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मंगलवार, 26 जून 2012

लखनऊ नवाबों से पहले -भाग 2 (आईये जाने एक इतिहास..लखनऊ जनपद के प्राचीन नगर और बस्तियाँ.....): महफूज़


लखनऊ के इतिहास के पिछले और पहले श्रृंखला में आपने लखनऊ का शुरूआती इतिहास जाना. अब इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हैं. लखनऊ के इतिहास की श्रृंखला देरी से आने का कारण समय की कमी है. कोशिश रहेगी कि टाइम टू टाइम यह सीरीज़ जारी रहे. हमारा लखनऊ बनारस के बाद दुनिया का सबसे नोन और पुराना शहर है. पूरे दुनिया में यही दो ऐसे शहर हैं जो दुनिया में सबसे पुराने हैं. 

लखनऊ जनपद के प्राचीन नगर और बस्तियाँ..... 

आज मैं लखनऊ जनपद की प्राचीन बस्तियों और स्थलों का विवरण प्रस्तुत करूँगा. इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनका वैज्ञानिक रीति से उत्खनन (excavation) किया गया है और कुछ ऐसे हैं जिनका परिचय सर्वेक्षण के दौरान मिली सामग्री से हुआ है. मैं पहले भी बता चुका हूँ कि यह वो इतिहास है जो किसी किताब और डिपार्टमेंट में नहीं मिलेगा और ना ही मेरा शोध है. यह जिनका शोध है मय सबूत उनका नाम मैंने पिछली पोस्ट में आभार के रूप में व्यक्त किया है. आईये आगे बढ़ें......

लखनऊ नगर में दो प्रमुख टीले हैं. एक नगर के उत्तर-पश्चिम दिशा में गोमती के तट पर स्थित लक्ष्मण टीला है और दूसरा टीला नगर के दक्षिण-पूर्व में स्थित बंगला बाज़ार के समीप क़िला मुहम्मदी नगर है जो कि  बिजली पासी के नाम से भी विख्यात है. दोनों पर प्राचीन बसती थी. प्रारम्भ में लक्ष्मण टीला विशाल क्षेत्र में फैला था. इसका ज़्यादातर भाग अब मेडिकल यूनिवर्सिटी के नीचे दबा हुआ है तथा इस टीले के एक भाग पर औरंगज़ेब के समय की बनी एक मस्जिद वर्तमान में है. इस टीले का पुरातात्विक उत्खनन नहीं हुआ है, इसलिए इसकी जानकारी के लिए हमें केवल इसके ऊपर या इसकी कटानों से मिलने वाली सामग्री पर निर्भर रहना पड़ता है. इस सामग्री से पता चलता है ली लक्ष्मण टीला भगवान् बुद्ध (ईसा से पूर्व छठी शताब्दी) के समय से भी प्राचीन है. अभी हाल ही में कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले  हैं जिनमें सबसे पुराने ईसा पूर्व एक हज़ार वर्ष के हैं. (और कोई न्यूज़ भी नहीं कहीं) इसमें राख के रंग का एक विशेष प्रकार का बर्तन भी है जिस पर सामान्यतः काले रंग से चित्र बने हैं जिसे पेंटेड ग्रे वेयेर कहा जाता है. टीले पर कई प्रकार के मनके, मिट्टी की मूर्तियाँ और खिलौने भी मिले हैं. अगर वैज्ञानिक ढंग से खुदाई की जाए तो वर्ष का सही पता चल सकता है. (बातचीत हमारी जारी है..आर्केओलौजी डिपार्टमेंट से)
(औरंगजेब की मस्जिद की पेंटिंग बाय हेनरी सौल्ट इन 1803)
(औरंगजेब की मस्जिद)

क़िला मुहम्मदी नगर (क़िला बिजली पासी) 240 मीo लम्बा और 170 मीo चौड़ा है जिसकी ऊंचाई 15 -20 मीटर रही होगी. इसे बिजली पासी का क़िला भी बताया जाता है. (आगे बिजली पासी के बारे में भी पता चलेगा). इस गढ़ी की चहारदीवारी में में लगभग २० बुर्ज बने थे. गढ़ी का निचला भाग मिट्टी का बना था जबकि इसके ऊपरी हिस्से में कंकड़ और ईंट का यूज़ हुआ है. आज भ ईसे देखने से ऐसा लगता है कि सुरक्षा के लिए चारों ओर खाई बनायीं गई थी जिसे पास के तालाब से भर लिया जाता था और वो तालाब आज भी है.  टीले से मिले मिट्टी के बर्तनों तथा मूर्तियों के आधार पर इस टीले का समय ईसा पूर्व 700 वर्ष तक रखा जा सकता है. ऐसा अनुमान है कि इस टीले पर बुद्ध के पहले से लेकर मुस्लिम काल तक यह बसती बनी रही. ऐसा लगता है कि लखनऊ नगर का प्राचीन इतिहास लक्ष्मण टीले तथा क़िला मुहम्मदी नगर का इतिहास है. और यह कैसा विचित्र संयोग है कि अगर एक टीला लक्ष्मण जी के नाम से  सम्बद्ध किया जाता है तो दूसरा टीला मुहम्मद साहब से. 
(प्राप्त सामग्री इन खुदाई)
यह तो रही लखनऊ के प्राचीन नगर की बात. अब हम यह देखेंगे और देखना चाहिए भी कि लखनऊ क्षेत्र में मनुष्य का निवास कब से आरम्भ हुआ और उस आरंभिक मनुष्य के बारे में हम क्या और कैसे जानते हैं? लखनऊ जनपद में ऐसे बहुत से स्थान हैं जहाँ तीन या चार हज़ार साल पहले मनुष्य निवास करने लगा था. पिछले दो वर्षों में लखनऊ जनपद के कई स्थानों का वैज्ञानिक उत्खनन किया गया है. सबसे पहले मैं अगले पोस्ट में उन स्थलों की चर्चा करूँगा जिनका उत्खनन किया गया है और फ़िर बाक़ी प्राचीन स्थानों की. क्रमशः (To be contd.....)

आभार: 
  • हिंदी वाड्मय निधि लखनऊ 
  • डॉ. एस. बी. सिंह 
  • स्वयं 
  • मैं अपनी स्टेनो कम टाइपिस्ट रीना का भी शुक्रगुज़ार हूँ.. जिसे मुझे कुछ भी समझाना नहीं पड़ा... शी इज़ वैरी इंटेलिजेंट.. इस बार रीना के बीमार होने की वजह से टाइपिंग में देरी हुई।
  • ऋचा द्विवेदी 

रविवार, 17 जून 2012

कुछ लोग पानी पर कील ठोक कर उसे रस्सों से बाँध देते हैं: महफूज़

आज कोई भूमिका या यहाँ वहां की बातें (बेकार की) लिखने का मन नहीं है. और इतिहास सीरीज भी टाईप  नहीं हुई है, रीना छुट्टी पर है और अपने पास टाइम नहीं है टाईप करने का। आज देखिये सीधे मेरी एक कविता। बहुत पहले लिखी थी और पोस्ट अब कर रहा हूँ। आज कोई फ़ोटो(ज़) भी नहीं है, कंप्यूटर की हार्ड डिस्क क्रैश हो गयी है। वैसे सन्डे का दिन  बहुत  बोरिंग होता है। खुशदीप भैया की तबियत भी ठीक नहीं है... सब लोग दुआ करिए की भैया जल्दी ठीक हो जाएँ। 



मुश्किल नहीं है पानी को बांधना 

पानी खतरे के निशान को पार 
कर गया है,
इसमें सब कुछ डूब 
गया है 
कुछ लोग पानी पर 
कीलें ठोक रहें हैं 
और कुछ 
पानी को रस्सों से बाँध 
रहे हैं 
यह वो लोग हैं 
जिन्होनें हमेशा 
पानी और ज़मीन को 
जूतों से छुआ है 
इनके तलवे ज़मीन और पानी 
की ज़ात से परिचित नहीं हैं ,
हर अपरिचित पानी को 
रस्सों से बांधता 
और फिर उसके जिस्म पर 
कीलें ठोकता है।

(c) महफूज़ अली 

गुरुवार, 14 जून 2012

लखनऊ नवाबों से पहले -भाग 1 (आईये जाने एक इतिहास): महफूज़

आज से मैं लखनऊ का अनदेखा और अनजाना इतिहास पेश कर रहा हूँ. यह इतिहास मैंने नहीं लिखा है और ना ही मेरा इसे लिखने में कोई ऐसा योगदान है. यह वो इतिहास है जिसे हम जानते तो हैं लेकिन सिर्फ नाम से. लखनऊ वो शहर है जो पूरी दुनिया में सिर्फ और सिर्फ अपनी तहज़ीब और बाग़ों के लिए जाना जाता है. लेकिन किसी को भी यह नहीं पता है कि लखनऊ कैसे और कब तहज़ीब और बाग़ों का शहर बना? ऐतिहासिक तौर पर भी लखनऊ के बहुत मायने  हैं मगर वो इतिहास लखनऊ के वासी और देश के लोग नहीं जानते हैं. तो उसी इतिहास को सामने लाना ही मेरा उद्देश्य है. शुरुआत तो लखनऊ के इतिहास से कर रहा हूँ मगर वो देश का इतिहास भी होगा और विवादित भी हो सकता है. जो भी इतिहास मैं बताऊंगा वो पूरी तरह से तथ्यों (फैक्ट्स) पर आधारित हैं और मेरे द्वारा भी रिसर्च किये हुए हैं. हर लिखे हुए का सबूत मेरे पास है. अगर किसी को मेरे इतिहास लेखन पर आपत्ति होगी तो उसका कोई मतलब नहीं होगा. नॉलेज गेन करना हमारा शौक़ होना चाहिए. (मेरी कोशिश यह रहेगी कि मैं हिंदी का प्रयोग करूँ और सरल भाषा में अनदेखा अंजाना सा इतिहास आपके सामने रखूं). प्रस्तुत इतिहास कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व एच.ओ.डी. श्री. शिव बहादुर सिंह ने अपने शोध से लिखा है और उसे लखनऊ विश्वविद्यालय के इतिहास डिपार्टमेंट के पूर्व प्रोफ़ेसर श्री. डी.पी. तिवारी जी ने अनुमोदित किया है. इतिहास लिखने के लिए मैं हिंदी वाड्मय निधि खुर्शीदाबाद, लखनऊ का भी आभारी हूँ.

आजकल हमारे नगरों में बड़ी तेज़ी से परिवर्तन हो रहे हैं. एक ओर नगर के पुराने निवासी अपनी विरासत से कटते जा रहे हैं तो दूसरी ओर बाहर से से आकर नगरों में बसने वाले उसके बारे में कुछ नहीं जानते. इसका नतीजा यह होता है कि हम ना तो अपने नगर जनपद से नाता जोड़ पाते हैं और ना ही गौरव का भाव ला पाते हैं. प्रेम और गौरव बोध के बिना हम अपने नगर जनपद को धर्मशाला या होटल से ज़्यादा भला क्या समझेंगे? और तब उसके विकास की फिकर क्यूँ करेंगे? अपने नगर से हमारा भावनात्मक सम्बन्ध होना ही चाहिए. पर यह तभी होगा जब हम उसके इतिहास को जानें, सांस्कृतिक विरासत से परिचित हों, विभिन्न वर्गों-साम्प्रदायों के नगर जनपद को योगदान का आंकलन करें. नगर जनपद से भावनात्मक प्यार वाह धागा है जो उसके सभी लोगों को बिना भेदभाव के जोड़ता है. अपने लखनऊ का परिचय देने के लिए हिंदी वाड्मय निधि के सहयोग से यह श्रृंखला ब्लॉग के माध्यम से लाने का मैंने प्रोमिस (निश्चय) किया है. मैं अपने हिंदी के गुरु श्री. उपाध्याय जी (मामा जी) का भी आभारी हूँ जो हिंदी लिखने, बोलने और प्रोंन्सियेशन में मेरी पूरी मदद कर रहे हैं. आईये आज थोडा सा लखनऊ के बारे में जानें और पूरी श्रृंखला से लखनऊ के इतिहास को एक अलग नज़रिए से समझें. 
(यह रामायण अरबी और फ़ारसी में लिखी गयी है और सिर्फ लखनऊ में है)

यह सच है कि लखनऊ दुनिया में प्रसिद्ध तब हुआ जब वह अवध के नवाबों की राजधानी बना (1775 -1856) लेकिन उससे बहुत पहले लखनऊ शहर और ज़िला आबाद हो चुका था. अब तक की खोज और खुदाई से इस जनपद में मनुष्यों की बसती का प्रमाण लगभग चार हज़ार साल पहले मिलने लगता है. लखनऊ को सबसे पहले आबाद करने वालों के सम्बन्ध में अब तक के कहाँ और क्या प्रमाण मिले हैं, कैसे उनका जीवन बदला? फ़िर कैसे लखनऊ नगर का राजनीतिक महत्त्व बढ़ने लगा जो नवाबों के समय शिखर पर पहुंचा. ऐसे ही कुछ लखनऊ के लम्बे इतिहास की कहानी  मैं सामान्य भाषा में सामान्य पाठक के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ. 

लखनऊ के विषय में लम्बे समय से यह समझा जाता रहा है कि इसका नामकरण अवध नरेश श्री. राम के भाई लक्ष्मण के नाम पर हुआ था. यह एक रोचक तथ्य है कि इस मान्यता की पुष्टि आदि काव्य वाल्मीकि रामायण से होती है. रामायण के उत्तरकाण्ड में लोकापवाद से बचने के लिए राम द्वारा सीता के परित्याग का उल्लेख है. अयोध्या से सीता को गंगा के किनारे स्थित वाल्मीकि आश्रम में छोड़ने का दायित्व लक्ष्मण को सौंपा गया था, जिन्होंने सुबह रथ से यात्रा शरू कर गोमती तट पर स्थित एक आश्रम में रात को आराम किया था-- ततो वास्मुपगम्य गोमतीतीर आश्रमे (वा.रा.7/46-19). दूसरे दिन दोबारा सुबह अपनी यात्रा शुरू कर के दोपहर में वे गंगा तट पर पहुंचे फ़िर नाव से गंगा को पार कर सरिता तट पर स्थित ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में सीता को छोड़ दिया--

राज्ञो दशरथस्यैव पितुर्मे मुनिपुंगवः !! सखा परमको विप्रो वाल्मीकिः सुमुहायशः! 
पाद्च्छयामुपागम्य सुखम्स्य महात्मनः! उपवासपरैकाग्रा वस त्वं जनकात्मजे!! (वा.रा. 7/47/16-17)

अब सवाल यह उठता है कि वह कौन सा स्थल हो सकता है जहाँ लक्ष्मण ने रात्री वास किया था और जहाँ से सुबह चलकर दोपहर गंगा तट पर पहुँच गए? वर्तमान लखनऊ शहर में गोमती किनारे स्थित लक्ष्मण टीला ही इस लिहाज़ से सबसे उपयुक्त दिखाई देता है. और यही टीला आज भी लक्ष्मण टीला के नाम से ही प्रसिद्ध है. यहीं रात्री विश्राम के बाद लक्षमण गंगा पार कर बिठुर स्थित वाल्मीकि आश्रम पहुंचे होंगे. कई कारणों से इस स्थल की खुदाई नहीं हो सकी है नहीं तो इतिहास की और भी परतें खुलतीं. यह भी कहा जाता है कि युधिष्ठिर के प्रपौत्र जनमेजय ने यह क्षेत्र तपस्वियों को दान कर दिया था. 

इसके विपरीत लखनऊ गैज़ेटियर के अनुसार "लिखना" नाम के शिल्पी ने शेखों के शासनकाल में एक क़िला बनवाया जिसका नामकरण उसी के नाम पर लिखना क़िला पड़ा. आगे चल कर ऐसा कहा जाता है कि उसी के नम पर लखनऊ नगर का नाम पड़ा. अब यह भी विचारणीय है कि किसी क़िले का नाम शिल्पी के नाम पर रखना अस्वाभाविक है. यह भी सोचने वाली बात है कि शेख शासकों ने भला अपने क़िले का नाम अपने शिल्पी के नाम पर क्यूँ रखा होगा? इसके अलावा अवधी भाषा में "लिखना" किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता. वस्तुतः यह नाम 'लखना' हो सकता है जो लक्ष्मण नाम का ही अवधी अपभ्रंश है. संभवतः स्थानीय अवधी भाषा में लखना नाम बोलचाल की भाषा में लखनू, लखनुवा, लखनवा, और अंत में लखनऊ हो गया. अँगरेज़ जिसे प्रोनाउन्स नहीं कर पाते थे तो लैकनेओ बुलाते थे जिसकी वर्तनी (स्पेलिंग) अंग्रेज़ी में LUCKNOW लिखते थे और आज भी यही लिखी जाती है. क्रमशः ..... To be contd..... 

आभार: 
  • हिंदी वाड्मय निधि लखनऊ 
  • डॉ. एस. बी. सिंह 
  • स्वयं 
  • मैं अपनी स्टेनो कम टाइपिस्ट रीना का भी शुक्रगुज़ार हूँ.. जिसे मुझे कुछ भी समझाना नहीं पड़ा... शी इज़ वैरी इंटेलिजेंट..
  • ऋचा द्विवेदी 
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