विकार रहित बनाते हुए आगे बढ़ें और आध्यात्म को प्राप्त कर सकें. आध्यात्म ही हमारी सामाजिक क्रियाओं का एकमात्र उद्देश्य है और आध्यात्म की पूर्ती संस्कार से ही होती है, जिससे मानव जीवन को शुद्ध (filter) करते हुए आगे बढ़ने का रास्ता मिल सके और आने वाला जीवन शुद्ध रहे. हम भारतीयों कि ज़िन्दगी संस्कारों में इस तरह से जकड़ी होती है कि वह जन्म से पहले और मौत के बाद तक आध्यात्मिक रूप से शुद्ध होता रहता है और यह संस्कार भारत के सिवाय दुनिया के किसी भी देश में नहीं मिलता.

आइये जानें संस्कार शब्द का अर्थ :---

आख़िर ऐसा क्या है कि यह संस्कार शब्द सिर्फ भारत में ही पाया जाता है?  क्यूँ यह शब्द सिर्फ भारतीय संस्कृति में ही है? क्यूँ दुनिया कि किसी भी भाषा में इसका अनुवाद नहीं मिलता? "संस्कार" का पर्यायवाची शब्द दुनिया की किसी भी भाषा में ढूंढना बहुत ही मुश्किल और जटिल है. दुनिया के किसी भी भाषा के एक शब्द के रूप में इसको अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता न ही संस्कार विश्व में भारत को छोड़ कर कहीं पाए जाते हैं. हम लोग संस्कारी होने न होने की बातें तो करते हैं लेकिन संस्कार क्या है यह नहीं जानते?

संस्कार में न केवल बाहरी कर्म-कांडों का ही स्थान है बल्कि आंतरिक विचार, धार्मिक भावना, नियम, आध्यात्मिक रीती-रिवाज़ जैसी बहुत सी बातों को एक ही साथ सिर्फ एक शब्द (संस्कार) में समाहित किया गया है. इसलिए संस्कार शब्द दूसरे देशों के आदर्शों से एकदम अलग मतलब रखता है. संस्कार शब्द को किसी भी विदेशी शब्द की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता.

अंग्रेज़ी में भी संस्कार को "SAMSKAR" (सम्स्कार) लिखा जाता है. किसी भी भाषा में संस्कार का कोई अनुवाद नहीं है. फ़िर भी यह लैटिन के 'सेरेमोनिया ' (CEREMONIA)  और अंग्रेज़ी के 'सेरेमोनी ' (CEREMONY) का पर्यायवाची लगता है. पर यह दोनों विदेशी शब्द सिर्फ़ ज़िन्दगी के बाहरी पक्षों को ही दिखाते हैं, आंतरिक पक्ष तो सिर्फ़ संस्कार शब्द में ही मिलेंगे. संस्कार शब्द की परिधि बहुत व्यापक है और शायद इसीलिए विश्व की किसी भी भाषा में "संस्कार" शब्द का कोई एक शब्द नहीं है.  और इसीलिए अंग्रेज़ी में भी "SAMSKAR" ही लिखा जाता है.
संस्कार शुद्धि की धार्मिक क्रिया है जो कि मनुष्य की शारीरिक, मानसिक, और बौद्धिक विकास के लिए किये जाने वाले अनुष्ठानों से है जिससे कि मनुष्य समाज का पूरी तरह से विकसित सदस्य हो सके. वास्तव में यह संस्कृत का शब्द है जिसका मतलब है परिशोधन या शुद्ध करना. इसलिए जब यह कहा जाता है कि सोने का संस्कार हो रहा है तो उसका मतलब होता है कि सोने का सार (मूल) निकाल कर उसको शुद्ध किया जा रहा है. इसलिए मनुष्य को अपने जीवन की पूर्णता के लिए ज़रूरी है कि आगे बढ़ने से पहले अपने विचारों और विकारों को शुद्ध कर ले. जीवन की सम्पूर्णता को प्राप्त करने के लिए अपने को शुद्ध करने की इसी प्रक्रिया को संस्कार कहते हैं.


नोट: प्रस्तुत लेख में संस्कार शब्द कि व्युत्पत्ति नहीं है.... यह लेख सिर्फ संस्कार कि परिभाषा और अर्थ को इंगित करता है... 

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

हम फिर साथ खेलेंगे......: महफूज़..

एक पल लिए तो मैं घबरा ही गया था, मेरे समझ में ही नहीं आ रहा था कि  क्या करुँ......... ? मुझे लगा कि  अब सब ख़त्म!!!!!!!! डॉक्टर ने भी जवाब दे दिया....... डॉक्टर ने चेक अप करने के बाद कहा कि  अब देखो यह प्रॉब्लम में फिफ्टी/फिफ्टी का चांस है....... .

मैंने कहा कि  " डॉक्टर ! मैं इसके बगैर नहीं रह सकता........ कुछ भी करिए....... मैं इससे बहुत प्यार करता हूँ"......नहीं रह सकता मैं इसके बगैर......... .

डॉक्टर ने मुझे कुछ दवाएं लिखी और कहा की फ़ौरन मेयो हॉस्पिटल जा कर यह दवाएं लेते आईये.....

मैं परेशां ....... बदहवास..... कार में बैठे बैठे अजीब खयाल आ रहे थे..... मेयो पहुँचा... और फ़ौरन दवा ले के.....वापस अपने डॉक्टर के पास पहुंचा ..

थोडी देर के बाद डॉक्टर ने बताया की पैरालिटिक अटैक हुआ है....... इसलिए धड का निचला हिस्सा काम नही कर रहा है....... सुन के मेरे पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई...... मैं सोच में पड़ गया ......

मैं अब कुछ भी खोने की पोसिशन में नहीं हूँ ..... बहुत कुछ खोया है मैंने .... अब और नहीं ..... मैं यही सोच रहा था क्या सब मेरी ही किस्मत में लिखा है.... ? क्या मेरी ज़िन्दगी में सिर्फ खोना ही खोना है? बचपन में माँ खोयी... फिर पिता जी और अब?? 

डॉक्टर ने कहा की आपके पास अब दो रास्ते हैं.... इसका लम्बे वक़्त तक इलाज कराएँ या फिर हमेशा के लिए?? और दोनों ही बहुत परेशानज़दा तरीका हैं.... 

पर मैंने फैसला किया की मैं इसका पूरा इलाज कराऊंगा....... और.....फिर मैं ICU की ओर बढ़ गया...... अन्दर जा के मैंने देखा..... उसकी आँखों में एहसान का भाव था.... शायद वो भी मेरे फैसले को समझ गया था.... 

मैं उसके पास पहुंचा और उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा..... 

और वो धीरे धीरे पूँछ हिला कर मेरा शुक्रिया अदा करने लगा.... 

मैंने धीरे से उससे कहा की हम फिर साथ खेलेंगे......

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यह हमारे जैंगो हैं... यह आजकल बीमार चल रहे हैं... इनकी ख़ास बात बता दूं कि यह लैब्राडोर प्रजाति के हैं. यह सिर्फ शक्ल से श्वान हैं, बाकी पूरे इंसान हैं, इनको हम बकरी कहते हैं, यह कभी नहीं भौंकते हैं, क्यूंकि इन्होने भौंकना कभी सीखा ही नहीं, कभी जब यह भौंकते हैं तो हम लोग जल्दी से रिकॉर्ड कर लेते हैं कि न जाने कब इनका भौंकना सुनने को मिले? यह सिर्फ खेलना जानते हैं, जब भी घर में कोई मेहमान आता है, तो यह अपने खिलौने लेके पहुँच जाते हैं और बेचारा मेहमान डर जाता है. यह पूर्णतया शाकाहारी हैं, और टमाटर खाने के बहुत शौक़ीन हैं. आम बहुत चाव से खाते हैं. कार /बाइक देखते ही बैठने कि जिद करते हैं. यह सबको दोस्त ही समझते हैं. जब नाराज़ होते हैं, तो इनको मनाना बहुत मुश्किल काम होता है. यह मेरा सारा काम करते हैं, सिर्फ अगर इनसे पानी का ग्लास मंगवा लो तो रोने लगते हैं. यह मेरे साथ ही बिस्तर में सोते हैं, और इनको सर्दी में भी air conditioner चाहिए. इनके तीन साथी और हैं, रेक्स,टैरो और बुश, इनमें से रेक्स बहुत ही घमंडी किस्म के ग्रेट डेन प्रजाति के हैं, टैरो जर्मन शेफर्ड हैं और कट खन्ने हैं, और बुश को तो क्या कहें यह doberman हैं... और सिर्फ सोते रहते हैं. जैंगो कि इन से नहीं बनती है... और यह तीनों हमारे घर के बाहर आउट  हाउस में रहते हैं. जैंगो सिर्फ घर के अन्दर रहते हैं. जैंगो मेरा बेटा है. यह आजकल लखनऊ के एक नर्सिंग होम में भर्ती  हैं. कृपया सब लोग दुआ करें कि जैंगो जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ....



(जैंगो हॉस्पिटल में...ड्रिप चढ़ते हुए..)

(यह मेरे साथ ही सोते हैं.)

(हमेशा गोदी चढ़ना चाहते हैं.)

(यह जब छोटे थे..तो पार्क जाने कि बहुत जिद करते थे.)

(यह मिलिए रेक्स से.. इनकी vertical लम्बाई ३.५ फीट है और horizontal लम्बाई ६ फीट २ इंच है.और अभी जैंगो से मिलने हॉस्पिटल आये थे..)

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

BOLD अत्याधुनिक नारी.....: एक लघुकथा.....





तृप्ति ने शादी से पहले अपने होने वाले पति से पूछा ............ 'क्या तुम वर्जिन हो'? 


शायद अटपटा लगा था संदीप को यह सुनकर, पर जल्द ही संभलकर बोला। 


"......और तुम.......?" अबकी सवाल उसने दागा...........


जवाब बोल्ड था...............






खुलेपन ने संवाद को तो विस्तार दे दिया, पर मन् और दिमाग के किसी कोने में विश्वास की खिड़की फिर भी न खुल सकी। 





(प्रस्तुत लघुकथा सत्य घटना पर आधारित है....)

सोमवार, 30 नवंबर 2009

अबे! साले, हंस क्यूँ रहा है?



एक और बड़ा अच्छा वाक़या याद आया है। बात उन दिनों की है जब मैं दसवीं क्लास में पढता था..... हमारे एक इतिहास के टीचर हुआ करते थे.... उनका नाम तो याद नही आ रहा है..... पर लंगूर नाम से पूरा स्कूल उनको जानता था.... यह नाम भी उनका इसलिए पड़ा था.... क्यूंकि एक तो वो ख़ुद भी बड़े लाल लाल थे....और दूसरा एक बार उनकी क्लास में लंगूर बन्दर घुस आया था.... तो बेचारे डर के मारे टेबल के नीचे घुस गए थे...तबसे उनका नाम लंगूर पड़ गया था......और वैसे भी लोग उनका असली नाम भूल ही चुके थे.  खैर.... मैं अपने वाकये पर आता हूँ।


एक बार वो हमें क्लास में इतिहास पढ़ा रहे थे..... तो किसी चैप्टर में इटली के महान दार्शनिक दांते (Dante) का ज़िक्र आया..... तो वो जब दांते के बारे में पढ़ा रहे थे...... तभी क्या हुआ की मेरे बगल में मेरा दोस्त अरुण साईंबाबा मुहँ बंद करके हंसने लगा.... तो हम कुछ लड़कों का गैंग था... सब उसकी उसकी ओर चोर नज़रों से देखने लगे.... हमने पूछा  कि  'अबे! साले हंस क्यूँ रहा है?'


तो उसने एक दूसरे  लड़के की ओर इशारा कर दिया जो कि बगल में दूसरी रो में बैठा हुआ था ... हमने उस लड़के की ओर देखा तो हम लोग सारी कहानी समझ गए.... कि  अरुण क्यूँ हंस रहा था?


दरअसल हमारे साथ एक लड़का पढता था जिसके दांत बिल्कुल सीधे बाहर की ओर निकले हुए थे.... तो अब हमारी क्लास में एक और नामकरण हो गया....उस बेचारे लड़के का नाम दांते पड़ गया...... उसके दाँत इतने बाहर थे कि मुंह बंद करने के बाद भी बाहर ही रहते थे.....और वो बेचारा अक्सर टीचर से डांट खा जाता था कि 'तुम बिना बात हँस क्यों रहे हो ?' तब पूरी क्लास एक सुर में बोलती थी,  'नहीं सर!!!!!  इसके दाँत ही ऐसे हैं ...' बेचारा टीचर भी झेल जाता था कई बार.  


और उस बेचारे का नाम दांते ऐसा पडा कि सही बता रहा हूँ....आज  भी उसको हम लोग दांते ही बुलाते हैं..... ख़ैर ! आजकल वो भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में  साइंटिस्ट है॥

बुधवार, 25 नवंबर 2009

मेरी जंग: वक़्त का सबसे बड़ा झूठ...




जब मैं खोया हुआ रहता हूँ,
एकटक छत को घूरता रहता हूँ
अपने आसपास से अनजान
और काटता रहता हूँ
दांतों से नाखून.

नहीं सुनाई देती है
कोई भी आवाज़
कोई मुझे थक हारकर
झिंझोड़ता है और पूछता है
क्यूँ क्या हुआ?

मेरे मुहँ से अचानक निकलता है
नहीं......!!!! कुछ भी तो नहीं...
यह उस वक़्त का सबसे बड़ा झूठ होता है
वास्तव में उस वक़्त मैं .....
लड़ रहा होता हूँ
एक जंग खुद से
जिसमे कुछ भी तो नहीं शामिल होता है....
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