सोमवार, 24 जून 2013

महीनों बाद कुछ ब्लॉग पर लिखा, रिश्तों का संत्रास ....मजेदार मगर कड़वा संस्मरण और कब तलक विश्वास करें गीत, ग़ज़ल और शे'रों पर" : महफूज़

आज बहुत महीनों के बाद दोबारा से ब्लॉग लिखने में बड़ा अजीब सा लग रहा है. लग रहा है कि कुछ है ही नहीं लिखने को या कहने को... हालांकि लिखने की कंसिस्टेंसी मेन्टेन तो रही है ... पर इतने महीनों के बाद ब्लॉग पर लिखना ... अम्म्म… ऐसा लग रहा है कि उंगलियाँ कीबोर्ड पर चल ही नहीं रही है। नेट, कंप्यूटर, या ब्लॉग पर लिखे तो काफी दिन हो गए हैं ... ह्म्म्म… महीनों हो गए हैं। कहते हैं कि ब्लॉग लिखना एक तरह से आज के मॉडर्न ज़माने में डायरी लिखने जैसा है .... बस फर्क यह  है कि डायरी में लिखी बातें सिर्फ आप तक रहतीं हैं और ब्लॉग पर लिखा हुआ पूरी दुनिया पढ़ती है. जिसे प्राइवेसी कहते हैं वो चीज़ ब्लॉग पर नहीं है। फिर भी यह तो है कि हम ब्लॉग लिखते हैं। वैसे एक बात तो है कि ब्लॉग की दुनिया ने मुझे बहुत कुछ दिया ... दोस्त ज्यादा और दुश्मन कोई भी नहीं ... हाँ! यह है कि छुट-पुट टुन्न-पुन्न तो हर जगह लगी ही रहती है. फिर भी मुझे तो ब्लॉग जगत ने मुझे बहुत कुछ दिया। अब यह बात अलग है कि फेसबुक के आने से वो बात अब ब्लॉग पर नहीं रही पर लगता तो ऐसा ही है कि ब्लॉग तो पहला घर है. वापस ब्लॉग पर कुछ लिखना थोडा सा पैथेटिक लग रहा है। 

समझ ही नहीं आ रहा है कि क्या लिखूं? जब ब्लॉग लिखा करते थे तो दिमाग में पहले से ही सब्जेक्ट मैटर तैयार रहता था ... अभी तो यह हाल है कि कुछ ध्यान ही नहीं आ रहा कि क्या लिखा जाये? एक बड़ा मजेदार संस्मरण याद आ रहा है ... सोच रहा हूँ कि लिखूं या नहीं ...अम्म्म .... लिख ही देता हूँ ... थोडा सा हम सबका एंटरटेनमेंट भी जायेगा और सोचने को भी मजबूर करेगा। 

हुआ क्या कि मेरा एक दोस्त है (जिसका नाम-वाम लिखना ज़रूरी नहीं है). बहुत ही ज़्यादा सेंसिटिव है .... पर्सनालिटी में भी ठीक है ... और रिच भी है हर तरह से और साथ ही साथ शादी-शुदा भी ... मगर अपनी पत्नी से बिलकुल भी संतुष्ट नहीं ... कोई भरोसा नहीं कि क्या पता आने वाले दिनों में तलाक - वलाक की नौबत आ जाए। इन महाशय जी की  एक गर्ल-फ्रेंड है जिसे यह अपनी सच्ची और सही मायने में पत्नी बताते हैं ... मगर कुछ कारणों से यह उससे शादी नहीं कर सकते। खैर! जो भी है हमें क्या? एक दिन क्या हुआ कि उन महाशय जी का मेरे पास फोन आया रात में दो बजे बड़े घबराए हुए ...उसने मुझे बताया रात में उसका किसी बात पर उसकी पत्नी से झगडा हुआ और दोनों में ज़बरदस्त मार-पीट हुई ... और उसी मार-पीट के दौरान उसकी गर्ल-फ्रेंड पत्नी का फोन आ गया .... जिसकी कॉल उसने झगडे में ही अटेंड की और जैसे ही कॉल उसने अटेंड की कि उसकी पत्नी जिससे कि उसकी मार-पीट चल रही थी ... उसने फोन छीन लिया ... और छीना झपटी दोनों में होने लगी ... इसी छीना झपटी में उसकी पत्नी जान बूझ कर बचाओ - बचाओ चिल्लाने लगी ... खैर! उसने फोन किसी तरह अपनी पत्नी से छीन कर काटा ... और थोड़ी देर के बाद शान्ति जब छा गयी तो उसने अपनी गर्ल-फ्रेंड पत्नी से बात की तो वो कहती है उससे कि वो अपनी पत्नी के साथ बेड पर था और उसने  एक मिनट की ज़बरदस्ती वाली आवाज़ बचाओ बचाओ के साथ सुनी है ... उसने काफी समझाने की कोशिश की मगर सब बेकार. अंत में थक हार-कर बैठ गया है। मैंने उसे यही समझाया कि भाई ... तू चूतिया है और रहेगा ... ज्यादा समझाने की ज़रुरत मैंने नहीं समझी क्यूंकि दो लोगों के बीच का रिश्ता सिर्फ वही दोनों समझ सकते हैं ... पर एक बात मैंने उसे कही कि जहाँ विश्वास ... ट्रस्ट नहीं ... वहां रहने का कोई फायदा भी नहीं ... 

 रिश्तों को समझना काफी  आसान भी है और मुश्किल भी। मुश्किल इसलिए कि जब कोई समझना ही नहीं चाहता तो आप कुछ नहीं कर सकते ...खासकर तब जब सामने वाला आप में सिर्फ बुराई ही ढूँढने की कोशिश कर रहा हो.... और समझना बिलकुल भी नहीं चाह रहा हो। वो रिश्ता ही क्या जिसमें एक्सप्लेनेशन देना पड़े और सामने वाला बुराई ही खोजने पर आमादा हो। अपना तो यही मानना है कि "If you Love the person... Just Love in anyway... as what she or he is..."

और नहीं तो मेरे फेसबुक में फ्रेंड लिस्ट में एक सोनाली बोस हैं ... उन्होंने एक बार लिखा था ... जो कि मुझे काफी अच्छा भी लगा था और उन्होंने रिश्तों को काफी अच्छे से डिफाइन भी किया था जो कि पढने में तो कड़वा था .... मगर सच था ... उन्होंने लिखा था ----

"जिस तरह हमारे जन्म के साथ ही हमारी मृत्यु का दिन भी निश्चित होता है उसी तरह हर नये रिश्ते के जन्म के साथ ही उस रिश्ते की मियाद भी तय होती है...हर नया रिश्ता अपनी उम्र साथ लिखा कर लाता है.... अगर आप किसी रिश्ते को उसकी तय की हुई सीमा से आगे खिचेंगे तो ज़ाहिर है कि वो नहीं चल पायेगा...रिश्ते हमारे जीवन में सुख और खुशी लाते हैं.... हर रिश्ता कुछ ना कुछ सिखाता है और बहुत हद्द तक हमारे जीवन को प्रभावित भी करता है, लेकिन आप किसी मृतप्राय रिश्ते को कुछ दिन वैंटिलेटर पर रख कर कुछ और सांस तो दे सकते हैं लेकिन ज़िंदा नहीं रख सकते हैं... ऐसे मरे हुए, बेकार, निर्जीव और बोझिल रिश्तोँ के बोझ को उतार फेंकने में ही हमारी समझदारी है, मैं यहाँ पर हर किस्म के रिश्तोँ की बात कर रही हूँ... याद रखिये यदि आज हम खुश और आनंदित नहीं हैं तो हम किसी और को भी क्या सुख और आनंद दे पायेंगे.... इंसानी फितरत है कि जो हम पाते हैं वही बांटते हैं...इसलिये खुशी बांटिये, आनंद साझा करिये और जितना हो सके रिश्तोँ को संभालिये लेकिन आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं... बोझ हमेशा बोझ ही रहेगा..... और रूई भी जब भीग जाती है तो भारी हो जाती है, ये तो फिर भी रिश्ते हैं...इन्हेँ प्यार और विश्वास की धूप में हमेशा सुखाये रखिये... हल्के हल्के रिश्ते तितली की तरह उड़ने लगेंगे.... लेकिन अगर तमाम कोशिश के बाद भी वो नहीं चल पा रहे हैं तो उन्हेँ छोड़ दिजिये... किसी भी बंधन में बंध कर कोई भी पनप नहीं पाया है... बाकि आपकी और मेरी मर्ज़ी, जो चाहे करेँ... है ना?"

मगर फिर भी मेरा यह मानना है कि रिश्ता लंबा और ता-ज़िन्दगी तभी कायम रहता है जब दो लोग उसे कायम रखना चाहें ... जिसमें ट्रस्ट अटूट हो और प्यार सागर से भी गहरा ... कोई भी चीज़ दोनों में से मिसिंग हो ... तो सोनाली जी की बातों को मान लेना चाहिए और आगे की सुध लेनी चाहिए .... मेरी एक कविता है जिसकी छोटी सी पंक्तियाँ हैं जो मुझे इस वक़्त याद रही है ... 

                                              "रात उतर आई है,
                                                सूरज के पैरों पर 
                                               ग़म भर नज़र है 
                                                शक के घेरों पर 
                                                हम कब तलक  
                                                    विश्वास     
                                                      करें 
                                               गीत, ग़ज़ल और शे'रों पर" 
                                                                                        (c) महफूज़ 

इसी के साथ विदा लेता हूँ .... हाँ! यह है कि ब्लॉग पोस्ट अब हर हफ्ते या टाइम मिलने पर लिखूंगा। 

सोमवार, 28 जनवरी 2013

पथराई आँखें, प्रतीक्षा तुम्हारी और कुछ घर के फूल : महफूज़

आहट पे तुम्हारी,
पलकें बिछीं हैं हमारी,
पथराई आँखें,
प्रतीक्षा तुम्हारी. 

              पलकों की कालीन बिछी है
              कमरे की हर चीज़ सजी है
              गुलदस्ते की आँखें कहतीं 
              रेतीली आशाएं सारी.
              पथराई आँखें,
               प्रतीक्षा तुम्हारी. 

नाखूनों से ज़मीं कुरचते
अंतर पलकों का भीगा,
राह रोकते, बाट जोहते,
नयनों की भाषा हारी 
पथराई आँखें,
प्रतीक्षा तुम्हारी. 

               युग आँखों में बीत गया है 
               सपना दिन में रीत गया है 
               चादर के कोने से कब तक 
                खेलेंगी उँगलियों हमारी 
              पथराई आँखें,
              प्रतीक्षा तुम्हारी.   

दिन हाशिया खींचने सा लगा है
प्यार की पहर नयनों में फ़िर उगा है 
आईना लिए मैं बैठी हूँ कबसे
न वो जीत में है न मैं बाज़ी हारी 
पथराई आँखें,
प्रतीक्षा तुम्हारी. ...

(c) महफूज़ अली 

(यह सारे फूल घर के ही हैं )

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

आईये जानें कुछ भारतीय दर्शन और आध्यात्मवाद: महफूज़


आज इस साल की पहली ब्लॉग पोस्ट पोस्ट करने का टाइम काफी दिनों के बाद मिला है। पिछले कई महीनों से मैं हिंदी साहित्य और हिंदुस्तानी फ़िलौसोफ़ि (दर्शन) का अध्ययन कर रहा हूँ। मेरे यह नहीं समझ आता कि हमारा हिंदी साहित्य इतना समृद्ध है फिर भी इसकी मांग क्यूँ नहीं है? हम सिर्फ बातों में ही हिंदी डेवलपमेंट कर सकते हैं और अगर आजकल के हिंदी के लेखकों के नाम पूछो तो लोग वही प्रेमचंद/महादेवी वर्मा ही  बताएँगे। आजकल के बच्चों को हिंदी के लेखकों के नाम ही नहीं पता, लेखक होंगे तो पता होंगे न? रही बात हिंदुस्तानी दर्शन की तो लोग सिर्फ टर्मीनौलौजीज़ से ही परिचित हैं अगर हम किसी से हिंदुस्तानी दर्शन पर सवाल पूछें तो लोग बगलें झाँकने लगते हैं या फिर बातों को बातों में ही खींचते हैं। मुझे बहुत अफ़सोस होता है कि लोग सिर्फ हिंदी के विकास के बारे में लिखते हैं "कि हिंदी का विकास करिए" मगर खुद सोचते और करते बिलकुल भी नहीं हैं। हिंदी के जैसा ही हाल भारतीय दर्शन का भी हो चुका है सिर्फ शब्दों से ही परिचित हैं।

आज मैं इसी भारतीय दर्शन के अंतर्गत "आध्यात्म" और "आध्यात्मवादिता" के बारे में सरल और आम भाषा में बता रहा हूँ। पहले तो यह बता दूं कि आध्यात्म का किसी भी धर्म से कोई भी लेना देना नहीं है,आध्यात्म एक प्राकृतिक (ईश्वरीय) प्रक्रिया है और धर्म मनुष्य निर्मित प्रक्रिया है। एक सामान्य भारतीय के जीवन का दार्शनिक आधार है "आध्यात्मवादिता"।  हमारे अंदरूनी भावों की ही आधार-शिला पर आधारित विचार मन में उठते हैं और उन्ही के सन्दर्भ में ही तमाम क्रियाएँ व्यक्ति तथा समाज के प्रति संपादित होती हैं। इन्हीं क्रियाओं के पीछे हमारा उद्देश्य भौतिक सुख तथा आनंद का ना होकर इससे परे आध्यात्मिक सुख का होता है। हमारी आँखों के सामने जो कुछ भी दिखता है वह हमारे इसी आध्यात्म के चश्मे के रंग में रंगा हुआ दिखता है।
(घर के फूल हैं, इनका भी एक अपना अलग दर्शन है)
जीवन तथा प्रकृति का कोई भी क्षेत्र हमारे सामने भले ही अपनी नम्रता लिए खड़ा हो पर हम उसमें ईश्वरीय मौजूदगी का ही दर्शन करते हैं। यही कारण है कि हमने जीव और जड में तो ईश्वर की साकार मूर्ति की कल्पना की है पर जो अदृश्य है उसमें भी हम ईश्वर को देखने लगते हैं (मूर्ति कल्पना और लिंग पूजन आज भी और विदेशी सभ्यताओं में भी पायी जाती है ... चीन, जापान और इंडोनेशिया में आज भी यह प्रचलित है). इसी ईश्वरीय अवधारणा से हमारी सारी क्रियाएं ईश्वर नियंत्रित और समर्पित होती है। यही आध्यात्म ही भारतीय जीवन दर्शन का "आध्यात्मवादिता" है। 
(घर के फूल हैं, इनका भी एक अपना अलग दर्शन है)
मगर हमारा आध्यात्मवाद कोरा भावनात्मक नहीं है, क्रियात्मक है। इसीलिए इस आध्यात्म को पाने के लिए हमेशा "कर्म" को ही प्राथमिकता दी गयी है। यही दूसरे शब्दों में "कर्मवाद" का सिद्धांत है। कर्मवाद की भावना हमारे जीवन में इसीलिए इतनी व्याप्त है कि किसी भी वस्तु के प्रति हमारे प्रत्येक के अन्दर अनासक्ति का भाव घर कर बैठा है, तथा यह इसलिए भी और बलवती है कि  हमारा सम्बन्ध भौतिक जगत से ना हो कर आध्यात्मिक जगत से ज्यादा है। वहीँ भारतीय दर्शन में यह भी कहा गया है कि धर्म वही है जो आपने धारण किया हुआ है जिससे स्वतः सुख हो मगर दूसरे को उससे कभी भी कष्ट ना हो।   

आध्यात्म का दो स्वरुप है: भौतिक और आध्यात्मिक। दूसरे शब्दों में यह सामूहिक और व्यक्तिगत है क्यूंकि जो भौतिक है वह सामूहिक है तथा जो आध्यात्मिक है वह व्यक्तिगत है। अब यहाँ व्यवहारिक एवं वैचारिक सम्बन्ध मानव निर्मित्त धर्म के ही आधार पर व्यक्ति का व्यक्ति से तथा व्यक्ति का समूह से बनाये रखने का प्रयास किया जाता है। इसीलिए भारतीय दर्शन में किसी भी मानव क्रिया में अर्थ और कर्म अगर उत्तेजक है तो यही मानव निर्मित्त धर्म के दर्शन द्वारा उसका नियंत्रण है। 


डिस्क्लेमर: प्रस्तुत आलेख में कुछ अंश भारत के सन्दर्भ में रशियन लेखन रोवोत्सकी (Dvorotski) की किताब से लिए गए हैं। बाकी लेख पूर्णतया मेरा है। फ़ोटोज़ का पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

दिन मरता है और नाखून की तरह उगता चला जाता है: महफूज़

(फोटो हैज़ नथिंग टू  डू विद द पोस्ट)
एक कविता -----

पिछला हफ्ता मैंने नाखूनों की तरह 

काटकर कचरे के ढेर में फ़ेंक दिया है। 
मगर दिन में भी नाखूनों की तरह 
रिजैनेरेटिव पावर होता है 
पुनः दिन 
उँगलियों में 
नाखूनों की तरह 
उगने लगा है।

नाखून की मीनारों में 
मैल भरने लगा है ...
धीरे धीरे शाम ढल रही है 
नाखून पूरा काला हो जायेगा 
और रात हो जाएगी।
जब यह रात असहनीय हो जाती है 
तो हम इसे नेलकटर से काट कर 
कूड़े के ढेर फ़ेंक आते हैं ...
और पुनः दिन नाखूनों में बढ़ने लगता है। 

नाखून और दिन में फर्क इतना ही है 
कि आदमी की मौत के साथ 
नाखूनों में रिजैनेरेटिव पावर 
समाप्त हो जाती है 
जबकि मरे हुए नाखून में भी 
दिन ... उन्ही पुराने दिनों की तरह 
डराता है।
मगर अब,
उसे कोई मारकर फेंकने वाला नहीं रहता 
यानि कि 
दिन नाखून बदल देता है 
उसमें पुनः डराने की शक्ति 
समाप्त नहीं होती 
याने दिन मरता है और उगता चला जाता है,
जबकि आदमी का नाखून 
मौत स्वीकार कर लेता है 
और 
उसका उगना 
बंद हो जाता है।

(c) महफूज़ अली 

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

मंगलसूत्र कहीं अटका हुआ है : महफूज़




पेश है मेरी एक अंग्रेजी कविता से प्रेरित यह कविता :

यह उन दिनों की बात है 
जब मेरा बचपन 
पिता की ढीली होती हुई पकड़ 
का गवाह हो रहा था। 

समझ की उम्र के साथ 
मैंने यह जाना 
कि माँ का सिर्फ सरनेम बदला है 
मगर पिता पूरी तरह बदल गए हैं। 

फिर मैं लड़ाई की उम्र में आ गया 
वर्षों तक लड़ने के बाद मैंने जाना 
कि रात से लड़ना बेवकूफी है,
इसे विश्राम की मुद्रा में 
धैर्य से भी काटा जा सकता है 
और यदि हम लड़ते रहे तो 
रात भर की लड़ाई में 
हम इतने थक चुके होंगे 
कि सुबह के सूरज का 
स्वागत करने की ताक़त 
हमारे रात भरे हाथों में नहीं होगी।

इसीलिए मेरी चीख चिल्लाहटें बेकार 
साबित हो गयीं ,
मैं यह देख नहीं पाता था कि 
साड़ी माँ ने पहनी है 
मगर 
मंगलसूत्र पिता के गले में 
अटका हुआ है 
और फिर 
उन आँखों में पिता तलाशना बहुत 
बड़ी बेवकूफी है,
जिनमें पिता ज़िंदा है। 

जिन उँगलियों में 
हम पिता तलाशते हैं 
वे स्पर्श की प्रतीक्षा करते हुए 
पति के हाथ हैं 
चौकलेट और लौलिपौप 
तो तुम्हे दर किनार करने का 
बहाना है। 
और 
वो स्कूल जिसकी टाट पट्टी पर 
तुम बड़े हो रहे हो 
तुम्हारी पढाई की तरह ही सस्ता है ,
जिसकी छतों से टपकते हुए पानी से 
तुम्हारे शरीर पर 
बड़े भाई का कुरता 
गीला हो गया है 
और तुम्हे 
पढ़ाने वाला टीचर 
घंटी के डर से 
शरीर की कतार से हताश
लौट आया है।

तुम 
एक अनिश्चय में जन्म लेकर 
दुसरे अनिश्चय में बड़े 
हो रहे हो ....
फिर 
तुम भी धीरे धीरे लड़ते हुए 
इतना थक जाओगे 
कि तुम्हारे भीतर से 
उभर कर मंगलसूत्र 
तुम्हारे गले में 
आ जायेगा 
फिर 
एक मिला जुला 
अनिश्चय 
जन्म लेगा 
और टपकती छतों और 
गीली टाट पट्टी 
पर भीगता हुआ 
बड़ा हो जायेगा। 

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