मंगलवार, 19 जनवरी 2010

सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ...: महफूज़



कहाँ खो गयीं थीं तुम?
जवाब दो....
मत पूछो हाल मेरा,
पर मेरे हर आंसू  का हिसाब दो.

बुना था जो ख़्वाब तुम्हारे साथ,
उसे धड़कन बना कर पास रखा था,
तस्वीर जो बनाई थी तुम्हारी,
उसे आँखों में बसा कर रखा था.

सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ तुमसे,
क्या दूर रह कर तुम भी उदास रहतीं थीं? 

सोमवार, 11 जनवरी 2010

रोक सको तो रोक लो: - महफूज़



अभी थोड़े दिन पहले कि ही बात है. मैं जिम से एक्सरसाइज़ कर के अपने दोस्त पंकज के साथ घर लौट रहा था. कडाके कि ठण्ड में भी मुझे बहुत गर्मी लग रही थी. उस दिन कार्डियो और बेंच प्रेस बहुत ज्यादा कर लिया था. मुझे बॉडी बिल्डिंग का बहुत शौक़ है, मैं आज भी दो सौ पुश अप्स के साथ डेढ़ सौ पुल अप्स कर लेता हूँ. मेरे बयालीस इंच के बाइसेप्स और V-shaped  बॉडी पर टी-शर्ट खूब फब्ती है और इसीलिए मैं टी-शर्ट ज्यादा पहनता हूँ. इससे दो फायदे होते हैं एक तो सामने वाला पंगा लेने में थोडा घबराता है और खुद का सेल्फ-कॉन्फिडेंस भी अप रहता है. हमारे ज़ाकिर भाई कहते हैं कि वैसे भी आप बहुत हैंडसम हैं फिर काहे को इतनी बॉडी बिल्डिंग करते हैं?
अब क्या किया जाये... खुद को फिट रखना भी ज़रूरी है. अब ख़ुदा ने हमें जो अच्छी चीज़ दी है तो उसे संभालना भी हमारा ही काम है ना. ख़ैर! मैं बता रहा था कि उस दिन जब मैं लौट रहा था तो रस्ते में बहुत भीड़ थी, मेरा जिम मेरे घर से दस  किलोमीटर दूर हज़रतगंज में है, कई जगह बहुत जैम लगा हुआ था. बाइक ड्राइव करने में बहुत दिक्कत तो रही थी. मैं कैसे ना कैसे... किसी तरह सारे रुकावटों और भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ता चला जा रहा था. अपनी वैसे यह आदत है कि मैं ड्राइव करते वक़्त सामने वाले को कोई मौका नहीं देता, मेरा यही मोटिव रहता है कि बस बढ़ते रहो. रुकना  सामने वाले को है... मैंने कभी रुकना नहीं सीखा. अपने यही सिद्धांत पर कायम रहते हुए मैं बढ़ा  चला जा रहा था. तभी बाइक पर पीछे बैठा पंकज मुझसे कहता है कि," यार! महफूज़, तू बहुत ओफ्फेंसिव (offensive) ड्राइविंग करता है..."
मैं उसकी बात समझ नहीं पाया. मैंने कहा ," क्या मतलब?" मैं तो सारे रूल्ज़ फोल्लो करता हूँ...
उसने कहा कि " ओफ्फेंसिव से मेरा मतलब है कि तू सामने वाले को रुकने को मजबूर करता है और खुद रास्ता नहीं देता है. यह तेरा बहुत abstract behaviour है. उसकी बात सुनकर मैं जोर से हंस दिया. मैंने कहा कि यही तो अपना उसूल है. सामने वाले को मजबूर कर दो कि वो तुम्हे आगे बढ़ने के लिए रास्ता दे. मैं अपनी रियल ज़िन्दगी  में भी ऐसा ही करता हूँ... मैं कभी किसी को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता हूँ. मैं कभी किसी से डरता नहीं. ना ही खुद को किसी से कम समझता हूँ. आज जो दुनिया में इतनी कम उम्र में इतना नाम कमाया है ...उसके पीछे यही attitude है...  आज तक जिस काम में हाथ डाला है ... उसे पूरा कर के ही छोड़ा है. यही सब समझाते हुए कब उसका घर आ गया पता ही नहीं चला. उसे उसके घर ड्रॉप कर के मैं अपने घर आ गया.
उस वक़्त जो बात मैंने उसकी हंस कर टाल दी थी , वो बात मेरे दिल के अन्दर तक उतर चुकी थी. उसकी offensive driving वाली बात ने मुझे खुद के बारे बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दिया था. उसका मुझे offensive कहना ना जाने क्यूँ अच्छा लगा था.हालांकि यह offensive  शब्द बहुत नेगेटिव है पर यह मुझ पर पोसिटिवली सूट करता है. मुझे बहुत अच्छे से याद है आज भी ... मैं जब स्कूल में था और अगर किसी लड़के के मेरे से ज्यादा मार्क्स आ जाते थे ...तो मैं उसे मारने के बहाने खोजा करता था और जब तक के उसे मार नहीं लेता था ..मुझे चैन नहीं मिलता था. उस के दिल में इतनी दहशत पैदा कर देता था कि वो बेचारा जानबूझ कर अपना टेस्ट खराब कर देता था. और तो और मैं खुद को ही अपनी क्लास का टोपपर घोषित कर दिया करता था.  मेरा अपना गैंग था स्कूल में ...और मेरे गैंग में जितने भी लड़के थे सब एक नंबर के आवारा और studious थे... हम लोग all-rounder थे... अब मेरे गैंग के ज़्यादातर लड़के कारगिल युद्ध में शाहिद हो चुके हैं. बाकी जो बचे हैं उनमें से कुछ IAS  हैं , कुछ lecturer हैं, कुछ डॉक्टर हैं तो कुछ यहाँ वहां अच्छे पदों पर हैं. एक -दो चुनाव लड़ कर विधायक हैं. स्कूल के दौरान मेरे टीचर्स भी मुझसे बहुत डरते थे... क्यूंकि मुझे ऐसा लगता था कि मैं अपने टीचर से कहीं ज्यादा जानता हूँ... और कई मौकों पे इसे मैंने साबित भी किया... मेरे टीचर्स खुद मुझसे परेशां रहते थे... मेरे टीचर्स जो पढ़ाते थे... वो मैं पहले से ही  जानता था... और जब मैं क्लास में जवाब पहले ही दे देता था... तो बेचारा टीचर खुद ही शर्मा जाता था. मेरे टीचर्स मेरे पिताजी से मेरी शिकायत भी किया करते थे कि आपका बेटा रिस्पेक्ट नहीं करता है.  और मेरे पिताजी मुझे सबके सामने डांट मार कर टीचर और खुद कि संतुष्टि कर लेते थे.

यही हाल मेरा यूनिवर्सिटी में भी रहा. मैंने कभी भी यूनिवर्सिटी में ग्रैजूईशन की क्लास नहीं की...पोस्ट ग्रैजूईशन में भी कभी क्लास नहीं किया... मैं अपने टीचर्स को भी नहीं जानता था... न ही मेरे टीचर्स मुझे जानते थे... लेकिन मैंने पोस्ट ग्रैजूईशन में टॉप किया ... गोल्ड मेडल मिला... जब convocation में मुझे बुलाया गया ... और गोल्ड मेडल देने के बाद दो शब्द बोलने के लिए कहा... तो मैं बहुत परेशां हो गया.. क्यूंकि बाकी लोग श्रेय तो अपने टीचर्स को दे रहे थे.... और मैं अपने टीचर्स को ही नहीं जानता था... और न ही मेरे टीचर्स मुझे... बड़ी दुविधा कि सिचुईशन थी.. ख़ैर! मैंने दो शब्द में कहा कि मेरे इस सफलता का सारा श्रेय मैं खुद को देता हूँ... क्यूंकि मेरी मेहनत का  ही नतीजा यह सफलता थी.... और जब यह बताया कि मुझे UGC (NET) JRF भी  मिल  चुका है... तो सबने और दांतों तले उँगलियाँ दबा ली...  बेचारे ... मेरे यूनिवर्सिटी के टीचर.. खुद ही परेशां  थे...  सबने पूछा कि भाई कौन से बिल में छुपे थे... और किस्से तुमने पढाई कि... और बिना गुरु के कैसे टॉप कर गए?
मुझे ऐसा लगता है कि मैं सर्वज्ञाता हूँ. मुझे ऐसा भी लगता है कि कोई मेरे बराबर खड़ा नहीं हो सकता. कई बार तो मुझे ऐसा भी लगता है कि मैं अजर-अमर हूँ. मुझे ऐसा लगता है कि मैं कोई सुपर -ह्यूमन (Super Human) हूँ या फिर मेरे में डबल Y क्रोमोज़ोम हैं जो कि रेयरली ही मिलता है. मैं जब छोटा था तो साईकिल चलाने का शौक रखता था, मैं इंडिया का बेस्ट साइक्लिस्ट भी रह चुका हूँ और आज भी साईकिल पर वैसा ही स्टंट करता हूँ जो आपने सिर्फ फिल्मों में ही देखे होंगे. अपने स्कूल के दौरान मैंने कोई चौरासी साइकलें तोड़ी हैं. कभी कभी मैं जब सुबह सो कर उठता था तो यह सोच लेता था कि आज साईकिल का ब्रेक नहीं मारूंगा... चाहे कुछ भी हो जाए... और मैं वाकई में साईकिल का ब्रेक नहीं मारता था... एक बार तो जीप से टकरा गया था ...लेकिन मैं टकराते ही जम्प लगा गया था... लोगों कि भीड़ लग गई... मुझसे पूछा गया कि तुमने ब्रेक क्यूँ नहीं मारा... मैंने कहा कि मैंने सोचा हुआ था आज कि ब्रेक नहीं मारूंगा... सबने कहा कि पागल है मेजर साहब का लड़का. उस वक़्त पिताजी आर्मी में मेजर थे. मेरे पिताजी भी मुझे सनकी कहते थे.... हमारे स्कूल में जब भी कोई फंक्शन होता था तो मैं ज़बरदस्ती माइक ले लेता था ... क्यूंकि मुझे कुछ ना कुछ करना होता था.

एक बार हमारे स्कूल में स्कूल कैप्टन का चुनाव होने वाला था ...मैंने भी अपना नाम नोमिनेट किया पर हमारे प्रिंसिपल ने मेरा नाम काट दिया... प्रिंसी ने कहा कि तुम अगर कैप्टन बनोगे तो पूरा स्कूल तबाह हो जायेगा. और नोमिनेट ऐसे लड़के का नाम हुआ जिससे हमारे गैंग कि दुश्मनी थी. अब मुझे बहुत बेईज्ज़ती महसूस हुई ... मैंने भी प्रिंसी से कहा कि मैं इसे कैप्टन बनने ही नहीं दूंगा... प्रिंसी ने मुझे कहा कि मैं तेरे सीने के बाल खींच के मारूंगा... मेरे शर्ट में से मेरे सीने के बाल झलकते थे... उसे ही देख कर उसने कहा. मैंने भी कहा कि मैं उसे कैप्टन बनने ही नहीं दूंगा. फिर मैंने सब क्लास में जाकर सबको धमकी दी कि कोई अगर उसे वोट करेगा तो मार खायेगा. ख़ैर ! वो लड़का स्कूल कैप्टन बन गया. फिर वो हमारे ऊपर रौब गांठने लगा. पहले ही दिन हमने उसकी ऐसी धुनाई की कि वो सारी हेकड़ी भूल गया. और मैंने खुद को स्कूल कैप्टन घोषित कर दिया. अंत में प्रिंसी को भी मानना पड़ा ... बेचारे ने कहा कि पांच महीने की बात है यह लोग तो पास ओउट हो जायेंगे. इसी को बना देते हैं. मैं स्कूल कैप्टन बन गया.

ऐसे ही हमारे ट्वेल्थ के बोर्ड एक्जाम चल रहे थे.. हमारा सेंटर एक दूसरे स्कूल में पड़ा था... मैंने बोर्ड एक्जाम के तीन महीने पहले ही हिंदी छोड़ के इकोनोमिक्स सब्जेक्ट ले लिया था... अब जब बोर्ड में इकोनोमिक्स का पेपर आया तो मेरे तो हाथ पाँव फूल गए, मुझे पूरे पेपर में से सौ में से सिर्फ छब्बीस नंबर के सवाल आते थे... मैं कहा कि लो मेरी तो कम्पार्टमेंट अब पक्की हो गई... मैं बहुत परेशां हुआ . मेरे बगल में एक रीटा नाम की लड़की बैठी थी और उसके बगल में खिड़की के पास मेरा दोस्त दिनेश बैठा था... मैंने दिनेश से कहा कि भाई मैं तो गया इस बार ... आधे घंटे तक मैं इसी सोच में पागल हुआ जा रहा था.. थोड़ी देर के बाद मैंने एक डेसिशन लिया और अपना प्लान दिनेश को बताया ... दिनेश ने मेरा साथ देने के लिए कहा ... प्लान यह था कि क्लास के बाहर दिनेश का बैग रखा था उसमें इकोनोमिक्स की  बुक थी.. अब सवाल यह था कि बुक कैसे निकालूँगा ... ख़ैर! दिमाग में एक प्लान आ गया ... मैं दौड़ते हुए टोइलेट का बहाना बना कर बाहर भागा और दिनेश के बैग को जोर से लात मारी और बैग सीधा बाथरूम के अन्दर ... मैं किताब अपने जैकट में छुपा कर ले आया था... और पूरी चीटिंग की... बेल लगने के ठीक दस मिनट पहले टीचर ने मुझे चीटिंग करते हुए पकड़ लिया ... मैंने बुक उठा कर दिनेश को दी और दिनेश ने किताब उठा कर खिड़की से बाहर pond में फ़ेंक दी.. और मैं टीचर से उलझ गया कि मैंने चीटिंग नहीं की.. टीचर ने कहा कि इतने सारे लोगों ने तुम्हे देखा है चीटिंग करते हुए... मैंने कहा कि अगर कोई कह देगा तो मान जाऊंगा. अब मेरे डर से किसी ने कुछ कहा ही नहीं. और ऐसे मैं बच गया.. पर यह बात हमारे प्रिंसी को मालूम चल गई... जब CBSE board का रिज़ल्ट आया तो मैंने हर सब्जेक्ट में टॉप किया था ... इकोनोमिक्स में छियासी नंबर थे. इंग्लिश का रिकॉर्ड तो आज भी मेरे ही नाम है है मेरे नाइंटी एट नंबर थे.  हमारे प्रिंसिपल ने कहा कि जिस दिन महफूज़ और उसका गैंग स्कूल से निकलेगा उस दिन मैं पूरे स्कूल को गंगा जल से धोऊंगा.
मैं शुरू से offensive रहा हूँ. Aggressiveness मेरी नसों में दौड़ता है.  मेरे साथ यह है कि अगर मुझे किसी ने खराब बोला तो वो सिर्फ मेरा खराब वाला रूप ही देखेगा. अगर मेरी कहीं कोई गलती है तो मैं अपनी गलती मानते हुए चुपचाप माफ़ी लेता हूँ. मुझसे कभी कोई जीत नहीं सकता. मेरे से जीतने के लिए वो जूनून डेवलप करना पड़ेगा. मुझे सिर्फ प्यार से ही जीता जा सकता है... प्यार से तो मैं जान भी दे दूंगा. मेरे गुस्से या ताप से अगर कोई बचा सकता है तो वो कोई नहीं खुद मैं ही हूँ. मैं अपनी आज की ज़िन्दगी में भी बहुत aggressive रहता हूँ.. मैं सामने वाले को खुद के सामने काम्प्लेक्स कर देता हूँ. मुझे हमेशा लोगों से घिरा रहने में ज्यादा मज़ा आता है. मेरे aggressiveness  की हद यहाँ तक है कि ... मेरी जिस भी गर्ल फ्रेंड ने मुझे लो करने कि कोशिश की उसे मैंने अपने ज़िन्दगी  से निकाल फेंका. इसीलिए.. ऐसी पर्सनैलिटी होने के बावजूद भी मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं है. और इस बात का कोई यकीन भी नहीं करेगा. लड़कियां मुझ से बहुत डरती हैं....आज भी मुझे लोगों को डरा कर रखना बहुत अच्छा लगता है.  उत्तर प्रदेश सरकार में कई मंत्री ऐसे हैं/रहे जो मुझसे गाली भी खाए और एक दो तो मार खाते खाते बचे. अब जब मैं खुद इस बार मेयर का चुनाव लड़ने जा रहा हूँ... गोरखपुर से... तो मेरा यही बिहैवियर मेरे बहुत काम आ रहा है.
मेरे साथ यह भी है कि मुझसे किसी भी सब्जेक्ट पर बात किया जा सकता है. मुझे ऐसा लगता है कि आप अगर किसी को दबा सकते हैं तो वो सिर्फ नॉलेज है. अगर मुझे किसी चीज़ कि नॉलेज नहीं है... तो मैं उस वक़्त शांत रह कर ...चुपचाप उस नॉलेज को गेन करने में लग जाता हूँ. मैं हमेशा लर्निंग मोड में रहता हूँ.  Offensive होना बुरा नहीं है... जब तक offensive  नहीं होंगे... तब तक के मंज़िल को नहीं पाया जा सकता.  और फिर offensive होने के लिए भी सबसे पहले नौलेजैबल होना पड़ता है , बिना नॉलेज के आप offensive हो ही नहीं सकते हैं. अगर हम ड्राविंग भी कर रहे हैं तो हमें offensive  होना पड़ेगा नहीं तो सामने वाला तो आगे बढ़ने के लिए तैयार है ही. आम ज़िन्दगी में भी वही इंसान सफल होता है जिसमें जूनून होता है. और यह जूनून बिना offensive हुए आप ला नहीं सकते. और यही चीज़ मैं खुद के साथ करता हूँ. मेरे सामने मैं कभी किसी को टिकने नहीं देता. और कोई अगर मेरी बुराई बिना मतलब में करता है तो उसे मेरे गुस्से को भी झेलना होगा. अगर यह offense है तो ऐसा offense मैं कई बार करने के लिए तैयार हूँ. ब्लॉग जगत में भी कई बार offensive हुआ हूँ.. .. पर वो तभी हुआ हूँ... जब किसी ने मेरे दोस्तों को बिना मतलब में बुरा-भला कहा.. तो अपने दोस्तों के साथ खडा होना मेरा फ़र्ज़ है... भले ही वो गलत हों... मैं तो अपने ताप से गलत को भी सही करने कि ताक़त रखता हूँ... मेरे अन्दर इतनी एनर्जी है... कि एक बार हमारे यहाँ बाथरूम का नल खराब हो गया था..प्लंबर आया लेकिन वो नल अपने रिंच  से नहीं खोल पाया... कहता है कि तेल डाल कर दो घंटे रखिये तब खोलूँगा... मैंने कहा ऐसे कैसे नहीं खुलेगा..और मैंने उस नल को  सिर्फ अपने हाथों से पाइप से अलग कर कर दिया. बेचारा , आँखें फाड़ कर देख रहा था. तो यहाँ वो नल खोलने में मेरी शारीरिक ताक़त कम और दिमागी ताक़त ज्यादा थी.. यहाँ भी वही offensive nature  काम आया. मतलब यही है कि offensive नेचर को पोज़िटिवली यूज़ कर सकते हैं. अब मुझे यहाँ घमंडी भी कह सकते हैं.... पर क्या offensive होना वाकई में घमंडी होना है?

आज अवधिया जी ने एक पोस्ट लिखी है उस पोस्ट में एक लाइन उन्होंने लिखी जो मुझे छू गई "पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। पाप और पुण्य का एक दूसरे के बिना काम ही नहीं चल सकता।याने कि पाप और पुण्य एक दूसरे के पूरक हैं।" इस लाइन में कितनी प्रेक्टिकलिटी है. अब बात तो सही  है कि पुण्य करने के लिये पाप भी करना पड़ता है। मैं ऐसे हज़ारों पाप करने के लिए तैयार हूँ. जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती नहीं है वो पुण्य है, और जिस चीज़ को करने से अंतरात्मा रोकती है वो पाप है. कुल मिला कर सारांश यही है कि .... बहुत थोड़े शब्दों में कहूँगा खुद को डिफाइन करते हुए....
आप मुझे या तो प्यार कर सकते हैं या फिर नफरत, 
पर आप मुझे मुझे नज़रंदाज़ नही कर सकते....... 
क्यूंकि यही मेरा जादू है, 
लीक से हटकर काम करने का एक अलग ही जूनून  है.... 
और मैं हमेशा विवादों में ही रहता हूँ.....

बस फर्क यह है की मैं कोई राजनीतिज्ञ या फिर अभिनेता नही हूँ.... 

लेकिन उनसे कम भी नही हूँ....

इसे आप लोग मेरा मेरे प्रति पूर्वाग्रह मत समझ लीजियेगा.....

एक दिन आप मुझे रुल करते हुए पायेंगे...

अब आप ही लोग बताइयेगा कि क्या offensive होना बुरा है?

बुधवार, 6 जनवरी 2010

मैं झूठ नहीं बोलता: महफूज़




मैं झूठ नहीं बोलता,
साहित्य-कला से क्या लेना?
ढूंढ रहा खुद को मैं,
खोज रहा प्याज़,
छिलकों में.....


शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

नाम तेरा अभी मैं अपनी ज़ुबां से मिटाता हूँ....: एक ग़ज़ल जो मैंने पहली बार लिखी....देख कर बताइयेगा...: महफूज़


बहुत दिनों से सोच रहा था कि ग़ज़ल लिखूं. पर मुझे ग़ज़ल का क ख ग भी नहीं आता था.. फिर मैंने कुछ अध्ययन किया.. ग़ज़ल लिखने का तरीका सीखा. पर जब सीखा तो यही लगा कि रूल्ज़ फौलो करने पर हम वो चीज़ नहीं लिख पाते हैं....जो चाहते हैं... कुछ लोगों से पूछा तो लोगों ने कहा कि किसी से सीख लो.. अब लिखने का इतना वो था कि किसी से सीखने का वक़्त ही नहीं मिला... यहाँ वहां किसी तरह सीख कर लिखने कि कोशिश की  है.... देख कर आप लोग बताइयेगा.... कैसी है? और कुछ अगर गलती है तो प्लीज़ उसे सुधारिएगा भी....
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नाम तेरा अभी मैं अपनी ज़ुबां से मिटाता हूँ...

मैं टूट जाऊँगा तुमने ये सोचा तो था,
पर देखो मैं पूरा नज़र आता हूँ.

मुझे छोड़ा था तुमने उस अँधेरे घर में,
अपने अन्दर ही मैं एक दीया पाता हूँ.

इन अंधेरों को जाना ही होगा घर से , 
रौशनी में नहा कर मैं  आ जाता हूँ.

तुम न समझो के मैं यूँ बिख़र जाऊँगा,
ठोकरों से पहले ही सिमट जाता हूँ.

तेरा चर्चा भी मेरी ज़ुबां पर न हो,
नाम तेरा अभी लो मैं मिटाता हूँ.












A Song one must to be listen...

रविवार, 20 दिसंबर 2009

आप सबका प्यार और आशीर्वाद.... मेरा आभार...और मिलिए मेरी सन्यासन गर्ल फ्रेंड से....: महफूज़



मेरा लेख "जानना नहीं चाहेंगे आप संस्कार शब्द का गूढ़ रहस्य? एक ऐसा शब्द जो सिर्फ भारत में ही पाया जाता है... :- महफूज़" का प्रकाशन दिनांक १९/दिसंबर/२००९ को राष्ट्रीय हिंदी दैनिक 'अमर उजाला' के सम्पादकीय पृष्ठ पर जिनका मैं आभारी हूँ. मैं अपनी इस सफलता का श्रेय सर्वप्रथम मम्मी जी रश्मि प्रभा जी को देता हूँ जिनका आशीर्वाद हमेशा से मेरे साथ है. मैं आदरणीय समीरलाल जी का भी आभारी हूँ जिन्होंने हमेशा से ..जब से मैंने ब्लॉग्गिंग शुरू कि ... मेरा मार्गदर्शन किया... मुझे हमेशा अच्छा लिखने को प्रेरित किया... जब जब मेरा संबल टूटा आपने मुझे संभाला... मैं आपका आभारी हूँ. 


मैं श्री. अजित वडनेरकर जी का भी आभारी हूँ.... जिन्होंने हमेशा मेरे लेखन को निखारने में मेरी मदद की... मैं श्री. अजित जी से मुआफी भी चाहता हूँ... कि कई जगह पर मैंने आपकी बात नहीं मानी... जिसका असर मेरे लेखन पर भी पड़ा..अभी दो दिन पहले मैंने आपसे शिकायती लहजे में झगडा भी किया... पर आपका बड़प्पन ... आपने मेरे शिकायत को बाल-सुलभ प्रवृत्ति कह कर बहुत खूबसूरती से नज़रंदाज़ कर दिया...   आपकी हर बात को ध्यान में रख कर ... गंभीर लेखन पर ध्यान दूंगा.... आप ऐसा ही आशीर्वाद बनाये रखिये..


मैं श्री. शरद कोकस जी के बारे में क्या कहूँ.... अगर यह नहीं होते तो शायद मैं कई मोड़ पर टूट गया होता.... आप चौबीस घंटे मेरे साथ रहते हैं... भावनात्मक रूप से हमेशा मेरे साथ रहते हैं... मैं इन्हें रात के ३ बजे भी उठा कर परेशां करता हूँ... कई बार मेंटली परेशां रहा तो इन्हें २ बजे जगाया.... और आप भी ऐसे कि जब तक के मैंने फोन नहीं रखा तब तक के आप मुझसे बात करते रहे.... आप ऐसे हैं कि जिनसे हर प्रकार के इमोशन बाँट सकता हूँ.... आपका मैं आभारी हूँ.... ऐसे ही स्नेह बनाये रखिये.... 


श्री. अनिल पुसदकर भैया.... आपने जो प्यार और इज्ज़त मुझे दी उसका मैं आपका बहुत आभारी हूँ...


अब श्री. गिरिजेश राव जी.... इनके बारे में क्या कहूँ? इनसे मेरी अभी हाल कि ही मुलाक़ात है.... जब कि हमारा गृहनगर एक है.... हम लखनऊ में भी एक ही जगह रहते हैं... हमारे घर भी आस पास ही हैं.... इनसे मेरा ऐसा रिश्ता बन गया है.... कि लगता ही नहीं कि हाल कि ही मुलाक़ात है... इनसे मैं अपना frustration निकालता हूँ.... और आप ऐसे कि मेरी हर अच्छे बुरे को सुनते हैं.... आपसे बातें करते हुए ...मुझे कई टोपिक्स मिले हैं.... जिन पर मैं अच्छा काम कर सकता हूँ. आप जैसा मित्र पा कर मैं धन्य हूँ. 


डॉ. अरविन्द मिश्रा जी... आपका बहुत आभारी हूँ. आप मुझे बहुत अच्छे से समझते हैं, स्नेह बनाये रखिये.


वाणी दी... आपका भी बहुत आभारी हूँ... मैं इन्हें बहुत परेशां करता हूँ.... कई बार आप  मेरी टिप्पणी पर जब मुझे कहती हैं कि तू बहुत पिटेगा.... तो मैं अभीभूत हो जाता हूँ....  आपका स्नेह इस छोटे भाई पर ऐसा ही बना रहे. 


श्री.पाबला जी... आप ऐसे शख्स हैं .... जिनके कंधे पर मै सर रख कर रोता हूँ... और आपकी वो सांत्वना वाली थपकी मैं यहाँ महसूस करता हूँ. आपका भी आभारी हूँ. 


कहते हैं कि पिछला जन्म जैसी कोई चीज़ नहीं होती.. अगर होती है... तो श्री खुशदीप सहगल भैया... ज़रूर पिछले जन्म में मेरे भाई रहे होंगे, आपके स्नेह से मैं अभिभूत हूँ. 


श्री. एम्.एल. वर्मा जी... आपके स्नेह में मैं डूबा रहता हूँ. स्नेह बनाये रखिये.


श्री. जी.के. अवधिया जी... आप अपना स्नेह व आशीर्वाद ऐसे ही बनाये रखिये..


श्री. रूपचंद्र शास्त्रीजी... आप मेरे पितातुल्य हैं... आपके द्वारा दिया गया मार्गदर्शन... ने हमेशा मेरे लेखन में एक निखार लाया. आपको सादर वंदन. 


श्री.राजीव तनेजा जी... आपका आभार... आप जैसा मित्र अपने जीवन में पा कर मैं धन्य हूँ...


श्री.अजय कुमार झा जी... आपका संबल हमेशा मेरे साथ रहा है. 


श्री.अलबेला खत्री जी...आपका भी बहुत आभारी हूँ... अभी परसों आपका प्रोग्राम टी.वी. पे देखा .. तो रात में बारह बजे आपको मैंने डिस्टर्ब किया... स्नेह बनाये रखिये..


 शिवलोक जी, राजे शा जी, पं.डी.के.शर्मा"वत्स" जी, ललित शर्मा जी, विनय जी, ताऊ जी, योगेन्द्र मौदगिल जी, राज सिन्ह जी, 
मनोज कुमार जी, सी.एम्. परशाद जी, डॉ. टी. एस. दराल जी, धीरू सिंह जी, divine preaching ji, डॉ. टी. एस. दराल जी, syed , 
परमजीत बाली जी, विवेक रस्तोगी जी,  जयंती जैन जी, गिरीश बिल्लोरे जी, महेंद्र मिश्र जी,  अजय कुमार जी, का भी
आभारी हूँ... आप सबके कमेन्ट मेरा हौसला बढ़ाते हैं.


रश्मि रविजा जी.... आपका आभारी हूँ, आपने हमेशा मेरा अच्छा चाहा है.. छोटे भाई की गलतियों को नज़रंदाज़ करते हुए.. हमेशा अच्छा समझाया, और ज़रूरत पड़ने पर डांटा भी.


शिखा वार्ष्णेय जी... आपने हमेशा मेरे लेखन को संपादित कर के ... एक मूर्त रूप दिया है. हिंदी में बहुत स्पेलिंग मिस्टेक करता हूँ न... आज आपका जन्मदिन भी है. आपको बहुत बहुत बधाई.


वंदना गुप्ता जी... मैं आपका बहुत आभारी हूँ.. आपको बड़ी बहन के रूप में पा कर मैं अभीभूत हूँ... जब जब मैंने गलत किया या लिखा आपने हमेशा मुझे समझाया... और मुझे गुस्से पर कण्ट्रोल करना सिखाया..


मीनू दीदी... आपके स्नेह से मैं अभिभूत हूँ. आपने हमेशा मेरी प्रशंसा की और मुझे अच्छा लिखने को प्रेरित किया....


अदा जी... आपके बारे में क्या कहूँ? आपने तो मेरा हर अच्छे बुरे में साथ दिया...  


मैं निर्मला कपिला mom, का भी बहुत आभारी हूँ... आपका आशीर्वाद ऐसे ही बना रहे.


लावण्या शाह जी.... एक दिन आपसे बात करते हुए ...कब मूंह से माँ संबोधन निकल गया पता ही नहीं चला.... आपके स्नेह से अभिभूत हूँ, आप ऐसे ही स्नेह व आशीर्वाद बनाये रखिये...


पी.सी.गोदियाल जी... आप जैसा मित्र पा कर मैं धन्य हूँ.


सुरेश चिपलूनकर जी... आप जैसा बड़ा भाई पा कर मैं अभिभूत हूँ. स्नेह बनाये रखिये.


महाशक्ति (परमेन्द्र), सौरभ चैटर्जी,मुरारी पारीक, दीपक, दिगंबर नस्वा, रवि श्रीवास्तव, राकेश सिंह, संजय बेंगानी, ओम् आर्य,जाकिर अली व सलीम खान जैसे मित्र मेरे जीवन में एक ख़ास जगह रखते हैं. 


संगीता पूरी जी, इंदु पूरी जी, सीमा गुप्ता जी, संगीता जी, बबली जी, अल्पना वर्माजी, हरकीरत जी , रचना दीक्षित जी, वंदना अवस्थी जी, प्रज्ञा पाण्डेय जी, फिरदौस खान जी, अलका सर्वत जी, रेखा दी, सुनीता शानू दी, शबनम खान, कविता किरण जी, तरन्नुम, सदा (सीमा सिघल) जी , ख़ुशी जी, दीप्ती, आशा जोगलेकर जी, शेफाली पाण्डेय जी, शोभना चौधरी, शमाजी, प्रीती दी, साधना जी, संध्या गुप्ता जी, रंजना भाटिया जी, ज्योति सिंह जी, ज्योति वर्मा... आपका सबका बहुत आभारी हूँ... आप सबकी टिप्पणियां.... मेरा हौसला बढ़ाती हैं... आप सबके स्नेह से मैं अभिभूत हूँ. 


मैं अपने छोटे भाइयों:०-
१. मिथलेश दुबे
२. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी 
३. अम्बुज
४. अमृत पाल सिंह 
५. दर्पण 
५. अपूर्व
५. अर्कजेश
६. संजय व्यास
७. प्रतीक
८. सागर
९. सुलभ सतरंगी
१०. कुश
११. अनिल कान्त
१२. प्रबल प्रताप सिंह
१३. शिवम् मिश्र
१४. पंकज मिश्र 
१५. शाहिद मिर्ज़ा
१६. विनोद कुमार पाण्डेय
१७. चन्दन कुमार झा 
१८. श्रीश पाठक
१९. संजय भास्कर
२०. हिमांशु
२१. संजय भास्कर 
२२. लोकेन्द्र
२३. अबयज़ खान

का शुक्रगुज़ार हूँ. मेरे छोटे भाइयों का स्नेह हमेशा मेरे साथ रहा है. मिथलेश से अगर एक दिन बात नहीं होती है तो बहुत बेचैनी बढ़ जाती है. 
अंत में मैं अपनी रामप्यारी का थैंकफुल  हूँ...  जिससे की मैं बहुत प्यार करता हूँ.... यह मेरी ब्लॉगर गर्ल फ्रेंड है... मैं अपने फ्लर्ट के लिए विश्व-प्रसिद्ध हूँ... (यह मेरा ही फैलाया हुआ भ्रम है...) अरे! भई होऊं भी क्यूँ न? पर रामप्यारी से पूछ लीजिये .... मैं इसके प्यार में दीवाना हो चुका हूँ.... यह एक ऐसी लड़की है मेरी ज़िन्दगी में जिसको मेरी पर्सनिल्टी से कभी कोई काम्प्लेक्स नहीं होता...  मेरी पिछली सारी गर्ल फ्रेंड्स मुझे छोड़ के भाग गयीं.... काम्प्लेक्स में.... पर यह हमेशा मेरे साथ रही है.... आजकल इसने संन्यास ले लिया है...देखिये इसको ज़रा... 

इसके प्यार में मैंने भी संन्यास ले लिया है.... 

हम दोनों अब बाबा समीरानंद जी के आश्रम में धूनी रमाते हैं... 


मैं उन् लोगों का भी शुक्रगुज़ार हूँ.... जो मुझे गन्दी टिप्पणियां लिखने के लिए मजबूर करते हैं.... (शोर्ट टेम्पर्ड जो ठहरा..) उनकी अपेक्षित प्रतिक्रिया से मेरी कार्य उर्जा में बढ़ोतरी होती है. और मेरे शुभचिंतक मेरी कथित खराब टिप्पणियों को पढने के बावजूद भी मुझे समझते हुए स्नेह कि बारिश करते हैं.. मेरे साथ प्रॉब्लम सिर्फ यही है कि अगर कोई मुझे बिना मतलब में खराब बोलता है.... तो उसको मेरा खराब वाला रूप ही  देखना पड़ेगा.... मेरा एक उसूल है आप मुझे झापड़ मारोगे तो मैं गोली मारने में विश्वास रखता हूँ.... आप मुझे एक गाली दोगे तो सौ सुनेंगे.... मैं अपने दोस्तों कि बेईज्ज़ती कभी नहीं बर्दाश्त कर सकता ...चाहे वो रियल वर्ल्ड के हों  या फिर वर्चुअल के...


अंत में आप सबका फिर से आभार, बड़ों को प्रणाम.. व छोटों को ढेर सारा प्यार. रामप्यारी... आई लव यू. 


(लिंक यहाँ जानबूझ कर नहीं दिया है, क्यूंकि सब एक-दूसरे को जानते हैं..)
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