मंगलवार, 8 मई 2012

फेसबुकिया बकवास, मेंटली कमज़ोर होना, और आज़ादी के घाव अब भी हरे हैं: महफूज़


मैं फेसबुक पर देखता हूँ कि कई लोगों ने देशभक्ति का ठेका ऐसे ले लिया है कि बाक़ी लोग उन लोगों के सिवाय कोई देशभक्त हैं ही नहीं. इन लोगों को पता नहीं कि ऐसे फेसबुक पर लिखने से देश और धर्म में कोई बदलाव नहीं आता उल्टा बेवकूफों की इमेज बनती है. देश सेवा समाज में और समाज के लिए अच्छे काम करने और अच्छे आचरण से बनती है. देश सेवा गरीबों और आम जनता में दुःख दर्द बांटने से होती है. आम जनता की समस्याओं को सौल्व करने से बनती है. यह ऐसे लोग हैं इन्हें लगता है कि फेसबुक पर लिख दिया और हो गई देश सेवा और तो और इनके लिए देशसेवा से मतलब है कि किसी भी पार्टी को गालियाँ दो. 

अरे भई.. इतने ही काबिल हो तो फील्ड में उतर कर काम करो, एम.पी./एम.एल.ऐ. बनकर समाज का भला ज़्यादा करो . कुछ लोगों को गलतफहमियां हो गईं हैं कि मिस्र में और एकाध देश में क्रान्ति फेसबुक से आई है और यह भी फेसबुक से ले आयेंगे, इन्हें यह नहीं पता कि फेसबुक ने सिर्फ कम्युनिकेट किया क्यूंकि उन देशों में सेल फोन्ज़ और बाक़ी मिडिया पर बैन हो गया था. और उस कंडीशन में फेसबुक ही काम में आया था. यह वो जाहिल हैं जो ख़ुद को बदलने की बजाये देश को बदलने की बात करते हैं लेकिन धर्म और जात-पात से ऊपर नहीं आ पाते. अरे! ख़ुद को बदल डालो देश अपने आप बदल जायेगा. फेसबुक से देशसेवा नहीं होती ना ही कोई सीरियसली लेता है. एक बात मैंने देखी है जब कोई भी आदमी अपनी ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर पाता.. आम आदमी, कलर्क/मास्टर/कंप्यूटर ओपेरटर/किराना दुकानदार/पत्रकार या फ़िर कोई नगर निगम कर्मचारी टाइप या फ़िर सब चलता है टाइप बन कर रह जाता है, और बहुत ज़्यादा सब-ऑर्डिनेशन में ज़िन्दगी गुज़ारता है तो वो देश सेवा, देश बदलने और दूसरों को और सिस्टम को गालियाँ देने के सिवाय और कुछ नहीं कर पाता. 

जब आप  ज़िन्दगी  में नालायक रहोगे तो फ्रस्ट्रेशन में दूसरों की कमजोरियों निकालोगे....घरों में ताका -झांकी करोगे, और फ़िर और फ्रस्ट्रेट होगे. इनका हाल उस मर्द की तरह होता है जो सेक्सुअली कमज़ोर होता है. जब मर्द सेक्सुअली कमज़ोर होता है तो वो सबसे पहले अपने ही घरों की महिलाओं पर गुस्सा उतारेगा, बीवी को डांटेगा, उसे गालियाँ देगा और जब ज़्यादा मर्दानगी दिखानी होगी तो मारेगा. क्यूंकि सेक्सुअली कमज़ोर आदमी सिवाय मारने के और गरियाने के कुछ और कर नहीं सकता. सेक्सुअली कमज़ोर आदमी सबसे पहले महिलाओं पर ही मर्दानगी दिखाते है. इसी तरह इस टाइप के देशभक्त होते हैं.. इन्हें "देशभक्ति" कह कर और दूसरों को गाली देकर दिखानी पड़ती है.. बाप पदै ना जने और पूत शंख बजावे वाला हाल होता है इनका. अगर लिखने से ऐसे ही देश बदलता तो आज हर कोई लिख ही रहा होता. 

अब मेरी एक कविता:

आज़ादी के घाव अब भी हरे हैं.. 

देश जब आज़ाद होते हैं,
उनके जिस्म पर 
स्वतंत्रता प्राप्ति के घाव होते हैं,
उन्हें भरा जाता है,
मगर आज़ादी के घाव अब तक हरे हैं
क्यूंकि   
देश का चिकित्सक 
रोज़  घाव साफ़ करने के बाद भी 
उसमें कांच के टुकड़े रख देता है,
ताकि 
उसकी ज़रुरत 
बनी रहे. 
( ऐसे ही है यह फ़ोटोज़.. नथिंग टू डू विद द पोस्ट..)

आईये अब मेरा फेवरिट गाना (ग़ज़ल) देखा जाए।

गुरुवार, 3 मई 2012

दो ग़ज़लकार, ज़मीर का जिंदा न रहना और हम दोनों मिल के...ह्म्म्म...: महफूज़

आज हमारे घर मशहूर शायर फार्रूक जायसी साहब का आना हुआ. फार्रूक साहब एक्साइज़ कमिशनर भी हैं और शायरी का शौक़ भी रखते हैं और अक्सर मशहूर ग़ज़ल गायक प्रदीप श्रीवास्तव के साथ मंच साझा भी करते हैं. फारूक साहब की ग़ज़लों को दुनिया भर में काफी लोगों ने लयबद्ध किया है. हालांकि! मैंने उनकी ग़ज़लों को अब पढना शुरू किया है और ग़ज़लों की तासीर को समझा है. कहते हैं कि बिना उर्दू के ग़ज़ल बन ही नहीं सकती और फारूक साहब उर्दू के बहुत ही ज़हीन और मक़बूल शख्सियत हैं.  आज जब उनसे बातें हुई तो मैंने उन्हें अपनी हिंदी में लिखी हुई कवितायें दिखायीं हालांकि हिंदी में कुछ भी दिखाना वैसा ही होता है जैसा हाई स्कूल की सेकण्ड डिविज़न में मार्कशीट, मेरे जैसा आदमी शरमाता सकुचाता हुआ हिंदी की कवितायें दिखाता है. उन्होंने पहले ही सिरे से मेरी कविताओं को नकार दिया. उन्होंने कहा कि कविता वो होती है जो गाई जा सके. आपने जो लिखा है वो इन पैरा फॉर्म है. उन्हें गाया नहीं जा सकता. मैंने कहा कि यह भी एक विधा है और काफी लोग लिख रहे हैं. उन्होंने छूटते ही कहा कि आप जैसा आदमी भी काफी लोगों को फौलो करने लग गया है? मुझे इस जुमले पर शर्म तो आई फ़िर अपनी शर्म पर सफाई से काबू कर लिया.   उन्होंने बताया कि बिना भाव को छुए आप कैसे गद्य कविताओं को भी लयबद्ध कर सकते हैं. मैंने उनसे कहा कि अब से कोशिश रहेगी कि आपकी बताई विधा में लिखूं. हालांकि ! होता यह है कि कविता तभी होती है जब हमारे मन में भाव हो , एक फीलिंग हो. विधा वगैरह सब भाव के साथ सेकंडरी हो जातीं हैं. 

                  (फार्रूक साहब)
बात ग़ज़ल की चल रही है तो ग़ज़ल कहने और गायकी में सीमा गुप्ता जी का भी जवाब नहीं है. सीमा जी को मैं काफी अरसे से देख, पढ़ और सुन रहा हूँ और कई ग़ज़ल की बारीकियों को उनकी ग़ज़लों के माध्यम से समझा है. ग़ज़ल गायकी और एड्रेस में सीमा जी आज की तारीख में पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं और कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरुस्कारों से नवाजी जा चुकीं हैं. सीमा जी के बारे में नेक्स्ट पोस्ट में... फिलहाल तो उनकी किताब और प्रेजेंटेशन को पढ़ रहा हूँ.
    (सीमा जी जब टी. वी . पर थीं तो मैंने फोटो खींच ली थी)

अब एक मेरी कविता फ़िर से सबके  लिए.. 

ज़मीर का ज़िंदा ना रहना 
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आदमी की आँख 
जब उसके भीतर कहीं गिर जाती है 
तब बाहर से अंधा होने के बावजूद भी,
वो भीतर से देखने लगता है 
बाहर ठोकरें खाने के साथ 
उसे यह साफ़ दिखाई देने लगता है 
कि ज़्यादातर लोग 
क्यूँ ठोकरें खा रहे हैं? 
और कुछ लोग 
इन्ही सड़कों पर 
क्यूँ 
सुविधा से चल रहे हैं.. 

(c) महफूज़ अली 

फ़िर कह रहा हूँ कि हमारे ज़िन्दगी में गीत/गानों का बहुत महत्त्व है.. यह ना हों .. तो ज़िन्दगी वैसी ही है जैसे कार विदाउट स्टेयरिंग. यह भी हमारा एक मीडियम ऑफ़ कम्युनिकेशन/एक्प्रेशन ऑफ़ लव है. 

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

छोटा सा हादसा, अखबारों की लाचारगी और असहमति की बेवकूफी: महफूज़


आज एक छोटा सा हादसा हुआ. हुआ क्या कि मैं गोमतीनगर से सी.एम.एस. स्कूल के रास्ते  हज़रतगंज  जा रहा था कि विपुल खंड के मोड़ पर एक बुज़ुर्ग साहब के स्कूटी को मैंने टक्कर मार दी हालांकि टक्कर हलकी थी फ़िर भी वो बुज़ुर्ग बगल में खुदी सड़क के किनारे बने गड्ढे में जा गिरे. मैं फ़ौरन अपनी कार रोक उनके पास भागा और देखा कि स्कूटी समेत बेचारे गड्ढे के अंदर हैं किसी तरह मैंने उनको बाहर निकाला फ़िर उनकी स्कूटी को. बलिष्ठ होने का यही फायदा है कि आपको  जहाँ ताक़त दिखानी चाहिए वहां आप आसानी से ताक़त दिखा सकते हैं. गड्ढे से देखा तो भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी अब डर यह था कि कहीं भीड़ मुझे ना धुन दे? स्कूटी अकेले बाहर निकाल कर रख दी... बुज़ुर्ग अंकल को चोट  नहीं आई थी और फ़िर वो भी अपनी गलती महसूस कर रहे थे. उन्हें पूरा चौराहा पार कर के आना चाहिए था और वो सीधा ही निकल आये. अब सफारी के आगे स्कूटी वैसे भी तिल्ली लगती है दिखाई नहीं दी. और हलके टक्कर से गड्ढे की ओर मुड गए. और फ़िर मेरे जैसा नया नया एस.यू.वी. चालक (ड्राईवर) तो कुछ ना कुछ तो होना ही था. ख़ैर! भीड़ ने मुझे पहचान लिया और फ़िर मेरे ऐटीट्युड को देखते हुए ख़ुद ही दूर हो गई. 
[यह सुबह सुबह जॉगिंग करते वक़्त]

मुझे ऐसा लगता है कि बुजुर्गों को गाडी वगैरह नहीं देनी चाहिए. उनसे कंट्रोल नहीं होती है. और कोई हादसा अगर होता है तो हर हादसे में सेंट-परसेंट गलती बुजुर्गों की ही होती है, लेकिन पिटता हमेशा दूसरा ही है. मैं तो हमेशा जब भी किसी बुज़ुर्ग को सड़क पर ड्राइव करते या सड़क पार करते देखता हूँ तो ख़ुद ही रुक जाता हूँ, उन्हें पहले पार करने देता हूँ या आगे जाने देता हूँ या फ़िर सही साइड देख कर निकल लेता हूँ. कभी भी बुजुर्गों और जानवरों के सामने से गाडी नहीं निकालनी चाहिए क्यूंकि यह दोनों हमेशा आगे की ओर ही भागते हैं. 
[सफ़ेद टी-शर्ट में मेरे जिम ट्रेनर के साथ मैं लाल टी-शर्ट में]

अभी हमारे हिंदुस्तान में सरकार ने लोगों को फोर/सिक्स लेन हाई वे जैसी फैसिलिटी तो दे दी है लेकिन हाई वे पर कैसे चला जाए यह नहीं बताया है? अभी भी हाई वे पर अचानक से जानवर और साइकल वाले निकल आते हैं और ज़्यादातर जाहिल लोग अचानक से गाडी मोड़ या रोक देते हैं. जिससे कि पीछे वाले को दिक्कत होती है. अभी मेरे साथ ऐसा ही हुआ था... गोरखपुर से लौट रहा था ...हमारे कार के आगे एक और कार जा रही थी... उसकी भी स्पीड सौ के ऊपर थी और उसने अचानक से ब्रेक लगा दिया सिर्फ पान थूकने के लिए. हमारी कार उससे जा भिड़ी हमारी कार को ज़्यादा नुक्सान नहीं हुआ उल्टा उसकी कार पीछे से दब गई. वो हमसे झगड़ने लगा. मैंने उसे क़ानून और तहज़ीब सिखाया वो नहीं माना तो हर्जाना देने के बहाने मैंने उसे कार के अंदर बुला लिया और फ़िर अपने ड्राईवर से कहा कि अब कार भगा ले चलो. उसे मैंने अपनी कार में बहुत मेंटल टौरचर किया और करीब बाराबंकी के पास नब्बे किलोमीटर दूर छोड़ दिया. बेचारे को अच्छा सबक मिला होगा. इतनी देर में मैंने उसे सारे ड्राइविंग रूल्ज़ सीखा दिए थे. अब उसने तौबा कर लिया होगा कि कभी भी रौंग ड्राइविंग नहीं करूँगा और मुझे तो ज़िन्दगी भर याद करेगा और कर रहा होगा. जब हमारा कॉन्फिडेंस लेवल हाई होता है ना तो गुंडई करने का मज़ा ही अलग होता है. वैसे मेरी अंग्रेज़ी बोलने वाली पर्सनैल्टी देसी गुंडई से मैच नहीं खाती .. लेकिन यही तो मज़ा है धोखा देने में.. अब सरकार को ट्रैफिक रूल्ज़ के ऊपर भी जागरूक करते हुए टी.वी. में ऐड देना चाहिए "जागो ग्राहक... जागो". स्कूल्ज़ में एक ट्रैफिक रूल्ज़ पर भी चैप्टर या सब्जेक्ट होना चाहिए. 
[यह जहाँ मैं स्विमिंग करने जाता हूँ ... वहां का एक प्यारा दोस्त]

ऐसी आप बीतियाँ  लिखने का भी एक अलग मज़ा है. आईये ज़रा अब कविता देखते हैं. पिछले एक साल के दौरान ढेर सारी कवितायें लिखी थीं, उन्हें ही धीरे धीरे पोस्ट करता रहता हूँ. 
[लोग मुझे आत्म-मुग्ध कहते हैं... संगीता स्वरुप जी कहतीं हैं बच्चा है ही ऐसा :)... जब हमारे पास अपनी इतनी फ़ोटोज़ हैं तो गूगल से क्यूँ लें भला?]  

अखब़ार की लाचारगी...

दिन अखबार की तरह 
सुबह-सुबह रोज़ 
मेरे कमरे में आकर 
गिर जाता है और 
शाम तक 
मैं उसी पर नज़रें गडाए 
मजबूर रहता हूँ ....
वही 
घायलों की ख़बरें,
हत्याओं के समाचार ,
आवश्यकताओं के विज्ञापन 
और 
बेरोज़गारी की लाचारगी.  

(c) महफूज़ अली 

जब भी हम किसी से भी सहमत नहीं होते हैं तो वो असहमति सिर्फ हम अपने लिए ही जताते हैं. लेकिन जाहिल इन्सान इसे हमेशा दूसरों का लिया बदला ही समझते हैं. अरे! भई... हम जब भी लड़ेंगें तो सिर्फ अपने लिए ही लड़ेंगें दूसरों के लिए लड़ने सिर्फ बेवकूफ ही जाते हैं. राजनीतिज्ञ भी जब भी दूसरों के लिए लडेगा तो सिर्फ और सिर्फ अपना ही फायदा देखेगा. बिना मतलब में कोई किसी के लिए तब तक के लिए नहीं लडेगा जब तक के वो उसका कोई अपना ना हो. 

आईये अब अपना फेवरिट गाना दिखाता हूँ. 

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

रिज़र्वेशन सिस्टम बेवजह तो नहीं, अफ़सोस भी कोई नहीं और स्टिंग ऑपरेशन: महफूज़

मैं कभी आरक्षण विरोधी नहीं रहा. आजकल हमारे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में बहुत से ऐसी जातियों को जो पहले ओ.बी.सी. में आतीं थीं अब उनको जातियों को एस.सी. में डाला जा रहा है. मैंने देखा है कि रिज़र्वेशन सिस्टम जो है वो कुछ करता नहीं है सिवाय कुछ काबिल लोगों में फ्रस्ट्रेशन भरने के. मैं ख़ुद 1998 में सिविल सर्विसेस के इंटरविउ में 200 में से 180 नंबर पाने के बाद भी फाइनल मेरिट में नहीं आ पाया. मैडम गोम्ज़ का बोर्ड था जो शायद उस वक़्त पंजाब की प्रिंसिपल फायनेंस सेक्रेटरी थीं. (वैसे याद नहीं है). उनसे भी बाद में बात हुई तो स्केलिंग सिस्टम और रिज़र्वेशन पौलिसीज़ को ज़िम्मेदार ठहराया  गया. अभी संघ लोक सेवा आयोग को अपने स्केलिंग सिस्टम को डिस्क्लोज़ करने की नोटिस दी गई है. देखिये क्या होता है. अब जो जातियां फ़िर से नये पौलिसीज़ में डाली जा रही हैं... क्या वाकई में उनका कोई उद्धार होगा? क्या वो वाकई में इतने इंटेलिजेंट होंगे? अभी  लखनऊ के वर्ल्ड फेमस किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में अभी भी बहुत से ऐसे स्टुडेंट्स हैं जो पैंतीस से बयालीस वर्ष के हैं और अभी भी एम.बी.बी.एस. के दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवे और फाइनल इयर में पिछले दस से पंद्रह सालों से हैं. इस बात पर कभी खुशदीप भैया ने कोई पोस्ट भी लिखी थी. अब ऐसे रिज़र्वेशन सिस्टम का क्या फायदा? 

आज मेरी मुलाक़ात मुख्यमंत्री आवास पर एक साहब से हुई... कहने लगे अब तो आपको भी हमारी सरकार से फायदा होगा. मैंने कहा कैसा फायदा? उन्होंने कहा कि हमारी सरकार अब मुस्लिम रिज़र्वेशन भी दे रही है. मैंने उनका डाउट क्लियर किया कि भई जो दे रही है उससे सिर्फ दलित मुस्लिम्स को ही फायदा होगा और मैं दलित नहीं हूँ. और फ़िर मैं अब इस उम्र में लेकर क्या करूँगा क्या? किसी बड़े जगह का चौकीदार बनने से अच्छा है मैं अपने छोटी जगह का राजा बन कर रहूँ. यह रिज़र्वेशन सिस्टम जब तक के रहेगा तब तक के काबिल इन्सान अपनी जगह पर नहीं पहुंचेगा. मेरा एक बहुत अच्छा दोस्त है वो आई.आर.एस. है उसके मार्क्स बहुत अच्छे होते हुए भी आई.ऐ.एस. नहीं मिला और बहुत से ऐसे भी जिनके मार्क्स पांचवीं पास करने के लायक भी नहीं थे लेकिन रिज़र्वेशन और स्केलिंग सिस्टम की वजह से आज आई.ऐ.एस में हैं. सिस्टम के ऐसे दोहरे नीतियों की वजह से ही काबिल आदमी कुछ करने के लायक नहीं है. 

1938 में रिज़र्वेशन सिस्टम को शुरू ही इस बात पर किया गया था कि बीस साल तक दलितों व् पिछड़ों को आरक्षण के माध्यम से समाज के मुख्यधारा में लाया जायेगा फ़िर इसे ख़त्म कर दिया जायेगा. और यह हर बीस साल पर बढ़ता रहा और बढ़ता रहा और बढ़ता रहा और बढ़ता रहेगा. आज भी आई.आई.टीज़. में बहुत सारे ऐसे छात्र हैं जो ना इंग्लिश जानते हैं ना मैथ्स.. बस आ गए हैं. अब दिक्कत यह है कि जिन लोगों को मुख्यधारा में लाना था उनको लाने के चक्कर में जनरल काबिल अब समाज के दलित और पिछड़े हो गए हैं. अब इनके लिए कौन सी सरकार क्या करती है? यह देखना है. देखना यह है कि जो नई पिछड़ी जातियां अब शेड्यूल कास्ट में डाली जा रही हैं.. क्या वो वाकई में इस नये रिज़र्वेशन को डिज़र्व करतीं हैं? 

अच्छा! एक चीज़ बता दूं सबको... आजकल मैं हिंदी पढना सीख रहा हूँ... मेरी वोकैब और ग्रैमर बहुत कमज़ोर है हिंदी में. हालांकि मैं हिंदी को बहुत ज़्यादा नहीं जानता हूँ लेकिन यह मेरी राष्ट्र व् मातृभाषा है इसीलिए इसे जानना ज़रूरी समझता हूँ. और सबसे बड़ी बात कि मेरा मतलब अब हिंदी से ही निकलता है. हाँ! साहित्य मैं अंग्रेज़ी का ही पढ़ता हूँ और अंग्रेज़ी का ही लिखता हूँ. हिंदी में मैं साहित्य लिख भी नहीं पाता हूँ. फ़िर भी मैं कई हिंदी मैगजीन्स का शुक्रगुज़ार हूँ ... छाप देते हैं. मुझे अंग्रेज़ी की ज़रूरत है और हिंदी सिर्फ सम्प्रेषण के लिए (Communication :सम्प्रेषण वर्ड मैंने अभी डिक्शनरी में देखा  है.) हिंदी में साहित्य इसलिए नहीं लिख पाता हूँ... कि हिंदुस्तान के छः हिंदी भाषी राज्य के  हर घर का पांचवा मेंबर हिंदी का साहित्यकार है. 

अब एक नज़र मेरी कविता पर....

बेवजह तो नहीं है 

रात उतर आई है, 
सूरज के पैरों पर 
सबकी  नज़र है 
संशय के घेरों पर 
कब तक विश्वास करें?
गीत, ग़ज़ल और शे' रों पर
अबोध नहीं दिखता है 
मेरा यह क्रोध लोगों पर.. 


मेरी पिछली पोस्ट पर कई लोग मुझे कोस रहे होंगे ... मुझे कोई अफ़सोस नहीं है. अफ़सोस किस बात का? ही ही ही ... गाना सुनिए गाना और देखिये.. आजकल मुझे लव सोंग्स बहुत पसंद आते हैं.. जब हम बहुत रोमैंटिक मूड में होते हैं तो लव सोंग्स ही अच्छे लगते हैं. और वैसे भी यह गाना बहुत सुकून देता है .. क्यूँ हैं न? 



पिछले दो दिनों से फेसबुक पर बहुत सुंदर सुंदर  लड़कियों के ऐड फ्रेंड रिक्वेस्ट आ रहे हैं. पर  अचानक ऐसा क्यूँ? लगता है कोई मेरा स्टिंग ऑपरेशन करना चाहता है.  

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

लेवल की बातें, शब्द अपनी सीमाएं नहीं तोड़ते और विरोध होना चाहिए, लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं: महफूज़ (Mahfooz)

अभी दो दिन पहले की बात है गोमती नगर के विराम खंड एरिया में एक मनसा मंदिर है वहां गया था क्यूंकि हमारे गोमती नगर में वही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं नहीं तो गोमती नगर में मारुती की कारें रखने वाला ग़रीब समझा जाता है. और यह मनसा मंदिर ही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं. मैं वहां अक्सर जाता रहता हूँ ... अकसर पुराने कपडे और अपनी माँ के नाम पर गरीबों को देता रहता हूँ पता नहीं क्यूँ पिता जी के नाम पर किसी को कुछ देने का मन ही नहीं करता... शायद पिताजी के जाने के बाद भी उनसे कॉन्फ्लिक्ट जारी है. माँ तो बहुत याद आती है हर पल पर पिता जी सिर्फ तभी याद आते हैं जब मैं मुक़दमे के सिलसिले में कोर्ट में जाता हूँ और जज का दरबान ज़ोर से चिल्ला कर मेरा नाम वल्द मेरे पिता जी हाज़िर हों या फ़िर जब टैक्स फ़ाइल करना होता है तब या फ़िर जब कहीं से कोई छुपी ही रकम मिलती है. एक बार कोर्ट में मैं जज से उलझ पड़ा था क्यूंकि मैंने कोर्ट में एंटर जेब में हाथ डाल कर किया था और जज के पेशकार ने मुझे जेब से हाथ निकालने को कहा था.. और हम वैसे भी सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रसित.. जज से यह कह कर उलझ पड़े कि यह सामंतवादी व्यवस्था है और कई  तर्कों से जज से उलझने के बाद वहीँ पेशकार को दो चार उलटी सीधी बातें सुनाने के बाद कोर्ट की अवमानना के जुर्म में ख़ुद को पांच सौ का जुर्माना लगवाया. लेकिन फ़िर उसके बाद किसी ने मुझसे उलझने की कोशिश नहीं की, बाद में जज मुझसे कहता है कि अगर तुम मेरे दोस्त नहीं होते तो सीधा जेल भिजवाता..... हमारे देश का क़ानून भी अजीब है जब तर्कों से हार जाता है तो जुर्माना लगा देता है या फ़िर संसद में बिल पास करने के नाम टाल जाता है. 

हाँ! तो हुआ क्या कि मनसा मंदिर गया था तभी देखा कि एक महिला अपने सत्रह-अठरह वर्षीय पुत्र के साथ मंदिर से बाहर निकल रही है. हम दोनों ने एक दूसरे को ध्यान से देखा और पहचान गए. वो मेरी किसी ज़माने में क्लास मेट थी. बात बात में पता चला कि वो समाज कल्याण अधिकारी है और अभी लखनऊ ट्रान्सफर हुआ है कोई  एक साल पहले, इंदिरा भवन में ही ऑफिस है. हम लोग बात करते करते गोमतीनगर में कैफे कॉफ़ी डे में बैठ गए, कैफे कॉफ़ी डे के बगल में ही वी.एल.सी.सी. है मेरी बहन वहीँ जिम जाती है मैंने सोचा कि उसे भी पिक कर लूँगा और इससे कुछ बातें भी हो जायेंगीं. और उसका बेटा वहीँ अपने एक दोस्त से मिलने चला गया. बात बात ही में उसने मुझसे पूछा कि  क्या तुम्हे मेरी याद आती थी? मुझे इस सवाल पर हंसी आई बहुत कस के. मैंने उससे कहा कि भई तुम्हे तो मैं कबका भूल चुका था... शक्ल तक याद नहीं थी... उसे यह लगा था कि मैं उसकी याद में पगला गया होऊंगा. फ़िर ख़ुद ही कहती है कि 'हाँ! तुम्हे क्या कमी? उससे थोड़ी देर यहाँ वहां की बातें होती रही... फ़िर मेरी सिस्टर भी आ गई हम सबने मिलकर खाया पिया काफी पी और अपने अपने घर आ गए. 

घर आ कर मैंने सोचा कि यह लड़कियां (महिलायें भी) पता नहीं क्या चाहती हैं और क्या समझतीं हैं? इन्हें यही लगता है कि लड़का इनकी याद में मर गया होगा, वैसे लड़कों की साइकोलॉजी (सब लड़के नहीं) बहुत डिफरेंट  होती है लड़का (अगर वाकई में लड़का है तो) हमेशा स्विच ओवर बहुत जल्दी कर लेता है. यह हमेशा लड़की के ऊपर डिपेंड करता है कि उसने कैसा रिश्ता (प्यार) रखा है कि लड़का उससे हमेशा बंध कर रहे.  

वैसे मैंने देखा है और महसूस भी किया है कि महिलायें बहुत सारी गलतफहमियों में बचपन से जीती हैं. वैसे महिलाओं (लड़कियों) के बिहेवियर को साइकोलौजिकली वॉच करने में बहुत मज़ा आता है. महिलाओं में सिर्फ एक चीज़ अच्छी होती है कि वो भविष्य जान लेतीं हैं और सिक्स्थ सेन्स उनमें वाकई में होता है. और पुरुषों में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर की बहुत कमी पाई जाती है और सिक्स्थ सेन्स होता ही नहीं. महिलायें फ़ौरन झूठ पकड़ लेतीं हैं और पकड़ कर शांत रहतीं हैं... वक़्त आने पर पोल खोलतीं हैं  और पुरुष सोचता है कि उसने महिला को बेवकूफ बना लिया. 

बहुत हो गया अब... अब ज़रा मेरी कविता भी बाट जोह रही हैं. कविता के साथ एक प्लस पॉइंट यह है कि यह कहीं भी लिखी जा सकती है... ट्रेन में, बाथरूम में, टहलते हुए और भी कई तरह से. मुझे कई बार बड़ा सरप्राइज़ होता है कि लोग रोज़ रोज़ कैसे कविता लिख लेते हैं? या तो कहीं से चुराते होंगे या फ़िर तुकबंदी होती होगी... क्यूंकि कविता लिखने के लिए भावनाओं में और भावनाओं का होना बड़ा ज़रूरी है. वैसे यह भी है कि बहुत बार ऐसा हुआ है कि कि कई लोगों की कविता पढने के बाद मुझे आत्महत्या से रोका गया है. एक बार एक कोई मनहूस सी शक्ल वाले की कविता अहा! ज़िन्दगी में पढ़ी थी उस कविता को पढ़ कर ऐसा लगा कि इस कविता को मैं कोई बीस पच्चीस साल या और भी पहले पढ़ चुका हूँ. ख़ैर! कविता एक ऐसी चीज़ है जिसकी चोरी बहुत आसानी से हो जाती है और पकड़ में भी नहीं आती है. अरे! आईये ज़रा अब मेरी कविता पढ़ते हैं:--

शब्दों की सीमायें नहीं होतीं 
______________________
उदासी 
गिरफ्त से बाहर 
ठहरी हुई है 
और मैं उसे शब्द मानने को
तैयार नहीं हूँ .... 
शब्द यदि अपनी सीमायें तोड़ दें 
तब वह शब्द नहीं रह जाता.
_________________________
(c) महफूज़ अली 


(फोटोग्रैफ्स तो ऐसे ही डाली गयीं हैं... आई एम इनफ हैंडी टू बी कौपीड फ्रॉम गूगल .. दैट्स वाय माय फोटोग्रैफ्स ईज़ हियर.)

जैसा कि मैंने कहा था... कि पोस्ट के आखिरी पंक्तियाँ हटा दी जायेंगीं... और शीर्षक में भी बदलाव करूँगा... तो वो मैंने कर दिया है. जिन्हें मेसेज देना था उन तक मेसेज पहुँच गया है... अब शायद वो साहब ऐसा नहीं  करेंगे... और उन्हें जो भी प्रॉब्लम होगी... तो वो किसी को पोस्ट लिख कर ... कुछ नहीं कहेंगे... ऐसा हम सोच सकते हैं. मेरे ऐसा लिखने से सबको कोफ़्त और परेशानी हुई होगी... मैं समझ सकता हूँ. लेकिन मैं मजबूर था. अब कोई किसी महिला को अपशब्दों से नवाज़ने की हिम्मत नहीं करेगा. और करना भी नहीं चाहिए. विरोध होना चाहिए.. ..लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं. 


आईये मेरा वन ऑफ़ दी फेवरिट गाना देखते हैं.. 



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