शनिवार, 20 जून 2009

अजनबी सी लगीं नहीं!!


कभी किसी महफिल

में तुम दिखीं नहीं,

कभी परियों के किस्सों

में भी तुम मिली नहीं।

न जानें क्यूँ फिर भी

मुझे तुम कभी

अजनबी सी

लगीं नहीं॥





महफूज़ अली

सोमवार, 15 जून 2009

खुशी

आज मैंने सुबह
अपने कमरे की खिड़की
खोली थी,
खिड़की के एक कोने में
बादल का एक छोटा सा
टुकडा था।

मैंने फिर पूरी खिड़की खोल दी
बाहर आँगन में
तारों भरे आसमान
के कई टुकड़े पड़े थे॥









महफूज़ अली

शुक्रवार, 12 जून 2009

मोमबत्ती की मौत!!!!!!!!!!!


वो गुलाबी मोमबत्ती,

सौन्दर्य बोध से भरपूर

पीली लपटों में कोलाहल करतीं

अपनी ही रौशनी से खेल रही थी।


उजली रात में भी

अँधेरा जशन मना रहा था

धरती काग़ज़ पर ख़्वाबों की

खेती कर रही थी,

मोमबत्ती फिर भी जल रही थी।


अँधेरा दुस्वप्न की तरह भाग रहा था

जलती पिघलती, मृत्यु-वेदना से शनैः-शनैः

धुंधली होती लपटों में,

मोमबत्ती चिल्ला रही थी

आख़िर कौन अमर होता है?
महफूज़ अली

गुरुवार, 11 जून 2009

माँ कि मौत.....


कोई लक्षण नहीं जीवन का

न कोई शब्द,

आहों का अंश भी नहीं

बंद आँखें ........

मैं असमंजस में था कि,

उन्होंने अलविदा भी नहीं कहा..........

यह कैसा मज़ाक है?

हम गले भी नहीं मिले

और उन्होंने आज मरने का दिन चुना

मैं सिर्फ़ एक पल के लिए जिया,

अलविदा कहने के लिए॥








महफूज़ अली

टूटी औरत !!


टूटी कांच की चूडियाँ ,
बुझी सिगरेट की राख,
दर्द से मदद को चिल्लाती
और
व्यर्थ में रोती......

हजारों जूतों की आवाज़
टूटा चेहरा

खरोंच,
ऐसा पहली बार नहीं है,
पति के बदन से शराब की बदबू
जो कोने में खडा माफ़ी मांगता
और आंसू बहती,
टूटी औरत॥








महफूज़ अली


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