सोमवार, 10 दिसंबर 2012

मंगलसूत्र कहीं अटका हुआ है : महफूज़




पेश है मेरी एक अंग्रेजी कविता से प्रेरित यह कविता :

यह उन दिनों की बात है 
जब मेरा बचपन 
पिता की ढीली होती हुई पकड़ 
का गवाह हो रहा था। 

समझ की उम्र के साथ 
मैंने यह जाना 
कि माँ का सिर्फ सरनेम बदला है 
मगर पिता पूरी तरह बदल गए हैं। 

फिर मैं लड़ाई की उम्र में आ गया 
वर्षों तक लड़ने के बाद मैंने जाना 
कि रात से लड़ना बेवकूफी है,
इसे विश्राम की मुद्रा में 
धैर्य से भी काटा जा सकता है 
और यदि हम लड़ते रहे तो 
रात भर की लड़ाई में 
हम इतने थक चुके होंगे 
कि सुबह के सूरज का 
स्वागत करने की ताक़त 
हमारे रात भरे हाथों में नहीं होगी।

इसीलिए मेरी चीख चिल्लाहटें बेकार 
साबित हो गयीं ,
मैं यह देख नहीं पाता था कि 
साड़ी माँ ने पहनी है 
मगर 
मंगलसूत्र पिता के गले में 
अटका हुआ है 
और फिर 
उन आँखों में पिता तलाशना बहुत 
बड़ी बेवकूफी है,
जिनमें पिता ज़िंदा है। 

जिन उँगलियों में 
हम पिता तलाशते हैं 
वे स्पर्श की प्रतीक्षा करते हुए 
पति के हाथ हैं 
चौकलेट और लौलिपौप 
तो तुम्हे दर किनार करने का 
बहाना है। 
और 
वो स्कूल जिसकी टाट पट्टी पर 
तुम बड़े हो रहे हो 
तुम्हारी पढाई की तरह ही सस्ता है ,
जिसकी छतों से टपकते हुए पानी से 
तुम्हारे शरीर पर 
बड़े भाई का कुरता 
गीला हो गया है 
और तुम्हे 
पढ़ाने वाला टीचर 
घंटी के डर से 
शरीर की कतार से हताश
लौट आया है।

तुम 
एक अनिश्चय में जन्म लेकर 
दुसरे अनिश्चय में बड़े 
हो रहे हो ....
फिर 
तुम भी धीरे धीरे लड़ते हुए 
इतना थक जाओगे 
कि तुम्हारे भीतर से 
उभर कर मंगलसूत्र 
तुम्हारे गले में 
आ जायेगा 
फिर 
एक मिला जुला 
अनिश्चय 
जन्म लेगा 
और टपकती छतों और 
गीली टाट पट्टी 
पर भीगता हुआ 
बड़ा हो जायेगा। 

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

और आदमी आज़ाद हो जाता है : महफूज़



धीरे धीरे मैंने 
उसके भीतर 
सुख उंडेलने की शुरुआत की 
और 
उसकी पलकों के नीचे 
और ऊपर की चमड़ी 
झुर्रियाने लगी 
आँख बंद होती चली गयीं,
होंठ सीटियाँ बजाने लगे ... 
मैं रिसने को बेचैन 
अपनी गति बढाने जा रहा था।
गति बढती है तो 
कसाव निर्मम हो जाता है 
और आदमी 
भीतर की घुटन बाहर धकेल कर 
आज़ाद हो जाता है। 

रविवार, 11 नवंबर 2012

टाइम नहीं है ... लोकल लेवल पर छपे ऐसे लोग आत्महत्या भी नहीं कर लेते ... मैं जनता को ज़हर पीने नहीं दूंगा और इन्हें अब जीने नहीं दूंगा: महफूज़

आजकल मेरे पास इतना टाइम नहीं होता कि ब्लॉग पोस्ट लिखूं या फिर ब्लॉग पर भूमिकाएं लिखूं ... एक चीज़ और है जो कि  समझ भी आ गयी कि  ब्लॉग और फेसबुकिंग तभी हो पाती है जब आप निरे निठल्ले, बेरोजगार और बिना किसी एम्बिशन के होते हैं और ऐम्लेसली ज़िन्दगी ढो  रहे होते हैं। अब तो मुझे यह नहीं समझ आता की कैसे लोग इतना टाइम निकाल कर कमेंट कर  लेते हैं हालांकि ऐसी ही फ़ालतू काम मैं भी कर चूका हूँ मगर वो मेरा टाइम ही ऐसा था जो खराब चल रहा था तो और कोई काम था ही नहीं फ़ालतू में यहाँ वहां कमेन्ट करने के अलावा। जैसे आज छुट्टी है और मैं फ़ालतू हूँ कोई काम धाम है नहीं सुबह तीन घंटे जिम में बिताये ..शाम धनतेरस के उसमें शौपिंग में बीतेगी ... और रात किसी रेस्ट्राओं में ... इसी बीच नालायक, ऐम्लेस, निठल्लों की तरह फ़ालतू टाइम था तो सोचा ज़रा हिंदी ब्लॉग्गिंग कर ली जाए। हिंदी ब्लॉग्गिंग का एक फायदा यह है कि  यहाँ आप जाहिलों, डिग्री धारक अनपढ़ों, ऐम्लेस लोग, और एक जगह बैठे रहने वालों से इंटरेक्शन कर के अपनी बात कह सकते हैं .. जाहिलों से इंटरेक्शन करना भी एक बहुत बड़ा आर्ट है जो मैं जानता हूँ। 
अभी हिन्द पॉकेट बुक्स की ओर  से मेरे पास तमाम पब्लिकेशन्स की किताबों की लिस्टिंग आई थी ... किसी भी नामी पब्लिकेशन में एक भी हिंदी का ब्लॉगर नहीं था ना ही कोई फेस्बुकिया था ... मेरे यह भी नहीं समझ में आता कि  ऐसी क्यूँ खुद के ही इज्ज़त में बम लगवाना ...यहाँ वहां से लोकल लेवल पर छप कर या  घर का पैसा यूँ ही नाली में बहा कर खुद को ही  छपवा कर सारे मोहल्लेवालों को ज़बरदस्ती अपनी किताब पढवाना ... 

अच्छा ! लोकली छपने के बाद ऐसे लोग आत्महत्या भी नहीं करते शर्म से ... कि  लोकल लेवल पर छपे हैं खुद का पेट काट कर किताब छपवाई है ... भई! ऐसे छपने से तो अच्छा  है आदमी तीन बार सकेसेफुल्ली सुईसाइड कर ले .... या फिर चम्मच में सूखा पानी लेकर डूब मरे ... ऐसा लगता है कि  हिंदुस्तान में हर नेटिया (आई मीन नेट यूज़र)  लेखक हो गया है और सबसे बड़ी बात यह  है कि  कोई इन्हें मानता भी नहीं फिर भी  खुद को मनाने में लगे हैं ... मंथन करना ज़रूरी है ... अब चलता हूँ ...   अपना क्या है ... स्कूल कॉलेज में हिंदी पढ़ी और लिखी नहीं ....यहीं इसी बात का मलाल हिंदी लिख पढ़ कर निकाल रहे हैं। 
(बिना मेरी फोटो के मेरी पोस्ट अच्छी नहीं लगती ना!)
आज यूँ ही एक कविता लिखी है ... कविताओं का भी कोई भरोसा नहीं होता ... पता नहीं क्या फीलिंग्स कब आ जाए और वो एक अलग मूर्त रूप ले ले .... देखा ही जाए अब कविता तो ... आज काजल कुमार जी ने एक स्टेटस डाला है फेसबुक पर कि "ब्लौगरों के कविताओं के इतने समूह-संकलन छप रहे हैं कि  लगता है कार्टून छोड़ कर कविताई कर ली जाए".... अब भाई बात भी  सही है ... सारा टैलेंट यहीं भरा हुआ है ... ही ही ही ...  .. निठल्ले, ऐम्लेस ... बेरोजगारों ...का समूह हो गया है अब ...  अरे मैं भी ना कविता लिखना भूल गया ... पता नहीं क्यूँ मुझे दूसरों की इज्ज़त में बम लगाने में बड़ा मज़ा आता है ... और यह सब इतने नालायक हैं कि  मेरा कुछ बिगाड़ भी नहीं पाते ... स्पाइंलेस फेलोज़ ... हुह ... 

मैं जनता को ज़हर पीने नहीं दूंगा 

फ़िल्मी गानों में भी 
स्तर और लिहाज है 
हिंदी का बड़ा लेखक 
चुटकुले बाज़ है। 
यह देश, समाज और साहित्य 
के लिए 
दाद है, खुजली है, खाज है।
मैंने लेखक को गाली नहीं दी 
उसके पाप को दी है 
जनता को डसने वाले 
चुटकुले के सांप को दी  है ,
कलम की जूती ही इनकी नमाज़ है।
यह चुटकुलों में शान्ति के 
कबूतर उड़ाते हैं 
व्यवहार में इनसे कसाई भी डर जाते हैं 
इतिहास को  ना जानने  पर इन्हें बड़ा नाज़ है 
मैं जनता को ज़हर पीने नहीं दूंगा 
चुटकुलों पर इन्हें अब जीने नहीं दूंगा। 

(c) महफूज़ अली 

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

कोई भूमिका नहीं, भीतरी द्वंद्व और चिकत्तों वाला कुत्ता: महफूज़


आज कोई यहाँ वहां की भूमिका लिखने का मन नहीं है। टॉपिक तो कई हैं दिमाग में मगर लिखने का मन नहीं कर रहा है ... और ना ही किसी को ताने मारने का मन है ... और ना ही किसी की बेईज्ज़ती करने का मन है। आज सिम्पली एक कविता है मगर बिना मेरी कोई फोटो के .... आजकल मैं फोटो नहीं खिंचवा रहा हूँ क्यूंकि ज्यादा हेवी जिम्मिंग की वजह से अच्छी आ नहीं रहीं .... तो ब्लॉग पर डालने का कोई मतलब नहीं है। कविता ही देखी  जाए अब ... बिना भूमिका के लिखना अच्छा  भी नहीं लगता है।






भीतरी द्वंद्व और चिकत्तों वाला कुत्ता
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यहाँ चाय, पान, सिगरेट और नमस्ते 
शिष्टाचार नहीं 
वरन उसकी एक अलग अर्थवत्ता है,
मगर 
मेरे भीतर जो टूट फूट रहा है 
उसका कारण 
शहर की बाहरी होड़ ही है ....
पीपल की फुनगियों पर 
अँधेरे की कोंपलें फूट रही हैं 
और पड़ोस की छत्त पर 
चिकत्तों वाला कुत्ता घूम रहा है....

(c) महफूज़ अली  

सोमवार, 8 अक्टूबर 2012

फिनिक्स... सायकोलौजिकल प्रॉब्लम..."मैं"... मेंटल डिसऑर्डर... फिलौसोफिकली पागल और बंद अँधेरे का दंगा: महफूज़


मुझे आजकल ख़ुद के बारे में ऐसे लगता है कि मैं एक फिनिक्स पक्षी हूँ जो अपनी राख से ज़िंदा हो जाता है. इसे एक झूठा घमंड भी कह सकते हैं मगर यह घमंड आजकल मुझ पर ज़्यादा ही हावी है, सुपिरियरीटी कॉम्प्लेक्स शायद किसी सायकोलौजिकल प्रॉब्लम की वजह से चादर की तरह ओढा हुआ हूँ. बहुत सारी चीज़ें जो कभी मेरे लिए मायने नहीं  रखतीं थीं आज पता नहीं क्यूँ मायने रख रहीं हैं.. पहले मेरे लिए पैसा उतना मायने नहीं रखता था मगर आज बहुत रखता है. पहले मेरे लिए छोटे छोटे रिश्ते भी मायने रखते थे मगर अब कोई भी रिश्ता बिलकुल भी मायने नहीं रखते.. पहले मैं अमीर ग़रीब नहीं सोचता था मगर आज सोचता हूँ... पहले मेरे लिए किसी लड़की/महिला का नेचर बहुत मायने रखता था मगर आज सुन्दरता ज़्यादा मायने रखती है... पहले उम्र कोई मायने नहीं रखती थी... मगर आज रखती है. ऐसी ही और भी बहुत सी चीज़ें हैं जो अब वक़्त और ज़रूरत के हिसाब से बदलती गईं. 

मुझे अपने स्कूल टाइम के दोस्त अब बिलकुल भी पसंद नहीं हैं, आज भी कई क्लासमेट मिलते हैं तो मैं पहचानने से इनकार कर देता हूँ... और दो-चार ऐसे भी हैं जिनसे हमेशा मिलने को जी चाहता है... ज़्यादातर मुझे इसीलिए पसंद नहीं आते क्यूंकि उनके लिए वक़्त ठहरा हुआ है. फिनिक्स पक्षी मैं ख़ुद को इसलिए कहता हूँ क्यूंकि इन कई सालों में में मैं कई बार मरा हूँ और कई बार मर कर दोबारा ज़िंदा हुआ हूँ.. आजकल मैं काफी एग्रेसिव हूँ.. था तो शुरू से.. ही.. मगर कुछ लोगों का ख़्याल कर के चुप हो जाता था मगर अब सिर्फ ख़ुद का ही ख़्याल रहता है. अब मेरे मैं से बढ़ कर कुछ भी नहीं है. और मेरी सबसे बड़ी प्रॉब्लम मेरा यही मैं है. मैं "मैं" से उबरना चाहता हूँ... इस  मैं से बाहर निकलना चाहता हूँ.. लेकिन जब भी अपने आस-पास देखता हूँ तो मुझे मेरा मैं ही ज़्यादा अच्छा लगता है. मैं अपने मैं से ख़ुद से ज़्यादा प्यार करने लगा हूँ.. और जो एक शेल यानी कि आवरण से बाहर आना ही नहीं चाहता, हो सकता है कि यह कोई मेंटल प्रॉब्लम हो मगर एक ख़ूबसूरत प्रॉब्लम है. 

अच्छा! जब इन्सान ज़्यादा फिलौसोफिकल होता है तो उसके वीउज़ भी ऐसे होते हैं जो समझ नहीं आते और दूसरों को पूरी पर्सनैलिटी ही डिस्टर्ब नज़र आती है तो किसी को मल्टिपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर नज़र आता है. जबकि फिलौसोफी पूरी पर्सनैलिटी पर ढंकी होती है. फिलौसोफिकल स्टेट में बहुत सारी चीज़ें ऐसी भी होतीं है जो पैरा सायकोलॉजीकल होती हैं, जिसका एक फायदा यह होता है कि ऐसे स्टेट में आदमी ज़्यादा लिटररी क्रिएटिव होता है. इस डायरी टाईप ब्लॉग्गिंग का भी एक अपना अलग मज़ा है... जो मन में आये लिखते जाओ किसी दूसरे की टेंशन नहीं. मुझे तो वैसे भी दूसरों की टेंशन नहीं होती. मैं तो दूसरों को टेंशन देता हूँ. मुझे कुछ लोगों की बेईज्ज़ती करने में बड़ा मज़ा आता है.. इतने नालायक लोग हैं जिनकी मैं हमेशा बेईज्ज़ती करता रहता हूँ कि मेरी बातों को रिटैलीयेट भी नहीं कर पाते.. शायद पलायनवादी होना इसे ही कहते हैं.. लड़ ना सको तो भाग ही लो. भई मैं अब ज़्यादा नहीं बोलूँगा.. नहीं तो फ़िर से कोई एक अलग फ़ालतू का टॉपिक शुरू हो जायेगा.. बिना मतलब में, मैं जाहिलों से लड़ना नहीं चाहता और न ही लड़ सकता हूँ. कविता पढ़ी जाए ...कविता.. इसकी बात ही अलग होती है. अगर सही से मतलब ख़ुद के विचार से लिखी जाए तो भावनाओं को उभार देती है. 
(भई! फोटो का ब्लॉग पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है , यह सुबह जिम से लौटते वक़्त गोमती किनारे।।।)

बंद अँधेरे का दंगा 

सम्प्रदाय की सांकल 
हर बार 
एक बंद अँधेरा बजाता है 
क़ुरान की जिल्द कहीं
उधडती है तो 
गीता का सीवन
टूट जाता है।।।। 

विधवाएं 
उर्दू और हिंदी की अलग नहीं हैं 
जीने का ठंडापन 
दोनों में 
विलग नहीं है  
ज़र्जर दीन-ऐ-इलाही 
का पत्थर 
हर बार सिसकता है 
और फूट जाता है।

© महफूज़ अली 
 
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