शनिवार, 14 नवंबर 2009

कहा था तुमने की कभी बुझना नहीं.....मैं लगातार जल रहा हूँ॥




कहा था तुमने की कभी रुकना नहीं

और 

मैं लगातार चल रहा हूँ॥

ज़मीन क्या , 

आस्मां पे भी मेरे पैरों के निशाँ हैं.....

मेरी हदें मुझे पहचानतीं हैं,

और 

मैंने वीरान हुए रास्तों को भी आबाद किया है॥

शांत हो के मैं ठहर जाऊँ यह असंभव है ,

लपटों को भी चीरकर मैंने खोजे हैं किनारे 

कहा था तुमने की कभी बुझना नहीं 

और 

मैं लगातार जल रहा हूँ॥ 

रविवार, 8 नवंबर 2009

काग़ज़ पर स्वीमिंग पूल .......



तरण-ताल  (Swimming-pool)

                                                                                                               लघु-कथा

नए खेल अधिकारी ने आज विभाग ज्वाइन करते ही पूरे खेल प्रांगण और विभाग का निरीक्षण किया, फिर चपरासी को सारी पुरानी फाइलें लाने का आदेश दिया.

चपरासी ने सारी फाइलें टेबल पर लाकर रख दिया. फाइलों को देखते हुए अधिकारी की नज़र ऐसी फाइल पर पडी जिसमें एक तरण-ताल का उल्लेख था, उक्त फाइल में उनके पूर्ववर्ती अधिकारी ने तरण-ताल बनवाने के लिए शासन से पचास लाख रुपये स्वीकृत कराये थे. 



उस फाइल में खेल प्रांगण में तरण-ताल के होने का उल्लेख था जिसका उदघाटन प्रदेश के खेल-मंत्री ने भी किया था.  नए अधिकारी ने पूरे खेल-प्रांगण का दोबारा निरीक्षण किया, परन्तु कहीं तरण-ताल नही दिखा, वापस ऑफिस पहुंचकर नए खेल अधिकारी ने तुंरत शासन को पत्र लिखा की जो तरण-ताल बनवाया गया था, उसमें पिछले दो महीने में दस लोग डूब कर मर गए हैं तथा जनता की बेहद मांग पर उक्त तरण-ताल को बन्द करना पड़ रहा है.  कृपया तरण-ताल को भरने के  लिए पचास लाख रुपये जल्द-से-जल्द स्वीकृत करें....


सोमवार, 2 नवंबर 2009

तुम प्यार से मनाने का तरीका सीख लो..........




शब्दों के जाल में उलझने की बजाये ,

हाव-भाव से दिल का हाल जान लो तुम।

एक सुरक्षित सहारा ....... एक ऐसा आगोश,

जहाँ दुनिया के किसी खतरे से डर न लगे॥

तारीफ़ की दरकार है मुझे..... 



कोई तो हो जिसकी , 


नज़रों में सिर्फ़ मेरा ही अक्स नज़र आए॥

मैं भी पहचान रखता हूँ, अपना मुकाम रखता हूँ,

इसे कोई मेरा अहम् न समझे, स्वाभिमान समझे॥

मेरी भावुकता को कमजोरी न समझे! 



जो दिल का सम्मान करे,

वही सच्चा साथी॥

मुझसे बात करो! 




संवाद का सोता सूखा,

तो शरीर का सम्बन्ध भी फीका लगता है॥

मैं उड़ना चाहता हूँ, आगे बढ़ना चाहता हूँ,

मगर तुम्हारे साथ, तुम्हारे सहारे! 



बोलो ! क्या मंज़ूर है?

ग़र मैं उलझ जाऊँ, नाराज़ हो जाऊँ तो..... 

तुम प्यार से मनाने का तरीका सीख लो॥

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

...मत बनाना मेरा बुत, मेरी मौत के बाद....




मैं हमेशा चलना चाहता हूँ, 


बोलना  चाहता हूँ, 


सुनना  चाहता हूँ,


मत बनाना मेरा बुत,


मेरी मौत के बाद,


क्यूंकि


मैं नहीं चाहता बहरा , 


गूंगा और निश्चल होना.........











महफूज़ अली

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

मुझे हर पल ज़रुरत है तुम्हारी, मत छोड़ो साथ मेरा कि आँसू भी साथ न निभा पायें .....



अहसास साथ हैं,
हर पल
हर वक्त
पर ऐसा लगता है
की
खोया हुआ सा है कुछ।
नही हो तुम मेरी कल्पना
हो तुम मेरा यथार्थ
ख़ुद राह मैं तलाशूंगा
जब तुम दोगी
मेरा साथ।
मुझे हर पल ज़रुरत है तुम्हारी,
जलते रहने के लिए,
धड़कते रहने के लिए,
मत आओ एक हवा के झोंके की तरह
मेरी ज़िन्दगी में ,
जो बुझा जाये मेरी लौ को।
मत छोडो अकेला मुझे,
एक ऐसे मोड़ पे ,
जहाँ वक़्त भी मेरा साथ न दे पाए ,
मुस्कान भी रूठ जाए ,
और ........................
आंसू भी साथ न निभा पाए ।।

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