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बुधवार, 27 जून 2012

मन की सुन्दरता, लव, सेक्स और धोखा कुछ भी नहीं: महफूज़


आज मैंने फेसबुक पर सुश्री डॉ. शरद सिंह जी की एक पोस्ट से इंस्पायर्ड एक अपनी सोच के हिसाब से स्टेटस डाला कि "लोग कहते हैं कि मन की सुन्दरता देखो, लेकिन मन की सुन्दरता जैसी कोई चीज़ है ही नहीं. हम सबसे पहले बाहरी सुन्दरता ही देखते हैं. और जब हमारा कम्युनिकेशन इस्टैबलिश हो जाता है तब हम मन भी देखते हैं. हम प्यार भी करते हैं तो सुन्दरता देख कर ही.. उसके बाद मन .. मन अगर खराब होता है तो उसके बाद सारी सुन्दरता धरी रह जाती है. लेकिन मन की सुन्दरता नाम की कोई चीज़ विदाउट कम्युनिकेशन है ही नहीं और जब कम्युनिकेशन हो जाता है तो भी मन की सुन्दरता मायने नहीं रखती क्यूंकि लव एंड सेक्स एक दूसरे के कौनटेम्पोरैरी हैं.. बिना सेक्स का ख्याल लाये लव हो ही नहीं सकता". 

काफी लाईक्स और कमेंट्स मिले खासकर मेसेज इन्बोक्स में. कुछ ने मुझे डेयरिंग कहा तो कुछ ने बहुत सलीके से अपनी बात रखी. ज़्यादातर लोगों ने सपोर्ट किया. मेरी कुछ महिला मित्रों ने फ़ोन पर कमेन्ट किया तो कुछ महिलाओं ने इन्बोक्स में. कुछ ने कहा कि तुम्हारा कॉन्वेंट बैकग्राउंड तुम्हे ज़्यादा एक्स्ट्रोवेर्ट बनाता है. पुरूषों ने काफी सपोर्ट किया. लन्दन स्थित तेजेंद्र शर्मा जी ने इसी बात पर एक कहानी भी लिखी थी. इसी टॉपिक पर उन्होंने मुझसे वादा किया है कि वो कहानी मुझे देंगे. 
(वैसे डिस्क्लेमर नीचे लगा है)
तो मैं कह रहा था कि मन सुन्दरता जैसी कोई चीज़ है ही नहीं. अब सवाल यह है कि मन की सुन्दरता हम कैसे जानेंगे? ज़ाहिर है हम किसी के मन को तभी जानेंगे जब हम उससे पर्सनली कॉन्टेक्ट में होंगे, जब हम पर्सनली कॉन्टेक्ट में ही नहीं होंगे तो मन की सुन्दरता को कैसे जानेंगे? तो सबसे पहले हम किसी से भी पर्सनल कॉन्टेक्ट में आयेंगें और जब पर्सनल कॉन्टेक्ट में आयेंगे तो सबसे पहले उसकी बाहरी सुन्दरता ही देखेंगे. कोई भी इन्सान बदसूरत और बेढंगे लोगों को नहीं पसंद करता है... इसीलिए सबसे पहले बाहरी आवरण से ही जुड़ता है. अगर आप सुंदर हैं और सुन्दरता के साथ आपका बिहेवियर भी अच्छा है तो वो दी बेस्ट है और अगर अगर आप सुंदर होने के साथ दिल से अच्छे नहीं हैं तो सारी सुन्दरता बेकार हो जाती है. तो बाहरी सुन्दरता सबसे अहम् चीज़ है, आपने ख़ुद को कैरी कैसे किया है यह बहुत मायने रखता है. लव में मन की सुन्दरता बहुत बाद में आती है सबसे पहले तो बाहरी आवरण से ही प्यार होता है जो कि एक कम्युनिकेशन का नतीजा होता है. बिना कम्युनिकेशन के प्यार हो ही नहीं सकता. अब चूंकि प्यार और सेक्स एक दूसरे के कौनटेम्पोरैरी हैं तो इसमें भी सबसे पहले शारीरिक सुन्दरता ही आती है. कोई भी चाहे फीमेल हो या मेल अपना सेक्सुअल पार्टनर ख़ूबसूरत ही चाहता है. क्यूंकि खूबसूरती प्यार को मज़बूत  करती है और यही प्यार फ़िर सेक्सुअली बौन्डिंग पैदा करता है. अगर सेक्सुअली खूबसूरती भी है तो प्यार और मज़बूत होता है. और सायकोलौजी सब्जेक्ट भी यही कहती है कि बियुटी कम्ज़ फर्स्ट देन ब्रेन. इसीलिए मन की सुन्दरता जैसी बातें सिर्फ फॉल्स आदर्शों को जताने के लिए ही ठीक रहती है. एक बात खासकर सिर्फ महिलाओं के लिए जब भी कोई पुरुष मन की सुन्दरता की बात करे तो समझ जाएँ कि वो बहुत बड़ा वाला "वो" है. 
(वैसे डिस्क्लेमर नीचे लगा है)
तो मन की सुन्दरता जैसी कोई चीज़ है ही नहीं अगर है तो इसको नापने का कोई पैमाना ही नहीं है. अब सिर्फ बातों में ही कह सकते हैं. लेकिन लव हम दर्शा सकते हैं. और प्यार अगर है तो उसे दर्शाना बहुत ज़रूरी है लेकिन मन की सुन्दरता को कैसे दर्शायेंगें वो भी बिना कम्युनिकेशन के? जैसे हम मन ही मन हंसने को नहीं दर्शा सकते हैं वैसे ही मन की सुन्दरता को भी नहीं दर्शा सकते.   इसीलिए सबसे पहले प्यार आता है .. रिश्तों में प्यार का होना ज़रूरी है और जब प्यार होगा तभी ना आप मन की सुन्दरता देखोगे और जब प्यार बिलकुल भी नहीं होगा तो मन की सुन्दरता भी नहीं होगी. 



DISCLAIMER:
  • वेयूज़ टोटली  मेरे हैं।
  • फ़ोटोज़ का ब्लॉग पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है, आत्ममुग्धता भी ज़रूरी होती है। जब तक के हम खुद से प्यार नहीं करेंगे तो कोई हमसे प्यार नहीं करेगा। 

गुरुवार, 14 जून 2012

लखनऊ नवाबों से पहले -भाग 1 (आईये जाने एक इतिहास): महफूज़

आज से मैं लखनऊ का अनदेखा और अनजाना इतिहास पेश कर रहा हूँ. यह इतिहास मैंने नहीं लिखा है और ना ही मेरा इसे लिखने में कोई ऐसा योगदान है. यह वो इतिहास है जिसे हम जानते तो हैं लेकिन सिर्फ नाम से. लखनऊ वो शहर है जो पूरी दुनिया में सिर्फ और सिर्फ अपनी तहज़ीब और बाग़ों के लिए जाना जाता है. लेकिन किसी को भी यह नहीं पता है कि लखनऊ कैसे और कब तहज़ीब और बाग़ों का शहर बना? ऐतिहासिक तौर पर भी लखनऊ के बहुत मायने  हैं मगर वो इतिहास लखनऊ के वासी और देश के लोग नहीं जानते हैं. तो उसी इतिहास को सामने लाना ही मेरा उद्देश्य है. शुरुआत तो लखनऊ के इतिहास से कर रहा हूँ मगर वो देश का इतिहास भी होगा और विवादित भी हो सकता है. जो भी इतिहास मैं बताऊंगा वो पूरी तरह से तथ्यों (फैक्ट्स) पर आधारित हैं और मेरे द्वारा भी रिसर्च किये हुए हैं. हर लिखे हुए का सबूत मेरे पास है. अगर किसी को मेरे इतिहास लेखन पर आपत्ति होगी तो उसका कोई मतलब नहीं होगा. नॉलेज गेन करना हमारा शौक़ होना चाहिए. (मेरी कोशिश यह रहेगी कि मैं हिंदी का प्रयोग करूँ और सरल भाषा में अनदेखा अंजाना सा इतिहास आपके सामने रखूं). प्रस्तुत इतिहास कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व एच.ओ.डी. श्री. शिव बहादुर सिंह ने अपने शोध से लिखा है और उसे लखनऊ विश्वविद्यालय के इतिहास डिपार्टमेंट के पूर्व प्रोफ़ेसर श्री. डी.पी. तिवारी जी ने अनुमोदित किया है. इतिहास लिखने के लिए मैं हिंदी वाड्मय निधि खुर्शीदाबाद, लखनऊ का भी आभारी हूँ.

आजकल हमारे नगरों में बड़ी तेज़ी से परिवर्तन हो रहे हैं. एक ओर नगर के पुराने निवासी अपनी विरासत से कटते जा रहे हैं तो दूसरी ओर बाहर से से आकर नगरों में बसने वाले उसके बारे में कुछ नहीं जानते. इसका नतीजा यह होता है कि हम ना तो अपने नगर जनपद से नाता जोड़ पाते हैं और ना ही गौरव का भाव ला पाते हैं. प्रेम और गौरव बोध के बिना हम अपने नगर जनपद को धर्मशाला या होटल से ज़्यादा भला क्या समझेंगे? और तब उसके विकास की फिकर क्यूँ करेंगे? अपने नगर से हमारा भावनात्मक सम्बन्ध होना ही चाहिए. पर यह तभी होगा जब हम उसके इतिहास को जानें, सांस्कृतिक विरासत से परिचित हों, विभिन्न वर्गों-साम्प्रदायों के नगर जनपद को योगदान का आंकलन करें. नगर जनपद से भावनात्मक प्यार वाह धागा है जो उसके सभी लोगों को बिना भेदभाव के जोड़ता है. अपने लखनऊ का परिचय देने के लिए हिंदी वाड्मय निधि के सहयोग से यह श्रृंखला ब्लॉग के माध्यम से लाने का मैंने प्रोमिस (निश्चय) किया है. मैं अपने हिंदी के गुरु श्री. उपाध्याय जी (मामा जी) का भी आभारी हूँ जो हिंदी लिखने, बोलने और प्रोंन्सियेशन में मेरी पूरी मदद कर रहे हैं. आईये आज थोडा सा लखनऊ के बारे में जानें और पूरी श्रृंखला से लखनऊ के इतिहास को एक अलग नज़रिए से समझें. 
(यह रामायण अरबी और फ़ारसी में लिखी गयी है और सिर्फ लखनऊ में है)

यह सच है कि लखनऊ दुनिया में प्रसिद्ध तब हुआ जब वह अवध के नवाबों की राजधानी बना (1775 -1856) लेकिन उससे बहुत पहले लखनऊ शहर और ज़िला आबाद हो चुका था. अब तक की खोज और खुदाई से इस जनपद में मनुष्यों की बसती का प्रमाण लगभग चार हज़ार साल पहले मिलने लगता है. लखनऊ को सबसे पहले आबाद करने वालों के सम्बन्ध में अब तक के कहाँ और क्या प्रमाण मिले हैं, कैसे उनका जीवन बदला? फ़िर कैसे लखनऊ नगर का राजनीतिक महत्त्व बढ़ने लगा जो नवाबों के समय शिखर पर पहुंचा. ऐसे ही कुछ लखनऊ के लम्बे इतिहास की कहानी  मैं सामान्य भाषा में सामान्य पाठक के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ. 

लखनऊ के विषय में लम्बे समय से यह समझा जाता रहा है कि इसका नामकरण अवध नरेश श्री. राम के भाई लक्ष्मण के नाम पर हुआ था. यह एक रोचक तथ्य है कि इस मान्यता की पुष्टि आदि काव्य वाल्मीकि रामायण से होती है. रामायण के उत्तरकाण्ड में लोकापवाद से बचने के लिए राम द्वारा सीता के परित्याग का उल्लेख है. अयोध्या से सीता को गंगा के किनारे स्थित वाल्मीकि आश्रम में छोड़ने का दायित्व लक्ष्मण को सौंपा गया था, जिन्होंने सुबह रथ से यात्रा शरू कर गोमती तट पर स्थित एक आश्रम में रात को आराम किया था-- ततो वास्मुपगम्य गोमतीतीर आश्रमे (वा.रा.7/46-19). दूसरे दिन दोबारा सुबह अपनी यात्रा शुरू कर के दोपहर में वे गंगा तट पर पहुंचे फ़िर नाव से गंगा को पार कर सरिता तट पर स्थित ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में सीता को छोड़ दिया--

राज्ञो दशरथस्यैव पितुर्मे मुनिपुंगवः !! सखा परमको विप्रो वाल्मीकिः सुमुहायशः! 
पाद्च्छयामुपागम्य सुखम्स्य महात्मनः! उपवासपरैकाग्रा वस त्वं जनकात्मजे!! (वा.रा. 7/47/16-17)

अब सवाल यह उठता है कि वह कौन सा स्थल हो सकता है जहाँ लक्ष्मण ने रात्री वास किया था और जहाँ से सुबह चलकर दोपहर गंगा तट पर पहुँच गए? वर्तमान लखनऊ शहर में गोमती किनारे स्थित लक्ष्मण टीला ही इस लिहाज़ से सबसे उपयुक्त दिखाई देता है. और यही टीला आज भी लक्ष्मण टीला के नाम से ही प्रसिद्ध है. यहीं रात्री विश्राम के बाद लक्षमण गंगा पार कर बिठुर स्थित वाल्मीकि आश्रम पहुंचे होंगे. कई कारणों से इस स्थल की खुदाई नहीं हो सकी है नहीं तो इतिहास की और भी परतें खुलतीं. यह भी कहा जाता है कि युधिष्ठिर के प्रपौत्र जनमेजय ने यह क्षेत्र तपस्वियों को दान कर दिया था. 

इसके विपरीत लखनऊ गैज़ेटियर के अनुसार "लिखना" नाम के शिल्पी ने शेखों के शासनकाल में एक क़िला बनवाया जिसका नामकरण उसी के नाम पर लिखना क़िला पड़ा. आगे चल कर ऐसा कहा जाता है कि उसी के नम पर लखनऊ नगर का नाम पड़ा. अब यह भी विचारणीय है कि किसी क़िले का नाम शिल्पी के नाम पर रखना अस्वाभाविक है. यह भी सोचने वाली बात है कि शेख शासकों ने भला अपने क़िले का नाम अपने शिल्पी के नाम पर क्यूँ रखा होगा? इसके अलावा अवधी भाषा में "लिखना" किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता. वस्तुतः यह नाम 'लखना' हो सकता है जो लक्ष्मण नाम का ही अवधी अपभ्रंश है. संभवतः स्थानीय अवधी भाषा में लखना नाम बोलचाल की भाषा में लखनू, लखनुवा, लखनवा, और अंत में लखनऊ हो गया. अँगरेज़ जिसे प्रोनाउन्स नहीं कर पाते थे तो लैकनेओ बुलाते थे जिसकी वर्तनी (स्पेलिंग) अंग्रेज़ी में LUCKNOW लिखते थे और आज भी यही लिखी जाती है. क्रमशः ..... To be contd..... 

आभार: 
  • हिंदी वाड्मय निधि लखनऊ 
  • डॉ. एस. बी. सिंह 
  • स्वयं 
  • मैं अपनी स्टेनो कम टाइपिस्ट रीना का भी शुक्रगुज़ार हूँ.. जिसे मुझे कुछ भी समझाना नहीं पड़ा... शी इज़ वैरी इंटेलिजेंट..
  • ऋचा द्विवेदी 

सोमवार, 11 जून 2012

खुशदीप भैया... गेट वेल सून (Get Well Soon) : महफूज़

पिछले चार पांच दिनों से मन बहुत  अजीब हो रहा था. सब कुछ अच्छा होते हुए भी अच्छा नहीं लग रहा था. एक तो आजकल ज़्यादातर वक़्त गोरखपुर में बीतता है दूसरा गोरखपुर में इन्टरनेट कनेक्शन नहीं रहता है. और फिर बिज़ी इतना कि मोबाइल फोन तक का ध्यान नहीं रहता है (बीते हुए वक़्त को दोबारा पाना बहुत मुश्किल होता है). पिछले दो तीन दिन से मन यूँ ही बहुत खराब हो रहा था. 
मैं बिला वजह परेशान था और उन परेशानियों का कारण भी खोज रहा था. लेकिन उन कारणों का पता नहीं चल पा रहा था. लखनऊ लौटा तो थोडा फ्री हुआ तो अपने चंद मित्रों को कॉल किया और पाबला जी से हमेशा की तरह गुफ्तगू हुई. उसके बाद भी अजीब सा खालीपन लग रहा था. तभी ध्यान आया कि खुशदीप भैया से बात नहीं हुई काफी दिनों से. उन्हें कॉल लगाया तो काफी देर तक घंटी गयी लेकिन फोन नहीं उठा. इससे पहले कभी ऐसा हुआ ही नहीं कि मेरा फोन नहीं उठा हो चाहे वो रात के तीन बजे ही क्यूँ न हो? 

मैंने फिर कॉल मिलाया तो काफी देर घंटी जाने के बाद फोन उठा तो पता चला कि खुशदीप भैया की भतीजी ने फोन उठाया है और मुझे बताया गया कि भैया हॉस्पिटल में एडमिट हैं और अभी अभी उन्हें नींद का इंजेक्शन दिया गया है. और चाची जी (भाभी जी) दवा लेने ज़रा बाहर की ओर गयीं हैं. मुझे पता चल गया कि मेरा मन इतने दिनों से अशांत क्यूँ था? यह मेरी भैया से बोन्डिंग ही थी जो मुझे बता रही थी. 

इसके बाद मुझे भैया से बात करने की बेचैनी होने लगी. लेकिन मैं उनके जागने का इंतज़ार ही कर सकता था. फिर एक इंटयुशन यह भी देखिये कि जैसे ही भैया तीन घन्टे बाद जगे तो मुझे अपने आप पता चल गया और मेरी बात भैया से हो गयी. हालचाल लेने के बाद अब जाकर चैन मिला है. ऐसा लग रहा है कि जैसे खोई हुई चाभी मिल गयी हो. भैया मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ. आप ही तो हो जो मेरे साथ हर तरह से होते हो. अच्छे में भी और बुरे में भी. आप मेरे लिए भाई से बढ़ कर हो. एक आप ही तो हो जिसके दम पर मैं थोडा यहाँ उछल भी लेता हूँ. आप जल्दी से ठीक हों यही मेरी ईश्वर से कामना है और फिर से पहले की तरह सबको हंसाएं. खुशदीप भैया  आई लव यू... 

बुधवार, 6 जून 2012

वक़्त बहुत कीमती है, मासिक धर्म और कुछ हमारी मजबूरी: महफूज़

ब्लॉग लिखने के लिए अलग से टाइम निकालना पड़ता है. मैं रोज़ सोचता हूँ कि कुछ ना कुछ लिखूंगा लेकिन टाइम नहीं मिल पाता है. जब हमें वक़्त का नुक्सान बिना किसी मतलब में हो जाता है तो  उस बीते हुए पल की भरपाई बहुत मुश्किल से हो पाती है. और खासकर तब जब आप स्वाभिमान और अभिमान की वजह से वक़्त को खोते हैं तो यही दोनों मान फ़िर से आपका खोया हुआ वक़्त आपको वापस दिलाने में आपकी मदद करते हैं और फ़िर उसके लिए जद्दोजहद की जंग सामाजिक तौर पर शुरू हो जाती है. जब हमारा वक़्त ख़राब होता है ना तो हमें ऐसे लोग भी मिलते हैं जो हमारा वक़्त बिना मतलब में ज़ाया कराते हैं. तो ऐसे वक़्त में अच्छा बुरा पहचानने की ताक़त भी कम हो जाती है. 
और ऐसे ही बुरे वक़्त में हम लोगों को सामजिक तौर भी नहीं पहचान पाते हैं. वक़्त ही एक ऐसी चीज़ है जो आप जितना चाहें उतना खो सकते हैं... और खोने के बाद कुछ पा नहीं सकते हैं. वक़्त को वेस्ट करने का सबका अपना अपना तरीका होता है और ज़्यादातर लोग अन्प्रोडकटिवली वक़्त को खोते हैं. कुछ लोग ब्लॉग लिखते हैं तो इतना लिखते हैं कि लोग सोचने लगते हैं कि यह आदमी काम क्या करता होगा? कुछ लोग फेसबुक पर बैठते हैं तो इतना बैठेंगे कि सामने वाला सोचेगा कि यह कोई धन्ना सेठ है. 
कुछ लोग यहाँ वहां की यूँ ही गप्पें लड़ायेंगे या बिना मतलब की बहस में उलझेंगे और तो और कुछ लोग सिर्फ बातों ही बातों में देश की इकोनोमी और सिस्टम सुधार देते हैं. तो कुछ लोग प्रोडकटिवली वक़्त को खोते हैं. इनके  अन्प्रोडकटिव काम भी प्रोडक्टिव होते हैं. मुझे ऐसा लगता है कि अगर पुरुष है तो उसे सिर्फ प्रोडक्टिव काम ही करने चाहिए और ऐसे काम करने चाहिए जो दिखाई दे और साक्षात नज़र आये. पुरुषों का बिना मतलब में वक़्त को बेकार करना बेमाने है. 
पुरुष ऐसा ही अच्छा लगता है जो हर तरह से सम्पूर्ण हो मौरली, सोशली और फ़ाइनैन्शियलि. बिना कार, फौरेन ट्रिप्स, लेटेस्ट इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स, सेक्सुअलटी, फिज़िकल फिटनेस,यंगनेस, वेल-ग्रूम्नेस, ढेर सारी गर्ल फ्रेंड्स (अगर शादी-शुदा नहीं है तो) और अच्छे बैंक बैलेंस के बिना पुरुष अजीब लगता है जैसे चिड़ियाघर का ओरंगउटान. और यह सब पाने के लिए के लिए वक़्त को पकड़ना पड़ता है. 

महिलायें भी ऐसे ही पुरुषों को ज़्यादा पसंद करतीं हैं जो वक़्त के हिसाब से सक्सेसफुल हो. इसीलिए वक़्त की बड़ी शौर्टेज रहती है. मैं हर काम प्रोडकटिवली ही करना चाहता हूँ. मेरे लिए ब्लॉग लिखना तब प्रोडक्टिव होगा जब मेरी ऊपर लिखी हुई सारी नीड पूरी हो रही होंगीं. 

अब मैं पहले की तरह पढ़ता बहुत हूँ. पढने से क्या होता है कि दिमाग़ तो खुलता ही है और साथ ही में नये नये आईडियाज़ भी आते हैं. जैसे हमारे शरीर को खुराक की ज़रूरत होती है वैसे ही हमारे दिमाग को भी खुराक की ज़रूरत होती है और वो खुराक दिमाग़ को सिर्फ पढने से ही मिलती है,  खासकर रिलीजियस टेक्स्ट्स. हम जब भी रिलीजियस टेक्स्ट पढेंगे चाहे वो किसी भी धर्म के क्यूँ ना हों, सबको पढ़ने के बाद यही लगेगा की यह तो सब एक ही बात कह रहे हैं. मैं बहुत जल्दी ही लखनऊ, कानपुर और गोरखपुर का ऐसा इतिहास बताने जा रहा हूँ जिसे अब तक के लिखा ही नहीं गया है और जिन्होंने लिखा है उन्हें कोई पहचानता ही नहीं तो वो इतिहास को लिखना एक तरह से उन गुमनाम लोगों को सामने लाना होगा जो अब तक पौलिटीक्ली डिबार्ड हैं. सब रिसर्च बेस्ड है. अब से मेरी पोस्ट्स सब हिस्टौरीकल डिसगाईज़ड फैक्ट्स पर कुछ दिन चलेंगीं. बीच बीच में कवितायें और बेमतलब की चीज़ें भी आतीं रहेंगीं. 
(मैं अपने जिम ट्रेनर के साथ, नोट:फ़ोटोज़ का पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है)
अच्छा! फेसबुक की सबसे बड़ी ख़ास बात क्या है कि कहीं से भी ओपरेट किया जा सकता है. कार से, मोबाइल से और वाय-फाय से भी. यह हर जगह मिल जाता है. ब्लॉग के साथ ऐसा नहीं है. और फेसबुक को कोई सीरियसली लेता भी नहीं है. फेसबुक में पोस्ट की लाइफ सिर्फ चंद मिनट की ही होतीं हैं. मुझे फेसबुक में ताना मारना बहुत अच्छा लगता है. और मेरे तानों से जब कईओं की सुलगती है तो मेरे मेसेज बॉक्स में गालियाँ लिख कर भेजते हैं फ़िर भी मैं किसी को अन्फ्रेंद नहीं करता. हाँ! मुझे काफी लोग कर देते हैं. पता नहीं क्यूँ लोग मेरे तानों को अपने ऊपर ले लेते हैं जबकि मैं युनिवर्सली ताने देता हूँ. आईये मेरे कुछ बीते दिनों के फेसबुक स्टेटस देखे जाएँ.
  • कई बार हम कुछ ऐसी महिलाओं से मिलते हैं जो हमें दिमागी और शारीरिक रूप में बहुत अच्छी लगतीं हैं.. तो मन में यही ख़याल आता है कि काश! हम इनके वक़्त पर पैदा हुए होते.. या यह हमारे वक़्त पर.. बहुत ज्यादा एज डिफ़रेंस मैटर नहीं करता...दस साल तक चलता है.. शायद यह सही कहा गया है... बट लव हैज़ नो बाउंड्रीज़. (but love has no boundaries) 
  • हिंदी की किताबें कोई www.flipkart.com से खरीदता ही नहीं है.. खरीदेगा भी क्यूँ.. सारे ब्लौगर्ज़ ही तो हैं ... कौन से साहित्यकार हैं.. ब्लागरों में एक ख़ास बात है.. सारे अपने आपको इंटेलेक्चुयल समझते हैं.. और रिकौग्नाइज़ कोई नहीं करता इन्हें.. खुद ही पैसे देते हैं खुद ही छपवाते हैं.. और ख़ुद को ही एक दूसरे से सम्मानित करवाते हैं.. तू मेरी धो मैं तेरी धो दूंगा.. या तू मेरी खुजा मैं तेरी.. और फिर चाहते हैं कोई ज्ञानपीठ दे दे...ज्ञानपीठ का मिनिमम रेट दस लाख रुपये.. जिसे चाहिए वो मुझसे संपर्क करे. 

    (भई! पुरुस्कार ऐसे होने चाहिए जो मान्यता प्राप्त हों.. और हर पुरुस्कार बिकता है ... जिसका मिनिमम रेट तो दस लाख है .. और बाकी जो जितने ज्यादा दे दे.. जो ज्यादा देगा उसे पुरुस्कार मिला जायेगा)

  • पता नहीं क्यूँ अधेड़ सम्पादक, ब्लॉग और फेसबुकिये पुरुष सिर्फ महिलाओं को ही क्यूँ कवितायेँ छापने के लिए कॉन्टेक्ट करते हैं? मुझे हमेशा कोई न कोई महिला बताती रहती है कि फलाने ने कविता भेजने के लिए फोन किया या SMS किया.. या फिर मेल किया.... शायद ही कभी किसी पुरुष ने मुझे बताया हो कि फलाने ने कविता मांगी है छापने के लिए.. कई संपादकों को तो मुझे हड़काना पडा.
  • कितना अजीब लगता है कि जब किसी मॉल में आपकी कोई पुरानी गर्ल फ्रेंड अपने पति के साथ टकरा जाये और अपने पति से इंट्रो कराते हुए कहे: " मीट माय क्लास मेट..फलां ..फलां..ही वॉज़ वैरी बदमाश ड्यूरिंग दैट डेज़.." और उसी मॉल के गेम सेक्शन में बदमाशी करते हुए आपकी वही गर्ल फ्रेंड अपने बच्चों को जोर से आवाज़ देकर बुलाये और कहे "आओ..बेटा देखो तुम्हारे मामा ... मामा से मिल लो.. ... और बच्चे आँखें फाड़े देखते हैं कि यह उनका कौन सा मामा है? आप प्रोफेशनली मुस्कुरा रहे होते हो.. और पुराने दिनों को फ्लैशबैक की तरह उसी वक़्त याद कर रहे होते हो.. 
  • साहित्यिक, ब्लॉग और फेसबुक जगत अब खुश हो जाएँ... आज से गुंडा गर्दी (कंडीशन्स ऐप्लाय) ... ताने देना...तंज मारना.. सब बंद.. अब तो कई सारे साहित्यिक मैगज़ीन्स ने भी रजिस्टर्ड पोस्ट से लैटर लिख कर हाथ जोड़ कर मना किया है.
ऐसे और भी बहुत से हैं. जो ख्याल आता रहता है तो मोबाइल/कंप्यूटर से स्टेटस डाल देता हूँ. 
(मैं अपने गोरखपुर स्थित गौशाला और भैंस शाला में)
(गोरखपुर स्थित मेरा फार्म हाउज़ )
(यह मेरे खेत में एक कौवा जिसकी चोंच टूटी हुई है)
मैंने एक कविता लिखी है. कविताओं का भी अजीब हाल होता है कोई पढ़ता ही नहीं है फ़िर भी हम लिखते हैं. मुझे अब कई सारे कवि जिन्हें हमने स्कूल में में पढ़ा आज मुझे वो नालायक लगते हैं. सब सरकारों के तलवे चाट कर अपनी अपनी कवितायें स्कूलों में लगवा दिए और हमें उन लोगों को ज़बरदस्ती पढना पढ़ा. बचपना भी बड़ा अजीब होता है ... हम विरोध करने लायक नहीं होते और अगर विरोध करते तो बच्चा कह कर चुप करा दिए जाते.. और जब बड़े हो जाते तो सिस्टम के आगे मजबूर रहते. आईये कविता देखते हैं..

हमारी मजबूरी 
क्या आपको ऐसा नहीं लगता
कि हमारी स्वतंत्रता 
उस 
मासिक धर्म की तरह है
जिसमें 
हम बूँद बूँद खून लिए 
झरते जाते हैं 
मगर 
ख़ुद के आगे भी 
दाग़ भरे कपडे ना उठा पाना
हमारी मजबूरी है. 
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अब मेरा फेवरिट गाना :

रविवार, 20 मई 2012

और किसी को कुछ कहना या लिखना है तो लिख ले भाई..: महफूज़


काफी दिनों (दस दिनों के बाद) के बाद नेट पर आना हुआ है. वजह बहुत सिंपल सी थी कि मैं अपने अकैडमिक कौन्फेरेंस के लिए बाहर था और नेट के एक्सेस में नहीं था और इंटरनेश्नल रोमिंग की सुविधा मेरे मोबाइल में नहीं थी. लौट कर आया तो दिल्ली से सीधे अपने गृह नगर गोरखपुर चला गया वहां भी नेट का एक्सेस नहीं था कि गोरखपुर में फ़ोन आया कि भई मेरे खिलाफ कोई मेल सर्कुलेट कर रहा है. मैंने कहा कि भई करने दो क्या फर्क पड़ता है? तो मुझे बताया गया कि मेरी कविताओं के पब्लिकेशन पर कोई रिसर्च कर रहा है तो कोई मेरे फेसबुक प्रोफाइल  पर पी.एच.डी. कर रहा है. 

आज लौटा हूँ तो शिवम् ने मुझे वो मेल फॉरवर्ड की और किसी ब्लॉग का लिंक भी दिया. हालांकि मुझे कुछ  कहना तो नहीं है. लेकिन आज मैं ख़ुद अपने बारे में और भी ब्लॉग जगत को बताना चाहूँगा जो ब्लॉग जगत में खुशदीप भैया, शिवम्, ललित शर्मा, अनूप शुक्ला (फुरसतिया), शिखा (यह मेरे बारे सब कुछ जानतीं हैं), अंजू चौधरी, रश्मि रविजा, रेखा श्रीवास्तव , इंदु पूरी, अजित गुप्ता और पवन कुमार (आई.ऐ.एस) जानते हैं क्यूंकि यह सब मेरे घर आ चुके हैं. लेकिन आज जब वो मेल सर्कुलेट हो रही है तो मैं यह बता दूं भई कि मेरे बारे में जो भी जितना खोदेगा उतना ज़्यादा  निकलेगा. वो मेल कहती है कि मैंने अपने फेसबुक प्रोफाइल में MHRL नाम की संस्था का ख़ुद को चेयरमैन और सी.इ.ओ. बताया है. 

हाँ! भई बताया है.. लेकिन जिस MHRL का लिंक उस पर बन कर आ रहा था मैं उसका चेयरमैन नहीं हूँ और ना कभी था और ना कभी होऊंगा. बताइए किस फ्रस्ट्रेशन में उस आदमी ने क्या क्या खोज निकाला. अरे भई... मैं ख़ुद मल्टी-मिलियनेयर और इंडस्ट्रीयलिस्ट हूँ. मेरी अपनी मेडिकल कंपनी Medica Herbals and Research Laboratory (MHRL) है और मैं अपनी कंपनी का चेयरमैन, डाइरेक्टर, और सी.इ.ओ हूँ...(website link attached herewith the line) मेरी यह कंपनी पांच साल पुरानी है और इसकी वेबसाइट भी पांच साल पुरानी है.कभी बताया नहीं तो इतना कुछ लिख दिया...पता नहीं लोग क्यूँ सबको अपने जैसा ही गरीब गुरबा ही समझते हैं? मेरे और भी बहुत सारे बिज़नेस हैं. कानपुर और गोरखपुर में हमारे अब स्कूल चलते हैं (अभी हाल ही में शुरू किये हैं, इसका भी आईडिया एक बार अनूप शुक्ला जी ने ही दिया था). 

हमारी फैक्टरी की एक यूनिट कानपुर के दादानगर में भी लग रही है. अगर मेरे फेसबुक प्रोफाइल में MHRL का लिंक अगर कोई Mental Health Resource League for Mchenry County (MHRL) का  आ गया तो मैं क्या करूँ? मैंने कभी उस ओर ध्यान भी नहीं  दिया..ना ही कभी ध्यान गया. वो तो उन महाशय ने ध्यान दिलाया।..और वो महाशय चल पड़े मेरे बारे में लिखने बिना जांचे परखे, पर  एक चीज़ तो है कि यह पता चल गया कि चार अक्षर क्या क्या कर सकते हैं... और अक्षर क्या कमाल दिखा सकते हैं.? मेरी अपनी दवा कम्पनी है, मेरे कई सारे ठेके चलते हैं और इन सबके साथ मै एकेडेमीशियन भी हूँ. भई मैं यह बता दूं कि मुझे हमेशा टॉप पर रहने की आदत रही है.. मुझे सिविल सर्विस में आई.ऐ.एस. नहीं मिला था तो मैंने आई. ऐ.ऐ.एस (आई.ऐ.एस. अलाइड) की नौकरी छोड़ दी. और कोई नौकरी  मैं कर नहीं सकता था तो लेक्चरार, अब असोसिएट प्रोफ़ेसर (यही एक ऐसी नौकरी है जहाँ सब- ऑर्डिनेशन नहीं है) बन गया. इन सबके अलावा मैं एक रिफाइंड गुंडा भी हूँ. शारीरिक रूप से बहुत स्ट्रोंग हूँ तो दो-चार आदमियों को अकेले संभाल लेता हूँ. पहलवान भी हूँ, एजुकेशनिस्ट भी हूँ, बिजनेसमैन भी हूँ, राइटर भी हूँ और हैंडसम भी हूँ... और राजनीतिग्य भी हूँ. इसके बाद भी जितना खोदोगे उतना ज़्यादा निकलेगा.  अब भाई मुझे ऊपर वाले ने बहुत सुंदर बनाया है अच्छी शक्ल सूरत के साथ, अच्छा शरीर, और अच्छा पैसे वाला भी बनाया है तो एक अलग ऐटीट्युड तो रहेगा  ही रहेगा. और उन सबसे भी ऊपर बात यह है कि मैं रियल मर्द हूँ.. मुझे जिसे भी गाली देनी होती है मैं मुँह पर देता हूँ.. मुझे जिसे भी मारना होता है घर के अंदर घुस कर मारता हूँ (मारने से पहले सम्बंधित थाने में ख़बर कर दी जाती है की एक घंटे बाद आना). जो नामर्द होता है वो छिप कर और पीठ पीछे वार करता है. अरे भाई आमने सामने की लड़ाई लड़ो ...यह क्या बिना जाने समझे  किसी को भी चल पड़े लिखने.. मेरे बारे में जितना  भी लिखोगे उतना ही मुँह की खाओगे.. अभी यह जितना भी बताया हूँ ...ख़राब   तो लग रहा है मुझे यह सब बताने में क्यूंकि आज तक मैंने अपना  यह प्रोफाइल कभी बताया ही नहीं. वो बताइए मुझसे सावधान रहने की कोशिश करवा रहा है और ख़ुद गायब है. अरे मुझसे सावधान रहने की ज़रूरत इन्ही जैसे लोगों को है जिस दिन पता चल गया मुझे तो छोडूंगा नहीं. मुझे उन लोगों से लड़ने में ज़्यादा मज़ा आता है जो क्षत्रिय और मर्दों की तरह लड़ते हैं. 

भई! मैं तो बचपन से लेकर आज तक पोपुलर रहा हूँ और आने वाले दिनों में रहूँगा. जो भी मेरे बारे में जितना खोदेगा उतना ज़्यादा पायेगा. रही बात कोई मेरे कविताओं के बारे बात करने का ...तो वो मैं जर्मनी से लौट कर आने के बाद बताऊंगा. और भई मैं सरकारी मान्यता प्राप्त अंतरराष्ट्रीय रूप से प्रख्यात अंग्रेज़ी का राइटर हूँ.. हिंदी का नहीं हूँ.. हिंदी में तो यही सब बेवकूफियां करने आया हूँ..तो भाई ग़रीब गुरबों.. मुझसे चंदा लेने आओ.. और जितना खोद सकते हो उतना खोदो.. तुम मुझे जितना खोदोगे ... उतना नया महफूज़ सामने आएगा ...अच्छा है तुम्हारे लिखने  से मैं ही पोपुलर हो रहा हूँ.. और मुझे अपने बारे में और बताने के लिए मौका मिल रहा है.  वैसे तो मैं जानता हूँ कि यह कौन लोग हैं मेल सर्कुलेट करने वाले लेकिन बस मैं अब फ़ालतू लोगों के मुँह नहीं लगता. आफ्टर ऑल आई हैव सम लेवल..   खुशदीप भैया ने एक बार एक जोक लिखा था कि एक पूछता है दूसरे से कि मेरे पास ब्लॉग है, ऑरकुट है, फेसबुक है और ट्विट्टर है ...हईं! तुम्हारे पास क्या है? तो दूसरा जवाब देता है कि मेरे पास काम धंधा है. तो भाई लोगों मेरे पास भी काम धंधा है.. मैं यह सब ब्लॉग्गिंग जैसी फ़ालतू एक्टिविटी खाली टाइम में ही करता हूँ. कितना फ़ालतू टाइम है लोगों के पास .. बाप रे बाप.. 

मैं उस मेल करने वाले का शुक्र-गुज़ार हूँ कि मेरे पीठ पीछे मुझे और पोपुलर कर दिया.. और मुझे घर बैठे इतनी पोपुलैरिटी दिलवा दी कि बहुत सारे लोगों के मेल और फ़ोन आने लग गए. अभी यह जितना भी मैंने ख़ुद के बारे में बताया है वो भी कम है. अभी मैं फ़िर बाहर जा रहा हूँ.... अब देखता हूँ कि लौट कर और कितनी पौपुलैरिटी मिली है.. आज बिना मतलब में खुद के बारे में जो छिपाया हुआ था।...उसी के बारे में इतना मूंह खुलवा दिया।

अब मेरा फेवरिट गाना : 

गुरुवार, 3 मई 2012

दो ग़ज़लकार, ज़मीर का जिंदा न रहना और हम दोनों मिल के...ह्म्म्म...: महफूज़

आज हमारे घर मशहूर शायर फार्रूक जायसी साहब का आना हुआ. फार्रूक साहब एक्साइज़ कमिशनर भी हैं और शायरी का शौक़ भी रखते हैं और अक्सर मशहूर ग़ज़ल गायक प्रदीप श्रीवास्तव के साथ मंच साझा भी करते हैं. फारूक साहब की ग़ज़लों को दुनिया भर में काफी लोगों ने लयबद्ध किया है. हालांकि! मैंने उनकी ग़ज़लों को अब पढना शुरू किया है और ग़ज़लों की तासीर को समझा है. कहते हैं कि बिना उर्दू के ग़ज़ल बन ही नहीं सकती और फारूक साहब उर्दू के बहुत ही ज़हीन और मक़बूल शख्सियत हैं.  आज जब उनसे बातें हुई तो मैंने उन्हें अपनी हिंदी में लिखी हुई कवितायें दिखायीं हालांकि हिंदी में कुछ भी दिखाना वैसा ही होता है जैसा हाई स्कूल की सेकण्ड डिविज़न में मार्कशीट, मेरे जैसा आदमी शरमाता सकुचाता हुआ हिंदी की कवितायें दिखाता है. उन्होंने पहले ही सिरे से मेरी कविताओं को नकार दिया. उन्होंने कहा कि कविता वो होती है जो गाई जा सके. आपने जो लिखा है वो इन पैरा फॉर्म है. उन्हें गाया नहीं जा सकता. मैंने कहा कि यह भी एक विधा है और काफी लोग लिख रहे हैं. उन्होंने छूटते ही कहा कि आप जैसा आदमी भी काफी लोगों को फौलो करने लग गया है? मुझे इस जुमले पर शर्म तो आई फ़िर अपनी शर्म पर सफाई से काबू कर लिया.   उन्होंने बताया कि बिना भाव को छुए आप कैसे गद्य कविताओं को भी लयबद्ध कर सकते हैं. मैंने उनसे कहा कि अब से कोशिश रहेगी कि आपकी बताई विधा में लिखूं. हालांकि ! होता यह है कि कविता तभी होती है जब हमारे मन में भाव हो , एक फीलिंग हो. विधा वगैरह सब भाव के साथ सेकंडरी हो जातीं हैं. 

                  (फार्रूक साहब)
बात ग़ज़ल की चल रही है तो ग़ज़ल कहने और गायकी में सीमा गुप्ता जी का भी जवाब नहीं है. सीमा जी को मैं काफी अरसे से देख, पढ़ और सुन रहा हूँ और कई ग़ज़ल की बारीकियों को उनकी ग़ज़लों के माध्यम से समझा है. ग़ज़ल गायकी और एड्रेस में सीमा जी आज की तारीख में पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं और कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरुस्कारों से नवाजी जा चुकीं हैं. सीमा जी के बारे में नेक्स्ट पोस्ट में... फिलहाल तो उनकी किताब और प्रेजेंटेशन को पढ़ रहा हूँ.
    (सीमा जी जब टी. वी . पर थीं तो मैंने फोटो खींच ली थी)

अब एक मेरी कविता फ़िर से सबके  लिए.. 

ज़मीर का ज़िंदा ना रहना 
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आदमी की आँख 
जब उसके भीतर कहीं गिर जाती है 
तब बाहर से अंधा होने के बावजूद भी,
वो भीतर से देखने लगता है 
बाहर ठोकरें खाने के साथ 
उसे यह साफ़ दिखाई देने लगता है 
कि ज़्यादातर लोग 
क्यूँ ठोकरें खा रहे हैं? 
और कुछ लोग 
इन्ही सड़कों पर 
क्यूँ 
सुविधा से चल रहे हैं.. 

(c) महफूज़ अली 

फ़िर कह रहा हूँ कि हमारे ज़िन्दगी में गीत/गानों का बहुत महत्त्व है.. यह ना हों .. तो ज़िन्दगी वैसी ही है जैसे कार विदाउट स्टेयरिंग. यह भी हमारा एक मीडियम ऑफ़ कम्युनिकेशन/एक्प्रेशन ऑफ़ लव है. 

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

छोटा सा हादसा, अखबारों की लाचारगी और असहमति की बेवकूफी: महफूज़


आज एक छोटा सा हादसा हुआ. हुआ क्या कि मैं गोमतीनगर से सी.एम.एस. स्कूल के रास्ते  हज़रतगंज  जा रहा था कि विपुल खंड के मोड़ पर एक बुज़ुर्ग साहब के स्कूटी को मैंने टक्कर मार दी हालांकि टक्कर हलकी थी फ़िर भी वो बुज़ुर्ग बगल में खुदी सड़क के किनारे बने गड्ढे में जा गिरे. मैं फ़ौरन अपनी कार रोक उनके पास भागा और देखा कि स्कूटी समेत बेचारे गड्ढे के अंदर हैं किसी तरह मैंने उनको बाहर निकाला फ़िर उनकी स्कूटी को. बलिष्ठ होने का यही फायदा है कि आपको  जहाँ ताक़त दिखानी चाहिए वहां आप आसानी से ताक़त दिखा सकते हैं. गड्ढे से देखा तो भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी अब डर यह था कि कहीं भीड़ मुझे ना धुन दे? स्कूटी अकेले बाहर निकाल कर रख दी... बुज़ुर्ग अंकल को चोट  नहीं आई थी और फ़िर वो भी अपनी गलती महसूस कर रहे थे. उन्हें पूरा चौराहा पार कर के आना चाहिए था और वो सीधा ही निकल आये. अब सफारी के आगे स्कूटी वैसे भी तिल्ली लगती है दिखाई नहीं दी. और हलके टक्कर से गड्ढे की ओर मुड गए. और फ़िर मेरे जैसा नया नया एस.यू.वी. चालक (ड्राईवर) तो कुछ ना कुछ तो होना ही था. ख़ैर! भीड़ ने मुझे पहचान लिया और फ़िर मेरे ऐटीट्युड को देखते हुए ख़ुद ही दूर हो गई. 
[यह सुबह सुबह जॉगिंग करते वक़्त]

मुझे ऐसा लगता है कि बुजुर्गों को गाडी वगैरह नहीं देनी चाहिए. उनसे कंट्रोल नहीं होती है. और कोई हादसा अगर होता है तो हर हादसे में सेंट-परसेंट गलती बुजुर्गों की ही होती है, लेकिन पिटता हमेशा दूसरा ही है. मैं तो हमेशा जब भी किसी बुज़ुर्ग को सड़क पर ड्राइव करते या सड़क पार करते देखता हूँ तो ख़ुद ही रुक जाता हूँ, उन्हें पहले पार करने देता हूँ या आगे जाने देता हूँ या फ़िर सही साइड देख कर निकल लेता हूँ. कभी भी बुजुर्गों और जानवरों के सामने से गाडी नहीं निकालनी चाहिए क्यूंकि यह दोनों हमेशा आगे की ओर ही भागते हैं. 
[सफ़ेद टी-शर्ट में मेरे जिम ट्रेनर के साथ मैं लाल टी-शर्ट में]

अभी हमारे हिंदुस्तान में सरकार ने लोगों को फोर/सिक्स लेन हाई वे जैसी फैसिलिटी तो दे दी है लेकिन हाई वे पर कैसे चला जाए यह नहीं बताया है? अभी भी हाई वे पर अचानक से जानवर और साइकल वाले निकल आते हैं और ज़्यादातर जाहिल लोग अचानक से गाडी मोड़ या रोक देते हैं. जिससे कि पीछे वाले को दिक्कत होती है. अभी मेरे साथ ऐसा ही हुआ था... गोरखपुर से लौट रहा था ...हमारे कार के आगे एक और कार जा रही थी... उसकी भी स्पीड सौ के ऊपर थी और उसने अचानक से ब्रेक लगा दिया सिर्फ पान थूकने के लिए. हमारी कार उससे जा भिड़ी हमारी कार को ज़्यादा नुक्सान नहीं हुआ उल्टा उसकी कार पीछे से दब गई. वो हमसे झगड़ने लगा. मैंने उसे क़ानून और तहज़ीब सिखाया वो नहीं माना तो हर्जाना देने के बहाने मैंने उसे कार के अंदर बुला लिया और फ़िर अपने ड्राईवर से कहा कि अब कार भगा ले चलो. उसे मैंने अपनी कार में बहुत मेंटल टौरचर किया और करीब बाराबंकी के पास नब्बे किलोमीटर दूर छोड़ दिया. बेचारे को अच्छा सबक मिला होगा. इतनी देर में मैंने उसे सारे ड्राइविंग रूल्ज़ सीखा दिए थे. अब उसने तौबा कर लिया होगा कि कभी भी रौंग ड्राइविंग नहीं करूँगा और मुझे तो ज़िन्दगी भर याद करेगा और कर रहा होगा. जब हमारा कॉन्फिडेंस लेवल हाई होता है ना तो गुंडई करने का मज़ा ही अलग होता है. वैसे मेरी अंग्रेज़ी बोलने वाली पर्सनैल्टी देसी गुंडई से मैच नहीं खाती .. लेकिन यही तो मज़ा है धोखा देने में.. अब सरकार को ट्रैफिक रूल्ज़ के ऊपर भी जागरूक करते हुए टी.वी. में ऐड देना चाहिए "जागो ग्राहक... जागो". स्कूल्ज़ में एक ट्रैफिक रूल्ज़ पर भी चैप्टर या सब्जेक्ट होना चाहिए. 
[यह जहाँ मैं स्विमिंग करने जाता हूँ ... वहां का एक प्यारा दोस्त]

ऐसी आप बीतियाँ  लिखने का भी एक अलग मज़ा है. आईये ज़रा अब कविता देखते हैं. पिछले एक साल के दौरान ढेर सारी कवितायें लिखी थीं, उन्हें ही धीरे धीरे पोस्ट करता रहता हूँ. 
[लोग मुझे आत्म-मुग्ध कहते हैं... संगीता स्वरुप जी कहतीं हैं बच्चा है ही ऐसा :)... जब हमारे पास अपनी इतनी फ़ोटोज़ हैं तो गूगल से क्यूँ लें भला?]  

अखब़ार की लाचारगी...

दिन अखबार की तरह 
सुबह-सुबह रोज़ 
मेरे कमरे में आकर 
गिर जाता है और 
शाम तक 
मैं उसी पर नज़रें गडाए 
मजबूर रहता हूँ ....
वही 
घायलों की ख़बरें,
हत्याओं के समाचार ,
आवश्यकताओं के विज्ञापन 
और 
बेरोज़गारी की लाचारगी.  

(c) महफूज़ अली 

जब भी हम किसी से भी सहमत नहीं होते हैं तो वो असहमति सिर्फ हम अपने लिए ही जताते हैं. लेकिन जाहिल इन्सान इसे हमेशा दूसरों का लिया बदला ही समझते हैं. अरे! भई... हम जब भी लड़ेंगें तो सिर्फ अपने लिए ही लड़ेंगें दूसरों के लिए लड़ने सिर्फ बेवकूफ ही जाते हैं. राजनीतिज्ञ भी जब भी दूसरों के लिए लडेगा तो सिर्फ और सिर्फ अपना ही फायदा देखेगा. बिना मतलब में कोई किसी के लिए तब तक के लिए नहीं लडेगा जब तक के वो उसका कोई अपना ना हो. 

आईये अब अपना फेवरिट गाना दिखाता हूँ. 

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

लेवल की बातें, शब्द अपनी सीमाएं नहीं तोड़ते और विरोध होना चाहिए, लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं: महफूज़ (Mahfooz)

अभी दो दिन पहले की बात है गोमती नगर के विराम खंड एरिया में एक मनसा मंदिर है वहां गया था क्यूंकि हमारे गोमती नगर में वही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं नहीं तो गोमती नगर में मारुती की कारें रखने वाला ग़रीब समझा जाता है. और यह मनसा मंदिर ही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं. मैं वहां अक्सर जाता रहता हूँ ... अकसर पुराने कपडे और अपनी माँ के नाम पर गरीबों को देता रहता हूँ पता नहीं क्यूँ पिता जी के नाम पर किसी को कुछ देने का मन ही नहीं करता... शायद पिताजी के जाने के बाद भी उनसे कॉन्फ्लिक्ट जारी है. माँ तो बहुत याद आती है हर पल पर पिता जी सिर्फ तभी याद आते हैं जब मैं मुक़दमे के सिलसिले में कोर्ट में जाता हूँ और जज का दरबान ज़ोर से चिल्ला कर मेरा नाम वल्द मेरे पिता जी हाज़िर हों या फ़िर जब टैक्स फ़ाइल करना होता है तब या फ़िर जब कहीं से कोई छुपी ही रकम मिलती है. एक बार कोर्ट में मैं जज से उलझ पड़ा था क्यूंकि मैंने कोर्ट में एंटर जेब में हाथ डाल कर किया था और जज के पेशकार ने मुझे जेब से हाथ निकालने को कहा था.. और हम वैसे भी सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रसित.. जज से यह कह कर उलझ पड़े कि यह सामंतवादी व्यवस्था है और कई  तर्कों से जज से उलझने के बाद वहीँ पेशकार को दो चार उलटी सीधी बातें सुनाने के बाद कोर्ट की अवमानना के जुर्म में ख़ुद को पांच सौ का जुर्माना लगवाया. लेकिन फ़िर उसके बाद किसी ने मुझसे उलझने की कोशिश नहीं की, बाद में जज मुझसे कहता है कि अगर तुम मेरे दोस्त नहीं होते तो सीधा जेल भिजवाता..... हमारे देश का क़ानून भी अजीब है जब तर्कों से हार जाता है तो जुर्माना लगा देता है या फ़िर संसद में बिल पास करने के नाम टाल जाता है. 

हाँ! तो हुआ क्या कि मनसा मंदिर गया था तभी देखा कि एक महिला अपने सत्रह-अठरह वर्षीय पुत्र के साथ मंदिर से बाहर निकल रही है. हम दोनों ने एक दूसरे को ध्यान से देखा और पहचान गए. वो मेरी किसी ज़माने में क्लास मेट थी. बात बात में पता चला कि वो समाज कल्याण अधिकारी है और अभी लखनऊ ट्रान्सफर हुआ है कोई  एक साल पहले, इंदिरा भवन में ही ऑफिस है. हम लोग बात करते करते गोमतीनगर में कैफे कॉफ़ी डे में बैठ गए, कैफे कॉफ़ी डे के बगल में ही वी.एल.सी.सी. है मेरी बहन वहीँ जिम जाती है मैंने सोचा कि उसे भी पिक कर लूँगा और इससे कुछ बातें भी हो जायेंगीं. और उसका बेटा वहीँ अपने एक दोस्त से मिलने चला गया. बात बात ही में उसने मुझसे पूछा कि  क्या तुम्हे मेरी याद आती थी? मुझे इस सवाल पर हंसी आई बहुत कस के. मैंने उससे कहा कि भई तुम्हे तो मैं कबका भूल चुका था... शक्ल तक याद नहीं थी... उसे यह लगा था कि मैं उसकी याद में पगला गया होऊंगा. फ़िर ख़ुद ही कहती है कि 'हाँ! तुम्हे क्या कमी? उससे थोड़ी देर यहाँ वहां की बातें होती रही... फ़िर मेरी सिस्टर भी आ गई हम सबने मिलकर खाया पिया काफी पी और अपने अपने घर आ गए. 

घर आ कर मैंने सोचा कि यह लड़कियां (महिलायें भी) पता नहीं क्या चाहती हैं और क्या समझतीं हैं? इन्हें यही लगता है कि लड़का इनकी याद में मर गया होगा, वैसे लड़कों की साइकोलॉजी (सब लड़के नहीं) बहुत डिफरेंट  होती है लड़का (अगर वाकई में लड़का है तो) हमेशा स्विच ओवर बहुत जल्दी कर लेता है. यह हमेशा लड़की के ऊपर डिपेंड करता है कि उसने कैसा रिश्ता (प्यार) रखा है कि लड़का उससे हमेशा बंध कर रहे.  

वैसे मैंने देखा है और महसूस भी किया है कि महिलायें बहुत सारी गलतफहमियों में बचपन से जीती हैं. वैसे महिलाओं (लड़कियों) के बिहेवियर को साइकोलौजिकली वॉच करने में बहुत मज़ा आता है. महिलाओं में सिर्फ एक चीज़ अच्छी होती है कि वो भविष्य जान लेतीं हैं और सिक्स्थ सेन्स उनमें वाकई में होता है. और पुरुषों में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर की बहुत कमी पाई जाती है और सिक्स्थ सेन्स होता ही नहीं. महिलायें फ़ौरन झूठ पकड़ लेतीं हैं और पकड़ कर शांत रहतीं हैं... वक़्त आने पर पोल खोलतीं हैं  और पुरुष सोचता है कि उसने महिला को बेवकूफ बना लिया. 

बहुत हो गया अब... अब ज़रा मेरी कविता भी बाट जोह रही हैं. कविता के साथ एक प्लस पॉइंट यह है कि यह कहीं भी लिखी जा सकती है... ट्रेन में, बाथरूम में, टहलते हुए और भी कई तरह से. मुझे कई बार बड़ा सरप्राइज़ होता है कि लोग रोज़ रोज़ कैसे कविता लिख लेते हैं? या तो कहीं से चुराते होंगे या फ़िर तुकबंदी होती होगी... क्यूंकि कविता लिखने के लिए भावनाओं में और भावनाओं का होना बड़ा ज़रूरी है. वैसे यह भी है कि बहुत बार ऐसा हुआ है कि कि कई लोगों की कविता पढने के बाद मुझे आत्महत्या से रोका गया है. एक बार एक कोई मनहूस सी शक्ल वाले की कविता अहा! ज़िन्दगी में पढ़ी थी उस कविता को पढ़ कर ऐसा लगा कि इस कविता को मैं कोई बीस पच्चीस साल या और भी पहले पढ़ चुका हूँ. ख़ैर! कविता एक ऐसी चीज़ है जिसकी चोरी बहुत आसानी से हो जाती है और पकड़ में भी नहीं आती है. अरे! आईये ज़रा अब मेरी कविता पढ़ते हैं:--

शब्दों की सीमायें नहीं होतीं 
______________________
उदासी 
गिरफ्त से बाहर 
ठहरी हुई है 
और मैं उसे शब्द मानने को
तैयार नहीं हूँ .... 
शब्द यदि अपनी सीमायें तोड़ दें 
तब वह शब्द नहीं रह जाता.
_________________________
(c) महफूज़ अली 


(फोटोग्रैफ्स तो ऐसे ही डाली गयीं हैं... आई एम इनफ हैंडी टू बी कौपीड फ्रॉम गूगल .. दैट्स वाय माय फोटोग्रैफ्स ईज़ हियर.)

जैसा कि मैंने कहा था... कि पोस्ट के आखिरी पंक्तियाँ हटा दी जायेंगीं... और शीर्षक में भी बदलाव करूँगा... तो वो मैंने कर दिया है. जिन्हें मेसेज देना था उन तक मेसेज पहुँच गया है... अब शायद वो साहब ऐसा नहीं  करेंगे... और उन्हें जो भी प्रॉब्लम होगी... तो वो किसी को पोस्ट लिख कर ... कुछ नहीं कहेंगे... ऐसा हम सोच सकते हैं. मेरे ऐसा लिखने से सबको कोफ़्त और परेशानी हुई होगी... मैं समझ सकता हूँ. लेकिन मैं मजबूर था. अब कोई किसी महिला को अपशब्दों से नवाज़ने की हिम्मत नहीं करेगा. और करना भी नहीं चाहिए. विरोध होना चाहिए.. ..लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं. 


आईये मेरा वन ऑफ़ दी फेवरिट गाना देखते हैं.. 



गुरुवार, 1 मार्च 2012

ब्लॉग्गिंग, भारतीय साहित्य और सिनेमा: महफूज़ (Mahfooz)


इसी इतवार को क़िताबों की रहस्यमयी दुनिया में ले जाने वाला दिल्ली में बीसवें विश्व पुस्तक मेले में जाना हुआ. हालांकि, जाने का कोई ऐसा प्रोग्रैम नहीं था मेरा, लेकिन अंजू चौधरी जी के पुस्तक "क्षितिजा" का विमोचन था और उसमें मेरा जाना ज़रूरी था और किया हुआ वादा भी निभाना था. इस बार पुस्तक मेले का विषय है "भारतीय साहित्य और सिनेमा". विषय देख कर मुझे हंसी भी आई क्यूंकि साहित्य और हिंदी सिनेमा का दूर दूर तक आपस में कोई लेना देना नहीं है. हिंदी साहित्य जो भी है सब नब्बे के दशक के पहले के हैं अब तो हिंदी साहित्य रचा ही नहीं जाता और हिंदी साहित्य का मतलब लोग सिर्फ प्रेमचंद से ही समझते हैं और थोडा बहुत निराला से. अब तो यह हाल है कि गाँव भी ख़त्म हो गए और खेत खलिहान भी और गाँव में रहने वाले  लोग भी. जो गाँव में रहते थे वो आठवीं /दसवीं पास/फेल कर के शहरों में मौल्ज़ में काम करने लगे. अब ना हीरा मोती हैं और ना ही बिरजू. फ़िर कुछ साहित्यिक मैगजीन्स आज भी इनसे ऊपर आने को तैयार नहीं है आज भी वो गाँव और खेतों और बैलों को ही साहित्य मान रही है. अब जो जेनेरेशन अस्सी के मध्य और नब्बे के दौरान पैदा हुईं हैं वो क्या जाने यह सब? इसीलिए यह जेनेरेशन साहित्य से दूर हैं क्यूंकि जो कुछ साहित्य में लिखा जा रहा है वो उन्होंने देखा ही नहीं. अगर हम दैनिक जागरण के टैबलौयिड आई-नेक्स्ट को देखें तो उसने वही भाषा को अपनाया है जो आज की जेनेरेशन बोलती है तो भाई साहित्य में भी वही भाषा क्यूँ नहीं? सेक्स जैसा विषय आज भी टैबू है साहित्य में जबकि वहीँ आई-नेक्स्ट आई-कैंडी के नाम से एक कॉलम निकालता है जो इनडाइरेक्टली  सेक्स ही बेचता है. हमारा साहित्य भी पिछले बीस सालों से कोई ख़ास डेवलपमेंट नहीं कर पाया है. आज साहित्यकार का मतलब लोग जावेद अख्तर, प्रसून जोशी और गुलज़ार जैसे लोगों को ही जानते हैं. इनसे भी ऊपर लोग  हैं और अच्छा लिखते हैं. आजकल अच्छे साहित्यकार इसीलिए सामने नहीं आ पा रहे हैं क्यूंकि एक तो बेचारे लौबिस्ट नहीं हैं और दूसरा उनके पास चेतन भगत जैसा मार्केटिंग स्किल और फायनेंस नहीं हैं. 

आप सबने देखा होगा कि जब भी वॉशबेसिन या नाली में "हिट" का स्प्रे करो तो अचानक ढेर सारे कौक्रोचेस और अजीब कीड़े निकल कर बाहर आ जाते हैं उसी तरह इंटरनेट के आने से और ब्लॉग रूप में एक फैसिलिटी मिल जाने से तमाम साहित्यकार पैदा हो गए हैं. कई लोग मुझे फ़ोन करके बताते हैं कि फलाने ने कविता छापने के लिए इतने पैसे मांगे और कोई एक आध संकलन निकाल कर बेचारे दूसरे को एहसास दे दिया कि भाई हमने तेरे जैसे को भी साहित्यकार बना दिया है. यह एक धंधा चल निकला है आजकल, तू मेरी खुजा मैं तेरी  खुजाऊंगा वाली तर्ज पर. अब तो ऐसा लगता है कि नेट आ जाने से हर घर में कवि/कवयित्री और साहित्यकार पैदा हो गया है. ऐसा लगता है कि पांच की फैमिली हैं तो एक मेंबर साहित्यकार है. 

और रहा सवाल हिंदी सिनेमा का तो आदि काल से जबसे हिंदी सिनेमा का जन्म हुआ है तबसे बेचारी पूरी फिल्म इंडस्ट्री हौलीवूड पर डिपेंड है ... हर फिल्म किसी ना किसी इंग्लिश, स्पैनिश, जैपनीज, ईरानियन और अरेबियन फिल्म का रीमेक है. पूरी कहानी, सब्जेक्ट, म्युज़िक, सिनेमेटोग्रैफी, स्क्रिप्ट, सीन और यहाँ तक कि डाय्लौग्स भी चुराए हुए होते हैं. हिंदी सिनेमा में सिवाय हिंदी (जो कि मूल रूप से उर्दू होती है) और हिंगलिश के सिवाय और कुछ ओरिजिनल नहीं होता. तो हिंदी के नाम पर सिनेमा को कैश करना यह हिंदी की गत दिखाता है कि पाठकों और दर्शकों (दर्शक इसलिए क्यूंकि ज़्यादातर लोग हिंदी की किताबें खरीद कर नहीं पढ़ते) को पुस्तक  मेले तक लाने के लिए सिनेमा का भी सहारा लेना पड़ा. हिंदी ग्लोबल भाषा भी नहीं है जो लोग हिंदी सिनेमा को ओवरसीज़ भी बताते हैं वो सिर्फ उन लोगों के लिए ओवरसीज़ सिनेमा बनाते हैं जो भारतीय डौलर और पौंड में पैसा खर्च करते हैं. और उससे हिंदी सिनेमा की लागत निकल जाती है और बाक़ी प्रौफिट वो देसी मार्केट से कमा लेते हैं.भीड़ खींचने के लिए ऐसा विषय रखा है और भीड़ है कि नदारद है पहले दिन ही कोई ख़ास भीड़ नहीं थी जो थी वो डेटिंग करने वालों की ज़्यादा थी.. उनको एक बहाना और जगह मिल गई थी डेटिंग करने के लिए. भीड़ है नहीं और ना ही होगी क्यूंकि एक्ज़ाम्ज़ चल रहे हैं और आजकल के मोडर्न पेरेंट्स अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाएंगे नहीं और ना ही खरीदने को इनकरेज करेंगे. अभी भी सारी भीड़ जो है थोड़ी बहुत वो इंग्लिश काउंटरज़ पर ज़्यादा हैं और खरीद भी रही हैं और हिंदी किताबें की ओर देख कर उलट पलट कर वापस रैक पर रख दी जा रही हैं. 

अब कुछ पलों को देखिये जो मैंने अपनों के साथ बिताये:----

(शिखा वार्ष्णेय की किताब डायमंड बुक स्टाल पर)

(बुक फेयर के पहले दिन सुनीता दी के स्टाल पर, मैं कुर्ते पजामे में)

(यहाँ भी)

(यहाँ संजू तनेजा जी के साथ दूसरे दिन)

(यह पदम् है यह मंचिंग कर रहा है)

(आप घोंसला वाले राजीव जी हैं)

(हरकीरत जी मंच से अपनी किताब का विमोचन कर के वापस आते हुए)

(सुनीता दी और अंजू जी)

(यह बैसवारी वाले संतोष जी हैं और पीछे पदम् मुझे मुक्का दिखाते हुए)

(अ वैरी स्पेशल मोमेंट)

(मी विद अंजू )

(हियर अल्सो ... हैविंग सम गुफ्तगू)

(यहाँ भी )

(दी... फ़ोटोज़ दिखाते हुए)

(यहाँ भी दीदी फोटो दिखाते हुए)
(अ न दर  कैची मोमेंट)

(यहाँ मैं.. यह फोटो शिवम् ने कब खींची पता नहीं)



अब मेरी कविता पढ़िए बिलकुल ओरिजिनल है हिंदी फिल्मों जैसी नहीं. 

संस्कृति की पगडण्डी 
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कुछ लोग हैं 
जिन्होंने 
ईश्वर
दर्शन
धर्म
और 
संस्कृति की 
पग डंडियों से सबकी 
आँखें खरीद ली हैं......
इसीलिए ज़्यादातर 
लोगों को सड़कें तो
दिखतीं हैं,  मगर
रास्ते नहीं दिखते. 

(c) महफूज़ अली 

अब इसी के साथ पोस्ट ख़त्म करता हूँ. आप लोग मेरा फेवरिट गाना देखिये.. 




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