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मंगलवार, 8 मई 2012

फेसबुकिया बकवास, मेंटली कमज़ोर होना, और आज़ादी के घाव अब भी हरे हैं: महफूज़


मैं फेसबुक पर देखता हूँ कि कई लोगों ने देशभक्ति का ठेका ऐसे ले लिया है कि बाक़ी लोग उन लोगों के सिवाय कोई देशभक्त हैं ही नहीं. इन लोगों को पता नहीं कि ऐसे फेसबुक पर लिखने से देश और धर्म में कोई बदलाव नहीं आता उल्टा बेवकूफों की इमेज बनती है. देश सेवा समाज में और समाज के लिए अच्छे काम करने और अच्छे आचरण से बनती है. देश सेवा गरीबों और आम जनता में दुःख दर्द बांटने से होती है. आम जनता की समस्याओं को सौल्व करने से बनती है. यह ऐसे लोग हैं इन्हें लगता है कि फेसबुक पर लिख दिया और हो गई देश सेवा और तो और इनके लिए देशसेवा से मतलब है कि किसी भी पार्टी को गालियाँ दो. 

अरे भई.. इतने ही काबिल हो तो फील्ड में उतर कर काम करो, एम.पी./एम.एल.ऐ. बनकर समाज का भला ज़्यादा करो . कुछ लोगों को गलतफहमियां हो गईं हैं कि मिस्र में और एकाध देश में क्रान्ति फेसबुक से आई है और यह भी फेसबुक से ले आयेंगे, इन्हें यह नहीं पता कि फेसबुक ने सिर्फ कम्युनिकेट किया क्यूंकि उन देशों में सेल फोन्ज़ और बाक़ी मिडिया पर बैन हो गया था. और उस कंडीशन में फेसबुक ही काम में आया था. यह वो जाहिल हैं जो ख़ुद को बदलने की बजाये देश को बदलने की बात करते हैं लेकिन धर्म और जात-पात से ऊपर नहीं आ पाते. अरे! ख़ुद को बदल डालो देश अपने आप बदल जायेगा. फेसबुक से देशसेवा नहीं होती ना ही कोई सीरियसली लेता है. एक बात मैंने देखी है जब कोई भी आदमी अपनी ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर पाता.. आम आदमी, कलर्क/मास्टर/कंप्यूटर ओपेरटर/किराना दुकानदार/पत्रकार या फ़िर कोई नगर निगम कर्मचारी टाइप या फ़िर सब चलता है टाइप बन कर रह जाता है, और बहुत ज़्यादा सब-ऑर्डिनेशन में ज़िन्दगी गुज़ारता है तो वो देश सेवा, देश बदलने और दूसरों को और सिस्टम को गालियाँ देने के सिवाय और कुछ नहीं कर पाता. 

जब आप  ज़िन्दगी  में नालायक रहोगे तो फ्रस्ट्रेशन में दूसरों की कमजोरियों निकालोगे....घरों में ताका -झांकी करोगे, और फ़िर और फ्रस्ट्रेट होगे. इनका हाल उस मर्द की तरह होता है जो सेक्सुअली कमज़ोर होता है. जब मर्द सेक्सुअली कमज़ोर होता है तो वो सबसे पहले अपने ही घरों की महिलाओं पर गुस्सा उतारेगा, बीवी को डांटेगा, उसे गालियाँ देगा और जब ज़्यादा मर्दानगी दिखानी होगी तो मारेगा. क्यूंकि सेक्सुअली कमज़ोर आदमी सिवाय मारने के और गरियाने के कुछ और कर नहीं सकता. सेक्सुअली कमज़ोर आदमी सबसे पहले महिलाओं पर ही मर्दानगी दिखाते है. इसी तरह इस टाइप के देशभक्त होते हैं.. इन्हें "देशभक्ति" कह कर और दूसरों को गाली देकर दिखानी पड़ती है.. बाप पदै ना जने और पूत शंख बजावे वाला हाल होता है इनका. अगर लिखने से ऐसे ही देश बदलता तो आज हर कोई लिख ही रहा होता. 

अब मेरी एक कविता:

आज़ादी के घाव अब भी हरे हैं.. 

देश जब आज़ाद होते हैं,
उनके जिस्म पर 
स्वतंत्रता प्राप्ति के घाव होते हैं,
उन्हें भरा जाता है,
मगर आज़ादी के घाव अब तक हरे हैं
क्यूंकि   
देश का चिकित्सक 
रोज़  घाव साफ़ करने के बाद भी 
उसमें कांच के टुकड़े रख देता है,
ताकि 
उसकी ज़रुरत 
बनी रहे. 
( ऐसे ही है यह फ़ोटोज़.. नथिंग टू डू विद द पोस्ट..)

आईये अब मेरा फेवरिट गाना (ग़ज़ल) देखा जाए।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

महिलायें सावधान: महफूज़


फेसबुक पर डॉ. मृणालिनी ने अपने स्टेटस पर जब यह डाला " ATTENTION ALL MY LADY FRIENDS....THERE ARE SOME CREEPS ON FACEBOOK LIKE HOW WE HAVE IN SOCIETY WHO ARE TRACKING MIDDLE AGED RICH WOMAN BEFRIENDING THEM BEING EMOTIONAL AND TALKING GOOD JUST TO EXPLOIT...IDENTIFY AND KICK THEM ON THEIR..Butttts.............."  तो मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. उनसे पता चला कि ऐसा काफी फेसबुक और ब्लॉग की महिलाओं के साथ हुआ है. मैंने उन्हें बताया कि मैं भी ऐसी बहुत सी महिलाओं को जानता हूँ जिनके साथ ऐसा हुआ है. कुछ को तो मैने ही उन महिलाओं के कहने पर भगाया और कुछ को इसीलिए कुछ नहीं कह पाया क्यूंकि उन महिलाओं की डिग्निटी का सवाल था. अब सोचने वाली बात यह है कि आख़िर ऐसा होता क्यूँ है? क्या महिलायें गलत हैं? या फ़िर वो पुरुषों की ही गलती है? थोडा सोचने पर निष्कर्ष यही निकला यह सारी प्रॉब्लम साइकोलॉजिकल और इमोशनल है. मिडल एज में आ कर एक पॉइंट ऐसा आता है कि कुछ अलग की रिक्वायरमेंट होती है और वो अलग को पाने के उसमें महिलायें कुछ ऐसे पुरुषों के चक्कर में फंस जातीं है. ऐसे पुरुष भी बहुत शातिर किस्म के होते हैं, वो बातों के दौरान कमज़ोरी जान लेते हैं और फ़िर उसी कमज़ोर पॉइंट पर हिट करते हैं और महिला को इमोशनल औरा में लेकर सेक्सुअल और फाइनेंशियल बेनेफिट लेते हैं या लेने की कोशिश करते हैं. और जब यह दोनों ही फुल्फिल्मेंट नहीं होता है तो उस महिला को ब्लैकमेल या परेशान करते हैं.

मैंने वही सोचा कि क्यूँ ना एक ऐसी पोस्ट लिखी जाए और महिलाओं को यह बताया (सावधान किया) जाए कि इस प्रकार के पुरुषों की पहचान कैसे की जाए और इनसे कैसे बचा जाए? इस प्रकार के पुरुष कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं महिलाओं को फांसने के लिए. आईये जाने वो कौन से पैंतरे चलते हैं जिससे कि महिला पूरी तरह से उनके जाल में आ जाये:---------
  • जब कोई पुरुष बिना मतलब में आपके प्रोफाइल और प्रोफाइल पिक्चर की तारीफ़ करे और यह कहे कि आप बहुत सुंदर हैं.
  • आपके शारीरिक अंगों जैसे आँखें, बाल, नाक इत्यादि की बेवजह तारीफ़ करे भले ही आप उतनी ख़ूबसूरत ना हों.
  • आपसे पारिवारिक जानकारी लेने की यूँ ही कोशिश करे. 
  • आपके किसी भी फ़ालतू लिखे हुए कविता, शे'र, कहानी, आपबीती की जमकर तारीफ़ करे और तारीफ में पास आने की कोशिश करे. 
  • आपको हिंदुस्तान का शेक्सपियर बताये.
  • आपकी किसी सहेली की आपसे बुराई करे और उस सहेली को आपसे लडवाए.
  • आपकी सुन्दरता की तारीफ़ किसी अंदाज़ में करे. 
  • अगर आपने गुड नाईट भी लिखा तो उस पर लम्बे चौड़े कमेन्ट दे. 
  • आपके पति या बच्चों की तारीफ़ करे. 
  • आपके फेसबुक में प्राइवेट लव मेसेजेज़ छोड़े. 
  • अपनी जवानी के समय की फ़ोटोज़ दिखाए. 
  • अपने बीस साल के बच्चे को पांच साल का बताये. 
  • अगर आपने कोई (वाहियात सी) किताब लिखी है उसकी बिना मतलब में आपसे बिना पूछे उसकी समीक्षा करने बैठ जाये. 
  • ज़बरदस्ती आपकी लिखी हुई  किताब की तारीफ़ करे. 
  • कोई जब यह कहे की आप बहुत अच्छा लिखती हैं .. मैं आपकी किताब छापना चाहता हूँ. (ऐसे पुरुषों से फ़ौरन यह सवाल करिए कि कितने पुरुषों की  किताब उसने छापी है?)
  • आपके शहर की तारीफ़ करे. 
  • जब कोई बिना मतलब में आपको साहित्यकार बोले. (साहित्यकार होते तो यहाँ नहीं होते जग में नाम होता)
  • कई अखबारों में काम करने वाले पुरुष महिलाओं की छपास की आदत को जानते हुए छापने की ज़िद करते हैं, ऐसे पुरुषों  से दूर रहिये. उनसे यही सवाल करिए कि भई अगर तू इतना ही इंटेलिजेंट होता तो कहीं और होता? 
  • कई पुरुष पत्रकार (नालायक) सिर्फ महिलाओं से ही बोलते हैं कि हम आपको छापेंगे. इनसे दूर रहिये.
  • कई ऐसे पुरुष भी मिलेंगे जो ऐसे अखबारों में काम करते हैं जिनका नाम भी कभी नहीं सुना होता है वो महिलाओं को छाप कर उन्हें पुदीने की झाड पर चढाते हैं. ऐसे लोगों से दूर रहिये. 
  • आपसे अपनी बीवी की बुराई करे. 
  • आपसे ख़ुद को कामदेव का अवतार बताये. 
  • ज़बरदस्ती सेक्सुअल टॉक्स पर आये. 
  • अपने और आपके ओरगेन को डिस्कस करने की कोशिश करे (बिना प्यार में इन्वोल्व हुए). 
  • आपको यह भी कहे कि कहीं देखा है.
  • ध्यान रहे बहूत कम महिलायें इंटेलिजेंट होतीं हैं और कोई पुरुष जब आपको इंटेलिजेंट बताये तो संभल जाएँ.
  • आपसे बात करते हुए अचानक रो पड़े और यह रोते रोते अपनी बीवी और बच्चों की बुराई करे और फ़िर यह भी कहे कि माँ याद आ गई. 
  • बात करते करते किसी गर्लफ्रेंड/बीवी को यह कहे कि वो मुझे छोड़ कर चली गई . 
  • अपनी बीवी को अपने मरे हुए भाई की बीवी बताये... और यह कहे रोते रोते कि मुझे मज़बूरी में भैया के मरने के बाद इससे शादी करनी पड़ी है,.  
  • कोई जब अपनी बीवी को लेस्बियन बताये. 
  • और अपनी प्रोफेशनल टेंशन को बार बार हाईलाईट करे. 
  • विदेशों में रहने वाली महिलाओं को टार्गेट कर उनसे पैसे डिमांड करे. 
  • मिडल एज में भी आपको स्वीट सिक्सटीन बताये. 
  • और ख़ुद को महफूज़ अली जैसा हैंडसम बताये. 
मैं ऐसा नहीं कहता कि सब पुरुष ऐसे होते हैं, ऐसी महिलायें भी होतीं हैं. कुछ महिलायें  भी पुरुषों को सेक्सुअल और फाइनेंशियल एडवांसमेंट  के लिए फांस्तीं है. तो ऐसी महिलाओं को उनकी मनचाही चीज़ देकर खुश रखे रहना चाहिए. उसमें पुरुषों का कुछ नहीं जाता है. जब सब म्यूचुयल है  तो कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. चूंकि महिलाओं को परेशानी ज़्यादा होती है तो उपरोक्त बातें सिर्फ उन महिलाओं के लिए हैं. 

अब देखिये जो भी पुरुष महिलाओं पर जब भी मंडराता है तो समझ जाइये कि वो इरेक्टाइल डिसफंक्शन से ग्रसित है... वो अपना फ्रस्ट्रेशन हमेशा दूसरी महिलाओं से पींगे बढ़ा कर दूर करता है क्यूंकि उसकी बीवी उसकी सच्चाई जानती है और नेट पर रहने वाली महिला नहीं. कमज़ोर आदमी हमेशा महिलाओं के पास रहने की कोशिश करता है और गिर गिर के चापलूसी करता है. आम ज़िन्दगी में भी वही पुरुष महिलाओं को मारता है या चिल्लाता है जो फिजिकली कमज़ोर होता है, वो अपनी मर्दानगी ऐसे ही दिखाता है. सेम ऐसा ही नेट पर है देर रात तक जग कर महिलाओं के ब्लॉग पर और फेसबुक पर मंडराना और ज़बरदस्ती तारीफें करना उनका शगल होता है. अब यह महिलाओं के  ऊपर डिपेंड करता है कि वो कैसे ऐसे पुरुषों को हैंडल करतीं हैं? जब भी कोई पुरुष आस-पास मंडराए तो समझ जाईये कि बेचारा कोई खंभा नहीं उखाड़ सकता है, वो इस लायक ही नहीं होता है कि कुछ गाड़े या उखाड़े. इरेक्टाइल डिसफंक्शन से ग्रसित पुरुषों से जुड़ कर सिवाय फ्रस्ट्रेशन के कुछ नहीं मिलेगा. और जो नोर्मल मर्द होगा उसका बिहेवियर बहुत नोर्मल होगा.. ज़बरदस्ती तारीफ़ नहीं करेगा, अपने बीवी-बच्चों को ध्यान देने वाला होगा, और उसका एक टाइम शेड्यूल होगा नेट पर आने का ... वो आएगा चंद लोगों से मिलेगा बात करेगा और फ़िर सोने चले जायेगा. 
(भई, यह फोटो इसीलिए डाली है ताकि जिनको अभी मेरे ऊपर गुस्सा आ रहा होगा तो वो मुझे देख कर थोडा और फ्रस्टेट हो लें)

तो पूरा जिस्ट(सारांश) सेक्स पर ही टिका है. यह भी सोचने वाली बात है कि आख़िर हर सेक्सुअल ताक़त की दवाएं सिर्फ पुरुषों के लिए ही क्यूँ बनीं हैं? सोचियेगा ज़रा... 

आईये अब, अपना मनपसंद गाना सुनाता हूँ. ऊप्स ! दिखाता हूँ... मैं तो आजकल वैसे भी  ज़िन्दगी से बहुत प्यार करने लगा हूँ और जब हम खुश होते हैं तो हम गाने ज़रूर सुनते हैं.. 


शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

अब तो नदी के सूखने की संभावना ही नहीं है: महफूज़ (Mahfooz)

मुझे पता नहीं क्यूँ कविता करने से बहुत डर लगता है..... एक तो यह कि कोई पढ़ता नहीं है और जो पढ़ भी लेता है तो वो अपना दिमाग लगा कर उसके मतलब में अपने हिसाब से एनालिसिस कर उस कविता को तहस नहस कर देता है और फ़िर ऊपर से मेरे जैसे को हिंदी डिक्शनरी देखनी पड़ती है तो वो अलग हेडेक... अब इस कविता में ही मुझे नहीं पता था कि छोटे छोटे पत्थरों को क्या बोलते हैं बड़ी मुश्किल से पता चला कि कंकड़ भी बोलते हैं ... ऐसा नहीं है कि मुझे कंकड़ नहीं पता था ...पता तो था लेकिन दिमाग़ में नहीं आ रहा था. अंग्रेज़ी सोचने और खाने का यही हाल होता है. 

अभी समीर लाल जी ने मुझे दोबारा ब्लॉग्गिंग करते देख कर कहा "वाह! ड्रैगन बैक इन एक्शन" .... मुझे यह टाइटल बहुत पसंद आया.. कितने डाइनामिक लगते हैं ऐसे टाइटल्ज़ .... कितनी एनेर्जी भर देते हैं... सो मैनलीहुड...  

           कविता से याद आया कि क्या हुआ ना फेसबुक पर एक महिला हैं उन्होंने अपनी वाल (Wall) पर किसी दूसरे कवि की कविता छाप दी और ढाई सौ कमेन्ट पा गईं... उस कवि ने उनकी यह गलती (चोरी) अपने वाल (Wall) पर सबको बता दी, अब उन महिला का चेहरा देखने लायक था. अब वो अपना फ्रस्ट्रेशन कैसे निकालतीं तो उन्होंने क्या किया कि पता नहीं कहाँ कहाँ से कैसी कैसी फोटो खोज कर अपने वाल पर डालनी शुरू की कि उनके पड़दादा फलाने साहित्यकार थे, तो दादा ने रामायण लिखी थी उन्होंने ही तमाम देवी देवताओं को वर्ल्ड फेमस किया था अगर उनके दादा नहीं होते तो आज इतने देवी देवता नहीं होते. मतलब फ्रस्ट्रेशन में उस महिला की यह हालत हो गई कि वो साइकी टाइप बिहेवियर करने लगीं. 

अरे मैडम .. अगर आपने चुरा भी लिया था तो उन ढाई सौ कमेंट्स के बीच में कहीं यह भी लिख देतीं कि यह कविता आपकी नहीं है. अब भई चोरी तो चोरी है. चोरी हमने भी की है लेकिन बता कर. 

अच्छा! मेरे एक चीज़ और समझ में नहीं आती कि आख़िर ऐसी क्या बात है कि फेसबुक के आते ही इतनी कवयित्रियाँ कहाँ से पैदा हो गईं है?  पुरुष तो फ़िर भी इतने कवि नहीं हैं लेकिन महिलाओं में देखता हूँ कि बाढ़ आ गई है और देखता हूँ कि लिंगुत्थान से वंचित ढेर सारे पुरुष जिनकी पत्नियां रात में  रोते हुए सो जातीं हैं वो वहां पर हर महिला के वाल पर रात में ख़ुशी-ख़ुशी और खुदखुशी में तारीफ़ करते नज़र आते हैं..  कमाल का फ्यूज़न है... और तारीफ़ भी ऐसी कि 'मैडम! हिंदुस्तान की शेक्सपियर आप ही हो".  फेसबुक देखकर ऐसा लगता है कि यह वो रेड लाईट एरिया है जहाँ हस्तमैथुन और दिमागी (साहित्यिक) मैथुन (Onanism) की अवैलिबिलीटी ज़्यादा है और दोनों में इमैजिनेशन का बहुत बड़ा रोल है.  आज सब लोग सोच रहे होंगे कि  मैं पगला गया हूँ .....क्या करूँ भई ?...आज लिटरली भड़ास निकाली है... भड़ास... हाईट हो गई थी. आईये भाई ... अब बियौंड थिंग्स .... इन्क्रेडिबली... स्ट्फ्स रिटन अबोव .... प्लीज़ हैव अ ग्लैन्स ओवर माय कविता.   
{आय ऍम वैरी सेल्फ ऑब्सेस्ड}

अब नदी के सूखने की संभावना नहीं है. 

कंकड़  का बनना 
रोक नहीं सकते
हम यह कर सकते हैं 
कि इन्हें पहाड़ ना बनने दें....

                    ज़रा सी नासमझी से 
                    पहाड़ नदी पर तैरने लगते हैं 
                    और
                    दोनों का चैन हराम हो जाता है.

नदी पहाड़ से डरती है 
कि वो उसके नीचे ना रह जाए....
पहाड़ को इस बात से तकलीफ 
कि उसका अटल अस्तित्व 
पानी पर तैर रहा है.....

                    इस सबके बावजूद 
                    तुम्हारे और मेरे बीच
                    में एक नदी बहती है 
                   जिसके सूखने की संभावना 
                          नहीं है...

क्यूंकि तुम ही 
वो नदी हो 
जो इन बनते हुए कंकड़ को 
अपने में समा लोगी.   

(c) महफूज़ अली
[हाइवे पर थोडा रुक गया था चाय पीने, सर्दी में थोड़ी धूप हो गयी थी]

कई लोग मुझे कहते हैं/ [कहतीं भी हैं] कि साला! तू बुड्ढा हो गया है.... इत्ते पुराने पुराने गाने खोज कर लाता है.... पुराने गानों की बात ही अलग है... लेस म्युज़िक मोर मीनिंग... मोर मीनिंग .... मोर सुकून...और सबसे बड़ी बात दिल और दिमाग को ठंडक का एहसास कराते... और उससे भी बड़ी बात ... बेस्ट वे ऑफ़ कम्युनिकेटिंग आवर वेज़ ऑफ़ फीलिंग्स... तो भई लीजिये पेश है आज का गाना... 

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