सोमवार, 18 मई 2009

तुम कहती हो.....


तुम कहती हो की

मैं अपना ख़ुद का ख़याल नहीं रख सकता

मैं कहता हूँ की

शायद,

तुम

सही कहती हो....... ॥








महफूज़ अली

गुरुवार, 7 मई 2009

रात बहुत लम्बी है..


रात बहुत लम्बी है,

रात बहुत ठंडी है,

मैं जाग रहा हूँ,

मैं जाग रहा हूँ।

सामने नदी है,

पेड़ की छाया है,

पर छाया पकड़ी नहीं जा सकती।

रात बहुत लम्बी है,

रात बहुत ठंडी है,

और

मैं जाग रहा हूँ॥

महफूज़ अली

कल्पना

कल्पना

धरती के नीचे आकाश में,
चमक रहे थे तारे,
और तैर रहे थे द्वीप,
उग रहे थे बीज,
खिल रही थीं कलियाँ,
लावा और डायनासौर की हड्डियाँ।।



महफूज़ अली

रविवार, 3 मई 2009

सूरज कहाँ चला जाता है?

मैं सोच रहा था की रात में सूरज कहाँ चला जाता है?
क्या बादलों के बीच खो जाता है?
या फिर चाँद के थकने का इंतज़ार करता है
या फिर थक कर सो जाता है?
क्या सूरज कहीं जा सकता है?
क्या कहीं खो सकता है?
क्या सूरज को नींद आ सकती है?
क्या वह इतना डरपोक हो सकता है कि
अंधेरे से डरकर छिप जाए?





(मेरी यह प्रस्तुत कविता कादम्बिनी पत्रिका जून २००६ में पृष्ठ संख्या १७२ में छाप चुकी है । )



महफूज़ अली

गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

जाने क्या क्या तलाश करता हूँ,
जब भी बाज़ार से गुज़रता हूँ ,


मैं कोई पीर नहीं
आदमी हूँ , गुनाह करता हूँ।


लोग डरते हैं मौत से
'महफूज़ ' मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ॥



महफूज़ अली

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