मंगलवार, 15 सितंबर 2009

तो वो बेवफ़ा कमबख्त .....मेरे ख़्यालों से कभी जाती नहीं........


सोचता हूँ कि

अगर तुम

मेरी ज़िन्दगी में

आतीं नहीं

तो क्या होता?


तो खो जाता अपनी

तनहाइयों में,

कोई पहचान नहीं बना पाता,

कर देता खाकसार ख़ुद को

पिछली यादों में,

आस जीने की खो देता

आंसुओं के सैलाब में,


पर अब तुम हो मेरे साथ

मेरे हमनवाँ,

पता नहीं!!!!!!!!!

तुम्हारे साथ कब रात से दिन

और दिन से रात हो जाती है,

अब नज़र भूल के भी उस तरफ़ नही जाती है

अगर तुम मेरी ज़िन्दगी में आतीं नहीं,

तो वो बेवफ़ा कमबख्त

मेरे ख़्यालों से कभी जाती नहीं........

सोमवार, 14 सितंबर 2009

मुझे बचाओ.....मैं हिन्दी हूँ....मैं गिर गई हूँ.....


मैं हिन्दी हूँ,

दबी-कुचली,

अपने ही वतन में

मेरे हमवतन मुझे

दया भरी नज़रों

से देखते हैं.....


कहने को तो मैं

राष्ट्रभाषा हूँ

जैसे महात्मा गाँधी

राष्ट्रपिता

दोनों का ही छदम वजूद

हम दोनों केवल

अपने दिवसों पर ही

याद किए जाते हैं....


मैं हिन्दी हूँ।


मेरे अपने ही देश में

शिक्षण संस्थानों के

नाम,

सेंट पॉल, सेंट मेरी , सेंट बोस्को,

और सेंट जॉन

पता नहीं!

आदिकाल से मैंने ऐसे संत

अपने देश में नहीं देखे ,

न ही सुने.............


सुना है चौदह सितम्बर को

मेरा दिवस है?

मुझे दिवस के रूप में

मनाया जाता है

जैसे वैलेंताईंस (Valentines) डे, रोज़ डे, किस डे

मनाया जाता है....


पन्द्रह दिनों की खुशी

का पखवारा ,

फिर उसके बाद

अंग्रेज़ी की पौ बारह.....

क्या मैं इतनी गिर गई हूँ?

मेरा दिवस ही

सबूत है इस

बात का

कि मैं गिर गई हूँ !!!!!!!!



शायद..............??????

शनिवार, 12 सितंबर 2009

शब्द खो गए हैं......... ढूंढ दे कोई..


मैं परेशान था,

पता नहीं कहाँ खो गए?

मेरे शब्द नहीं मिल रहे थे।

शब्द थे तो थोड़े से ही,

पर भाव ज़्यादा थे,

उन शब्दों से मैं बड़े - बड़े ख़्वाब देखता था,

कभी-कभी याद करके रोता था,

पता नहीं कहाँ खो गए?

मेरे शब्द नहीं मिल रहे थे।


बहुत दिनों से मैंने कुछ लिखा नहीं था,

और आज जब लिखने चला तो,

शब्द ही खो गए।

मैं परेशान था,

मेरे शब्द नहीं मिल रहे थे।


वो मुस्कुराते हुए,

मुझे परेशान देख रही थी।

मैंने उससे पूछा कि,

"देखें हैं तुमने मेरे शब्द कहीं ?"

उसने मासूम सा चेहरा

हिला कर कहा--------

"नहीं! नहीं तो!!!!!!!"

ठीक से देखो होंगे यहीं कहीं.............

वो बोली

छत पर देखो

कल शाम को तुम टहल रहे थे

छोड़ आए होगे किसी

फूलों कि टहनी पे...

कहीं तकिये के नीचे तो नहीं रख दिए तुमने

सोने से पहले?


मैं खामोशी से सुन रहा था,

उसके मासूम चेहरे को

देख मुस्कुरा रहा था।

कुछ शरारत सी उसकी आँखों में

मुझे नज़र आ रही थी ।

मैंने कहा कहीं तुमने तो नहीं छुपा दिए,

मुझे परेशां करने के लिए,

दे दो न मुझे मेरे शब्द

मुझे कविता लिखनी है ।


वो शर्म का परदा ओढे खड़ी थी,

अपने होठों पे ख़ामोशी सजाये थी,

अपने हाथों कि मुट्ठी

को बंद किए पीठ के

पीछे छुपाये खड़ी थी।


उसके चेहरे कि शरारत और बंद मुट्ठी

नज़र आ रही थी।

मैं आगे बढ़ा ,

वो पीछे हटी,

मैं थोड़ा और बढ़ा

वो थोड़ा और पीछे हटी........

शायद वो समझ गई थी................

मैं फिर आगे बढ़ा

और रुक गया

वो भी रुक गई......

मैंने अचानक उसे अपनी बाहों में जकड लिया,

मेरी शरारत को भांप उसने

झट से अपनी बंद मुट्ठी

मेरे आगे खोल दी,

शब्द मुट्ठी से बाहर निकल कर

काग़ज़ पर फैल गए,

और

मेरी कविता पूरी हो गई......


गुरुवार, 10 सितंबर 2009

काश! कोई तो समझ पाता मेरे दिल के हालात् !


काश! कोई समझ पाता मेरे दिल के हालात् !

कैसे कहूँ? हैं लफ्ज़ नहीं ...................

कहने को.................. ॥


एक दिन था कि हसीँ लगती थी दुनिया सारी

यह चिलचिलाती धूप भी,

हमें लगती थी प्यारी॥


आज तुम नहीं तो कुछ नहीं,

सारी दुनिया ही बेकार है

यह ज़िन्दगी रही ज़िन्दगी नहीं,

अब तो यह ज़िन्दगी बेज़ार है॥


तुम्हारे न होने से ,
काटने को दौडे यह चांदनी,
रो पड़ता हूं कभी कभी ,
जब आती हैं यादें पुरानी
दिल तो रो रहा है,
पर आँसू बहते ही नहीं ,
शायद वे भी समझ न सके ,
मेरे दिल के हालात् ॥


बंद करता है 'महफूज़ '
अपनी कलम अब यहीँ,
कोई पैगाम हो तो भेजना,
ग़र समझ सको तो समझ लेना,
मेरे दिल के हालात् ॥ ॥ ॥




महफूज़ अली

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

हम भी हमेशा के लिए सो जायेंगे! ! ! ! ! ! !



ख़्वाबों की दुनिया में जीना कितना अच्छा लगता है,


होता है वहाँ बिल्कुल वैसा जैसा कि


हम सोचते हैं।


मेरे ख्वाबों में वो आना उनका,


मुझे नींद में से जगाना उनका,


मेरे चेहरे पे अपनी जुल्फों का गिराना उनका,


अपनी खुशबू से मेरे वजूद को महकाना उनका,


वो चलना मेरे साथ उस रस्ते पे जिसकी कोई मंज़िल नही,


वो बैठ जाना किसी वीराने में मेरे साथ उनका,


और


वो तन्हाईयों को महफिल बनाना उनका।



जब -जब जागे हम नींद से आँखें मलके,


ढूँढा उन्हें तो उनका कोई निशाँ न मिला,


वो आते नहीं अब हमसे मिलने जागते हुए,


ग़र वो कह दें कि सिर्फ़ ख़्वाबों में ही मिलने आएंगे,


तो क्या ज़रूरत है मुझे जगने की ,


हम भी हमेशा के लिए सो जायेंगे॥


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