शनिवार, 7 अप्रैल 2012

लेवल की बातें, शब्द अपनी सीमाएं नहीं तोड़ते और विरोध होना चाहिए, लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं: महफूज़ (Mahfooz)

अभी दो दिन पहले की बात है गोमती नगर के विराम खंड एरिया में एक मनसा मंदिर है वहां गया था क्यूंकि हमारे गोमती नगर में वही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं नहीं तो गोमती नगर में मारुती की कारें रखने वाला ग़रीब समझा जाता है. और यह मनसा मंदिर ही एक ऐसी जगह है जहाँ ग़रीब मिलते हैं. मैं वहां अक्सर जाता रहता हूँ ... अकसर पुराने कपडे और अपनी माँ के नाम पर गरीबों को देता रहता हूँ पता नहीं क्यूँ पिता जी के नाम पर किसी को कुछ देने का मन ही नहीं करता... शायद पिताजी के जाने के बाद भी उनसे कॉन्फ्लिक्ट जारी है. माँ तो बहुत याद आती है हर पल पर पिता जी सिर्फ तभी याद आते हैं जब मैं मुक़दमे के सिलसिले में कोर्ट में जाता हूँ और जज का दरबान ज़ोर से चिल्ला कर मेरा नाम वल्द मेरे पिता जी हाज़िर हों या फ़िर जब टैक्स फ़ाइल करना होता है तब या फ़िर जब कहीं से कोई छुपी ही रकम मिलती है. एक बार कोर्ट में मैं जज से उलझ पड़ा था क्यूंकि मैंने कोर्ट में एंटर जेब में हाथ डाल कर किया था और जज के पेशकार ने मुझे जेब से हाथ निकालने को कहा था.. और हम वैसे भी सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स से ग्रसित.. जज से यह कह कर उलझ पड़े कि यह सामंतवादी व्यवस्था है और कई  तर्कों से जज से उलझने के बाद वहीँ पेशकार को दो चार उलटी सीधी बातें सुनाने के बाद कोर्ट की अवमानना के जुर्म में ख़ुद को पांच सौ का जुर्माना लगवाया. लेकिन फ़िर उसके बाद किसी ने मुझसे उलझने की कोशिश नहीं की, बाद में जज मुझसे कहता है कि अगर तुम मेरे दोस्त नहीं होते तो सीधा जेल भिजवाता..... हमारे देश का क़ानून भी अजीब है जब तर्कों से हार जाता है तो जुर्माना लगा देता है या फ़िर संसद में बिल पास करने के नाम टाल जाता है. 

हाँ! तो हुआ क्या कि मनसा मंदिर गया था तभी देखा कि एक महिला अपने सत्रह-अठरह वर्षीय पुत्र के साथ मंदिर से बाहर निकल रही है. हम दोनों ने एक दूसरे को ध्यान से देखा और पहचान गए. वो मेरी किसी ज़माने में क्लास मेट थी. बात बात में पता चला कि वो समाज कल्याण अधिकारी है और अभी लखनऊ ट्रान्सफर हुआ है कोई  एक साल पहले, इंदिरा भवन में ही ऑफिस है. हम लोग बात करते करते गोमतीनगर में कैफे कॉफ़ी डे में बैठ गए, कैफे कॉफ़ी डे के बगल में ही वी.एल.सी.सी. है मेरी बहन वहीँ जिम जाती है मैंने सोचा कि उसे भी पिक कर लूँगा और इससे कुछ बातें भी हो जायेंगीं. और उसका बेटा वहीँ अपने एक दोस्त से मिलने चला गया. बात बात ही में उसने मुझसे पूछा कि  क्या तुम्हे मेरी याद आती थी? मुझे इस सवाल पर हंसी आई बहुत कस के. मैंने उससे कहा कि भई तुम्हे तो मैं कबका भूल चुका था... शक्ल तक याद नहीं थी... उसे यह लगा था कि मैं उसकी याद में पगला गया होऊंगा. फ़िर ख़ुद ही कहती है कि 'हाँ! तुम्हे क्या कमी? उससे थोड़ी देर यहाँ वहां की बातें होती रही... फ़िर मेरी सिस्टर भी आ गई हम सबने मिलकर खाया पिया काफी पी और अपने अपने घर आ गए. 

घर आ कर मैंने सोचा कि यह लड़कियां (महिलायें भी) पता नहीं क्या चाहती हैं और क्या समझतीं हैं? इन्हें यही लगता है कि लड़का इनकी याद में मर गया होगा, वैसे लड़कों की साइकोलॉजी (सब लड़के नहीं) बहुत डिफरेंट  होती है लड़का (अगर वाकई में लड़का है तो) हमेशा स्विच ओवर बहुत जल्दी कर लेता है. यह हमेशा लड़की के ऊपर डिपेंड करता है कि उसने कैसा रिश्ता (प्यार) रखा है कि लड़का उससे हमेशा बंध कर रहे.  

वैसे मैंने देखा है और महसूस भी किया है कि महिलायें बहुत सारी गलतफहमियों में बचपन से जीती हैं. वैसे महिलाओं (लड़कियों) के बिहेवियर को साइकोलौजिकली वॉच करने में बहुत मज़ा आता है. महिलाओं में सिर्फ एक चीज़ अच्छी होती है कि वो भविष्य जान लेतीं हैं और सिक्स्थ सेन्स उनमें वाकई में होता है. और पुरुषों में सेन्स ऑफ़ ह्यूमर की बहुत कमी पाई जाती है और सिक्स्थ सेन्स होता ही नहीं. महिलायें फ़ौरन झूठ पकड़ लेतीं हैं और पकड़ कर शांत रहतीं हैं... वक़्त आने पर पोल खोलतीं हैं  और पुरुष सोचता है कि उसने महिला को बेवकूफ बना लिया. 

बहुत हो गया अब... अब ज़रा मेरी कविता भी बाट जोह रही हैं. कविता के साथ एक प्लस पॉइंट यह है कि यह कहीं भी लिखी जा सकती है... ट्रेन में, बाथरूम में, टहलते हुए और भी कई तरह से. मुझे कई बार बड़ा सरप्राइज़ होता है कि लोग रोज़ रोज़ कैसे कविता लिख लेते हैं? या तो कहीं से चुराते होंगे या फ़िर तुकबंदी होती होगी... क्यूंकि कविता लिखने के लिए भावनाओं में और भावनाओं का होना बड़ा ज़रूरी है. वैसे यह भी है कि बहुत बार ऐसा हुआ है कि कि कई लोगों की कविता पढने के बाद मुझे आत्महत्या से रोका गया है. एक बार एक कोई मनहूस सी शक्ल वाले की कविता अहा! ज़िन्दगी में पढ़ी थी उस कविता को पढ़ कर ऐसा लगा कि इस कविता को मैं कोई बीस पच्चीस साल या और भी पहले पढ़ चुका हूँ. ख़ैर! कविता एक ऐसी चीज़ है जिसकी चोरी बहुत आसानी से हो जाती है और पकड़ में भी नहीं आती है. अरे! आईये ज़रा अब मेरी कविता पढ़ते हैं:--

शब्दों की सीमायें नहीं होतीं 
______________________
उदासी 
गिरफ्त से बाहर 
ठहरी हुई है 
और मैं उसे शब्द मानने को
तैयार नहीं हूँ .... 
शब्द यदि अपनी सीमायें तोड़ दें 
तब वह शब्द नहीं रह जाता.
_________________________
(c) महफूज़ अली 


(फोटोग्रैफ्स तो ऐसे ही डाली गयीं हैं... आई एम इनफ हैंडी टू बी कौपीड फ्रॉम गूगल .. दैट्स वाय माय फोटोग्रैफ्स ईज़ हियर.)

जैसा कि मैंने कहा था... कि पोस्ट के आखिरी पंक्तियाँ हटा दी जायेंगीं... और शीर्षक में भी बदलाव करूँगा... तो वो मैंने कर दिया है. जिन्हें मेसेज देना था उन तक मेसेज पहुँच गया है... अब शायद वो साहब ऐसा नहीं  करेंगे... और उन्हें जो भी प्रॉब्लम होगी... तो वो किसी को पोस्ट लिख कर ... कुछ नहीं कहेंगे... ऐसा हम सोच सकते हैं. मेरे ऐसा लिखने से सबको कोफ़्त और परेशानी हुई होगी... मैं समझ सकता हूँ. लेकिन मैं मजबूर था. अब कोई किसी महिला को अपशब्दों से नवाज़ने की हिम्मत नहीं करेगा. और करना भी नहीं चाहिए. विरोध होना चाहिए.. ..लेकिन आत्म सम्मान के बिना पर नहीं. 


आईये मेरा वन ऑफ़ दी फेवरिट गाना देखते हैं.. 



मंगलवार, 20 मार्च 2012

कुछ यहाँ वहां की ऐंवें ही और सिर्फ तुम्हारे लिए एक प्रेम कविता : महफूज़

 आज कुछ लिखने का मन नहीं है... नहीं ई ई ई ई ई..... मेरा मतलब है कि मन तो है लेकिन समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं? कभी कभी जब मन में बहुत परप्लेक्सन होता है तो भी लिखने विखने का मन नहीं करता.... आज तो मैं उन सबका थैंकफुल हूँ.. जो मेरी खुशियों में मेरे साथ थे... 

आज संजय बेंगानी जी ने एक सवाल पूछा था... सुबह नाश्ता करते वक़्त देखा.. " सफल होते ही व्यक्ति सबसे पहले किसे छोड़ता है? #कभी ध्यान में न आने वाले जवाब का सवाल. ... मुझे लगा कि इस पर कुछ लिखना चाहिए.. तो यही ख्याल आया कि  सफल होते ही व्यक्ति ऐसे लोगों को छोड़ता है जो उसे हमेशा बेवकूफ  ही देखना चाहते हैं... और बेवकूफ सफल व्यक्ति को कहते हैं कि यह कैसे सफल हो गया.. यह तो बेवकूफ था. सफल होते ही व्यक्ति ऐसे लोगों को छोड़ देता है.  

कुछ  ऐसे मनहूस लोग भी होते हैं.. जो  सफलता को डाउट की निगाह से ही देखते हैं... दरअसल यह ऐसे लोग होते हैं जो शक्ल सूरत से, पढाई लिखाई से (नॉट मेंट विद डिग्रीज़), एक्स्ट्रा को-कर्रिकुलर एक्टिविटीज़, जनरल नॉलेज, पर्सनैलिटी से बिलो एवरेज होते हैं..  जिन्हें कभी स्कूल में और कॉलेज में लड़कियों ने घांस नहीं डाली होती है.... इनके पास  अक्ल,शक्ल और पर्सनैलिटी ही नहीं होती है... और फिर जिनके पास होती है उनसे जलन पाल लेते हैं.... 

कुछ आपको हाई स्कूल और इंटर के टाइम पर ही देखना पसंद करते हैं... जब आप सफल होते हैं.. तो उनकी आँखें फट जातीं हैं... ऐसे लोग टाइम बार्ड होते हैं.... यह सोचते हैं कि वक़्त हमेशा रुका हुआ रहता है... और हर इंसान रुके हुए वक़्त पर ही जीता है.. कुछ आपका पास्ट खोज कर लाते हैं... कि कहीं से तो कमज़ोर करें...  ख़ैर! यह तो है कि  थोड़ी भी सफलता के साथ साथ बहुत से दुश्मन भी आते हैं... और कुछ दोस्त से दुश्मन बन जाते हैं. 

ज़्यादा लिखने विखने का मन नहीं कर रहा है... आप लोग मेरी कविता देखिये... यह कविता भी मैंने कहा ना तभी लिखी जाती है जब मन में भावनाएं अपने उफान पर होतीं हैं.. तभी ही कविता कविता बनती है.. वैसे एक और बात बता रहा हूँ कि एक ब्लॉगर है.. वो सिर्फ तुकबंदी करता है... और कहता है कि कविता है.. उसकी कविता मैंने जैंगो (मेरा प्यारा कुत्ता) को पढाई ... बेचारा जैंगो पढ़ कर मर गया.. मुझे बहुत सारे ब्लॉगर फोन कर के उसे गाली देकर भड़ास निकालते हैं.. :) (स्माईली)... 

आईये अब कुछ फोटोग्रैफ्स देखे जाएँ... 

(यह मेरी न्यूज़ है हिंदुस्तान में. मैं दैनिक जागरण, इंडिया टुडे, आज, अमर उजाला, अजय और अंकित  का भी आभारी हूँ)
(यह अंजू जी की किताब का ज़िक्र पंजाब केसरी में) 
(यह फोटो डराने के लिए.... भई! मुझसे संभल कर रहना.. वैरी सेल्फ ऑब्सेस्ड ...)




(सिर्फ तुम्हारे लिए: एक प्रेम कविता)

उलझनों में कुछ भी कहूँ ,
मगर मेरे अन्दर 
सिर्फ तुम 
हो गई हो.
इन्ही उलझनों के बीच
में जो ताज़गी है ना 
वो तुम हो


अच्छा! अब एक गाना मेरा मनपसंद 







गुरुवार, 1 मार्च 2012

ब्लॉग्गिंग, भारतीय साहित्य और सिनेमा: महफूज़ (Mahfooz)


इसी इतवार को क़िताबों की रहस्यमयी दुनिया में ले जाने वाला दिल्ली में बीसवें विश्व पुस्तक मेले में जाना हुआ. हालांकि, जाने का कोई ऐसा प्रोग्रैम नहीं था मेरा, लेकिन अंजू चौधरी जी के पुस्तक "क्षितिजा" का विमोचन था और उसमें मेरा जाना ज़रूरी था और किया हुआ वादा भी निभाना था. इस बार पुस्तक मेले का विषय है "भारतीय साहित्य और सिनेमा". विषय देख कर मुझे हंसी भी आई क्यूंकि साहित्य और हिंदी सिनेमा का दूर दूर तक आपस में कोई लेना देना नहीं है. हिंदी साहित्य जो भी है सब नब्बे के दशक के पहले के हैं अब तो हिंदी साहित्य रचा ही नहीं जाता और हिंदी साहित्य का मतलब लोग सिर्फ प्रेमचंद से ही समझते हैं और थोडा बहुत निराला से. अब तो यह हाल है कि गाँव भी ख़त्म हो गए और खेत खलिहान भी और गाँव में रहने वाले  लोग भी. जो गाँव में रहते थे वो आठवीं /दसवीं पास/फेल कर के शहरों में मौल्ज़ में काम करने लगे. अब ना हीरा मोती हैं और ना ही बिरजू. फ़िर कुछ साहित्यिक मैगजीन्स आज भी इनसे ऊपर आने को तैयार नहीं है आज भी वो गाँव और खेतों और बैलों को ही साहित्य मान रही है. अब जो जेनेरेशन अस्सी के मध्य और नब्बे के दौरान पैदा हुईं हैं वो क्या जाने यह सब? इसीलिए यह जेनेरेशन साहित्य से दूर हैं क्यूंकि जो कुछ साहित्य में लिखा जा रहा है वो उन्होंने देखा ही नहीं. अगर हम दैनिक जागरण के टैबलौयिड आई-नेक्स्ट को देखें तो उसने वही भाषा को अपनाया है जो आज की जेनेरेशन बोलती है तो भाई साहित्य में भी वही भाषा क्यूँ नहीं? सेक्स जैसा विषय आज भी टैबू है साहित्य में जबकि वहीँ आई-नेक्स्ट आई-कैंडी के नाम से एक कॉलम निकालता है जो इनडाइरेक्टली  सेक्स ही बेचता है. हमारा साहित्य भी पिछले बीस सालों से कोई ख़ास डेवलपमेंट नहीं कर पाया है. आज साहित्यकार का मतलब लोग जावेद अख्तर, प्रसून जोशी और गुलज़ार जैसे लोगों को ही जानते हैं. इनसे भी ऊपर लोग  हैं और अच्छा लिखते हैं. आजकल अच्छे साहित्यकार इसीलिए सामने नहीं आ पा रहे हैं क्यूंकि एक तो बेचारे लौबिस्ट नहीं हैं और दूसरा उनके पास चेतन भगत जैसा मार्केटिंग स्किल और फायनेंस नहीं हैं. 

आप सबने देखा होगा कि जब भी वॉशबेसिन या नाली में "हिट" का स्प्रे करो तो अचानक ढेर सारे कौक्रोचेस और अजीब कीड़े निकल कर बाहर आ जाते हैं उसी तरह इंटरनेट के आने से और ब्लॉग रूप में एक फैसिलिटी मिल जाने से तमाम साहित्यकार पैदा हो गए हैं. कई लोग मुझे फ़ोन करके बताते हैं कि फलाने ने कविता छापने के लिए इतने पैसे मांगे और कोई एक आध संकलन निकाल कर बेचारे दूसरे को एहसास दे दिया कि भाई हमने तेरे जैसे को भी साहित्यकार बना दिया है. यह एक धंधा चल निकला है आजकल, तू मेरी खुजा मैं तेरी  खुजाऊंगा वाली तर्ज पर. अब तो ऐसा लगता है कि नेट आ जाने से हर घर में कवि/कवयित्री और साहित्यकार पैदा हो गया है. ऐसा लगता है कि पांच की फैमिली हैं तो एक मेंबर साहित्यकार है. 

और रहा सवाल हिंदी सिनेमा का तो आदि काल से जबसे हिंदी सिनेमा का जन्म हुआ है तबसे बेचारी पूरी फिल्म इंडस्ट्री हौलीवूड पर डिपेंड है ... हर फिल्म किसी ना किसी इंग्लिश, स्पैनिश, जैपनीज, ईरानियन और अरेबियन फिल्म का रीमेक है. पूरी कहानी, सब्जेक्ट, म्युज़िक, सिनेमेटोग्रैफी, स्क्रिप्ट, सीन और यहाँ तक कि डाय्लौग्स भी चुराए हुए होते हैं. हिंदी सिनेमा में सिवाय हिंदी (जो कि मूल रूप से उर्दू होती है) और हिंगलिश के सिवाय और कुछ ओरिजिनल नहीं होता. तो हिंदी के नाम पर सिनेमा को कैश करना यह हिंदी की गत दिखाता है कि पाठकों और दर्शकों (दर्शक इसलिए क्यूंकि ज़्यादातर लोग हिंदी की किताबें खरीद कर नहीं पढ़ते) को पुस्तक  मेले तक लाने के लिए सिनेमा का भी सहारा लेना पड़ा. हिंदी ग्लोबल भाषा भी नहीं है जो लोग हिंदी सिनेमा को ओवरसीज़ भी बताते हैं वो सिर्फ उन लोगों के लिए ओवरसीज़ सिनेमा बनाते हैं जो भारतीय डौलर और पौंड में पैसा खर्च करते हैं. और उससे हिंदी सिनेमा की लागत निकल जाती है और बाक़ी प्रौफिट वो देसी मार्केट से कमा लेते हैं.भीड़ खींचने के लिए ऐसा विषय रखा है और भीड़ है कि नदारद है पहले दिन ही कोई ख़ास भीड़ नहीं थी जो थी वो डेटिंग करने वालों की ज़्यादा थी.. उनको एक बहाना और जगह मिल गई थी डेटिंग करने के लिए. भीड़ है नहीं और ना ही होगी क्यूंकि एक्ज़ाम्ज़ चल रहे हैं और आजकल के मोडर्न पेरेंट्स अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाएंगे नहीं और ना ही खरीदने को इनकरेज करेंगे. अभी भी सारी भीड़ जो है थोड़ी बहुत वो इंग्लिश काउंटरज़ पर ज़्यादा हैं और खरीद भी रही हैं और हिंदी किताबें की ओर देख कर उलट पलट कर वापस रैक पर रख दी जा रही हैं. 

अब कुछ पलों को देखिये जो मैंने अपनों के साथ बिताये:----

(शिखा वार्ष्णेय की किताब डायमंड बुक स्टाल पर)

(बुक फेयर के पहले दिन सुनीता दी के स्टाल पर, मैं कुर्ते पजामे में)

(यहाँ भी)

(यहाँ संजू तनेजा जी के साथ दूसरे दिन)

(यह पदम् है यह मंचिंग कर रहा है)

(आप घोंसला वाले राजीव जी हैं)

(हरकीरत जी मंच से अपनी किताब का विमोचन कर के वापस आते हुए)

(सुनीता दी और अंजू जी)

(यह बैसवारी वाले संतोष जी हैं और पीछे पदम् मुझे मुक्का दिखाते हुए)

(अ वैरी स्पेशल मोमेंट)

(मी विद अंजू )

(हियर अल्सो ... हैविंग सम गुफ्तगू)

(यहाँ भी )

(दी... फ़ोटोज़ दिखाते हुए)

(यहाँ भी दीदी फोटो दिखाते हुए)
(अ न दर  कैची मोमेंट)

(यहाँ मैं.. यह फोटो शिवम् ने कब खींची पता नहीं)



अब मेरी कविता पढ़िए बिलकुल ओरिजिनल है हिंदी फिल्मों जैसी नहीं. 

संस्कृति की पगडण्डी 
------------------------

कुछ लोग हैं 
जिन्होंने 
ईश्वर
दर्शन
धर्म
और 
संस्कृति की 
पग डंडियों से सबकी 
आँखें खरीद ली हैं......
इसीलिए ज़्यादातर 
लोगों को सड़कें तो
दिखतीं हैं,  मगर
रास्ते नहीं दिखते. 

(c) महफूज़ अली 

अब इसी के साथ पोस्ट ख़त्म करता हूँ. आप लोग मेरा फेवरिट गाना देखिये.. 




सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

एक नालायक की आप-बीती और जड़ का प्रमाण: महफूज़


 सोचता हूँ  कि  अपने नाम के आगे डॉ. लगा लूं.. हाँ! भई.. आख़िर पी.एच.डी. किये हुए आज आठ साल हो गए हैं और अब तो दूसरी  पी.एच.डी.भी तैयार है. लेकिन पता नहीं क्यूँ अजीब लगता है? मेरा ऐसा मानना  है कि पी.एच.डी. नालायक लोग करते हैं, यही एक ऐसी क्वालिफिकेशन है जिसके बारे में कभी कोई सवाल नहीं होता. यही एक ऐसी क्वालिफिकेशन है जिसके लिए आपको पढना नहीं पड़ता सिर्फ अपने गाइड को तेल लगाते रहिये. यही एक ऐसी क्वालिफिकेशन है जिसके बारे में कभी किसी भी इंटरविउ में कोई सवाल नहीं होता आपसे सिर्फ रिसर्च मेथडोलॉजी पूछी जाती है. अगर कोई इतना ही इंटेलिजेंट होता है तो पी.एच.डी. नहीं करता. जिस प्रकार एक साहित्यकार (जो आखिरकार नालायक ही साबित होता है) को उसकी डेथ बेड पर साहित्य सम्मान दिया जाता है उसी प्रकार पी.एच.डी. आपकी क्वालिफिकेशन का अल्टीमेट सर्टिफिकेशन होती है. 

मेरी शक्ल मेडिकल डॉक्टर जैसी है. मैं जब भी लखनऊ के के.जी.एम.सी. मेडिकल कॉलेज जाता हूँ तो वहां के कई जूनियर मुझे सीनियर समझ लेते हैं और जहाँपनाह वाले अंदाज़ में तीन बार सलाम ठोंक देते हैं. मेरी सिचुएशन बहुत अजीब होती है तब. कई बार तो मुझे बहुत सारे पेशेंट्स डॉक्टर समझ कर घेर लेते  हैं.  अब तो मेडिकल कॉलेज में भी फाइनल इयर में मैनेजमेंट के एक-आध सब्जेक्ट्स पढ़ाए जाते हैं और जब मुझे अपना नाम डॉ. (महफूज़ अली) के साथ बताना पड़ता है तो मेरा चेहरा अजीब सा हो जाता है. मैं ख़ुद को बड़ा नालायक फील करता हूँ. सोचता हूँ अगर इतना ही इंटेलिजेंट होता तो भई पी.एच.डी. क्यूँ करता? 

अगर कोई बच्चा वाकई में इंटेलिजेंट होता है तो वो बारहवीं के बाद ही आई.आई.टी./मेडिकल/एस.सी.आर.ऐ./एन.डी.ऐ/या होटल मैनेजमेंट में निकल जायेगा. उसके बाद जो एवरेज होगा वो ग्रेजुएशन/पोस्ट ग्रेजुएशन  के बाद सी.डी.एस. / बैंक पी.ओ./ सिविल सर्विसेस/ लेक्चरार/या यू.जी.सी./गेट/मैट पास करके निकल जायेगा. जो इनमें से कुछ भी नहीं बन पायेगा वो और आगे पढ़ता हुआ पी.एच.डी. करेगा और फ़िर ज़िन्दगी भर भी कुछ नहीं करेगा. हमने तो भई यू.जी.सी. जे.आर.ऍफ़. लिया था और सिविल सर्विसेस में भी दो बार इंटरविउ तक पहुंचे थे. 

जब कोई बच्चा स्कूल टाइम से लेकर कॉलेज तक में नालायक होता है. हाई स्कूल और बारहवीं में घिस घास कर पास होता है... ना डॉक्टर बनने लायक होता है ना इंजिनियर, ना आई.ऐ.एस. बनने लायक होता है ना प्रोफ़ेसर, ना पौलिटीशियन बनने लायक होता है ना बिजनेसमैन, ना टीचर बनने लायक होता है ना चपरासी, ना लेखक बनने लायक होता है ना कवि. ऐसा बच्चा बड़ा होकर 'पत्रकार' बन जाता है ... या... किसी जागरण/ज़ेवियर/घोरहू-कतवारू  इंस्टीट्युट ऑफ़ मॉस कम्युनिकेशन टाईप के संस्था से डिप्लोमा लेकर 'एंकर' बन जाता है. 

वैसे मैं तो अपने  नाम के साथ नेट (इंटर) पर डॉ. इसीलिए नहीं लगाता हूँ कि कौन अपना बचपना ख़त्म करे. नोर्मल लाइफ में तो सीरियस ही रहना पड़ता है एक यही तो वर्चुयल दुनिया है जहाँ थोडा बहुत बचपना इस उम्र में भी दिखा सकता हूँ. 

इस उम्र से ध्यान में आया कि मैं हमेशा लोगों को सलाह दूंगा कि भई एक्सरसाइज़ ज़रूर किया करें और खाना बहुत सोच समझ कर खाएं . इससे क्या होता है ना कि आप ख़ुद ही अपनी उम्र को धोखा दे देंगे. अभी क्या हुआ ना कि लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के मीटिंग में लंच के दौरान जब प्रज्ञा पाण्डेय जी, सुशीला पूरी जी, उषा राय जी और प्रज्ञा जी की एक बहुत ही अच्छी सहेली हैं किरण जी जो कि बहुत ही नामी साहित्यकार   हैं और हमेशा हंस/वागर्थ में छपती रहती हैं (इन्होने मुझे बचवा कह कर पुकारा था) को जब मैंने अपनी उम्र बताई तो सब थोड़ी देर के लिए परेशान हो गईं थीं और मैं बहुत खुश. सब लोग सोचते होंगे मुझे कि कितना आत्ममुग्ध इन्सान है? ख़ैर.....


जिन दिनों नहीं कुछ लिख रहा था... तो... उन दिनों कविता लिखी थी. अब लिखी तो कई सारी हैं... लेकिन ब्लॉग पर धीरे धीरे रोज़मर्रा ज़िन्दगी में से टाइम निकाल कर डाल रहा हूँ. तो प्लीज़ ...यू ऑल आर रिक्वेस्टेड टू हैव अ स्लाईट ग्लैन्स ओवर माय कविता इन हिंदी

जड़ का प्रमाण
-----------------

यह नींद भी कितनी अजीब है,
पलकें बाहर से बंद कर लो
और आँखें 
अंदर खुल जातीं हैं. 
मैं अपनी नींद के भीतर 
सालों से जागते हुए 
देख रहा हूँ ----
एक अंकुर को फूटते हुए
पर मैं जड़ बनने को तैयार नहीं हूँ ....
कब तक मैं भीतर रह कर 
औरों को इंधन पहुंचाता रहूँगा?
जड़ का प्रमाण ही यही है,
कि पौधा फलों को 
जन्म देकर 
उन्हें जवानी तक पहुंचाने में दम तोड़ 
देता है. 

(c) महफूज़ अली 

इंधन=Fuel
प्रमाण=Evidence
जवानी=youth
अंकुर=Baby Plant  (यह कुछ हिंदी के टफ वर्ड्स हैं जिन्हें मुझे डिक्शनरी में देखने पड़े हैं)

उम्मीद है कि कविता अच्छी लगी होगी. पिछले साल अगस्त में लिखी थी.  अब भई.. मेरा मनपसंद गाना देखिये भी और सुनिए भी.


बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

फलसफा रिश्तों का : महफूज़ (Mahfooz)



मुझे ऐसा लगता है कि हमारे ज़िन्दगी में एक वक़्त ऐसा आता है कि जितने भी गैर ज़रूरी चीज़ें या लोग हैं वो अपने आप फिल्टर हो जाते हैं. ऊपरवाला हमारे लिए हमेशा अच्छा ही सोचता है और वो खुद ही ऐसे लोगों को हमारे ज़िन्दगी से गायब कर देता है जो हमारे लिए आगे चल कर नुकसानदायक होंगे. ऊपरवाला हमें हमारी ज़िन्दगी में ऐसे बहुत से लोगों से मिलवाता है जिनसे हमें वो ज़िन्दगी का सबक सिखाता है. और फिर हमें किसी ऐसे से मिलवा देता है जो सिर्फ हमारे लिए ही बना होता है और हम ऐसी कोई गलती नहीं करते जो हमने अपने पिछले संबंधों में किये  थे. कोई ज़रूरी नहीं है कि जिससे वो हमें मिलवाये वो हमारा ज़िन्दगी भर का हो जाये , वो ऐसा भी कर सकता है कि उसे आपका हमसफ़र ना बना कर हमसाया बना देता है. 
(फ़ोटोज़ का ब्लॉग पोस्ट्स से कोई लेना देना नहीं है, आई डोन'ट वॉंट टू स्टील फ्रॉम गूगल विंक..विंक..)



रिश्तों का फलसफा....

कैरेक्टर हमेशा 
बिकता है 
बस बिकता और सिर्फ बिकता है.....
मोम जलता नहीं है 
पिघलता है 
और 
उसके बीच में फंसा हुआ 
धागा जलता है ....
जलता है 
और लगातार जलता है,
जब तक धागा जलता है 
मोम पिघलता रहता है. 

                  जैसे ही उसने केक काटा 
                     और मोमबत्ती बुझाई 
                   एक साल और कट गया 
                 और ज़िन्दगी एक बार और बुझ गयी 
                          कटने और बुझने की .....
                 शिकायत की कहानी है ज़िन्दगी.

मोम के बीच फंसी हुई ज़िन्दगी 
धागे की तरह धीरे धीरे जलती है 
और जिस्म ...
धागे के ख़त्म होने तक लगातार 
पिघलता है 
जब धागा पूरी तरह
जल जाता है तो
मोम .....
रिश्तों के डेस्क पर फैलता है
और 
पसर जाता है. 

(c) महफूज़ अली 


अब एक बहुत ही खूबसूरत गाना देखिये/सुनिए. बड़ा मज़ा आएगा, ऐसे गानों को आँख बंद करके सुनने में ही मज़ा आता है. दिस टाईप ऑफ़ सोंग इस ऑलवेज़ फॉर डेडिकेशन....


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