एक और बड़ा अच्छा वाक़या याद आया है। बात उन दिनों की है जब मैं दसवीं क्लास में पढता था..... हमारे एक इतिहास के टीचर हुआ करते थे.... उनका नाम तो याद नही आ रहा है..... पर लंगूर नाम से पूरा स्कूल उनको जानता था.... यह नाम भी उनका इसलिए पड़ा था.... क्यूंकि एक तो वो ख़ुद भी बड़े लाल लाल थे....और दूसरा एक बार उनकी क्लास में लंगूर बन्दर घुस आया था.... तो बेचारे डर के मारे टेबल के निचे घुस गए थे...तबसे उनका नाम लंगूर पड़ गया था...... खैर.... मैं अपने वाकये पर आता हूँ। एक बार वो हमें क्लास में इतिहास पढ़ा रहे थे..... तो किसी चैप्टर में इटली के महान दार्शनिक दांतेका ज़िक्र आया..... तो वो दांते के बारे में पढ़ा रहे थे...... तभी क्या हुआ की मेरे बगल में मेरा दोस्त अरुण साईंबाबा मुहँ बंद करके हंसने लगा.... तो हम कुछ लड़कों का गैंग था... सब उसकी उसकी ओर चोर नज़रों से देखने लगे.... हमने पुछा की 'अबे! हंस क्यूँ रहा है?' तो उसने एक और लड़के की ओर इशारा कर दिया... हमने उस लड़के की ओर देखा तो हम लोग सारी कहानी समझ गए.... की अरुण क्यूँ हंस रहा था? दरअसल हमारे साथ एक लड़का पढता था जिसके दांत बिल्कुल सीधे बाहर की ओर निकले हुए थे.... तो अब हमारी क्लास में एक और नामकरण हो गया....उस बेचारे लड़के का नामदांतेपड़ गया...... और सही बता रहा हूँ....अज भी उसको हम लोग दांते ही बुलाते हैं..... खैर ! आजकल वो भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर में ग्रेड बी का साइंटिस्ट है॥
मुझसे अक्सर यह सवाल होता है की मैं इंग्लिश को गालियाँ क्यूँ देता हूँ....?????? लोग मुझे कहते भी हैं.... की आप ख़ुद तो इंग्लिश में लिखते हैं , इंग्लिश ही ज्यादातर बोलते हैं.....तो आप इंग्लिश को गाली क्यूँ देते हैं? अब मैं इन महान लोगों को कैसे समझाउन....की मैं इंग्लिश को गाली बही देता ... बस यह है की मैं इंग्लिश का विरोधी हूँ...और वैसे भी आप किसी भी चीज़ का विरोध तभी कर पाएंगे जब आपको उसके बारे में पूरी जानकारी हो.... अब सवाल यह है की मैं इंग्लिश क्यूँ बोलता हूँ और क्यूँ लिखता हूँ....? दरअसल इसमे मेरी गलती नही है....मेरी परवरिश ही इंग्लिश में हुई है....बचपन में कॉन्वेंट में डाल दिया गया.... पूरी एजूकेशन ही इंग्लिश माध्यम से हुई..... घर में भी मेरे अभिभावकों ने अंग्रेज़ी का ही माहौल diya.... मेरी पेर्सोनालिटी भी अँगरेज़ है.... तो मैं क्या करून.....????? पर जबसे अक्ल आई है....मैंने इंग्लिश का इस्तेमाल पूरी तरह से आम ज़िन्दगी में बंद कर दिया है....और यह अक्ल आए हुए १५ साल हो गए हैं..... मैं दो बार संघ लोक सेवा आयोग के इंटरव्यू में गया हूँ....वहां भी यह सवाल हुआ की अपने पूरा एक्साम इंग्लिश में दिया ...फिर इंटरव्यू का माध्यम अपने हिन्दी क्यूँ चुना? अब वहां भी सवाल...पर अपने हिसाब से जवाब दिया मैंने..... और बेचारे संतुष्ट हो गए.... अच्छा मेरा यह मानना है की जब दो सूअर आपस में अपनी भाषा में बात करते हैं..... कोई शेर की भाषा में तो बात करता नही? क्यूँ? तो हम हिन्दुस्तानी क्यूँ नही अपनी भाषा में बात करना पसंद करते हैं.....? क्यूं हमें एक तीसरी भाषा का इस्तेमाल करना पड़ता है.... इंग्लिश तीसरी भाषा है....कैसे ज़रा यह आप लोग ही मुझे बताएँगे....फिर मैं इसका जवाब दूँगा..... इंग्लिश हें ज़रूर आनी चाहिए...वो आजकल की ज़रूरत है...पर हमें इसको अपने ऊपर हावी नही करना चाहिए..... पता नही लोगों को हिन्दी में और हिन्दी से क्या प्रॉब्लम है.... हिन्दी से मेरा मतलब क्लिष्ट हिन्दी नही है.... हिन्दी से मेरा मतलब आम हिन्दी है...जो हर हिन्दुस्तानी बोलता है,,,,.... जो हम समझते हैं..... क्या आप जानते हैं की हिन्दी का विकास क्यूँ नही हुआ..... ? क्यूंकि हमने हिन्दी के विकास के लिए कुछ भी नही किया..... अगर हम हिन्दी में कोई शब्द अंग्रेज़ी या फिर कोई और भाषा के प्रयोग करते हैं....तो ख़ुद हिन्दी वाले ही कहते हैं.... की हिन्दी में बोलो.....अरे! भाई जब हिन्दी में शब्दों की कमी है तो हमें बाहर से शब्द लेने में क्या हर्ज़ है? कुल मिला के सार यह है की अंग्रेज़ी नालायकों की भाषा है.... ज़रा अपने आस पास नज़र डाल के देखियेगा ....आपको तमाम नालायक मिल जायेंगे.... जो बड़ी बड़ी डिग्री लिए होंगे लेकिन ज्ञान के नाम पे काले धब्बे हैं॥ ज़रा गौर करियेगा....अपने आस पास... कोई न कोई शराबी ज़रूर ऐसा मिलेगा... जो की अनपढ़ होगा लेकिन शराब पीने के बाद आपको अंग्रेज़ी बोलता हुआ मिलेगा... गौर करियेगा .... सैल्समैन टाइप के लोग आपको अंग्रेज़ी बोलते हुए ज़रूर मिलेंगे.... हर कम पढ़ा लिखा हुआ आदमी आपको अंग्रेज़ी बोलता हुआ मिलेगा... जो की अपने आप को यह दिखायेगा की वोह बहुत पढ़ा लिखा है... आपको लडकियां अंग्रेज़ी बोलते हुए ही मिलेंगीं क्यूंकि बहुत कम लड़कियां ही सही मायनों में पढ़ी लिखी मिलेंगीं.... डिग्रीयां बहुत मिलेंगी उनके पास लेकिन नॉलेज कम..... सही मायनों में पढ़ा लिखा वही आदमी है....जिसने अपनी पढ़ाई को अपने अन्दर जज्ब कर लिया हो॥ जो नौलेज्वाला हो.... जिससे आप हर टोपिक पे बात कर सकते हों॥ महफूज़ अली
पेशे से प्रवक्ता और अपना व्यापार. मैंने गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम्.कॉम व डॉ. राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय,फैजाबाद से एम्.ए.(अर्थशास्त्र) तथा पूर्वांचल विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. की उपाधि ली है. I.G.N.O.U. से सन २००५ में PGJMC किया और सन् 2007 में MBA किया. पूर्णकालिक रूप से अपना व्यापार भी देख रहा हूं व शौकिया तौर पर कई कालेजों में भी अतिथि प्रवक्ता के रूप में अपनी सेवाएं देता हूं. पढ़ना और पढ़ाना मेरा शौक़ है. अंग्रेज़ी में मुझे मेरी कविता 'For a missing child' के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है. मेरी अंग्रेजी कविताओं का संकलन 'Eternal Portraits' के नाम से बाज़ार में उपलब्ध है,जो की Penguin Publishers द्वारा प्रकाशित है. अंग्रेजी में मैंने अब तक क़रीब 2600 कविताएं लिखी हैं. हंस, वागर्थ, कादम्बिनी से होते हुए ...अंतर्राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका 'पुरवाई' जो की लन्दन से प्रकाशित होती है ...में प्रकाशित हुआ, तबसे हिंदी का सफ़र जारी है... मेरी हिंदी कविताओं का संकलन 'सूखी बारिश' जो की सन् 2006 में मुदित प्रकाशन से प्रकाशित है... मैं करता हूं कि मेरा ब्लॉग मेरे पाठकों को ज़रूर अच्छा लगेगा... आपकी टिप्पणियां मेरा हौसला बढ़ाती हैं. इसलिए मेरी रचनाएं पढ़ने के बाद अपनी अमूल्य टिप्पणी ज़रूर दें.मेरा प्रमुख ब्लॉग 'लेखनी’ है.
Dreaming an old dream.......
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As an ever flowing silver stream
This in my heart this is a dream
A dream of long ago ever shining bright this in my heart
The dream of long ago will alwa...
My new doggie
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*Rex: My new doggie............ I have got a dear and treasured friend, you
may be know him tooMore humble, meek, and gentle heof human beings (Dogs) I
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