रविवार, 2 जून 2019

द पाईड पाइपर ऑफ़ हिन्दुकुश: अ स्टोरी रिडिफाइनड....

सदियों पुरानी बात है. सुदूर हिन्दुकुश पर्वतों के उस पार टीरिच नाम का एक देश हुआ करता था. वहाँ का राजा घमण्डी किस्म का था. उसके आस-पास हमेशा चाटुकारों का जमघट लगा रहता था. राजा अपनी बातों को सच साबित करने के लिए ज़्यादातर झूठ और रीढविहीन दलीलों का इस्तेमाल किया करता था. राजा होने की वजह से सब उसकी हाँ में हाँ मिलाते थे. दरबारियों की भी हालत ऐसी थी कि राजा के सामने गलत को गलत बोलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे. जब-तब बेसिर-पैर के करों के बोझ से जनता को दबाया जाता था. कुछ दरबारियों को अत्याचार करने का राजा का मौन समर्थन भी था जिसकी आड़ में वो जनता पर ज़ुल्म किया करते थे. 






इन्हीं सब हालातों के बीच एक बार देश में भीषण महामारी फ़ैल गई. किसी के भी समझ नहीं आ रहा था कि यह महामारी कहाँ से आई है और कैसे फ़ैल रही है? लोग मर रहे थे और बचने के लिए यहाँ वहां भाग रहे थे. किसी के पास भी महामारी को रोकने के लिए उपाय नहीं. जनता त्राहि माम - त्राहि माम कर रही थी मगर काफी ऊँचाई पर महल के सुरक्षित और मज़बूत किले में रहने की वजह से राजा को महामारी से कोई डर नहीं लग रहा था न ही उसे जनता के मरने की कोई फ़िक्र थी. वो अपने ही जहान में सुकून से था. 

राजा को दरबारियों ने बताया कि अगर इस महामारी से निपटने का जल्दी ही कोई उपाय नहीं किया गया तो जनता विद्रोह कर देगी और इतनी बड़ी तादाद में विद्रोह को रोकना मुश्किल हो जायेगा. राजा को भी महसूस जुआ कि जल्द ही अगर कुछ नहीं किया गया तो विद्रोह के कारण राज करना मुश्किल हो जायेगा. राजा ने दरबारियों की आपातकालीन बैठक तुरंत बुलाई और उस बैठक में महामारी का कारण पता लगाने का निर्देश दिया. सम्बंधित दरबारियों ने अपने अपने संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करते हुए महामारी का पता लगाने की भरपूर कोशिश की जो कि रंग लाई. महामारी का कारण राज्य में चूहों की बढती तादाद थी जिसकी वजह से महामारी फ़ैल रही रही थी. राज वैद्य ने इस महामारी का नाम प्लेग बताया जिसकी वजह से लोग मर रहे थे और गाँव के गाँव महामारी की चपेट में आ कर साफ़ हो रहे थे. राजा और समस्त दरबारी ऊँचाई पर सुरक्षित जगह पर रहने की वजह से इस महामारी से बचे हुए थे मगर जनता मर रही थी. 

हालात को देखते हुए महामारी से निपटने का जब कोई उपाय नहीं सूझा तो राजा ने मुनादी करने का आदेश दिया जिसमें कहा गया कि "जो कोई भी देश और प्रजा को चूहों द्वारा उत्पन्न की गई इस प्लेग नामक महामारी से मुक्त करेगा उसे राजा अपना आधा राज-पाट ईनाम स्वरुप दे देंगे". प्लेग से निपटने के लिए इतनी बड़ी तादाद में चूहों को मारना तकरीबन नामुमकिन था. और प्रजा और आस-पास के इलाकों से भी अब तक कोई इस समस्या को दूर करने सामने नहीं आया. एक दिन एक गडरिया राजा के दरबार में आया. उसने रंग-बिरंगी अजीब सी धोती और कुरता पहना हुआ था और दाँयें हाथों की उँगलियों में एक बांसुरी फँसी हुई थी. उस गडरिये ने राजा से कहा कि वो उसके राज्य से चूहों का ही सफाया कर देगा तो जब चूहे ही नहीं रहेंगे तो यह प्लेग नामक महामारी भी ख़त्म हो जाएगी. राजा को उस गडरिये में अपना राज-पाट बचाने की उम्मीद नज़र आई. गडरिये ने भी राजा से आधे राज-पाट के वादे को पक्का किया. गडरिये ने राजा को बताया कि वो अपनी बाँसुरी बजा कर सारे चूहों को सम्मोहित कर देगा और उन्हें अपने पीछे ले जा कर समुन्द्र में डुबो देगा और इस तरह से सारे चूहे मर जायेंगे और राज्य से महामारी ख़त्म हो जाएगी. 

राजा को बाँसुरी से चूहों के सम्मोहित होने की बात पर यकीन नहीं हुआ मगर उसके पास गडरिये की बात पर यकीन करने के सिवाय और कोई चारा नहीं था. राजा को पूरा यकीन था कि ऐसा कुछ नहीं होगा और उसे अपना आधा राज-पाट ईनाम स्वरुप नहीं देना पड़ेगा. इसी यकीन में राजा बेफिक्र सो गया. अगली सुबह राजा ने उठ कर अपने महल की ऊंचाई से देखा कि अनगिनत चूहे किसी अनजान धुन के पीछे-पीछे अनुशासन में जा रहे थे, राजा को सिर्फ धुन सुनाई दे रही थी और वो गडरिया कहीं नज़र नहीं आ रहा था. राजा समझ गया कि चूहों की इतनी लम्बी कतार में गडरिया कहीं बहुत आगे है जो अपने धुन की तान पर चूहों को राज्य से बाहर कर रहा है. 



शाम तक सारे चूहे राज्य से ख़त्म हो चुके थे. गडरिये ने अपने वादे अनुसार सबको समुन्द्र में डुबो दिया था. अगली सुबह अपनी उँगलियों में वही बाँसुरी फँसाये जिसे उसने बजा कर चूहों का ख़ात्मा किया था गडरिया राजा के दरबार में पहुँचा और राजा से अपना वादा पूरा करने को कहा. राजा अपने वादे से मुकर गया. राजा को मुकरते देख दरबारियों को कोई हैरानी नहीं हुई और न ही कोई हैरानी गडरिये को हुई. गडरिया चुपचाप राजा के दरबार से चला गया. राजा और उसके दरबारी इसे एक मामूली घटना समझ कर भूल गए. अगली सुबह राजा सो कर उठा तो उसे अपने आस-पास कोई भी नज़र नहीं आया. उसने अपने कारिंदों और नौकरों को आवाज़ दी मगर कोई नहीं सुना. हैरान-परेशान राजा उठा और उठ कर अपने बारजा में आया जहाँ से उसे अपना पूरा शहर दिखता था. राजा ने एक नज़र शहर पर डाली उसे कहीं कोई भी इंसान नज़र नहीं आया. 



एक अजीब सी मुर्दनी पूरे शहर पर छाई हुई थी कि तभी राजा की नज़र महल के बगल से निकलने वाली सड़क पर पड़ी. हजारों की संख्या में भीड़ खामोशी के साथ किसी धुन के पीछे जा रही थी. राजा भी नेपथ्य में विलीन होती धुन को सुन रहा था. राजा के राज्य में अब एक भी इन्सान नहीं बचा था. अब राजा के समझ में आ गया कि वो राजा भी जनता की ही वजह से है. बिना जनता कैसा राजा? 

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

लखनऊ: गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल- महफूज़ (Mahfooz)

"लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ-मीनार नहीं,
सिर्फ एक शहर नहीं,कूचा-ओ-बाज़ार नहीं.....
इसके दामन में मोहब्बत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं..."



अब ज़रा लखनऊ की जगह हिंदुस्तान का कोई भी शहर इमेजिन कर लीजिये... खराब लगा न? लखनऊ के ही बगल में कानपुर है... अब ज़रा कानपुर को इमेजिन कर के देखिये. मन खिन्न हो जायेगा... ऐसे ही कई शहर सोच लीजिये आप लखनऊ से तुलना नहीं कर सकते. यहाँ की ज़बान, यहाँ की विरासत, यहाँ का आर्किटेक्चर, यहाँ का खाना, यहाँ के लोग, यहाँ लोग लोग धीमे, धीरे और सलीके से बोलते हैं. यहाँ की फिज़ा... आब-ओ-हवा... और यहाँ के लोगों की शक्लों की बात ही अलग है. हर तरफ सुंदर लोग दिखेंगे. कम खूबसूरती का यहाँ नाम-ओ-निशान नहीं है... यहाँ का ज़र्रा ज़र्रा खूबसूरत है. लखनऊ का इतिहास, सांस्कृतिक विरासत, गंगा-जमुनी तहज़ीब... हर वर्ग-सम्प्रदाय का आपस में प्यार बेजोड़ है. यही आपसी प्यार वह धागा है जो यहाँ के हर निवासियों को बिना भेद-भाव के आपस में जोड़ता है. हमारे लखनऊ का जातीय और सांस्कृतिक इकाई के रूप में एक रुतबा है जिससे हमारे हिंदुस्तान का निर्माण हुआ है. यहाँ के नवाब आज भी अपनी ठसक से दुनिया में मिसाल कायम करते हैं. आप दुनिया में कहीं भी जायेंगे और अगर लखनऊ वाले हैं तो लखनऊ को मिस ज़रूर करेंगे. दुनिया में आप सिर्फ इतना बता दीजिये कि आप लखनऊ से हैं तो इज्ज़त आपकी मोहताज होगी... कोई ऐसा शहर आपको इतनी इज्ज़त नहीं दिला सकता जो सिर्फ लखनऊ शब्द में ही काफी है. यहाँ की धार्मिक एकता को देखते हुए यही कामना करता हूँ कि पूरे देश का नाम बदल कर लखनऊ कर देना चाहिए. शान्ति अपने आप आ जाएगी.


चलते-चलते: लखनऊ वाले अलग से "जान" लिए जाते हैं,
अपनी ज़बान से पहचान लिए जाते हैं. © महफूज़

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

आईये जानें 11, 51, 101, 501, 1001 जैसे रुपयों को गिफ्ट के रूप में क्यूँ देते हैं? : महफूज़ (Mahfooz)

हम सब लोग अक्सर शादी-ब्याह, जन्मदिन, और ऐसे ही और किसी शुभ अवसर पर 11, 51, 101, 501, 1001 जैसे रुपयों को गिफ्ट के रूप में देते हैं जिन्हें हम शगुन कहते हैं. क्या कभी हम लोगों ने सोचा है कि आख़िर यह औड (Odd) नंबर्स में ही क्यूँ हम लोग शगुन देते हैं? और इसे शुभ क्यूँ कहते हैं? दरअसल इसका इतिहास कोई ज्यादा पुराना नहीं है... बात तबकी है जब भारत में 1542 में शेर शाह सूरी ने पहली बार रुपये छापे. इन रुपयों के छपने से पहले चांदी के किसी भी वज़न के सिक्कों को रूपया कहा जाता था. "रुपये' शब्द का चलन शेर शाह सूरी ने ही चलाया और इसी रुपये के साथ 'आना" का भी आविष्कार हुआ मगर 'आना' उस वक़्त उतना पोपुलर नहीं हुआ और वक़्त के साथ धीरे धीरे प्रचलन में आया. 

उस ज़माने के लोग हर त्यौहार, रस्म-शादी-जन्म जैसे अवसरों पर बीस आना का दान करते थे. इस बीस आने की वैल्यू एक रुपये पच्चीस पैसे के बराबर हुआ करती थी. उस ज़माने में बीस आने की बहुत कीमत हुआ करती थी. सारे दान वगैरह बीस आने के रूप में ही दिए जाते थे. धीरे धीरे वक़्त बदला और बदलते वक़्त के हिसाब से बीस आना भी बदला. बाद में रुपये की कीमतों में परिवर्तन की वजह से बीस आने में भी परिवर्तन हुआ तो यह परिवर्तन इवन नंबर्स में आया जिसके आख़िर में जीरो यानि कि शून्य आने लगा और शून्य को अपशगुन माना जाने लगा और लोगों ने इस शून्य को हटाने के लिए एक का इस्तेमाल किया और तबसे यह आजतक प्रचलन में है. 

जीरो यानि कि शून्य का एक मतलब यह भी होता था कि लेन-देन का व्यवहार ख़त्म...इसलिए भी शून्य से बचते थे. एक ज़माने में बीस आने का दान "महादान" कहलाता था. हिन्दू धर्म में इसके रेगार्डिंग एक बात और प्रचलित है वो यह कि शगुन देते समय मूल धन (Principal Amount) जैसे कि 500 रूपये वो हम आपकी ज़रूरतों के लिए आपको दे रहे हैं और जो एक रूपया हम अलग से जो आपको दे रहे हैं उसे आप सही (बुरे) वक़्त के लिए बचा कर रखें या कहीं इन्वेस्ट या दान करके अपनी सम्पत्ति और कर्मों में इजाफा करिए. कहते हैं जब दो अलग सभ्यता एक दूसरे के साथ रहने लगती है तो एक दूसरे के संस्कार और कुछ अपनाये जा सकने वाले रीति-रीवाज़ों को भी अपना लेती है यही कारण है कि 'हिन्दू धर्म की यह दानशीलता भारतीय मुसलमानों' में भी पायी जाती है. शगुन के यह रुपये मुसलमान भी वैसे ही शुभ अवसरों पर देते हैं जैसे कि हिन्दू.

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

हाय! रे हिंदी.... तेरा दर्द ना जाने कोये: महफूज़ (Mahfooz)

कल जब मैं अपना टाटा स्काई का डी.टी.एच. ऑनलाइन रिचार्ज कर रहा था तो रिचार्जिंग और प्लान में कोई दिक्कत आ रही थी जिस वजह से रिचार्ज नहीं हो रहा था. तो मैंने कस्टमर केयर पर नंबर मिलाया तो वौइस् सर्विस ने कहा कि "अंग्रेजी के लिए एक दबाइए ' और 'हिंदी के लिए दो"... अब टच स्क्रीन फोन है तो इत्तेफ़ाक से अंग्रेजी के लिए एक ही दबा... दो मिनट टाटा का कंपनी एंथम सुनाने के बाद वहां से फोन उठा और आवाज़ आई कि "दिस इज़ पीटर ! हाउ मे आई हेल्प यू?" अब पीटर से मैंने हिंदी में अपनी प्रॉब्लम बतानी शुरू की... तो थोडा सा सुनने के बाद पीटर ने मुझसे इंग्लिश में ही कहा कि 'आय डोंट अंडरस्टैंड हिंदी." मैंने कहा "क्या?" तो पीटर ने फिर "हिंदी" में कहा कि "मुझे हिंदी नहीं आती"... मैंने फ़ौरन ही धोने का यह मौका लपक लिया. मैंने कहा अब बताता हूँ इसको गलत आदमी से पंगे ले लिए इसने. अब पीटर को तो यह पता नहीं था कि कहाँ उसने हाथ डाल दिया? 

मैंने फिर पीटर से हिंदी में ही कहा कि "ठीक है! मैं अपनी प्रॉब्लम इंग्लिश में बताता हूँ." मैंने फिर कहा "आर यू रेडी पीटर?" पीटर ने कहा 'यस! आय एम रेडी. फिर उसे मैंने "अमेरिकन एक्सेंट" में अपनी प्रॉब्लम छ सौ किलोमीटर प्रति घंटे के स्पीड से बतानी शुरू की... इसी बीच वो सिर्फ वो आंयें-आंयें करता रहा... मैंने पीटर से पूछा "आर! यू गेटिंग मी?" पीटर ने कहा "सर! काइंडली स्लो योर वौइस् सो दैट आई कुड अंडरस्टैंड? मैंने फिर अमेरिकन एक्सेंट में ही "दस किलोमीटर प्रति घंटे" के हिसाब से धीरे धीरे उसे अपनी बात समझाई मगर उसके समझ में नहीं आया. पीटर चुप. मैं जवाब के इंतज़ार में. पीटर ने फिर कहा "सर! प्लीज़ मेक योर इंग्लिश इजी. 

मैंने कहा 'ओके! फिर मैंने अमेरिकन रोटासीज्म (Rhotacism) स्टाइल में बोलना शुरू किया. अब पीटर रोने वाली स्थिति में आ गया. "वॉट हैपंड पीटर?" मैंने पूछा. पीटर ने हिंदी में कहा कि नहीं सर मैं आपकी इंग्लिश समझ नहीं पा रहा. अब मैंने पीटर को अपनी पूरी प्रॉब्लम हिंदी में बता दी और मुश्किल से "तीस सेकंड" में पीटर ने मेरी प्रॉब्लम सोल्व कर दी. पीटर ने बताया कि मैंने अंग्रेजी वाला बटन दबाया था इसलिए उसकी मजबूरी थी. मैंने उसे बताया कि "पीटर! अगर तुम मुझसे हिंदी नहीं आती कहने के बजाये यह बात बता देते तो बीस मिनट ना तुम्हारे वेस्ट होते न मेरे". मुझे इस बात का भी यकीन है कि उसका नाम पीटर नहीं था. वैसे पीटर ने एक सबक यह भी सीखा होगा कि कभी किसी को अंडर-एस्टीमेट नहीं करना चाहिए... मगर फोन रखने के बाद मेरे मन को बहुत शान्ति मिली.

बुधवार, 30 सितंबर 2015

हॉर्न ओके प्लीज (Horn OK Please): Mahfooz Ali (महफूज़)

हम सबने अक्सर भारतीय ट्रकों के पीछे हॉर्न ओके प्लीज (Horn OK Please) लिखा देखा है. कई बार पढ़ कर हंसे भी हैं और कई बार आपस में दोस्तों से, टीचर से या बड़े बूढों से पूछा भी है कि आख़िर ट्रक के पीछे ऐसा क्यूँ लिखते हैं? हमने अक्सर देखा होगा कि हॉर्न (Horn) और प्लीज (Please) के बीच में बड़ा सा ओके (OK) लिखा होता है. 

द्वितीय विश्व युद्ध के समय पूरे विश्व में पेट्रोल की बहुत कमी हो गयी थी जिस वजह से ट्रांसपोर्टेशन केरोसिन पर डिपेंड हो गया था और युद्ध में रसद सामग्री केरोसिन आधारित वाहनों से ही हर जगह पहुंचाई जा रही थी. केरोसिन का नेचर (प्रकृति) बहुत ही प्रतिक्रियाशील होता है तो अक्सर ट्रक वगैरह में चलते चलते आग लग जाती थी जिससे कि पीछे और अगल बगल वाले वाहनों को भी नुक्सान हो जाता था. इस वजह से हर ट्रक के पीछे लिखा होता था हॉर्न ओके प्लीज... जिसमें से ओके (OK) बीच में बड़ा इसलिए लिखते थे क्यूंकि ओके (OK) का मतलब होता था ऑन केरोसिन (On Kerosene) मतलब केरोसिन से चलने वाला वाहन ताकि लोग दूर से देख लें और एक दूरी बना कर रखें और ओवरटेक हॉर्न देते हुए करें. 

पूरी दुनिया को पता है कि हम भारतीय बिना नदी में उतरे ही गहराई बताने लगते हैं. धीरे धीरे यह भारत में एक अनजाना बिना मतलब में ट्रेंड बन गया जो आज तक कायम है. कभी टाटा कंपनी ने जब अपना औल-पर्पस ओके साबुन लांच किया था तो इस ट्रक के पीछे लिखे ओके को अपनी मार्केटिंग में बहुत भुनाया था. तो अब जब भी ट्रक के पीछे हॉर्न ओके प्लीज (Horn OK Please) को आप देखेंगे तो मुझे भी याद करेंगे. है ना यूनिक जानकारी?

रविवार, 20 सितंबर 2015

फेसबुक पर धार्मिक दंगे करने वालों को पहचानिए : महफूज़

मैं जब भी फेसबुक पर लोगों को हिन्दू-मुस्लिम झगडे या गंदी धार्मिक आहत करने वाली बातें करते देखता हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि इस टाइप के लोग एक दूसरे से जैसे कह रहे हों कि : भाई! मैं इक कुत्ता हूँ ... ठीक वैसे ही जैसे तुम हो ...और तुम्हे मालूम ही है जैसे कि तुम्हे उन्मुक्त होकर भौंकना पसंद है, वैसे ही मुझे भी पसंद है और यही हमारा नेचर है. आप जब ऐसे लोगों को जो धार्मिक गंदगी या उन्माद फैलाने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं बहुत आसानी से पहचान सकते हैं. एक तो इनका फॅमिली, स्कूल और दोस्तों का बैकग्राउंड कमज़ोर होता है, 



दूसरा इस तरह के लोग अंडर-एम्प्लोयेड या छोटे कामों में एम्प्लोयेड होते हैं, मोस्टली बेरोज़गार होते हैं, लडकियां/छोटे बच्चे/महिलाएं/हायर पढ़ा लिखा क्लास इनके पास नहीं फटकते, इनके घर की महिलायें मोस्टली प्रताड़ित होती हैं, ऐसे लोग स्कूल टाइम से ही नेग्लेक्टेड होते हैं... ऐसे लोगों के बाप का बिहेवियर इनके अपने घर में खराब होता है... और यह राजनीतिज्ञों और फ़िल्मी लोगों से बहुत इम्प्रेस्ड रहते हैं क्यूंकि इन लोगों की अपनी कोई पर्सनालिटी नहीं होती तो यह दूसरों में खुद को या मसीहा तलाशते हैं. मेरा धर्म ... तेरा धर्म बतियाने वालों से दूर रहना चाहिए .... यह लोग आपकी पर्सनालिटी भी खराब करते हैं. सभ्य समाज में लोग धर्म को घर के अन्दर रखते हैं.

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

###कविता: इतिहास के अतीत से देश के वर्तमान तक###

###कविता: इतिहास के अतीत से देश के वर्तमान तक###
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सुनता था ईंटों को
दीमकें नहीं खातीं
संग्रहालय के चित्रों को 
मौत नहीं आती....
एक खाकी धुंधला रंग 
नन्हों की स्कूल दीवारों पर
टंगा रहता है,
इतिहास के अतीत में 
जकड़ा भविष्य 
छूट जाता है 
और देश का वर्तमान 
धर्म के रंग में खो जाता है. 

(c) महफूज़ 

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

ईश्वर, अल्लाह, खुदा, भगवान् या गॉड… वो ना तो पैदा होता है ना ही मरता है: महफूज़

अगर आप सारे धर्मों की स्टडी (स्टडी मीन्स वाकई में स्टडी) करें तो पायेंगे कि जिसे हम ईश्वर, अल्लाह, खुदा, भगवान् या गॉड कहते हैं.… वो ना तो पैदा होता है ना ही मरता है न ही यह शादी करता है न ही सेक्स, ना ही इसे मेन्सेस होते हैं ना इसे बच्चे पैदा करने की ज़रुरत है.ना ही इसे गुस्सा आता है ना ही इसे लड़ाई-झगडे या झूठ बोलने की ज़रूरत है. ना ही इसे प्रसाद, चढ़ावे, चादर या किसी भी प्रकार के धन की ज़रुरत है. ना ही खुद की पूजा या इबादत करने के लिए जोर-ज़बरदस्ती करता है. ना ही इसे किसी हथियार की ज़रुरत है ना ही किसी चमत्कार की. ना ही इसे नौटंकी की ज़रूरत है ना ही इलाज की, ना तो यह स्त्री है ना ही पुरुष. यह तो निराकार है. इसका कोई आकार नहीं है. 

इसलिए धर्म को लेकर आपसी झगड़ों से दूर रहना चाहिए. जितने भी लोग धर्म को लेकर झगड़ रहे हैं वो जाहिल और औसत (Average) लोग हैं. लोग इतने जाहिल हैं कि सुनी सुनाई बातों पर ज्यादा यकीन करेंगे बनिस्बत खुद पढने के. हर इंसान अगर किसी भी धर्म में पैदा हुआ है तो यह उसकी गलती नहीं है ना ही वो एप्लीकेशन देता है अपने धर्म को चूज़ करने की. हर इंसान एक्सीडेंटल पैदा होता है... डिस्चार्ज या स्खलन का नतीजा है. कोई भी इंसान यह सोच कर सेक्स नहीं करता कि आज तो राहुल, सलीम या जॉर्ज को पैदा करूँगा...मौज मस्ती में सब पैदा हो जाते हैं. 

बहुत सारे धर्म ऐसे हैं जिनमें जाहिल ज्यादा पैदा होते हैं क्यूंकि वो खुद अपना धर्म नहीं समझ पाते क्यूंकि पढ़ते बिलकुल नहीं और सुनते ज्यादा हैं. सब लोगों ने अपने आप को बड़ा समझना शुरू कर दिया है. दुनिया का हर धर्म खुद को साइंटिफिक कहता है मगर इंसानियत से नफरत करना कोई साइंस कभी नहीं कहता.पढो जाहिलों पढो.... यह politicians तुम्हे आपस में अपने फायदे के लिए लड़ायेंगे और खुद आपस में हर धर्म वाले से मिल जुल कर रहेंगे और तुम्हे उलझा कर रखेंगे बेसिर पैर की चीज़ों में. कभी किसी पहुँचवाले का नुक्सान होते देखा सुना है? 

मैंने अपना खुद का धार्मिक त्याग कर रखा है... मेरा नाम मेरे साथ सिर्फ इसलिए हैं क्यूंकि मैंने जब आँख खोली तो यही नाम पाया. धर्म से मुझे इंसानों ने जोड़ा. बड़ा हुआ तो नाम-धर्म तो नहीं हाँ सोच को ज़रूर बदल पाया क्यूंकि मेरे ईश्वर ने मुझे यही एक चीज़ दी थी. और यही एक चीज़ ले कर जाऊंगा. बहुत सारे लोगों को शिकायत होती है कि मैं उनकी बात का जवाब नहीं देता तो मेरा उनको जवाब यह है कि भाई अगर तुम्हारा वो लेवल होगा तो ज़रूर दूंगा. अगर मैंने किसी की भी बात का जवाब नहीं दिया तो वो यह समझ ले कि सवाल लेवल का है.

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

##‪#‎गीली‬ नदी###







तुम्हारे और मेरे बीच में 
एक नदी बहती है,
जिसके सूखने की संभावना 
बिलकुल भी नहीं है ....
मगर जब तल में कंकड़ बन ही जाते हैं
तो इन्हें
समेटने के लिए
तुम्हे नदी हो जाना चाहिए....

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

T-Shirt of poet Mahfooz Ali is for sale in India...

Dear Friends,

The Poem "Fire is still alive" you are glancing over the T-Shirt is of famous International English Poet "Mahfooz Ali". He is an author, activist, philanthropist, and blogger apart from an Educationist from Lucknow, INDIA. This poem is being taught at Wisconsin University, Madison State (U.S.A.) for the last five years. This poem has introduced a revolutionary change into the eco-system of US and that's why got published on T-shirt to educate each US citizen to save their forestry. 

In India this printed T-Shirt is available for sale now. The proceeds from this T-shirt will go to the widows and dependents of the farmers' of PUNJAB State in INDIA who committed suicide due to the State Government Policies of agriculture, banking and lending systems and compulsion to pay their debts to SAAHUKAARS (Local Money Lenders) through an International PROJECT BUILDING BRIDGES INDIA. 

The T-shirt is of very fine quality weaved from the imported cotton SISAL fiber and high quality printing. As the proceeds is for charity purpose we have kept the price in equilibrium worth Rs. 400/- each (Four Hundred Only). 

You can help by circulating this message in your campus, apartments, offices and online. 



One can also order online by depositing money in the bank account. For further details please get in touch to the email: mankaonline@gmail.com 

Regards, 



रविवार, 5 अक्टूबर 2014

##‪#‎डेडली‬ कोंडोलेंस###





##‪#‎डेडली‬ कोंडोलेंस### 
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सूचना के आधार पर,
लोकतंत्र की ही तरह 
वहां मौत तलाशी जा रही थी,
कुछ शोक सभा का ज़िक्र कर रहे थे
तो कुछ मौत के बहाने मिलने वालों 
की लिस्ट बना रहे थे। 
कहीं से किसी की रोने की आवाज़ आ रही थी 
तो कहीं धूप सेंकी जा रही थी... 
कुल मिला कर वहां मरने का समाचार था 
मगर कोई मरा नहीं था 
सिवाय संवेदनाओं के।



(c) महफूज़ अली

रविवार, 21 सितंबर 2014

###जद्दोजहद में शहर-ऐ-लखनऊ: एक कविता###



जद्दोजहद में शहर-ऐ-लखनऊ: एक कविता 
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पहली बार मैंने तस्वीर के चिकत्ते वाले हिस्से को 
आगे से देखा है,
कच्ची पक्की पगडंडियों के आस-पास हँसते तमीज़ को 
आज के लखनऊ ने सिमेंटी संस्कृति में बदल दिया 
तहज़ीब मिटटी की दीवार वाले मकान के घुप्प 
अँधेरे में खामोश रहती है या ऊँघ जाती है 
जब कभी हमारे भीतर वात्सल्य भरता है,
गोमती परिवर्तन चौक तक आ जाती है। 
और कच्ची दीवारें भरभरा कर बाढ़ के पानी में 
घुल जाती है। 
पुराने लोगों को दुर्घटना मानता शहर 
खुद के पैरों तले  कुचला गया है। 
हम सब उलटे खड़े हैं 
और पीठ की तरफ से इतिहास को पहचानने के लिए 
आज के दोगले चरित्र के भीतरी स्वरुप को 
हम रात के सन्नाटे से ढ़की लम्बी 
सड़क पर जलती-बुझती लाइट के 
सफ़ेद अँधेरे में छुपा  रहे हैं,
अब शहर के जिस्म पर लूट का अनुशासन है 
सामान की तरह इंसान की खरीद-फरोख्त  जारी है 
षड्यंत्र...अस्पताल और जनसँख्या के व्यक्तित्व की 
विशेषता बन गया है।।

(c) महफूज़ अली 

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

‪#‎## समंदर‬ आश्वासनों का: एक ‪कविता‬ ###



आश्वासनों के ढेर पर मैं गिर गया हूँ,
किनारा कोई दिखता नहीं 
भीड़ बढ़ती जा रही है 
ख़ामोश कमरा है, 
कहीं कोई निशान नहीं
आदमी हूँ कुर्सियों से डर गया हूँ....
अंत तक आकाश में,
प्रश्न करते सितारे,
आश्वासनों की रात में,
चलते नज़ारे,
नींव अंधी खोखली सी,
खा रही मुझको,
चाँद में 
समंदर उतर गया है....


© महफूज़

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

##‪#‎इंडिया‬ : एक श्रद्धांजली ###

देश की आँखें 
विश्व के इतिहास में 
अब तक गड़ी हैं,
रात ने एड़ी बजाई 
भोर पहरे पर खड़ी है।
फ़लक चूमते अरमान,
धरती की नसों से,
कमरे का आसमान
देश बन रहा है,
भाषणों में मौत का पैगाम
भारत जल रहा है
और दिल्ली की तस्वीर
आँखों में गड़ी है।
गोलियों की बाढ़,
लाशें गिन रही हैं,
बारूद के पेड़ हैं,
बम के काफिले हैं,
जलता हुआ भारत
धुंआ दे रहा है,
मौत से कुर्बानियां
कितनी बड़ी हैं।
बर्फानी रातों में,
ग्लेशियर पर
एकांत यात्रा कर रहा है,
इन शहीदों के लिए
इतिहास आंसू झर रहा है,
इसलिए मौत की पगडंडियों पर,
ज़िन्दगी जम कर लड़ी है।
विचारक जागते हैं जब,
करवट विश्व लेता है,
पुराना देश धरती पर
नए इम्तिहान देता है,
क्रान्ति के तूफ़ान उठते हैं
मौत की बाहें बढ़ी हैं,
रात ने एड़ी बजाई
भोर पहरे पर खड़ी है।।


(c) महफूज़ अली

शनिवार, 29 मार्च 2014

###कविता:- वायसे - वरसा ###



शब्द टॉर्च नहीं होते,
जब यह अंधियारे में बहते हैं
तब आदमी का एकांत भंग हो जाता है। 
कभी-कभी शब्द 
आदमी के भीतर बहता है 
और कभी 
आदमी शब्द के भीतर बहता है।।


(c) महफूज़ अली 

बुधवार, 5 मार्च 2014

###कविता: नहीं चाहिए ऐसा समाजवाद####

सामान की तरह आदमी की खरीद फ़रोख्त जारी है,
अब नई पीढ़ी अपना फालतू वक़्त 
भीड़ बन कर गुंडों के नेतृत्व में 
हड़तालों, जुलूसों और धरनों में काट रही है। 
विश्वविद्यालय 
पत्रांक आने के बाद तक,
दयांक, भिक्षांक की यात्रा करते हुए 
कुर्सी से चिपके सपेरों के कारण 
लूटांक तक का भावी कार्यक्रम बना रहा है।
अवध एक नगरी थी,
लखनऊ एक पर्स है
जिसकी भीतरी दीवारों पर कंठे और कोतवाली
के पोस्टर चिपके हुए हैं,
जनतंत्र की क़तारों में खड़ा प्रदेश
स्वयं के बुझने से बेचैन नहीं है,
दरअसल अपनी पसलियों में सुरंग खोद रहा है।
कुछ नए हवाले देकर सम्बन्धों के पेट पर
"समाजवाद" लिख दिया गया है,
और बातचीत के बीच का संलाप धंधा हो गया है।
अब अँधेरा एक आदत है
जिसे हम रोज़ तम्बाकू की तरह
अपनी हथेलियों पर मसलकर
कुछ देर बाद
शहर की गलियों
पर थूक देते हैं।।

(c) महफूज़ अली

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

धर्म-निरपेक्ष और युवा भारत ही देश और समय की ज़रूरत है : महफूज़

किसी भी देश के नागरिकों की बुनियादी ज़रूरत क्या हो सकती है? रोटी, कपडा और मकान के बाद सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक सुरक्षा व पारस्परिक भागीदारिता किसी भी नागरिक का मूल अधिकार है। किसी भी एक के डांवाडोल स्थिति में आने पर अराजकता पैदा हो सकती है और देश में एक अशांति व्याप्त हो सकती है। यह देश के शासकों पर निर्भर करता है कि अपने हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा किस प्रकार करते हैं? अनेकता में एकता हमारे देश की पहचान रही है। इतनी विविधताओं के बाद भी हमने एक देश का नारा बुलंद किया है।  फिर भी आज देश में एक छिपी हुई अराजकता व्याप्त है, लोग अभी भी धर्म, जाति और क्षेत्रवाद में बंटे हुए हैं और चंद लोग इसे बढ़ावा दे कर गोरिल्ला युद्ध की तरफ देश को अग्रसित करने की कोशिश कर रहे हैं। 

धर्म-निरपेक्षता की व्याख्या को अब कुछ लोग अलग मायने देने लगे हैं।  देश के राजनेता अब धर्म-निरपेक्षता शब्द पर लोगों को बांटने पर लगे हैं।  अब धर्म-निरपेक्ष शब्द से लोगों को आपस में लड़वाने की कोशिश हो रही है।  एक वर्ग को दूसरे वर्ग से इसी शब्द के आधार पर भड़काया जा रहा है और हम सिर्फ मूक दर्शक बने हालात को देख रहे हैं।  देश में आज हर वर्ग अपने आप में असंतुष्ट है किसी को हिन्दू से समस्या है तो किसी को मुसलमान से तो किसी को किसी जाति से।  हर वर्ग एक दूसरे को संशय की दृष्टि से देख रहा है मगर मिलकर साथ चलने की नहीं सोच रहा है।  आज देश में सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देने की बात कोई भी राजनीतिक दल नहीं करता है हर दल और उसके नेता आपस में लोगों को द्वेष और नफरत की ओर धकेलने में लगे हुए हैं। यह देश धर्म-निरपेक्ष हो कर ही तरक्की कर सकता है किसी भी एक वर्ग को नज़रअंदाज़ करके हम देश में  अराजकता की स्तिथि ही पैदा करेंगे। 

देश के नेताओं को भी समझना होगा कि यह समय राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का नहीं है और देश की एकता को खंडित होने से बचाने की ज़रूरत है।  देश के नागरिकों को भी यह समझना होगा कि पहले हम भारतीय हैं और उसके बाद धर्म पालनकर्ता। आज देश में जिस तरह हिन्दू मुसलमान से और मुसलमान हिन्दू से अलग थलग है उसके लिए हिन्दू-मुसलमान नहीं इस देश के चंद राजनेता हैं जो एक दूसरे के बीच नासमझी की खाई पैदा किये हुए हैं और दोनों धर्मों के कुछ जाहिल अपने अपने स्वार्थ के लिए इस खाई को और चौड़ा कर रहे हैं। आज देश के हिन्दू-मुसलमान में आपस में एक दूसरे से कटे हुए हैं , यह आपस में एक "पारस्परिक बातचीत" से ही एक दूसरे को समझ सकते हैं और आपस की गलतफहमियों को दूर कर सकते हैं। 

आज देश का युवा वर्ग भी आपस में एक दूसरे से धार्मिक और आर्थिक आधार पर भ्रमित है। नवयुवाओं का दिमाग उपजाऊ ज़मीन की तरह होता है, अगर उन्नत विचारों के बीज बो दें तो वही उगेंगे।  आज का युवा भ्रमित है, दिशाहीन हैं उन्हें जो जैसा समझा देता है उसे ही सच मान बैठते हैं और आगे चल कर खुद को ठगा महसूस करते हैं। आज युवा पीढ़ी के दिल-दिमाग में अच्छे बीजों का रोपण करने वाले घटते जा रहे हैं।  कला, साहित्य, और विज्ञान में रोज़ नई प्रतिभाएं उभरतीं हैं परन्तु सही दिशा व मौका न मिलने से भीड़ का हिस्सा बन कर रह जाती हैं।  सवाल यह भी उठता है कि क्या हम और हमारा देश युवाओं को उभरने का मौका देता है? आज देश और देश के राजनेताओं को यही साबित करना है कि युवाओं का जोश और प्रतिभा बेकार ना जाने पाये और देश के युवाओं को जाति-धर्म से ऊपर उठायें। 

सूचना और संचार तकनीक ने युवाओं में बड़े पैमाने पर नकारात्मक बदलावों को विकसित किया है। ज़्यादातर युवा पहले खुद के बारे में सोचता है, और देश समाज के बारे में बाद में। इस लिहाज़ से ऐसे समाज और विज्ञान की ज़रूरत है जो युवाओं को राष्ट्रनिष्ठ बना सके, युवाओं को एक ऐसे ढाँचे में ढालने और गढ़ने की ज़रूरत है जो उन्हें सक्षम, कुशल, और योग्य बना सके। युवाओं के लिए वर्ष 2014 बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। आने वाले लोकसभा चुनाव के परिणाम नए  भारत के निर्माण के लिए निर्णायक होंगे।  सशक्त, स्वावलम्बी, और सक्षम भारत के लिए  साहसी और पराक्रमी नेतृत्व की ज़रूरत है। भारतीय राजनीति, अर्थनीति, और समाजनीति में सशक्तिकरण होना एक मांग है और इस मांग को सिर्फ भारत का युवा ही पूरा कर सकता है, तभी सबल, सक्षम और समर्थ भारत का निर्माण हो सकता है। 

देश की अखंडता को बरकरार रखने के लिए "सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा" को सार्थक करने की ज़रूरत है ना कि सिर्फ यह कविता में ही रह जाये।  हम ऐसा प्रयास करें की हमारी धार्मिक एकता बनी रहे और फिर से विश्व पटल पर उस फलक तक पहुंचे जहाँ भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था और यह तभी सम्भव है जब हम सब भारतीय मिलजुल कर एकजुट होकर साथ होंगे। 

शनिवार, 23 नवंबर 2013

###एक कविता: रेनेसांस (Renaissance)###





विचारक जागते हैं जब,
करवट विश्व लेता है,
पुराना देश धरती पर,
नए इम्तिहान देता है,
क्रान्ति के तूफ़ान उठते हैं
मौत की बाहें बढ़ी है,
रात ने एड़ी बजाई
भोर पहरे पर खड़ी है।

© महफूज़ 

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

### कविता: अखबारी कॉलम और कितना भूखा है ....कुछ फ़ोटोज़ ... मैं और : महफूज़ ####


सिर्फ एक कविता और कुछ फोटो :


(जॉगिंग के बाद बरगद के पेड़ के नीचे सुस्ताते हुए ... ह्म्म्म्फ़ .... ह्म्म्म्फ़्फ़्फ़) 


अखबारी कॉलम 
और विज्ञापन सूचना 
भार विहीन 
हल्की होती वेदना,
जितना तन रेतीला है 
मन उतना ही सूखा है ....
एक रोज़गार की प्रतीक्षा में 
बेरोज़गार दिन,
कितना भूखा है।।

(c) महफूज़


                                             (जयपुर के जौहरी मार्किट के एक मॉल के बाहर ....)

रविवार, 22 सितंबर 2013

अंगड़ाई, छोटा सा संस्मरण, क्वालिटी, लर्निंग मोड, शब्दों की नींद, सिर्फ पुरुषों के लिए, जानू और मेरे शोना : महफूज़

अम्म्म …. आह…(अंगड़ाई!!!!) अच्छा इस अंगड़ाई लेने का भी एक अलग मज़ा है ... थके हों या सोकर उठे हों, ज़रा सा बदन को हाथ ऊपर कर के थोडा पंजों के बल ऊपर की ओर स्ट्रेच करिए , फिर देखिये सारी की सारी थकान उतर जाएगी और एक अलग से तरो-ताज़गी फील होगी और चल दीजिये नहा धो कर अपने काम पर। अच्छा! डॉक्टर्स भी कहते हैं कि दिन भर में तीन से चार बार खड़े हो कर खुद भी यूँ ही अंगड़ाई ले लेनी चाहिए। इससे एक आपका शरीर दोबारा उर्जावान हो जाता है और काम करने की क्षमता बढ़ जाती है। साइंस तो यहाँ तक कहती है कि अंगड़ाई लेने से हड्डियों में लचीलापन मेंटेन रहता है और कई रोगों से भी बचाव हो जाता है। 

डॉक्टर से याद आया कि मेरे मित्र हैं डॉ. आनंद पाण्डेय, जो कि जाने माने ओर्थपेडीक सर्जन हैं। डॉ. आनंद के एक मित्र हैं डॉ. मुदित खन्ना जो डॉ. आनंद से दो साल जूनियर भी रहे हैं। डॉ. आनंद ने बताया कि मुदित जो हैं वो पेशे से डॉक्टर नहीं हैं जबकि ओर्थो में पी . जी . किया है डॉ मुदित ने। यह  थोडा सा सरप्राईज़िंग था मेरे लिए। डॉ . मुदित जो हैं वो पेशे से लेखक हैं और मेडिकल सब्जेक्ट्स पर ही क़िताबें लिखते हैं और उन्हें सिर्फ किताब लिखने के सालाना पांच करोड़ रुपये रॉयल्टी मिलती है। डॉ मुदित गोवा में रहते हैं और वैसे भोपाल के रहने वाले हैं। डॉ मुदित ने शादी नहीं की है और गोवा में एक आलिशान बंगले में रहते हैं और बत्तीस कारों का काफिला रखा हुआ है। और गोवा के ही एक हॉस्पिटल से अटैच्ड हैं ... मूड होता है तो पेशेंट देखते हैं नहीं तो पूरा दिन गोवा क्लब में ही रहते हैं। डॉ . मुदित ने सिविल सर्विसेज की परीक्षा एक बार पास की और तीसरी रैंक पर रहते हुए भी ज्वाइन नहीं किया। कहते हैं कि कौन फंसे? डॉ मुदित बहुत ही जिंदादिल पर्सनालिटी के इंसान हैं जिनका ज़्यादातर समय बियर और खूबसूरत लड़कियों के साथ बीतता है। डॉ. मुदित ने पहली किताब मज़ाक मज़ाक में जब एम बी बी एस फाइनल इयर में थे तभी  लिख डाली थी और पहली ही किताब पॉपुलर हो गयी थी जिसका पहला चेक उन्हें पांच लाख का मिला था और अब बाकी सिर्फ बताने के लिए है. डॉ. मुदित से मैंने जब पूछा सफलता का राज़ तो सिर्फ एक कारण बताया उन्होंने अपार्ट फ्रॉम पेरेंट्स एंड गॉड'स ब्लेस्सिंग्स कि मस्त रहो, टेंशन फ्री रहो और जो मन कहे वही करो. डॉ. मुदित जैसी शख्सियत से मिलने के बाद एक अलग ही फीलिंग आती है और यह  भी फीलिंग आ सकती है कि यार हम शायद अपनी ज़िन्दगी वेस्ट कर रहे हैं. वैसे मैंने एक चीज़ सीखी कि ज़िन्दगी में क्वालिटी और क्वालिटी लोग बहुत मायने रखते हैं. 

(डॉ  . मुदित)

(डॉ आनंद)

क्वालिटी से फिर याद आया  …. बाय गॉड बता रहा हूँ कि आज याद बहुत कुछ आ रहा है. हाँ! तो मैं बता रहा था कि ज़िन्दगी में क्वालिटी बहुत मायने रखती है ख़ास कर लोग जो आपके आस-पास हैं उनकी क्वालिटी क्या है? अगर क्वालिटी लाइफ नहीं होगी तो तरक्की रुक जाती है और क्वालिटी पैसे के अलावा एटीट्युड से भी भी आती है. और अपने आस-पास हमेशा ऐसे लोग रखिये जिनसे कुछ सीखने को मिले और जो आपको हमेशा लर्निंग मोड में रखें। जो आपकी राह में बाधा बनें तो ऐसे लोगों से दूर हो जाना ही सही है. 
(अब ये मैं ही हूँ  … यूँ ही मॉल में आनंद के साथ पिक्चर देखने गया था रात में ग्यारह बजे)

मैं हर बार सोचता हूँ कि ब्लॉग रोज़ लिखूंगा… टाइम इसकी परमिशन नहीं देता और वैसा भी मैं रोज़ नहीं लिखता था और ना ही लिख पाउँगा  … भई! इतना फ़ालतू टाइम भी तो होना चाहिए और फिर उसके बाद लिखने के लिए टॉपिक। रोज़ाना ज़िन्दगी में ऐसे बहुत से वाकये होते हैं जिन्हें लिखा जा सकता है मगर उन्हें भी लिखने के लिए शब्दों को नींद से जगाना पड़ता है और शब्दों की नींद टूटती देरी से ही है. तो जब मूड करता है तभी ही लिखना हो पाता है. आह! बहुत हुआ…. अब चलता हूँ। 

चलते चलते एक मजेदार बात सिर्फ पुरुषों के लिए (वैसे यह मैं नहीं कह रहा… एक रिसर्च ने कहा है) वो यह कि भाई अगर आपने नेट से कोई गर्ल फ्रेंड या बीवी बनायीं है और वो आपको जानू, कुत्ता, जलनटू, शोना, बेबी, या फिर कोई और प्यार के संबोधन से पुकारती है तो आप सावधान हो जाइये  … आपके अलावा और भी लोगों को ऐसे संबोधनों से पुकारा जा रहा होगा  … तस्दीक करने के लिए आप अपनी उनसे पासवर्ड अचानक में मांग कर चेक कर लीजिये  …. हा हा हा  … आँखें खुल जायेंगीं। ख़ैर! चलिए यह तो मज़ाक की बात हो गयी  … अब आपको अपनी एक सीरियस कविता पढ़वाता हूँ जो कि रियलिस्टिक कविता है : --- तो लीजिये पेश-ऐ-नज़र है ----


### अखबारी कॉलम और कितना भूखा है ####


अखबारी कॉलम 
और विज्ञापन सूचना 
भार विहीन 
हल्की होती वेदना,
जितना तन रेतीला है 
मन उतना ही सूखा है ....
एक रोज़गार की प्रतीक्षा में 
बेरोज़गार दिन,
कितना भूखा है।। 

(c) महफूज़

कविता तो चलती रहती है और कविता लिखी भी तभी जा सकती है जब भावनाएं अपने चरम पर हों  …अंत में यही मायने रखता है कि हम खुश हैं ना और बाकी दुनिया जो समझे। 

एक फेवरेट विडियो के साथ पोस्ट ख़त्म करता हूँ :--      (कमेंट बॉक्स खोलने के  बारे में सोचूंगा  … सो नो रिक्वेस्ट प्लीज)

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