बुधवार, 6 जनवरी 2010

मैं झूठ नहीं बोलता: महफूज़




मैं झूठ नहीं बोलता,
साहित्य-कला से क्या लेना?
ढूंढ रहा खुद को मैं,
खोज रहा प्याज़,
छिलकों में.....


84 टिप्पणियाँ:

गिरिजेश राव, Girijesh Rao ने कहा…

वाह, वाह
nice
हमरा नाम काहें दिए ?

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } ने कहा…

waah waah

शबनम खान ने कहा…

wah mehfooz ji....kya likh dala aapne
sar k upar se nikal gaya.......

M VERMA ने कहा…

जो प्याज के छिलको के परत-दर परत में ढूढ रहा है वह कैसे कह सकता है "साहित्य-कला से क्या लेना?"
शायद परत-दर परत का सत्य ही तो साहित्य है

स्वप्न मञ्जूषा ने कहा…

@शबनम जी,
वो तो दिखाई दे रहा है...सब सर के ऊपर से जा रहा है...
फोटू भी ले ली आपने ..:):)

Mithilesh dubey ने कहा…

भाई सच बताऊं तो कभी कभी लगता है कि क्या आप महफूज भाई ही हैं या कोई और , भाई इतना डूब कर तो बहुत कम लोग ही इच्छा रखते हैं और साहस । बढ़िया रचना , परन्तु ये लेबल का चक्कर कुछ समझ नही आया ।

शरद कोकास ने कहा…

इस कविता में पाँच पंक्तियों में पाँच

स्वप्न मञ्जूषा ने कहा…

महफूज़ मियाँ,
अब क्या त्रिवेणी लिखने का बुखार चढ़ा है..
मेरे भी सर के ऊपर से निकल रहा है ये तो ...
फिर भी कोशिश करते हैं समझने की
अरे बाबा...छिलके में प्याज मत ढूंढिए...
थोड़ा और गहरे जाइए...मिल जायेगी प्याज़ ...
वैसे यहाँ सबका यही हाल है.....हाँ ये अलग बात है कि लोग छिलके को ही प्याज समझे बैठे हैं और खुश हैं...

अबयज़ ख़ान ने कहा…

शबनम और अदा ने बढ़िया कमेंट्स दिये हैं.. अरे प्याज के छिलके से बाहर निकलिए... बहुत खूब

Arvind Mishra ने कहा…

अगर इसे यूं कहा जाय तो ....प्याज में छिलकों को खोल/खोज रहा हूँ तब ?
अक्सर सत्य प्याज के छिलकों में परत दर परत बाद कहीं छुपा होता है !
उऊपर की सतहों से ही न्याय कर देना ठीक नहीं है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बात कहने का ये लहजा भी खूब रहा!
प्याज के छिलके उतारने में तो
आँसू आ जाते हैं।

बेनामी ने कहा…

सच बोलिएगा
ये हाथ किसके हैं?

बी एस पाबला

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

भाई,
पावला जी की बातो में दम है , सच बता ही
दीजिये - ये हाथ किसके हैं ?

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

महफूज़ भाई बहुत बढ़िया काम कर रहे है करते रहिए ऐसे ही अचानक किसी दिन बहुत बड़े वैज्ञानिक बन जाएँगे...

अजय कुमार झा ने कहा…

हुम्म्म ! अब समझे कि ई ससुर प्याज एतना महंगा काहे हो रहा है । सब ठो तो आप छील छील के साहित्य साहित्य ढूंढ रहे हैं । मिल गया हो तो तनिक रसोई का भी ख्याल किया जाए । अरे हमरा नहीं महाराज अपना तो दाल रोटी मजे में चल रहा है . मगर आप काहे किसी के पेट पे लात ...नहीं नहीं प्याज मारते हैं जी ...

Amrendra Nath Tripathi ने कहा…

का भाई !
हमारे आने के बाद से पियाज
निकोलने में उलझ गए !

बवाल ने कहा…

क्या ही ख़ूब कहते हो भाईजान। वाह वाह।

Kusum Thakur ने कहा…

वाह वाह ....

Udan Tashtari ने कहा…

देखता हूँ

उसकी गहरी आँखों से

टप टप गिरते

वो आँसूं...

-प्याज छिल कर आया है अभी!!!


:)

राजीव तनेजा ने कहा…

परत दर परत किसे खोज रहा है बंदे?...मैं तो तेरे अन्दर ही विद्यमान हूँ

मनोज कुमार ने कहा…

पियाज छीलने से तो हमने भी सुना है आंसुए निकलने लगता है।

shikha varshney ने कहा…

जितने प्याज के छिलके छिलोगे उतने आंसू निकलेंगे ..बेहतर होगा की एक परत निकालो और काम चलाओ :) सब यही करते हैं ...हम भी ....ही ही ही.

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर!!
सभी यही तो कर रहे हैं...
अपनी अपनी तलाश।

संगीता पुरी ने कहा…

वाह !! वाह !!

राज भाटिय़ा ने कहा…

क्या बात है जी

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" ने कहा…

कम शब्दों में बहुत गहरी बात कह गए!!
मन की पर्तें खोलने पर ही किसी सत्य को जाना जा सकता है........

वाणी गीत ने कहा…

प्याज की तरह है जिंदगी भी ...छिलका छिलका उतरते बीत जाती है ...परते उघाड़ते आंसू भी खूब आते हैं मगर आखिर जो बचता है मीठा तीखा अलहदा सा स्वाद वही जिंदगी है ...
ओवन में तपाना अच्छा ही रहा ....!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

;-) Wah ........

Khushdeep Sehgal ने कहा…

बब्बन खान का बड़ा मशहूर नाटक रहा है...अदरक के पंजे...

अब महफूज़ अली लाए हैं...प्याज के छिलके

बब्बन खान ने साठ देशों में दस हज़ार से अधिक शो करके गिनीज़ बुक रिकॉर्ड बनाया...

महफूज़ अपने आप में ही एक रिकॉर्ड हैं...

जय हिंद...

हास्यफुहार ने कहा…

वाह...

36solutions ने कहा…

प्याज छिलको मे भी अपने प्याज होने के गुण धर्म लिये होता है, परत दर परत.

छिलको का आपसी सम्बन्ध उसे प्याज का पहचान देता है.

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

हम सारा जीवन प्याज छीलने में ही ब‍िता देते हैं अंत में हाथ आता है .. श‍िफर.

.. वैसे खुद को ढूंढ रहे हैं तो क‍िसी गुठली वाले फल में ढूंढते.... कुछ न कुछ तो है आपके अंदर.

Unknown ने कहा…

"मैं झूठ नहीं बोलता ..."

पछताओगे भैया! तत्काल शुरू कर दो झूठ बोलना!!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

pyaaz ke chhilkon me jivan ka rahasya hai,seekh hai......prat-dar-parat badhte jao,aankhon se bahta pani uski bhasha ban jati hai

Dr. kavita 'kiran' (poetess) ने कहा…

hamara sahitya-kala se len-den hai tabhi naa ham sab yahan hain.chhilkon me pyaz khojne ke bajay aap registan me pani bhi talash kar sakte the mahfooz sahab!ha ha ha.

Randhir Singh Suman ने कहा…

nice

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

खोजता हूँ प्याज छिलकों में.........
बहुत खूब !
और चित्र में छिल आलू रहे हो :)

Jyoti Verma ने कहा…

bahut sundar kavita!

ρяєєтii ने कहा…

Pyaaj Sachaai aur atut-ta ka pratik hai bro... Sacchai uske kaatne per aasuo ki aur ek dusre se chilka juda ho tabhi pyaaj kahlata hai warna mahaz chilka hi rah jata hai...!

Bahot gahri baat kah gaye ho tum...

संजय बेंगाणी ने कहा…

छिलका छिलका प्याज है...खूब.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

महफूज़ जी छिलकों के अन्दर जो आपने सच्चाई छिपा रखी है वो हम सब जानते हैं ....ये भी कि आप झूठ नहीं बोलते ....अब छोडिये राज़ को राज़ ही रहने दें ......!!

vandan gupta ने कहा…

mahfooz

kya baat kah di..........bahut khoob.

Anil Pusadkar ने कहा…

झूठ तो मैं भी नही बोलता और बचपन से लेकर आज तक़ सिर्फ़ नुकसान ही उठाते आया हूं,देखना सोचना फ़िर से और हो सके तो फ़िर से विचार करना।

रंजू भाटिया ने कहा…

बहुत खूब ..प्याज के छिलकों में सत्य का सार ..बहुत बढ़िया शुक्रिया

Razi Shahab ने कहा…

achcha hai mile to batayiye ga

निर्मला कपिला ने कहा…

सरासर झूठ बोल रहे हो मैने प्याज देखा उसमे तो तुम नहीं थे। हा हा हा अब निश्चिन्त होजाओ कहीं और खोजो खुद को आशीर्वाद्

Unknown ने कहा…

MUJHE KUCHH BHI SAMJH ME NAHI AAYA ....MRE SAR KE DO HATH UPAR SE GUJAR GAYE SARE SHBAD..PLZ AAP ISAKI VYAKHYA KIJIYE....

Dr. Zakir Ali Rajnish ने कहा…

ये सब क्या है?
जुकाम ठीक हुआ की नहीं?

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उम्दा सोच ने कहा…

प्याज और प्यार दोनों में बड़ी समानता है ,दोनों को ढूँढने के लिए छिलका उतारना पड़ता है !

रचना दीक्षित ने कहा…

अजी जनाब आज जा के पता चला प्याज़ के महंगे होने का राज़ सरे तो आप ही ने छील डाले.हमारी रसोई का तो कुछ ख्याल करते.वैसे सही कहा है मैं भी जा रही हूँ प्याज़ छीलने

Sulabh Jaiswal "सुलभ" ने कहा…

प्याज छिलना और कुछ भी नहीं पाना
यही सत्य अन्वेषण है.
जब तक जीवन है यह खोज जारी रहे.

- सुलभ

pallavi trivedi ने कहा…

सभी को अपनी अपनी तलाश है....पर अभी तक किसी की पूरी हुई हो, ऐसा कोई नहीं मिला!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कभी कभी जिंदगी उलझ जाती है ढूँढती है परत दर परत ....... गहरी बात ......

संजय भास्‍कर ने कहा…

bhai sahab namaskar
kamal hail aap..........

संजय भास्‍कर ने कहा…

पियाज छीलने से तो हमने भी सुना है आंसुए निकलने लगता है।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सचमुच बढिया है.

sanjay vyas ने कहा…

वाह!अंजुरी में सागर.

Preeti tailor ने कहा…

pasand aa gaya ye andaaj...

Murari Pareek ने कहा…

वाह!!! इन दो पंक्तियों में जितना अर्थ लगा सकते हैं उतना कम है ! कई रामायणकार पुस्तके भी कम पड़ जाएँगी!!!

समयचक्र ने कहा…

हर कोई अपने आपको खुद खोज रहा है ..... वाह भाई ..

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

प्याज़ में तो आंसू मिलेंगे महफ़ूज़ भाई :)

Unknown ने कहा…

vrey nice...!!

पंकज ने कहा…

प्याज का पतला सा छिलका कितना कुछ कह गया. हाँ, गिरिजेश के पोस्ट से पता चला कि इस प्याज के पकोड़े तो आपने खा लिये और छिलके हमारे लिये पेश कर दिये.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

वाह महफूज़ भाई।
गागर में सागर।
आदमी गर खुद को पहचान ले तो फिर समझो गंगा स्नान हो गया, हज भी हो गई।
बहुत गहरी बात कही है आज आपने , बधाई।

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

प्याज में प्याज ढूँढना यही सत्य है :)

गिरिजेश राव, Girijesh Rao ने कहा…

मैं झूठ नहीं बोलता, - ईमानदार स्वीकार, आगे की चार पंक्तियों पर लागू। भीतर की यात्रा इसके बाद ही प्रारम्भ होती है।

साहित्य-कला से क्या लेना? - साहित्य और कला भी तो उस यात्रा के साधन हैं। महफूजिया बयान - उनके लिए जो 'साधन पाखण्ड साधना' करते हैं।

ढूंढ रहा खुद को मैं, कह ही दिए

खोज रहा प्याज़,
छिलकों में..... पर्तें, आँसू भरी यातनाएँ, मर्म के लिए तड़पन, कहीं अंत में भीतर संघनित अस्तित्त्व के होने का भ्रम और चलते जाना ...न समझना कि छिलके ही तो प्याज हैं। उन्हें क्या उतारना। बस जान लेना काफी नहीं क्या कि पर्ते हैं, होती हैं, रहेंगी। उनका रहना ही तो जीवन है।

विवेक रस्तोगी ने कहा…

सबकी टिप्पणी पढ़ ली पर किसी को यह चिंता नहीं है कि आप किसकी प्याज छील रहे हो और क्यों, ये कौन से भाव वाली प्याज है, कितने की है, ठेले से खरीदी है या किसी एयर कंडीशन्ड मॉल से, खैर कहीं से भी आई हो इस प्याज के भाग्य में केवल छिलना ही लिखा है, और हमेशा छिलती ही रहेगी। छीलते रहिये छीलते रहिये कभी न कभी तो आपको जो चाहिये वह मिल जायेगा।

अर्चना तिवारी ने कहा…

बहुत खूब..गागर में सागर...क्या बात है

Unknown ने कहा…

बहुत दूर की सोचते हो यार। देखकर तो ऐसा ही लगता है। बहुत खूब।

Pratik Maheshwari ने कहा…

वाह जनाब क्या तुलना की है आपने.. मान गए :)

ज़मीर ने कहा…

Choti rachna , arth bada. Bahut acha laga. Nai saal ki shubhkamnay.

ओम आर्य ने कहा…

Is baar sir se upar gayee !!

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

kash kuchh aur badi hoti post.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

प्याज की हर परत छिलका बन गयी
इसी तरह कुछ हमारी ज़िन्दगी बन गयी.

Urmi ने कहा…

आपको और आपके परिवार को नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया रचना लिखा है आपने!

Asha Joglekar ने कहा…

एतना प्याज छीलेंगे तो आंसू ही मिलेंगे और आंसुओं से ही बेहतरीन साहित्य रचा जाता है ।

Asha Joglekar ने कहा…

एतना प्याज छीलेंगे तो आंसू ही मिलेंगे और आंसुओं से ही बेहतरीन साहित्य रचा जाता है ।

alka mishra ने कहा…

मैं भी झूठ नहीं बोलती ...
मैं आपकी "जी ...........अच्छा................" का कब से इन्तिज़ार कर रही हूँ

शोभना चौरे ने कहा…

खोज रहा प्याज़,
छिलकों में...
ye to apni apni samjh hai vaise chilke aaps me jude hai isiliye vo pyaj ban gya hai .vaise pyaj achhe ko rula deta hai srkare gira deta hai to jyda mat chiliye
pyaj ko sabut hi rhne dijiye .

सदा ने कहा…

खोजता हूँ प्याज छिलकों में.....वाह, बहुत ही खूब अन्‍दाज साहित्‍य प्रस्‍तुति का बधाई ।

Murari Pareek ने कहा…

अभी तक प्याज ही छिल रहे हैं क्या!!

शेफाली पाण्डे ने कहा…

dikha rahe ho seb...kah rahe ho pyaaj....aisa kyun?

Himanshu Pandey ने कहा…

गिरिजेश भईया की टिप्पणी पढ़कर आपकी इस रचना को समझना आसान है । देर से आया हूँ इसलिये कुछ न कहूँगा ।

आभार ।

vijay budki ने कहा…

aap ke qalam ko mera salam.allah kare zore qalam aur ziyada!

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