मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

मुझे हर पल ज़रुरत है तुम्हारी, मत छोड़ो साथ मेरा कि आँसू भी साथ न निभा पायें .....



अहसास साथ हैं,
हर पल
हर वक्त
पर ऐसा लगता है
की
खोया हुआ सा है कुछ।
नही हो तुम मेरी कल्पना
हो तुम मेरा यथार्थ
ख़ुद राह मैं तलाशूंगा
जब तुम दोगी
मेरा साथ।
मुझे हर पल ज़रुरत है तुम्हारी,
जलते रहने के लिए,
धड़कते रहने के लिए,
मत आओ एक हवा के झोंके की तरह
मेरी ज़िन्दगी में ,
जो बुझा जाये मेरी लौ को।
मत छोडो अकेला मुझे,
एक ऐसे मोड़ पे ,
जहाँ वक़्त भी मेरा साथ न दे पाए ,
मुस्कान भी रूठ जाए ,
और ........................
आंसू भी साथ न निभा पाए ।।

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

वादा करो छोडोगी नहीं तुम मेरा साथ.....



तन्हाई में जब मैं
अकेला होता हूँ,
तुम पास आकर दबे पाँव
चूम कर मेरे गालों को,
मुझे चौंका देती हो,
मैं ठगा सा,
तुम्हें निहारता हूँ,
तुम्हारी बाहों में, 
मदहोश हो कर खो जाता हूँ.
सोच रहा हूँ.....
कि अब की बार तुम आओगी,
तो नापूंगा तुम्हारे
प्यार की गहराई को....
आखिर कहाँ खो जाता है
मेरा सारा दुःख और गुस्सा ?
पाकर साथ तुम्हारा,
भूल जाता हूँ मैं अपना सारा दर्द
देख कर तुम्हारी मुस्कान और बदमाशियां....
मैं जी उठता हूँ,
जब तुम,
लेकर मेरा हाथ अपने हाथों में,
कहती हो.......
मेरे बहुत करीब आकर
कि रहेंगे हम 
साथ हरदम...हमेशा....

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

आइये जानें क्यों यूरोपीय व कुछ एशियाई देश शून्य (ज़ीरो) को 'ओ' (O) बोलतें हैं?


काफी लोगों को मालूम है कि पूरा यूरोप और एशिया के कुछ देश (जिसमें भारत यानि  कि That is India भी) ज़ीरो यानि कि शून्य को ज़ीरो यानि कि शून्य नहीं बोलतें हैं. अंग्रेज़ी का 'O' (ओ) अक्षर बोलतें हैं. अब सौ कि वर्तनी अंग्रेज़ी में बोलनी है तो वो वन ओ ओ बोला जाएगा, वन ज़ीरो(शून्य) ज़ीरो(शून्य) नहीं. यह हम में से सबने देखा भी है और सुना भी है. पर यह यूरोप और कुछ एशिया के देशों में ही प्रचलित है.   अब तो कुछ तथाकथित खुद को नस्ल से भारतीय कहने वाले भी शून्य (ज़ीरो) को 'ओ' ही बोलते हैं, और 'ओ' बोलने में फख़्र महसूस करते हैं. आखिर ऐसा क्या और क्यूँ है जो यूरोपीय और कुछ एशिया के देश ज़ीरो यानि कि शून्य को अंग्रेज़ी का 'ओ '(O) बोलते हैं? आइये यह जानने से पहले शून्य (ZERO) का इतिहास जान लें?

शून्य (ज़ीरो) का इतिहास:---

इसमें कोई शक नहीं कि शून्य (ज़ीरो) के आविष्कार का श्रेय भारत को जाता है. इसको शुरू से डॉट (.) के रूप में लिखा जाता रहा है या फिर गोलाकार रूप में लिखा जाता है. इसको डॉट (.) या गोलाकार रूप में इसलिए लिखा जाता है/था क्यूंकि गोलाकार का मतलब "घूम फिर के वही" होता है यानि कि कुछ नहीं. संस्कृत में भी शून्य का मतलब कुछ नहीं होता है. और यह गोलाकार रूप में लिखना भी संस्कृत से ही निकला है..

इतिहासकार मानते हैं कि सन 458 A.D. से शून्य (ज़ीरो) अस्तित्व में आया. परन्तु इसपर काफी मतभेद है. पुरातन काल में अंकों को प्राकृतिक चीज़ों को आधार बना कर लिखा जाता था. उदाहरण के तौर पर: अगर १ लिखना है तो चाँद या सूरज बना कर लिख दिया जाता था, २ लिखना है तो दो आँखें बना कर लिख दिया जाता था. इसी तरह दशमलव प्रणाली के तहत शून्य को डॉट (.) या फिर गोलाकार रूप में लिख दिया जाता था. यह भारतीय ही थे जिन्होंने दशमलव प्रणाली (Decimal Point Sysytem) का आविष्कार किया और इसी के साथ शून्य (ज़ीरो) का आविष्कार हुआ.

शून्य (ज़ीरो) के बारे में सबसे पहले महान गणितज्ञ 'ब्रह्मगुप्त' (598-660 A.D)  जिनका जन्म मुल्तान (अब पाकिस्तान में) हुआ,  ने अपनी पुस्तक "ब्रह्मगुप्त सिद्धांत" में दिया. जिसको बाद में भारतीय गणितज्ञ 'भास्कर' (1114-1185A.D.) ने थोडा संशोधित करते हुए, अपनी पुस्तक "लीलावती' में विस्तारपूर्वक लिखा. शून्य (ज़ीरो) के आविष्कार से ही प्रेरित होकर भारतीयों ने ऋणात्मक अंकों का आविष्कार किया और बाद में बीज गणित (algebra) को विकसित किया. 
आठवीं शताब्दी के दौरान बग़दाद के राजा "खोलोफ़-अल-मंसूर" ने अपने कुछ दरबारियों को भारत के सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान में) गणित, ख़गोल-शास्त्र, तथा चिकित्सा-शास्त्र पढने के लिए भेजा. यह दरबारी अपने साथ कुछ महत्वपूर्ण किताबें भी ले गए, जिनको इन्होने अरबी भाषा में रूपांतरित/अनुवाद किया.

अरब के प्रसिद्ध गणितज्ञ अल-ख्वारिज़मी (790 AD-850AD) सन 830 A.D. में  भारत आये और भारतीय अंक प्रणाली को पूरे विश्व में अपनी किताब 'हिसाब-अल-जब्र-व-अल-मुकाबीलाह' के द्वारा प्रसिद्ध किया. इन्होने संस्कृत शब्द 'शून्य' को अरबी में 'सिफ़्र' अनुवाद किया, जिसका मतलब कुछ नहीं होता है. यही 'सिफ़्र' लैटिन में "ज़फ्यर" (ZEPHYR) हो गया. जो आगे चल कर फ्रेंच में zero (ज़ीरो) हो गया.... और यही ज़ीरो फ्रेंच से अंग्रेज़ी में आ गया... 
आज पूरे विश्व में ज़ीरो (शून्य) के आविष्कार से भारत कि एक अलग महत्ता है. 

आइये अब जानें क्यूँ यूरोपीय व कुछ एशियाई देश शून्य (ज़ीरो) को 'ओ' (O) बोलतें हैं? 

अब जैसा कि हम सब को मालूम है कि शून्य (ज़ीरो) भारत की देन है. और शून्य (ज़ीरो) को अंग्रेज़ी के "O" आकार में लिखते हैं जिसको जब हम लिखते हैं तो जहाँ से शुरू करते हैं तो वहीँ पर ख़त्म भी करते हैं. और शून्य का मतलब "कुछ नहीं" होता है. यानी की घूम-फिर के वही. हमें यह भी मालूम है कि यूरोपियन देशों में भारत को सपेरों का देश कहा जाता है, तो इन यूरोपिअनों से कभी बर्दाश्त नहीं हुआ कि कैसे एक सपेरों के देश ने शून्य (ज़ीरो) का आविष्कार कर दिया? जबकि सारे महत्वपूर्ण आविष्कार यूरोपीय देशों में ही हुए हैं. यूरोपियन देश भारत को नीचा दिखाने के लिए शून्य या फिर ज़ीरो नहीं बोलते हैं.... ज़ीरो भी इसलिए नहीं बोलते हैं...  क्यूंकि लैटिन भाषा कि उत्पत्ति स्पेनिश और पोर्टुगुइसे(Portuguese) भाषा  से हुई है... और स्पेन,फ्रांस और पुर्तगाल ब्रिटिश और अमरीकन साम्राज्य (COLONY) रहे हैं..... जिनको अपनाना यूरोपियन देशों कि शान के खिलाफ रहा है.....
और यही रवैया यह देश भारत के साथ अपनाते हैं... यूरोपियन देशों के स्कूलों में शून्य (ज़ीरो) नहीं बताते हैं.... अगर हम इन्टरनेट पर भी शून्य से सम्बंधित लेख देखें तो उन लेखों में यूरोपियन टच मिलेगा...... न कि भारतीय....  यह देश शून्य या ज़ीरो न बोल के हम भारतीयों कि बेईज्ज़ती करते हैं, तथा हमारी उपलब्धियों को नकारते हैं... 1956 में एक अमरीकन फिल्म "ALEXANDER THE GREAT" आई थी उसमें भी यही बताया गया था कि ज़ीरो यानि कि शून्य का आविष्कार PTOLEMY ने किया था. जिस पर भारत कि ओर से कोई बहस नहीं कि गई थी. 
आज विडम्बना यह भी देखिये.... कि कई भारतीय भी अब शून्य यानी कि ज़ीरो को 'ओ' (O) ही बोलते हैं. शायद वो जानते नहीं हैं.... कि 'ओ' (O) बोल कर खुद कि ही बेईज्ज़ती कर रहें हैं. 


सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

हौले से तुम्हारे कानों में कहता हूँ कि आई लव यू...



किस वक़्त कहूँ मैं कि ,
आई लव यू?
उस वक़्त जब तुम मुझे 
देख हलके से मुस्कुरा देती हो?
या उस वक़्त जब मैं परेशां 
होकर तुम्हे देखता हूँ,
और तुम मेरे हाथों में अपना हाथ देकर,
मेरी सारी परेशानी समेट लेती हो?
तुम रूठ जाती हो,
मेरी किसी बात पर 
मैं मनाता हूँ और,
तुम फिर छुईमुई सी 
मेरे सीने से लग जाती हो,
और मैं तुम्हारे काले बालों को 
पीछे सरका कर,
हौले से तुम्हारे कानों में कहता हूँ,
यही बारम्बार,
कि 
आई लव यू,
आई लव यू.......

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

आरती ओम् जय जगदीश हरे का सच..... आईये जानें इसको और इस आरती के जनक को......



शारदा राम "फिल्लौरी" 19वीं शताब्दी के प्रमुख सनातनी धर्मात्मा थे. एक समाज सुधारक होने के साथ-साथ उन्होंने हिंदी तथा पंजाबी साहित्य क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किये. आधुनिक हिंदी के क्रमिक (Gradual) विकास में इनका अप्रतिम योगदान कभी न भुलाया जा सकेगा. 

बहुत कम लोग ही इस सच्चाई से वाकिफ होंगे कि दुनिया भर में प्रसिद्ध  प्रार्थना (आरती) 'ओम् जय जगदीश हरे' जो आज पूरे दुनिया में हिन्दू परिवारों में पूजा पद्धति के रूप में गाई जाती है के जनक(Father) श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" थे. उनके द्वारा लिपिबद्ध कि गई यह प्रार्थना (आरती) उनके अपने जीवन काल में ही एक नई ऊंचाई को छू लिया था. श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" के लिए श्रद्धा का मतलब इश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण था. 
मात पिता तुम मेरे,शरण गहूं मैं किसकी ,
तुम बिन और न दूजा,आस करूं मैं जिसकी...
भक्ति-भाव के प्रति समर्पण इनके द्वारा लिपिबद्ध कि गई प्रार्थना (आरती) के एक-एक पंक्ति में स्पष्ट रूप से झलकता है. वे दृढ रूप से इश्वर के प्रति समर्पण में विश्वास रखते थे.  सत्यधर्म व शतोपदेश ने श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" को अनंत समर्पण के कवि के रूप में स्थापित किया तथा उनके कार्यों को भक्तिकाल के तुलसीदास व सूरदास के समकालीन माना. 

श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" का जन्म जालंधर (पंजाब) के एक गाँव फिल्लौर के ब्राह्मण परिवार में 30 सितम्बर 1837 को हुआ था. इनके पिता श्री. जय दयालु जाने-माने ज्योतिषी थे. अपने पुत्र के जन्म के समय ही उन्होंने भविष्यवाणी कर दी थी कि उनका उनका पुत्र अपने अल्पकाल के जीवन में यश-कीर्ति कमाएगा और उनकी यह भविष्यवाणी सच साबित हुई. श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" ने गुरमुखी  भाषा व लिपि का अध्ययन सन 1844 में सात साल कि उम्र में कर लिया था.

बाद के सालों में उन्होंने हिंदी, संस्कृत, फारसी और ज्योतिष कि भी शिक्षा ली तथा सन 1850 में संगीत विशारद कि उपाधि ली. श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" का विवाह सिख औरत महताब कौर से हुआ था.  सन 1858 में श्री. शारदा राम की मुलाक़ात एक ईसाई पादरी न्यूटन (NEUTAN) से हुई तथा सन 1868 में उन्होंने गुरमुखी भाषा व लिपि में पहली बार बाइबल का अनुवाद किया. 

"सिखां दे राज दी विथिया" और "पंजाबी बातचीत" गुरमुखी लिपि में श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" की यादगार रचनाएँ हैं. "सिखां दे राज दी विथिया" (प्रकाशन 1866)और "पंजाबी बातचीत" ऐसी प्रथम किताबें हैं जिनका अनुवाद गुरमुखी लिपि से रोमन लिपि में हुआ है. "सिखां दे राज दी विथिया" के सृजन ने शारदा राम को आधुनिक गद्य के जनक के रूप में स्थापित किया. यह किताब तीन अध्यायों में है. इसके आखिरी अध्याय में पंजाब के रीती-रिवाज़ , आम बोल-चाल के शब्द तथा लोक संगीत के बारे में जानकारी दी गई है. इसी कारण से इस किताब को पंजाब में पाठ्य-पुस्तक के रूप में उच्च शिक्षा के लिए निर्धारित किया गया था. 

"पंजाबी बातचीत" में पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित कहावतें, मुहावरों व क्षेत्रीय भाषा शैली का चित्रण किया गया है. पंजाबी शब्दकोष से लुप्त हो चुके तथा दुर्लभ शब्दों को पाठक पंजाबी बातचीत में खोज सकते हैं. ब्रिटिश काल में भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश लेने के लिए ब्रिटिशों और भारतियों को पंजाबी बातचीत पर आधारित विस्तार पूर्ण (Subjective) परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य (Mandatory) था. 

श्री. शारदा राम भारत के प्रथम उपन्यासकार के रूप में भी जाने जाते हैं. उनके द्वारा लिखित प्रथम हिंदी उपन्यास "भाग्यवती" जिसको निर्मल प्रकाशन ने सन 1888 में प्रकाशित किया था. इस उपन्यास की केंद्रीय पात्र एक स्त्री भाग्यवती है जो लड़की के पैदा होने पर अपने पति को समझाती है की लड़का और लड़की में कोई भेद नहीं है. इस उपन्यास में श्री. शारदा राम ने  बाल-विवाह, दहेज़-प्रथा व शिशु (बालिका) -हत्या का प्रबल विरोध किया है तथा विधवा-विवाह व प्रौढ़-शिक्षा का घोर समर्थन किया है. इसी वजह से यह उपन्यास अपने समय से काफी आगे था. दिलचस्प बात यह है कि उस ज़माने में यह उपन्यास माता-पिता द्वारा अपनी बेतिओं को उनके विवाह के समय दहेज़ स्वरुप भेंट किया जाता था. 

ऐसा माना जाता है कि भारत का प्रथम हिंदी उपन्यास सन् 1902 में प्रकाशित "प्रीक्षा-गुरु" (PRIKSHA-GURU) था जिसके लेखक श्री. लाला श्रीनिवास थे. परन्तु डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी जो कि गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर में हिंदी विभाग में प्रोफ़ेसर हैं, के खोजों  व ऐतिहासिक तथ्य के अनुसार भारत का प्रथम हिंदी उपन्यास "भाग्यवती" था जिसने भारतीय साहित्य के इतिहास को दोबारा लिखने को मजबूर कर दिया. 

श्री. शारदा राम "फिल्लौरी" एक श्रेष्ठ चिन्तक होने के साथ - साथ स्वतंत्र विचारों वाले व्यक्ति थे तथा वेदों व शास्त्रों की व्याख्या अपनी सोच व ढंग से किया करते थे. श्री. शारदा राम "फिल्लौरी ने देश की आज़ादी के आन्दोलनों में भी हिस्सा लिया था. महाभारत से उद्धृत अपने भाषणों का इस्तेमाल उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ किया था. जिसके लिए अंग्रेज़ों ने उन्हें अपने गाँव फिल्लौर से देश निकला दे दिया था. 

इसे विड़म्बना ही कहेंगे की जिस प्रार्थना (आरती) 'ओम् जय जगदीश हरे' से विश्व भर के हिन्दू अपनी दिनचर्या की शुरुआत करते हैं उसी प्रार्थना (आरती) के जनक को भुला चुके है. श्री. शारदा राम "फिल्लौरी का देहांत मात्र 44 वर्ष की अल्प आयु में 24 जून 1881 को लाहौर में हुआ. 

अपने साहित्यिक अनुसरण और भाषणों से श्री. शारदा राम "फिल्लौरी ने न सिर्फ पंजाबी साहित्य में महत्वपूर्ण विकास किया बल्कि हिंदी साहित्य को भी अपने अप्रतिम योगदान से एक नया आयाम दिया.


Sources (सन्दर्भ) :--
१. गुरु नानक विश्वविद्यालय, अमृतसर. (फोटो भी यहीं से लिया है)
२. डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी (प्रो. व डीन हिंदी विभाग GNDU, अमृतसर.... किसी भी प्रकार का शुबह होने पर इनसे इस नंबर पर 9356133665 संपर्क  किया जा सकता है.)
३. प्रस्तुत लेख सत्य तथ्यों और स्वयं किये गए शोध  पर आधारित है. 
(आप सब को दीपावली कि हार्दिक शुभकामनाएं....)

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