सोमवार, 31 मई 2010

शेक्सपियर ग़लत था.... नाम में बहुत कुछ रखा है.... : महफूज़

दुनिया में इन्सान जब जन्म लेता है, तब वह अपने साथ कोई नाम नहीं लाता. हाँ! फ़ौरी तौर पर उसका नामकरण कर दिया जाता है. जैसे:- पप्पू, बिल्लू, पिंकी, चिंटू, बाबू.. आदि और भी बहुत से नाम. नाम तो पैदा होने के कुछ दिनों पर रखा जाता है, जिसे  हम बाकायदा नामकरण संस्कार कहते हैं, ताकि परिवार, समाज, गाँव, राष्ट्र और दुनिया में लोग उसे उस नाम से पहचानें और पुकारें, और यह परंपरा हर जगह, हर समाज में प्रचलित है. सामाजिक सरोकार में भी उस नाम से ही व्यवहार किया जाता है. सृष्टि के प्रारम्भ से ही हमारी धार्मिक क़िताबों से वस्तुओं के और पदार्थों के नाम पाए गए हैं और माता-पिता, भाई-बहन आदि सम्बन्धवाचक संज्ञाएँ भी हमारी धार्मिक क़िताबों से ही पायी गयीं हैं. इन्ही धार्मिक क़िताबों से इंसानों ने अपनी संतानों के लिए नाम रखना शुरू किया.  इस तरह देखा जाए तो नामकरण एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है. 


अगर सोचा जाए कि कोई नाम ही नहीं होता तो क्या होता? पेड़....पेड़ नहीं होता तो क्या होता? आम...आम नहीं होता तो क्या होता? मैं...महफूज़ नहीं होता तो क्या होता? समीरलाल जी...समीरलाल नहीं होते तो क्या होते? शिखा ....शिखा नहीं होती तो क्या होतीं? तो कहने का मतलब यह है कि अगर नाम नहीं होता, तो संसार का व्यवहार पल भर भी नहीं चल पाता, इसलिए नाम का बड़ा महत्त्व है और नाम से ही सहजता प्राप्त होतीं हैं. 

नाम कई प्रकार से हो सकते हैं. कुछ गुण के अनुसार, कुछ कर्म के अनुसार, स्वभाव के अनुसार, सम्बन्ध के अनुसार और व्यवहार के अनुसार भी देखने में आते हैं. एक इंसान के कई नाम हो सकते हैं, लेकिन मुख्य नाम एक ही होता है. जैसे मेरा प्यार से पुकारा जाने वाला नाम "पप्पू" है (ही ही ही ...), मेरे घर में, नाते-रिश्तेदार सब पप्पू बुलाते है, लेकिन मुख्य नाम महफूज़ है. वैसे, नाम कैसा रखना चाहिए इसका भी मार्गदर्शन, धर्मानुसार, संस्कृति व् संस्कार में पाया जाता है. और यह भी कहा जाता है कि नाम का असर हमारे पूरे व्यक्तित्व पर भी पड़ता है. अब कोई इंसान बुधवार को पैदा हुआ तो घर वालों ने उसका नाम प्यार से बुद्धू रख दिया, तो वो इंसान अपने नाम के ऐकौर्डिंग ही बिहेव करेगा... वो वाकई में बुद्धू होगा. ऐसे ही अगर देखें तो मोनिका, अंजलि, रश्मि, टीना, रीटा, फ़िज़ां, और पारुल नाम की लडकियां हमेशा सुंदर ही मिलेंगीं क्यूंकि इन नामों का मतलब ही सुंदर होता है. इसलिए नाम ऐसा होना चाहिए जो पूरे व्यक्तित्व को सार्थक बनाए और हमेशा उस नाम से ज़िंदगी   में प्रेरणा  मिलती रहे. बहुत पहले की बात है... मैं उस वक़्त नाइंथ क्लास में पढता था... मेरे साथ एक लड़का पढता था... उसका नाम छेदी लाल था... अब जैसा उसका नाम, वैसे ही उसका रूप और व्यवहार. उसे कोई भी स्टूडेंट अपने साथ नहीं रखना चाहता था, सिर्फ उसके नाम की वजह से.... वो पढने में भी छेदी टाईप का था... और उसको भी शर्म आती थी....उसे कोई अपने साथ बैठाना भी नहीं चाहता था.... उसे मैं अपने साथ बैठाने लगा... सिर्फ यह दिखाने के लिए... कि ... मेरे जैसे स्मार्ट को यह सब चीज़ें परेशान नहीं करतीं.... अब जब भी कोई नया टीचर आता.. वो खड़ा कर के सबका इंट्रो लेता तो उसके बाद मेरा ही नंबर आता .... अब उसका नाम छेदी लाल... अब इससे पहले कि मैं अपना नाम टीचर को बताता ...सारी क्लास पहले ही बोल  देती एक स्वर में..... कि सर...इसका नाम सुराख अली है.... अब छेदी लाल और सुराख अली का कॉम्बिनेशन भी देखिये.... एकदम ट्विन सिटी की तरह.... हैदराबाद और सिकंदराबाद ...की तरह...   अब धीरे धीरे मुझे भी वो प्रॉब्लम देने लगा.... तो मैं भी धीरे से अलग हो गया.... तो नाम का बहुत असर होता है. अगर नाम का असर नहीं होता... तो थ्री इडियट्स में करीना कपूर ...बेचारे आमिर खान का दोनों बार नाम सुनकर "यक" नहीं कहती और यह भी नहीं कहती कि मैं शादी के बाद अपना सरनेम नहीं चेंज करुँगी. .... 

इंसानों और इश्वर के नामों में बहुत अंतर देखने में आता है. इंसानी नाम सार्थक, यथार्थ और वास्तविक नहीं होते, लेकिन अगर देखें तो ईश्वर (ख़ुदा) के सारे नाम सार्थक हैं. जैसे किसी एक मनुष्य का नाम अमरसिंह है. लेकिन, नाम अमर होने से क्या वह मरेगा नहीं? मरना तो उसे है ही, इसका मतलब है कि उसका नाम सार्थक ना रहा. अगर किसी का नाम अन्नपूर्णा है और वो भीख मांगती है, तब क्या उसका नाम सार्थक हुआ? 

इसलिए नाम का बहुत महत्त्व है, नाम हमारे व्यक्तित्व को सार्थक बनाते हैं. अगर हम ग़ुलाब को ग़ुलाब ना कहें तो क्या उसकी ख़ुशबू कम हो जाएगी? नहीं..... लेकिन नाम तो ग़ुलाब ही रहेगा न, जुलाब तो नहीं होगा ना? इसलिए शेक्सपियर ग़लत था. यह कह देने भर से कि नाम में क्या रखा है? काम नहीं चलेगा. नाम में तो बहुत कुछ रखा है. नाम हमें सार्थकता व् सम्पूर्णता प्रदान करते है, नाम तो अव्यय, अविनाशी और ईश्वर जैसा है.
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साहित्य जगत व ब्लॉग जगत के तमाम मित्रों को यह बताते हुए बहुत ख़ुशी हो रही है कि मेरी हिंदी कविता "बचपन" अंतर्राष्ट्रीय त्रैमासिक हिंदी पत्रिका "पुरवाई' जो कि लन्दन से प्रकाशित होती है, में प्रकाशित हुई है. कविता की  स्कैन कॉपी अवलोकन के लिए प्रस्तुत है.



शनिवार, 10 अप्रैल 2010

खुशियाँ बांटने से बढती है..नफरत का क्या काम? : महफूज़


सबसे पहले समस्त ब्लॉग जगत को इतना अपनापन और स्नेह देने के लिए धन्यवाद. (खुशदीप भैया के लिए सिर्फ एक बात कहना चाहूँगा कि मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ. मुझे गर्व है आप पर.) मैं बिन माँ-बाप का होकर भी अकेला नहीं हूँ, यह मुझे समस्त ब्लॉग जगत ने बता दिया. इसके लिए मैं पूरे हिंदी व इंग्लिश ब्लॉग जगत का शुक्रगुज़ार हूँ. मुझे तो पता ही नहीं था कि सब मुझे इतना प्यार करते हैं? पिछले दो महीने से वक़्त ही नहीं था कि नेट पर बैठ सकूँ? कुछ प्रोब्लेम्स ही ऐसी थीं. लेकिन आज जब पूरा ब्लॉग जगत खंगाला तो आँखों से आंसू छलक पड़े. ब्लॉग जगत के लोकप्रियता के ऐसे शिखर पर आप सब लोग बैठाएंगे, इसका अंदाज़ा भी मुझे नहीं था. लोग कहते हैं कि ब्लॉग कि दुनिया ऐसी है कि लोग जल्दी ही भुला देते हैं, लेकिन आप सबके प्यार ने इस मिथ को झुठला दिया. आज सबसे पहली टिप्पणी डॉ. अजित गुप्ता जी के ब्लॉग पर की, अपने आप हाथ से माँ का संबोधन निकल पडा, जिसका ध्यान मुझे बिलकुल भी नहीं था, ममा का मेल आया तो बहुत देर तक रोता रहा. इस ब्लॉग जगत ने मुझे हर रिश्ता दिया है. माँ नहीं है मेरी, लेकिन आज मेरे पास ब्लॉग जगत के द्वारा जो रिश्ता बना है मेरा उससे माँ कि कमी अब नहीं महसूस होती है. अब तो मैं यहाँ धन्यवाद के लिए नाम भी नहीं लिख सकता हूँ क्यूंकि इतने सिर्फ नाम लिखने के लिए मुझे चार पोस्ट लिखनी पड़ेगी. मैं तो सबके प्यार से अभीभूत हूँ.

मैं आज फिर पूरे ब्लॉग जगत को अपनी खुशियों में शामिल करना चाहता हूँ. अब जैसा कि मैंने आज से ९ महीने पहले एक धन्यवाद पोस्ट लिखी थी और उसमें बताया था कि अमेरिका के Wisconsin University जो कि Madison State में है. उस यूनिवर्सिटी के Emeritus Professor. Nancy L.John Diekelmannn ने  मुझे संपर्क कर के  मेरी कविता "Fire is still Alive" को टी-शर्ट पर प्रकाशित करने की अनुमति मांगी थी, जो कि मैंने उनको दे दी थी, उस सिलसिले में मुझे उस वक़्त अमरीका भी जाना था लेकिन उन्होंने बाद में मना कर दिया था. इस पूरे दस महीने के दौरान अलग अलग चरण में मेरी उनसे फ़ोन और इ.मेल के ज़रिये बात-चीत चल रही थी. बाद में उन्होंने बताया कि वो टी-शर्ट एक अप्रैल को छप कर आ जाएगी.  और जब वो टी-शर्ट छप कर आ गई तो उन्होंने मुझे फोन और इ.मेल से सूचित किया और इसकी ख़बर मैंने सबसे पहले अपनी मम्मी रश्मि प्रभा जी को फोन के द्वारा सत्ताईस मार्च को सूचित किया. Diekelmann जी ने मुझे मेल के द्वारा सूचित किया कि Priority Mail जो कि अमरीका कि सबसे तेज़ डाक सेवा है जो पूरी दुनिया में कहीं भी डाक दो दिन में पहुंचाने का दावा करती है से चार टी-शर्ट भेज दी है. उन्होंने मुझसे माफ़ी भी मांगी कि टी-शर्ट पर मेरा नाम गलत प्रिंट हो गया है. हालांकि उन्होंने मुझसे citation मेल कर के पूछा था, लेकिन नेट से दूर होने की वजह से मैं उन्हें समय पर जवाब नहीं दे पाया, और टी-शर्ट छप कर आ गई. जब वो टी-शर्ट छप कर आ गई तो उसको स्कैन कर के मेरी बहन ने मेरी मेल पर भेज दिया और इसकी खुशखबरी सबसे पहले मैंने आदरणीय समीर लाल जी, खुशदीप भैया और अदा जी को मेल फॉरवर्ड कर के बताया. जिसका ज़िक्र खुशदीप भैया ने फर्स्ट अप्रैल को अपने ब्लॉग पर किया, जिसको काफी लोगों ने मूर्ख दिवस का मज़ाक समझ लिया...हा हा हा हा हा .... फिर बाद में अदा जी ने अपने ब्लॉग पर पूरी स्कैन मेल पोस्ट की. जब उन्होंने पोस्ट कर दिया फिर उसके बाद मैंने अपने लोगों को फोन से सूचित किया. अब मैं तो अपने घर से बहुत दूर हूँ... बहुत मन है वो टी-शर्ट पहनने  का.... और यह ख़्वाहिश लखनऊ और गोरखपुर पहुँच कर ही पूरी हो सकती है. अभी तो देहरादून का प्लान है फिर उसके बाद ३ दिन के लिए मलेशिया जाना है.  

Diekelmann जी ने बताया कि मेरी वो कविता Wisconsin University के सिलेबस में भी जोड़ी जा रही है और दिसम्बर में Wisconsin University में  होने वाले दीक्षांत समारोह में मुझे भी आमंत्रित किया जायेगा जहाँ मुख्य अतिथि अमरीका के राष्ट्रपति श्री. बराक ओबामा जी भी मुझे सम्मानित करेंगे. अमरीकन राष्ट्रपति जी के ओफ्फीस से भी मेल बधाई कि मेल चुकी है.  उन्होंने (Diekelmann) यह भी बताया कि पहले यह टी-शर्ट परियोजना Non-Profit based थी लेकिन कंपनी ने जब उसे मार्केट में उतारने का प्रस्ताव भी रखा तो उन्होंने इजाज़त दे दी और कहा कि जब मार्केट में यह आएगी तो आपको Royalty भी मिलेगी. मुझे यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई. इस सन्दर्भ में बहुत जल्द ही पेपर्ज़ साइन होने वाले हैं. उन्होंने यह भी बताया कि रोयल्टी सारी लीगल कार्यवाही और FEMA Act. की formalities पूरी हो जाने के बाद ही मिलेगी जिसमें तीन से चार महिने का समय लगेगा. Diekelmann जी ने यह बताया कि यह टी-शर्ट अमरीका, कनाडा सहित एशिया के कुछ देशों (जिसमें भारत भी) में भी बिक्री की जायेंगीं.. इससे पहले भी मुझे USA से सन २००५ में International Poet of the year का अवार्ड मेरी अंग्रेजी कविता "Lullaby for a missing child' के लिए   मिल चुका है. (कृपया मेरे ब्लॉग पर और ऑरकुट के एल्बम में अखबारों की स्कैन कॉपी देखें..) जिसके लिए मुझे तत्कालीन मुलायम  राज्य सरकार ने भी U P D C जिसकी अध्यक्ष उस वक़्त जया बच्चन जी थीं के हाथों और तरफ से सम्मानित किया गया था. (कृपया ब्लॉग के दायीं ओर लगी फोटो देखें और अखबारों की कतरन देखें)... इस बार भी मेरी बहन ने मुझे फोन कर के बताया कि ऐसा कोई फोन आया था और मेरे बाहर होने की वजह से बोल दिया गया कि मैं बाहर हूँ और मुझे जल्द से जल्द संपर्क करने के लिए कहा गया है... अब किस विभाग से आया यह तो मुझे गोरखपुर पहुँच कर ही पता चलेगा.... गोरखपुर/लखनऊ पहुँच कर जैसे ही सूचना/तिथि का निर्धारण होगा मैं आप सबको ज़रूर सूचित करूँगा... आप लोग सब तैयार रहिएगा.... काश! पिता जी ज़िंदा होते तो मेरी ना-मौजूदगी में सब संभाल लेते...सच कहा गया है...माँ-बाप के बिना जीवन अधूरा है. इसकी भी सूचना मैंने अपने लोगों को दी है कि सब लोग तैयार रहें.... इस बार मेरा परिवार बहुत बड़ा है. तो मैंने अपने ब्लॉग परिवार को भी सूचित किया. अब सारी डिटेल तो गोरखपुर पहुँच कर ही पता चलेगी. इस उपलब्धि को लखनऊ/गोरखपुर पहुँच कर ही प्रेस मीट और प्रेस रिलीज़ कर के समस्त दुनिया के सामने भी रखना है. मीडिया से फोन तो आ रहे है, लेकिन रोज़ी रोटी पहले है...काम ख़त्म होते ही इस उपलब्धि पर काम करना है.    श्री.बिल्लोरे जी ने कहा था कि हम यहीं पर प्रेस रिलीज़ कर दे रहे हैं,  जिसकी सूचना उन्होंने यहाँ के मीडिया को भी दे दी थी, लेकिन मैंने मना कर दिया कि मैं अपनी सरज़मीन और जन्मभूमि पर ही सब कुछ करूंगा. इसका मैं श्री. गिरीश बिल्लोरे जी का एहसानमंद हूँ.  अब जब लखनऊ /गोरखपुर पहुंचूंगा और इस सफलता को सेलेब्रेट करूँगा तो मैं अभी से समस्त ब्लॉग जगत को मैं आमंत्रण दे रहा हूँ कि अपनी उपस्थिति से मेरी खुशियों को दोगुना करें.

 मैं बहुत खुश भी हूँ और दुखी भी. दुखी इसलिए कि कई बार हम कई रिश्तों को समझ नहीं पाते हैं, हम गाहे-बगाहे ऐसे लोगों को अपना समझ लेते हैं, जो किसी मौके की तलाश में रहते हैं कि आपको दुःख हो. जिन्हें हम अपना समझते हैं वही धोखा दे जाते हैं. और जिन्हें हम कुछ भी नहीं समझते वो हमारे साथ रहते हैं और फिर एक नए रिश्ते को जन्म देते हैं. और फिर यही रिश्ता शायद ज़िन्दगी भर के लिए कायम हो जाता है. कई बार हम सोचते हैं कि जिन्हें हम प्यार कर रहे हैं वो हमारे साथ हर सुख दुःख में रहेगा फिर वही कब धोखा दे जाए ...कुछ कहा नहीं जा सकता. इस ब्लॉग जगत में मुझे बहुत कुछ मिला है. बहुत कुछ मिला है तो बहुत कुछ सीखा भी है. इंसान और रिश्तों को पहचानना मैंने ब्लॉग जगत से ही सीखा है. मुझे कई लोग और काफी लोग भी बहुत घमंडी किस्म का या फिर मगरूर किस्म का भी समझते हैं पर मेरा यकीन करिए मैं ऐसा बिलकुल भी नहीं हूँ. मैं हमेशा प्यार बांटता हूँ और बदले में सिर्फ प्यार ही चाहता हूँ. जब कभी मेल खोलता हूँ तो कोई गाली लिख के भेजता है, तो कोई कहता है कि तुझे अपनी सुन्दरता पे बहुत घमंड है, तो कोई कहता है कि मुकदमा कर दूंगा. मैं कहता हूँ कि अगर राष्ट्रवादी विचारधारा का होना क्या गुनाह है? क्या इसके लिए मुझे गाली देनी चाहिए? अब हैंडसम हूँ तो मेरा इसमें क्या दोष? क्या सुंदर होना घमंडी होने का मापदंड है? और मुकदमा भई कोई क्यूँ करेगा ...मैंने तो किसी की भैंस भी नहीं खोली है.... और वैसे इतना दम भी रखता हूँ कि भैंस खोल लूं ...और मैं ऐसे लोगों को क्या बोलूँ? इन्हें यह नहीं पता कि हम तो खानदानी मुकदमेबाज़ हैं. मेरे पिताजी मेरे ऊपर छः-छः मुक़दमे छोड़ कर गए हैं. ज़मीन से लेकर, 307 और 504  के मुक़दमे झेल रहा हूँ बिना मतलब के .... ऐसे लोगों को क्या बोलूँ ? मैंने एक बार जज से कहा भी था कि बिना मतलब इतना सब झेल रहा हूँ... तो जज ने कहा अच्छा तो है.... पता कैसे चलेगा कि बड़े आदमी हो... तो ऐसे लोगों को मैं यही कहना चाहूँगा कि फर्जी मुक़दमे में कैसे फंसाया जाता है यह मुझसे ज्यादा अच्छे से कोई नहीं जानेगा. इसलिए अब इस प्रकार की मेल भेजना बंद करें या फिर कोई मुकदमा लाद ही दें मुझ पर ... फिर देखें क्या होता है? मैं तो खुलेआम कहता हूँ कि जिसे भी मुझसे झगडा करना है तो एक बार सोच ले क्यूंकि मैं डसूंगा तो बहुत दर्द होगा. और आप ही लोग बताइए कि मैंने कभी किसी को ब्लॉग पर उल्टा सीधा कहा है? किसी की भी इन्सल्ट की है? हाँ! एक बार मैंने महिलाओं के खिलाफ कुछ गलत किसी पोस्ट पर कमेन्ट के रूप में लिख दिया था.... उसके लिए मैं माफ़ी भी मांग चुका हूँ और आज इस खुले मंच से अपने उस गंदे और वाहियात कमेन्ट के लिए फिर से समस्त ब्लॉग जगत कि महिलाओं से माफ़ी मांगता हूँ.  मेरा यकीन करिए ... मुझे बहकाया गया था... शायद किसी रौ में मैंने वो लिख भी दिया. और तबसे उसका पश्चाताप कर रहा हूँ. उस कमेन्ट की वजह से मैंने कई अच्छे दोस्त इस ब्लॉग जगत पर खो दिए. और तो और कुछ लोग ब्लॉग समाचार या फिर किसी और नाम से ब्लॉग बना कर मेरे नाम का भी दुरूपयोग कर रहे हैं. मैं इन लोगों को condemn करता हूँ और साथ ही साथ वार्न भी . मैं तो इतना ही कहूँगा कि प्यार बांटिये .... प्यार मिलेगा...  नहीं तो वही कहावत वाला हाल होगा कि "बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होए..."  

अंत में मैं आदरणीय समीर लाल जी, खुशदीप भैया (आप मेरे सगे से बढ़ कर हैं...), श्री. ऍम.वर्मा जी, आदरणीय शास्त्री जी, श्री. अविनाश वाचस्पति जी, श्री. शरद कोकास भैया, श्री. पाबला जी, श्री. ललित शर्मा जी, श्री. अवधिया जी, shri. ajay kumar jha ji, श्री. डॉ. अरविन्द मिश्र जी, श्री. गिरिजेश राव जी, श्री. महेंद्र मिश्र जी, श्री.रविन्द्र प्रभात जी, श्री. सुमन जी (नाईस वाले), श्री. संजय अनेजा जी... श्री. बवाल जी ..आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद... आप लोग हमेशा मेरे साथ रहे ...मेरा हौसला बढाया.... मैं आप सबका आभारी हूँ. 

मैं श्री. गिरीश बिल्लोरे जी का बहुत एहसानमंद हूँ. आपने व आपके परिवार ने मुझे इस अनजान शहर में बिलकुल भी अकेला नहीं महसूस होने दिया. आपने मेरा बहुत ख्याल रखा. मुझे बिलकुल भी एहसास ही नहीं हुआ कि मैं एक अलग शहर में हूँ.     आपने बड़े भाई और पिता की तरह मेरा ख्याल रखा. जो इज्ज़त आपने मुझे दी वो मैं पूरी ज़िन्दगी नहीं भूल सकता. 

मैं मम्मी रश्मि प्रभा जी (आपका आशीर्वाद हमेशा से मेरे साथ रहा है..), डॉ.अजित गुप्ता जी.... (ममा... कल आपका मेल आने के बाद मैं बहुत रोया हूँ... ममा..आपको मैंने Diekelmann जी का फोन नंबर और इ.मेल ..मेल कर दिया है.... आप अमेरिका पहुँच कर उनको फोन कर लीजियेगा ... वो आपको टी-शर्ट available करवा देंगे..) ...रश्मि रविजा जी...(आपका मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूँ... हर पल आपने मेरा हौसला बढाया... discourage होने से बचाया..I am very thankful to you....), शिखा जी..(आपको मैं बहुत मिस कर रहा हूँ) ... वाणी दीदी (क्या दीदी... कान छोडिये ना....अब लम्बी-लम्बी नहीं फेकूंगा.... दी...प्लीज़ कान छोड़ दीजिये... सॉरी बाबा..आ..दी..दर्द कर रहा है..)....अदा जी.... (आप में तो मेरी जान बसती है... मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ... ) मैं आप सब लोगों का शुक्रगुज़ार हूँ ... और मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ.... 

Last but not the least.... मैं पूरे ब्लॉग जगत का आभार व्यक्त करता हूँ.... जो इज्ज़त और प्यार आप सबने मुझे दिया है .... उसका मैं शुक्रगुज़ार हूँ. मेरे लिए यह संभव ही नहीं है कि मैं आप सबका शुभ नाम लिखूं... क्यूंकि आप लोग भी जानते हैं कि अगर मैंने नाम के साथ आभार व्यक्त किया तो चार पोस्ट और लिखनी पड़ेगी. मैं आप सबसे बहुत प्यार करता हूँ. 

कई बार हम इतनी जिम्मेदारियों में फंसे होते हैं कि कई बाहरी कामों के लिए वक़्त ही नहीं निकाल पाते हैं. मैं तो वैसे भी इतना बीजी हूँ कि बीज़ी वर्ड भी मेरे बीज़िनेस के आगे बहुत  बहुत खाली है... इसी बीज़िनेस को देखते हुए भई आज मैं लखनऊ ब्लोग्गर अस्सोसियेशन के अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा दे रहा हूँ. हालांकि, मुझे पता नहीं था कि मैं इस अस्सोसियेशन का अध्यक्ष भी हूँ... जब पता चला तो अपनी गैर ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ....  मैंने सोचा कि इतने नालायक अध्यक्ष का क्या फायदा? जो अपने संस्था के बारे में ही ज्यादा नहीं जान रहा हो... ख़ैर! मैं तो समस्त ब्लॉग जगत का तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ. मेरा ब्लॉग जगत के विद्वान जनों से अनुरोध है कि कृपया मेरी कविता "Fire is still alive" का हिंदी में अनुवाद कर के मुझे दीजिये. मैं आभारी रहूँगा.

(अपने शुभचिंतकों व मित्रों के कहने पर मेल व कोरियर के स्नैपशॉट हटा रहा हूँ.... ११/०४/२०१०....समय : १२.५५)   

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

इस क़दर टूटा हूँ कि रोना चाहता हूँ....: महफूज़

कभी-कभी मन बहुत उदास होता है. कारण ख़ुद को भी नहीं पता होता. हम रोना तो चाहते हैं, लेकिन आंसू नहीं निकलते, मंज़िल सामने तो होती है लेकिन रास्तों का पता नहीं होता. विचारों का द्वंद्व  दिल-ओ-दिमाग़ में चलता रहता है लेकिन विचारों में ठहराव नहीं होता. यूँ ही अपलक लेटे-लेटे छत पर टंगे पंखे को देखते हैं लेकिन अशांत मन द्वंद्व में रहता है. इसी द्वंद्व को दर्शाती ....प्रस्तुत है एक कविता.....  




इस क़दर टूटा हूँ कि
रोना चाहता हूँ.
आत्मा की पुक़ार खींच रही है
ख़ुद से बातें करना चाहता हूँ.
घना  अँधेरा,
जिसकी दुनिया नहीं
खिड़की किनारे बैठ कर,
सूनी आँखों से,
सुनता रेलगाड़ी की आवाज़
अनमना सा,
मंज़िल को पाना चाहता हूँ.
गाता उदासी के गीत
सोच! काश! माँ ज़िंदा होती?
तो जीवन होता सुंदर और भी सुंदर
ख़ुद को गढ़ता पढ़कर
शिव खेडा "आप जीत सकते हैं"
फ़िर सोचता,
जाने कैसे गढ़ता कुम्हार
मिटटी के लोंदे को
जहाँ सांस भी थिरकती है
चाक पर..
दोहराता ख़ुद को
स्वार्थ खोजते कुछ
करता अपने को सार्थक 
अपलक, मृत्यु से पहले
करके पापों का अपहरण
भिड़ता कहीं,
अतीत और आगत से
अपने काम को अंजाम देते हुए
और
निकल पड़ता हूँ किसी अनंत 
यात्रा पर....

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

इसीलिए सिर्फ प्रेम करना चाहिए..: महफूज़


अन्नपूर्णा कूड़ा फेंकने घर के बाहर आई तो देखा कि तीन बूढ़े व्यक्ति घर के बाहर वाले चबूतरे पर बैठे हैं. अन्नपूर्णा ने उन्हें नहीं पहचानते हुए कहा " वैसे तो मैं आप लोगों को नहीं जानतीं, फिर भी घर के अन्दर आईये और कुछ भोजन ग्रहण कीजिये."

"क्या घर का मालिक घर में है?" बूढों ने पूछा...
"नहीं" अन्नपूर्णा ने कहा. "वे बाहर गए हैं."

"तब हम अन्दर नहीं आ सकते".. बूढों ने कहा.

शाम को अन्नपूर्णा के पति जब घर पर आये तो अन्नपूर्णा ने दिन की घटना के बारे में बताया.

"जाओ उनको बताओ कि मैं घर पर आ गया हूँ और आदर के साथ अन्दर ले आओ.." अन्नपूर्णा के पति ने कहा...

अन्नपूर्णा बाहर आई और उन लोगों को घर के अन्दर चलने के लिए आमंत्रित किया. 

" हम एक साथ घर के अन्दर नहीं जा सकते," बूढों ने कहा...
"क्यूँ?" वो कारण जानना चाहती थी..

उनमें से एक बूढा बोला," मेरा नाम धन है तथा यह मेरे साथी सफलता और प्रेम हैं. अब तुम जाओ और अपने पति से विमर्श करके बताओ कि वो हम तीनों में से किसे घर के अन्दर आमंत्रित करना चाहते हैं."

अन्नपूर्णा अन्दर आई और सारा वाक़या अपने पति से बताया. 

"ठीक है, धन को अन्दर आने दो जिससे हमारा घर भी धन से भर जाए." अन्नपूर्णा के पति ने कहा.....

"नहीं, क्यूँ ना हम सफलता को सफलता को आमंत्रित करें?" अन्नपूर्णा ने कहा...

दोनों की बेटी जो सारी बातें सुन रही थी ने कहा, "क्यूँ ना हम प्रेम को आमंत्रित करें जिससे कि हमारा घर भी प्रेम से भर जायेगा?"

अन्नपूर्णा के पति ने बेटी की बात को रखते हुए कहा, "ठीक है, जाओ प्रेम को ले आओ..."

अन्नपूर्णा बाहर गई और तीनों बूढों से पूछा, "आपमें से प्रेम कौन है? कृपया अन्दर आईये और हमारे मेहमान बनिए...."

प्रेम उठा और घर की ओर चल दिया. उसके पीछे - पीछे बाकी दोनों बूढ़े भी चलने लगे.....

आश्चर्यचकित होते हुए अन्नपूर्णा ने धन और सफलता से पूछा," मैंने तो सिर्फ प्रेम को आमंत्रित किया था .... आप लोग क्यूँ अन्दर आ रहे हैं?"

दोनों बूढों ने एक साथ जवाब दिया: "प्रेम जहाँ भी जाता है, हम उसके साथ जाते हैं..." 

बुधवार, 27 जनवरी 2010

जज़्बा ग़र दिल में हो तो हर मुश्किल आसाँ हो जाती है... मिलिए हिंदुस्तान के एक उभरते हुए ग़ज़लकार से: महफूज़

कहते हैं.....कविता या शायरी ख़ुदा  की ज़ुबां होती है...और उस ज़ुबां  को हम तक पहुँचाने वाले लोग बहुत ख़ास होते हैं...ऐसे ही एक बहुत ख़ास शख्स से आज मैं आपका विसाल करवाने जा रहा हूँ..नाम है जनाब पवन कुमार सिंह. यूँ  तो इनका तार्रुफ़ मेरी आवाज़ या मेरी कलम की मोहताज है ही नहीं ...इन्होने अपना बहुत ऊंचा मक़ाम बनाया हुआ है. जनाब पवन कुमार सिंह आई.ए.एस हैं....किसी ने मुझसे कहा था आई.ए.एस कोई बनता नहीं है,  आई.ए.एस पैदा होता  हैं....और यह बिलकुल सही बात है....शायद आपको आई.ए.एस कई मिल जाएँ ...लेकिन शायर आई.ए.एस , यह एक बहुत ही रेयर कॉम्बिनेशन है...और इनकी यही बात मुझे कायल कर गई.


जनाब पवन कुमार सिंह जी से मेरी मुलाक़ात अपने मेरे अपने शहर गोरखपुर प्रवास के दौरान हुई. जनाब पवन कुमार सिंह जी मेरे हमउम्र ही हैं और इस वक़्त गोरखपुर में जोइंट मैजिस्ट्रेट की बसात से ओज हैं...जनाब पवन कुमार सिंह जी लखनऊ के भी Sub divisional magistrate रह चुके  हैं. लखनऊ में प्रशासनिक शौर्य गाथा आपकी बहुत मशहूर है. लखनऊ में मुहर्रम के दौरान इनके वक़्त में पूरे अमन-ओ-चैन के साथ ताजिये का जुलूस निकलता था. पवन जी बहुत ही सदाक़त-म' आब शख्सियत हैं. 
 
पवन कुमार जी शुरू से ही एक मेधावी छात्र  रहे....पढाई लिखाई में हमेशा अव्वल....इनकी मेधा ऐसी तीखी की आईएस बनना बायें हाथ का खेल रहा....इस उपलब्धि में इनके पिता श्री जो कि पुलिस सेवा में रहे का भरपूर हाथ रहा.... आपके पिताश्री ने पुलिस सेवा में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित किया है.....इनके पिता भी बहुत तीक्ष्ण दिमाग  के व्यक्ति रहे....उनका व्यक्तित्व भी बहुत प्रभावपूर्ण है....जो भी उनसे मिलता है...उनकी मृदुभाषा से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता....

जैसा की मैंने आपसे बताया ..जनाब पवन कुमार जी एक आई.ए.एस होने के साथ-साथ एक पहुँचे हुए शायर भी हैं......इस ग़ज़लगो ने ग़ज़लों की दुनिया में भी धूम मचा रखी है....मैं ग़ज़लों की तमीज तो नहीं रखता लेकिन इनकी ग़ज़लों ने हमेशा मुझे झिंझोड़ा है..... आपको उर्दू की बहुत ज़हीन इल्मियत हासिल है. आप सही मायनों में ग़ज़ल को ग़ज़ल लिखते हैं. कहते हैं कि बिना उर्दू और फ़ारसी के ग़ज़ल बन ही नहीं सकती और आप ऐसा लगता है कि  आपकी क़लम से उर्दू कि स्याही निजात होती है. हालांकि...आजकल ग़ज़ल हर भाषा में लिखी जा रही है. आपकी कई ग़ज़लें हिंदुस्तान के मशहूर क़िताबों में निशाँ-ऐ-शुहूद हो चुकी हैं. कई मशहूर ग़ज़लकारों ने आपकी ग़ज़ल को इल्मियत तौर पर तस्दीक किया है. इसीलिए आज की मेरी पोस्ट जनाब पवन कुमार जी के नाम आबिद (समर्पित) करता हूँ...उम्मीद ही नहीं ...यकीं  है आप सब भी मुझसे ज़रूर इत्तेफ़ाक़ होंगे...... 

मैंने अपने गुरु मशहूर गीतकार और ग़ज़लकार जनाब जावेद अख्तर जिनसे मैं आजकल ग़ज़ल की बारीकियां सीख रहा हूँ...से आपके बारे में ज़िक्र किया और उन्होंने ने भी आपकी उर्दू ग़ज़लों को लायक-ऐ-तहसीन किया है. और आपको हिंदुस्तान का उभरता हुआ ग़ज़ल गो का तमगा दिया है. जनाब जावेद अख्तर साहब कहते हैं कि ग़ज़ल वो होती है जिसे गाई जा सके और आपकी ग़ज़लों को जावेद साहब ने उसी रूप में तस्दीक किया है. मैंने भी सोचा की मैंने हर विधा में लिखा है तो क्यूँ ना ग़ज़ल में भी हाथ आज़माया जाये? पर ग़ज़ल की बारीकियों को सीखने की ज़रूरत थी और उसके लिए एक अच्छे गुरु की ज़रूरत थी और जनाब जावेद साहब से अच्छा गुरु कौन हो सकता था. उम्मीद है की आने वाले दिनों में आप सबका तार्रुफ़ मेरी ग़ज़लों से भी होगा. ग़ज़ल सीखने में जनाब पवन कुमार सिंह जी भी मेरी काफी मदद कर रहे हैं. आपकी एक भूरे कवर की डाइरी है... जिसमें कई उम्दा ग़ज़लें आपकी क़लम से शिरकत कर चुकी हैं. मेरी आपसे गुज़ारिश है कि आप अपनी डाइरी के पन्नों को अपने ब्लॉग पर पूरी तरह से उकेर दें. आपकी एक ग़ज़ल जो मुझे बहुत दिल अज़ीज़  है...जिसमें आपने मोहब्बत में टूटने के एहसास को ... और टूट के फिर से खड़े होने के जज़्बात को बहुत ही खूबसूरती से उकेरा है....तो पेशे-ऐ-ख़िदमत है आपकी वही उम्दा ग़ज़ल ... तो हज़रात!!!!  ज़रा आप सब भी मोलाहिजा फरमाइयेगा...


ज़रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं !
सलामत आईने रहते हैं, चेहरे टूट जाते हैं !!

पनपते हैं यहाँ रिश्ते हिजाबों एहतियातों में,
बहुत बेबाक होते हैं वो रिश्ते टूट जाते हैं !!

नसीहत अब बुजुर्गों को यही देना मुनासिब है,
जियादा हों जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं !!

दिखाते ही नहीं जो मुद्दतों तिशनालबी अपनी, ,
सुबू के सामने आके वो प्यासे टूट जाते हैं !!

समंदर से मोहब्बत का यही एहसास सीखा है,
लहर आवाज़ देती है किनारे टूट जाते हैं !!

यही एक आखिरी सच है जो हर रिश्ते पे चस्पा है,
ज़रुरत के समय अक्सर भरोसे टूट जाते हैं !!


आपका यह कहना है कि  जिंदगी में जिन चीज़ों की ज़रूरत सबसे ज्यादा होती है उनमे दोस्तों को भी शामिल किया जाना बेहद ज़रूरी है। दोस्तों की ज़रूरत आपको उस समय सबसे ज्यादा होती है की जब आप उदास होते हैं या फ़िर कि जब आप काफी खुश होते हैं. वक्त पर दोस्तों का काम आना आपके लिए तसल्ली देने वाला लम्हा होता है। दोस्ती के बारे में एक बात और ,दोस्ती हमेशा तभी होती है जब आप निस्वार्थ तरीके से किसी से जुड़ते हैं. मुझे बहुत ख़ुशी है कि आप मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं.  चलते चलते पेश है आपकी एक और ग़ज़ल... 
ज़रा आप लोग भी नोश फरमाइयेगा... 

तेरी खातिर खुद को मिटा के देख लिया !
दिल को यूँ नादान बना के देख लिया !!

जब जब पलकें बंद करुँ कुछ चुभता है,
आँखों में एक ख्वाब सजा के देख लिया !!

बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है,
बच्चों को चुपचाप बिठा के देख लिया !!

कोई शख्स लतीफा क्यों बन जाता है,
सबको अपना हाल सुना के देख लिया !!

खुद्दारी और गैरत कैसे जाती है,
बुत के आगे सर को झुका के देख लिया !!

वस्ल के इक लम्हे में अक्सर हमने भी,
सदियों का एहसास जगा के देख लिया !!

इत्तेफाक यह देखिये आज... कि... मैंने दिन में यह पोस्ट लिखी और शाम में जनाब पवन जी का फोन आ गया... कि आप लखनऊ में ही हैं... और अभी उन्ही से मिल कर आ रहा हूँ...  वो दिन दूर नहीं जब हम हिंदुस्तान के बड़े नुमाईन्दा शायरों और ग़ज़ल कारों में आपका नाम  शुमार होते हुए ... फ़ख्र से  देखेंगे.  जनाब पवन जी के लिए बहुत सारी दुआएं......  आमीन....
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