सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

हाय! रे हिंदी.... तेरा दर्द ना जाने कोये: महफूज़ (Mahfooz)

कल जब मैं अपना टाटा स्काई का डी.टी.एच. ऑनलाइन रिचार्ज कर रहा था तो रिचार्जिंग और प्लान में कोई दिक्कत आ रही थी जिस वजह से रिचार्ज नहीं हो रहा था. तो मैंने कस्टमर केयर पर नंबर मिलाया तो वौइस् सर्विस ने कहा कि "अंग्रेजी के लिए एक दबाइए ' और 'हिंदी के लिए दो"... अब टच स्क्रीन फोन है तो इत्तेफ़ाक से अंग्रेजी के लिए एक ही दबा... दो मिनट टाटा का कंपनी एंथम सुनाने के बाद वहां से फोन उठा और आवाज़ आई कि "दिस इज़ पीटर ! हाउ मे आई हेल्प यू?" अब पीटर से मैंने हिंदी में अपनी प्रॉब्लम बतानी शुरू की... तो थोडा सा सुनने के बाद पीटर ने मुझसे इंग्लिश में ही कहा कि 'आय डोंट अंडरस्टैंड हिंदी." मैंने कहा "क्या?" तो पीटर ने फिर "हिंदी" में कहा कि "मुझे हिंदी नहीं आती"... मैंने फ़ौरन ही धोने का यह मौका लपक लिया. मैंने कहा अब बताता हूँ इसको गलत आदमी से पंगे ले लिए इसने. अब पीटर को तो यह पता नहीं था कि कहाँ उसने हाथ डाल दिया? 

मैंने फिर पीटर से हिंदी में ही कहा कि "ठीक है! मैं अपनी प्रॉब्लम इंग्लिश में बताता हूँ." मैंने फिर कहा "आर यू रेडी पीटर?" पीटर ने कहा 'यस! आय एम रेडी. फिर उसे मैंने "अमेरिकन एक्सेंट" में अपनी प्रॉब्लम छ सौ किलोमीटर प्रति घंटे के स्पीड से बतानी शुरू की... इसी बीच वो सिर्फ वो आंयें-आंयें करता रहा... मैंने पीटर से पूछा "आर! यू गेटिंग मी?" पीटर ने कहा "सर! काइंडली स्लो योर वौइस् सो दैट आई कुड अंडरस्टैंड? मैंने फिर अमेरिकन एक्सेंट में ही "दस किलोमीटर प्रति घंटे" के हिसाब से धीरे धीरे उसे अपनी बात समझाई मगर उसके समझ में नहीं आया. पीटर चुप. मैं जवाब के इंतज़ार में. पीटर ने फिर कहा "सर! प्लीज़ मेक योर इंग्लिश इजी. 

मैंने कहा 'ओके! फिर मैंने अमेरिकन रोटासीज्म (Rhotacism) स्टाइल में बोलना शुरू किया. अब पीटर रोने वाली स्थिति में आ गया. "वॉट हैपंड पीटर?" मैंने पूछा. पीटर ने हिंदी में कहा कि नहीं सर मैं आपकी इंग्लिश समझ नहीं पा रहा. अब मैंने पीटर को अपनी पूरी प्रॉब्लम हिंदी में बता दी और मुश्किल से "तीस सेकंड" में पीटर ने मेरी प्रॉब्लम सोल्व कर दी. पीटर ने बताया कि मैंने अंग्रेजी वाला बटन दबाया था इसलिए उसकी मजबूरी थी. मैंने उसे बताया कि "पीटर! अगर तुम मुझसे हिंदी नहीं आती कहने के बजाये यह बात बता देते तो बीस मिनट ना तुम्हारे वेस्ट होते न मेरे". मुझे इस बात का भी यकीन है कि उसका नाम पीटर नहीं था. वैसे पीटर ने एक सबक यह भी सीखा होगा कि कभी किसी को अंडर-एस्टीमेट नहीं करना चाहिए... मगर फोन रखने के बाद मेरे मन को बहुत शान्ति मिली.

बुधवार, 30 सितंबर 2015

हॉर्न ओके प्लीज (Horn OK Please): Mahfooz Ali (महफूज़)

हम सबने अक्सर भारतीय ट्रकों के पीछे हॉर्न ओके प्लीज (Horn OK Please) लिखा देखा है. कई बार पढ़ कर हंसे भी हैं और कई बार आपस में दोस्तों से, टीचर से या बड़े बूढों से पूछा भी है कि आख़िर ट्रक के पीछे ऐसा क्यूँ लिखते हैं? हमने अक्सर देखा होगा कि हॉर्न (Horn) और प्लीज (Please) के बीच में बड़ा सा ओके (OK) लिखा होता है. 

द्वितीय विश्व युद्ध के समय पूरे विश्व में पेट्रोल की बहुत कमी हो गयी थी जिस वजह से ट्रांसपोर्टेशन केरोसिन पर डिपेंड हो गया था और युद्ध में रसद सामग्री केरोसिन आधारित वाहनों से ही हर जगह पहुंचाई जा रही थी. केरोसिन का नेचर (प्रकृति) बहुत ही प्रतिक्रियाशील होता है तो अक्सर ट्रक वगैरह में चलते चलते आग लग जाती थी जिससे कि पीछे और अगल बगल वाले वाहनों को भी नुक्सान हो जाता था. इस वजह से हर ट्रक के पीछे लिखा होता था हॉर्न ओके प्लीज... जिसमें से ओके (OK) बीच में बड़ा इसलिए लिखते थे क्यूंकि ओके (OK) का मतलब होता था ऑन केरोसिन (On Kerosene) मतलब केरोसिन से चलने वाला वाहन ताकि लोग दूर से देख लें और एक दूरी बना कर रखें और ओवरटेक हॉर्न देते हुए करें. 

पूरी दुनिया को पता है कि हम भारतीय बिना नदी में उतरे ही गहराई बताने लगते हैं. धीरे धीरे यह भारत में एक अनजाना बिना मतलब में ट्रेंड बन गया जो आज तक कायम है. कभी टाटा कंपनी ने जब अपना औल-पर्पस ओके साबुन लांच किया था तो इस ट्रक के पीछे लिखे ओके को अपनी मार्केटिंग में बहुत भुनाया था. तो अब जब भी ट्रक के पीछे हॉर्न ओके प्लीज (Horn OK Please) को आप देखेंगे तो मुझे भी याद करेंगे. है ना यूनिक जानकारी?

रविवार, 20 सितंबर 2015

फेसबुक पर धार्मिक दंगे करने वालों को पहचानिए : महफूज़

मैं जब भी फेसबुक पर लोगों को हिन्दू-मुस्लिम झगडे या गंदी धार्मिक आहत करने वाली बातें करते देखता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि इस टाइप के लोग एक दूसरे से जैसे कह रहे हों कि : भाई! मैं इक कुत्ता हूँ ... ठीक वैसे ही जैसे तुम हो ...और तुम्हे मालूम ही है जैसे कि तुम्हे उन्मुक्त होकर भौंकना पसंद है, वैसे ही मुझे भी पसंद है और यही हमारा नेचर है. आप जब ऐसे लोगों को जो धार्मिक गंदगी या उन्माद फैलाने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं बहुत आसानी से पहचान सकते हैं. एक तो इनका फॅमिली, स्कूल और दोस्तों का बैकग्राउंड कमज़ोर होता है, 



दूसरा इस तरह के लोग अंडर-एम्प्लोयेड या छोटे कामों में एम्प्लोयेड होते हैं, मोस्टली बेरोज़गार होते हैं, लडकियां/छोटे बच्चे/महिलाएं/हायर पढ़ा लिखा क्लास इनके पास नहीं फटकते, इनके घर की महिलायें मोस्टली प्रताड़ित होती हैं, ऐसे लोग स्कूल टाइम से ही नेग्लेक्टेड होते हैं... ऐसे लोगों के बाप का बिहेवियर इनके अपने घर में खराब होता है... और यह राजनीतिज्ञों और फ़िल्मी लोगों से बहुत इम्प्रेस्ड रहते हैं क्यूंकि इन लोगों की अपनी कोई पर्सनालिटी नहीं होती तो यह दूसरों में खुद को या मसीहा तलाशते हैं. मेरा धर्म ... तेरा धर्म बतियाने वालों से दूर रहना चाहिए .... यह लोग आपकी पर्सनालिटी भी खराब करते हैं. सभ्य समाज में लोग धर्म को घर के अन्दर रखते हैं.

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

###कविता: इतिहास के अतीत से देश के वर्तमान तक###

###कविता: इतिहास के अतीत से देश के वर्तमान तक###
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सुनता था ईंटों को
दीमकें नहीं खातीं
संग्रहालय के चित्रों को 
मौत नहीं आती....
एक खाकी धुंधला रंग 
नन्हों की स्कूल दीवारों पर
टंगा रहता है,
इतिहास के अतीत में 
जकड़ा भविष्य 
छूट जाता है 
और देश का वर्तमान 
धर्म के रंग में खो जाता है. 

(c) महफूज़ 

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

ईश्वर, अल्लाह, खुदा, भगवान् या गॉड… वो ना तो पैदा होता है ना ही मरता है: महफूज़

अगर आप सारे धर्मों की स्टडी (स्टडी मीन्स वाकई में स्टडी) करें तो पायेंगे कि जिसे हम ईश्वर, अल्लाह, खुदा, भगवान् या गॉड कहते हैं.… वो ना तो पैदा होता है ना ही मरता है न ही यह शादी करता है न ही सेक्स, ना ही इसे मेन्सेस होते हैं ना इसे बच्चे पैदा करने की ज़रुरत है.ना ही इसे गुस्सा आता है ना ही इसे लड़ाई-झगडे या झूठ बोलने की ज़रूरत है. ना ही इसे प्रसाद, चढ़ावे, चादर या किसी भी प्रकार के धन की ज़रुरत है. ना ही खुद की पूजा या इबादत करने के लिए जोर-ज़बरदस्ती करता है. ना ही इसे किसी हथियार की ज़रुरत है ना ही किसी चमत्कार की. ना ही इसे नौटंकी की ज़रूरत है ना ही इलाज की, ना तो यह स्त्री है ना ही पुरुष. यह तो निराकार है. इसका कोई आकार नहीं है. 

इसलिए धर्म को लेकर आपसी झगड़ों से दूर रहना चाहिए. जितने भी लोग धर्म को लेकर झगड़ रहे हैं वो जाहिल और औसत (Average) लोग हैं. लोग इतने जाहिल हैं कि सुनी सुनाई बातों पर ज्यादा यकीन करेंगे बनिस्बत खुद पढने के. हर इंसान अगर किसी भी धर्म में पैदा हुआ है तो यह उसकी गलती नहीं है ना ही वो एप्लीकेशन देता है अपने धर्म को चूज़ करने की. हर इंसान एक्सीडेंटल पैदा होता है... डिस्चार्ज या स्खलन का नतीजा है. कोई भी इंसान यह सोच कर सेक्स नहीं करता कि आज तो राहुल, सलीम या जॉर्ज को पैदा करूँगा...मौज मस्ती में सब पैदा हो जाते हैं. 

बहुत सारे धर्म ऐसे हैं जिनमें जाहिल ज्यादा पैदा होते हैं क्यूंकि वो खुद अपना धर्म नहीं समझ पाते क्यूंकि पढ़ते बिलकुल नहीं और सुनते ज्यादा हैं. सब लोगों ने अपने आप को बड़ा समझना शुरू कर दिया है. दुनिया का हर धर्म खुद को साइंटिफिक कहता है मगर इंसानियत से नफरत करना कोई साइंस कभी नहीं कहता.पढो जाहिलों पढो.... यह politicians तुम्हे आपस में अपने फायदे के लिए लड़ायेंगे और खुद आपस में हर धर्म वाले से मिल जुल कर रहेंगे और तुम्हे उलझा कर रखेंगे बेसिर पैर की चीज़ों में. कभी किसी पहुँचवाले का नुक्सान होते देखा सुना है? 

मैंने अपना खुद का धार्मिक त्याग कर रखा है... मेरा नाम मेरे साथ सिर्फ इसलिए हैं क्यूंकि मैंने जब आँख खोली तो यही नाम पाया. धर्म से मुझे इंसानों ने जोड़ा. बड़ा हुआ तो नाम-धर्म तो नहीं हाँ सोच को ज़रूर बदल पाया क्यूंकि मेरे ईश्वर ने मुझे यही एक चीज़ दी थी. और यही एक चीज़ ले कर जाऊंगा. बहुत सारे लोगों को शिकायत होती है कि मैं उनकी बात का जवाब नहीं देता तो मेरा उनको जवाब यह है कि भाई अगर तुम्हारा वो लेवल होगा तो ज़रूर दूंगा. अगर मैंने किसी की भी बात का जवाब नहीं दिया तो वो यह समझ ले कि सवाल लेवल का है.
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